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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

हम्मीररासो ३७
कहूँ¹ बीन बादित्र बाजंत ऐसी।
सुने राग मोहं² मृगं माल बैसी ॥२०५॥
करैं गान ताँनं पसू पच्छि मोहैं।
सुनै जीव आवंत³ जानैं न को हैं॥
सुने बीन पब्बीन⁴ सुर नाय रागैं।
रहे मोहि कै माल डारे न भागे ॥२०६॥
कहूँ राग ऐसो करैं मेघ आवैं।
तबै साह ताको बड़ी मौज चावैं ॥
असी भाँति आखेट कै रंग भीनो।
निसा घौस जातंन काहू न चीनो ॥२०७॥
तिहीं ठौर बित्यौ सुसारौ बसंतं।
रमै पातसाहं मनौ र्तिकंतं ॥
तिहीं ठौर ग्रीखम्म किन्नौ प्रबेसँ।
महा संकुलं बृक्ष राजं सुदेसं ॥२०८॥
तहाँ तेज भाँनं न जाँनं न जाँनं।
तिहीं हेत साहं रहे तास थानं⁵ ॥
समौ एक ऐसो तहाँ रौद्र आयौ।
महा पौन प्रचंड औ मेघ छायौ ॥२०९॥
कहूँ ओर पतसाह खेलैं सिकारं।
करैं केलि जेती जलं बाल लारं* ॥
भयौ अंधकारं महाघोर ऐनं।
गई सुद्धि सुझै नहीं अप्प⁶ नैनं ॥२१०॥
१ बहू। २ मोहे। ३ आनंद। ४ पर्वीन। ५ तिहीं तेज भाँनंन जाँनं
नं जातं। तिहीं हेत साहं रहे संक वातं। ६ आप।
*लार (लाल)=जो क्रीड़ा में अन्यों के पूर्व विजय प्राप्त करती हो।
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

३८ हम्मीररासो
फुरथ्यौ¹ साह को सत्थ भोजत्थ तत्थं ।
भयौ घोर अंधार सुझै न हत्थं ॥
तजी बालकीड़ा जलं त्यागि भग्गी ।
जहीं ओर दौरी भयौ मुख अग्गी ॥२११॥
किहूँ ओर दासी किहूँ ओर खोजा* ।
कहूँ ओर हुरमैं कहूँ ओर कोजा ॥
जसो होनहारं बन्यौ आय जैसो ।
करो लाख कोऊ टरै नाहिं तैसो ॥२१२॥
लिखे लेख जो नाहिं मिट्टै सुकोई ।
यही बात निश्चै सुनो सर्व सोई ॥
सरं त्यागि चल्ली सुहुरमैं सुभीत ।
कँपै गात ताको रह्यौ व्यापि सीतं ॥२१३॥
तिहीं ठौर महिमा मिले सेख आई ।
महा साहसी सूर उद्धारताई ॥
निजं धर्म साधै तजै नाहिं राचं ।
कहै जो कछू² तो निवाहंत बाचं ॥२१४॥
मिली बाल ताकौं कही दीन बाँनी ।
समै³ बाम सेखं मनौं⁴ आप जानी ॥
डरो ना कहो आप हौ कौन कोई ।
कहूँ जो उढ़ावो यहाँ बैठि मोही ॥२१५॥
तवै बाजि तैं सेख भू पै जुआयौ ।
कछू वस्त्र हो अंग ताको उढ़ायौ ॥२१६॥
दोहरा छंद
महिमा उतरे बाजि तैं, दियौ वस्त्र तिहिँ हत्थ ।
१ फुत्र्यौ । २ कहूँ । ३ उमै । ४ मनं ।
+खोजा=सेवक ।
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ३९
सीत भीत ता ना मिटी, कही हुरम यह गत्थ ॥२१७॥
पुच्छिय महिमा-साहि तब, को तू आप बताय ।
मैं घरनी पतिसाह की, रूपबिचित्रा नाय ॥२१८॥
जलक्रीड़ा हम करत सब, आयौ पौन प्रचंड ।
तब डेरन को भजि चलीं, तामैं मेघ सुमंड ॥२१९॥
