हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ५५
परो १ फिर आप नहीं दुख आय ।
तजो यह जानि प्रथम्म सुभाय ॥
जथा वह रावन जित्ति २ त्रिलोक ३ ।
सुरन्नर नाग रहैं तिहिं ओक ४ ॥३१४॥
करचौ तिन बैर जबै रघुनाथ ।
मिट्यौ गढ़ लंक सुबंकम पाथ ५ ॥
कहो सर ६ कोन करैं पतिसाह ।
करै तब जंग बचो नहिं ताहि ७ ॥३१५॥
छप्पय छंद
कह हमीर सुनि दूत बचन निज असत भाखौं ।
मो बिन ८ और न कोय सेख को सरनै राखौं ॥
गहूँ खाग ९ सनमुक्ख दुहुँ अति गर्व सुद्ध द्रढ़ ।
लहै मुक्ति मग सत्य किधौं रणथंभ महा गढ़ ॥
कहियो निसंक पतिसाह सों सेख सरनि हम्मीर किय ।
सामाँन युद्ध जेते कछू सो अनंत दुग्गह जु लिय ॥३१६॥
दातार छंद
सुनि हमीर के बचन, दूत दिक्खिय दिस आयव ।
करि सलाँम कर जोरि, साह कौं १० सीस नमायव ॥
पूरब दच्छिन देस और पच्छिम दिसि आयव ।
सवै सेख फिरि थकि, कहूँ काहू न रखायव ॥
तब सेख आय रणथंभ गढ़, दीन बचन इम भक्खियौ ११ ।
सुनि हमीर करुणा सहित, सेख बचन दै राक्खयौ १२ ॥३१७ ॥
महरम खाँ वजीरोवाच
समद पार गय सेख, बार हजरत वह नहीं ।
१ परै । २ जीति । ३ तिलोक । ४ वोक । ५ माथ । ६ सरि ।
७ आहि । ८ मुझ बिन । ६ तेग । १० सौं । ११ भाखियौ । १२ राखियौ ।
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