हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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चौपाई छंद
हजरति हरषि तोर तिहिं¹ दिन्नौ ।
चूहौ² प्राण-हीन तब किन्नौ ॥
तबहीं साहि हरषि मुसकाए ।
तिय कौ ऐसे बचन सुनाए ॥२४७॥
कायर जाति तिया³ हम जानी ।
तातैं यह हम प्रथमहिं ठानी ॥
यह करनी अद्भुत तुम देखी ।
निज कर करी सु तुम अवरेखी ॥२४८॥
हँसी हुरम सुनि हजरति बानी ।
पुरुषन की तो अकथ⁴ कहानी ॥
मारैं सिंह तो न मुख भाखैं ।
जाचे नाहिं प्राण वै राखैं ॥२४६॥
मैं जग मैं ऐसा सुनि पाऊँ ।
कहैं साहि मैं बहुत बघाऊँ ॥
बकसो गुनह तो अबै बताऊँ ।
तुरत साहि कै पाइ लगाऊँ ॥
सोरठा छंद
ऐसा मोहिं बताय, सिंह मारि सिफत न करै ।
बकसो औगुन आय, जो उन तात ज मारियौ ॥ २५१ ॥
हुरम तबै कर जोरि, बार बार सिर नाय कै ।
सुनहु गुनह⁵ अब मोर, हजरति बीतयौ आपनो ॥ २५२ ॥
१ तहँ । २ चूही प्राणहीन तिहिं चीनौ । ३ तीय । ४ अकह ।
५ गुनाह जुमोर ।
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