भयौ भयानक तिमिर बन, सबै संत्थ गय भूल ।
मै इकली वन महँ यहाँ, डरति फिरति दुख मूल ॥२२०॥
छप्पय छंद
तब महिमा कर जोरि हुरम कूँ सीस नवायौ१ ।
चढ़यौ अस्व की पिठ्ठि दैव पहुँचाव सुभायौ ॥
कहै हुरम सुन सेख देह कंपत है मोरी ।
छिनक बैठि यहिं ठौर सरन मैं लिन्नी (लीनी) तोरी ।
कहै सेख यह बीत नहिं, तुम साहिब मैं दास तुव ।
यह धरम नाहिं उलटी कहो, सरन सदा सेवक सुमुव ॥२२१॥
सेख समो पहिचानि स्वामि सेवग न बिचारौ ।
काम रूप तुम पुरुष बीर बानैत उदारौ ॥
बहुत काल अभिलाष रही जिय मैं यह भारी ।
कौन समो वह होय मिलै महिमा गुनबारी ॥
सुइ करिय आज साहिब सहल, सकल मनोरथ सिद्ध हुव ।
दै योग भोग संयोग यह, कौन दोस जग देहु तुव ॥२२२॥
चौपाई छंद
कहै सेख तुम बेगम सच्चिय ।
ऐसी बात कहो मति कच्चिय ॥
मैं अब लों तिय जग मैं जानत ।
भगनी मात .सुत। सम माँनत ॥२२३॥
१ हुरम कहि कहि सन बोयौ ।
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४० हम्मीररासो
ता महिं तुम हजरत की बाला ।
सब कै एक वहै हकताला ॥
तातैं कहा धर्म मैं हारूँ ।
यह तो कबहुँ जिय न बिचारूँ ॥२२४॥
सुनहु सेख बेगम तिय सबहीं ।
तुम हूँ धर्म्म सुन्यौ है कबही ॥
तिय तजि लाज कहत रति जाचन ।
को नहिं धर्म जो पुरुष अराचन ॥२२५॥
तन मन धन जाचे तैं दिज्जिय ।
कह कुराँन पूरन सोइ किज्जिय१ ॥
पुरुष धर्म यह मूर न होई ।
तिय जाचत कौ नाटत कोई ॥२२६॥
सोरठा छंद
तब जिय सोचि बिचारि, मनहीं मन महिमा समुझि ।
साँची है यह नारि, धर्म उभै जग महँ प्रगट ॥२२७॥
तब महिमा मुसकाय, कर गहि आलिंगन दियौ ।
इक तरु कौं तर जाय, दियौ तुरंगम बंधि तब ॥२२८॥
जीनपोस तर डारि, सस्त्र खुल्लि रखिय निकट ।
करी सुमार सुमार, उत्कंठा तिय मिलन की ॥२२६॥
छप्पय छंद
महा मोद मन बढ़्यौ परस्पर तन मन फुल्लिव ।
मिटिव बंक मन संक निसँक ह्वै आसन भुल्लिव ॥
मानो कोक चकोर चंद लब्भव रबि लंबे ।
घन दामिनि मनु मिलिय काँम रति पति सुख फंवे ॥
१ दीजे, कीजे ( अंत्यानुप्रास )
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हम्मीररासो
४१
दुहुँ ओर सोर स्वातिक सुभो, गाढ़ो आलिंगन दियव ।
नख खंड नाहिं परसे सरहिं, सकल कोक केली कियव ॥२३०॥
अंग अंग बिनअंग* रंग बड्डिव दुहुँ ओरन ।
कढिव बिरह तन ताप परस्पर बर सत मोरन ॥
हाव भाव रति अंग मुदित बर्षत अभिलाषै ।
करत कटाक्ष प्रकास बैन मधुरै मुख भाषै ॥
गहि अंग संग आसन दियव, कोक कला रस विस्तरिव१।
आनंद द्वंद उन्माद जुत, काँम विवस दोउन भयव ॥२३१॥
तिहिं छिन इक मृगराज आनि तत्काल सुगज्जिव ।
प्रज्वलित नयन प्रचंड चँवर सिर उप्पर सज्जिव ॥
बिकट दंत मुख त्रिकट वाहु नख बिकट सुरंज्जै ।
तिहिं भय वन कै जीव सबै गजराज सुभज्जै ॥
आवत्त देखि तिहिं सिंह कौ, ह्वै सभीति तिय इम कहै ।
विधि कौन समै यह का भई, दैव बारि मैं बपु दहै ॥२३२॥
तब तिय कंपि सभीति उछरि महिमा गर लगिय ।
हे प्राणेश्वर कहा भई रसगत जु उमगिय ॥
तजहु भजहु अब वेगि, बचहु अब प्राण उबारो ।
मैं अब पलटे प्राण तजौं, तुम पर तन वारौं ॥
मुसकाय मीर तब यों कहैं, न डरि न डरि अबला सुभुव ।
तुट्टै जु आब रख्खों भुज न, कहा स्याल डर डरत तुव ॥२३३॥
छंद अर्द्धनाराच
गहे कमाँन बाँनयं, धरंत ताहिं पाँनयं ।
तज्यौ न बाल आसनं, गह्यौ सरं सरासनं ॥२३४॥
१ विध्यरिव । २ प्रफुलित ।

  • बिनअंग=अनंग ।
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४२ हम्मीररासो
सु सिद्धि राग बागयं, ढए स धीर पागयं ।
कह्यौ हँकारि त्राचयं, सम्हारि स्वाँन साचयं ॥२३५॥
करी सुगुज्ज पुंजयं, उठ्यौं सु क्रोध गुंजयं ।
धरत्थौ सु चौर सीसयं, भुजा उठाय रीसयं ॥२३६॥
जथा सुक्रोध कालयं, उठ्यौ सु सिंह वालयं ।
करं कमाँन लिन्नयं, कसी सतानि¹ दिन्नयं ॥२३७॥
लग्यौ सुबाण मन्थयं, लखी अकत्थ गत्थयं ।
लग्यौ सुबाण पार भौ, गिरद्यौ सु सिंह स्यार भौ ॥२३८॥
दोहरा छंद
सिंह मारि इक बाण तैं, भू मैँ दिन्नौ डारि ।
फिरि कमान तिहिं हथ्थ² तैं, धरी जु भूपर धारि ॥२३९॥
यहु साहस किन्नौ प्रगट, सम स्वभाव सम बुद्धि ।
गर्व हर्ष हिय नहिं कछू, प्रगटिय प्रेम प्रसिद्ध ॥२४०॥
मिलत मिलत मुसकात मृदु, कंपत हर्षंत गात ।
उचकनि लचकनि मसकिबो, सीकर हूकर बात ॥२४१॥
कवित्त छंद
कंचन लता सी थहरात अंग अंग मिलि,
सीकर समूह अंग अंगनि मैं दरसै ।
चुंबन कपोल नैन खंडन अधर नख,
गहत पयोधर प्रचंड पानि परसै ॥
आनँद उमंगन मैं मुसकात बाल तुत-
रात बतरात सतराअत रस बरसै ।
लपटनि झपटनि मसकनि अनेक अंग,
रति रंग जंग तैं अनंग रंग सरसै ॥२४२॥
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१ तान । २ हाथ ।
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हम्मीररासो ४३
छप्पय छंद
मिटी पवन परचंड, मिटिव मनमथ मद भारिव ।
हटेउ तिमर तिहिँ समय, प्रगट परगा(का)स सुधारिव ॥
सकल सत्थ जथ तत्थ, मिले अप्पन १ थल आइव ।
साहि हुरम को सोध करिव तिहिँ समय सुहाइव ॥
दिन्नी जु सिक्ख तब सेख कौं, अप्प अप्प सिबरन गयय२ ।
पहुँची सु जाय पतिसाह पै, हुरम साह आदार दियव ॥२४३॥
तब सु साहि करि कुच्च,३ सकल दिल्लिय दिसि आयव ।
चढ़िव सेन समूह, धूरि उड़ि अंबर छाइव ॥
घुमरि घुमरि निस्साँन,४ घोर दुंदभि घन बज्जिय ।
सकल खाँन उमराव, हरष संजुत मग रज्जिय ॥
कीन्हौं५ प्रबेस निज निज घरन, साह महल दाखिल भयव ।
सुख खाँन पाँन सौगंधजुत, अप्प अप्प६ रस बस भयत्र७ ॥२४४॥
इक्क८ समय पतिसाह, हुरम सँग सेज बिराजे ।
दंपति अति रस लीन, काक की कला९ सुसाजे ॥
रमत करत परकार, इक्क१० आसन रस११ भीने १२ ।
सरस परस्पर मुदित, उदित कंद्रप तन चीने ॥
तिहिँ समय दैव संजोग तै, इक आखू+ आवत भयव ।
देखंत ताहिं पतिसाहि को, मदन द्वंद उतरि गयव ॥२४५॥
दोहरा छंद
मूषक हजरति देखि कै, आसन तजि ततकाल ।
लै कमाँन संधानि कै, हन्यौ तार लखि वाल ॥२४६॥
१ आपन । २ दीनी जु सीख तब सेख कौं आय आय डेरन गयव ।
३ कूँच । ४ नीसाँन । ५ किन्हौ । ६ आप आप । ७ बसि छयव । ८ एक ।
९ केलि । १० एक । ११ रति । १२ भिन्ने,चिन्ने,भिन्नय,चिन्नय, अंत्यानुप्रास ।
+आखू (आखु)= मूसा ।
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४४ | हम्मीररासो
चौपाई छंद
हजरति हरषि तोर तिहिं¹ दिन्नौ ।
चूहौ² प्राण-हीन तब किन्नौ ॥
तबहीं साहि हरषि मुसकाए ।
तिय कौ ऐसे बचन सुनाए ॥२४७॥
कायर जाति तिया³ हम जानी ।
तातैं यह हम प्रथमहिं ठानी ॥
यह करनी अद्भुत तुम देखी ।
निज कर करी सु तुम अवरेखी ॥२४८॥
हँसी हुरम सुनि हजरति बानी ।
पुरुषन की तो अकथ⁴ कहानी ॥
मारैं सिंह तो न मुख भाखैं ।
जाचे नाहिं प्राण वै राखैं ॥२४६॥
मैं जग मैं ऐसा सुनि पाऊँ ।
कहैं साहि मैं बहुत बघाऊँ ॥
बकसो गुनह तो अबै बताऊँ ।
तुरत साहि कै पाइ लगाऊँ ॥
सोरठा छंद
ऐसा मोहिं बताय, सिंह मारि सिफत न करै ।
बकसो औगुन आय, जो उन तात ज मारियौ ॥ २५१ ॥
हुरम तबै कर जोरि, बार बार सिर नाय कै ।
सुनहु गुनह⁵ अब मोर, हजरति बीतयौ आपनो ॥ २५२ ॥
१ तहँ । २ चूही प्राणहीन तिहिं चीनौ । ३ तीय । ४ अकह ।
५ गुनाह जुमोर ।
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हम्मीररासो ४५
छप्पय छंद
मृगया महँ जिहिं समय, सकल भुल्लिय १ बन माहीं ।
महा घोर तम भयौ, तहाँ २ वरनी नहिं जाही ॥
तदिन सेख संयोग, आनि हमसैं तब मिल्लिव ।
नहिंन सेख तकसीर, देखि मन मोरहिं चिल्लिव ॥
संयोग भोग बिछुरन मिलन, लिख्यौ बिधाता ज दिन जहँ ।
नहिं टरै लाख कोऊ करो सुतौ होय वह ३ त दिन तहँ ॥२५३॥
दोहरा छंद
मैं सेखहिं जाँनत नहीं, सेख न जाँनत मोहिं ।
होनहार संजोग जो,४ मिटै न उतनी होहि ॥ २५४ ॥
सुरति करत सिंह जु उठ्यौ, लख्यौ सेख सति भाय ।
लै कमाँन मारचौ तुरत, तज्यौ न आसन आय ॥ २५५ ॥
सुनू स्वभाव ज सेख के, लच्छिन कहे जु आप ।
मैं सभीति भइ सिंह तैं, कहे मोहिं बिन पाप ॥ २५६ ॥
त्रोटक छंद
सुनिये पन सेख करे निज ये ।
घर बैठत बाँ जल सों रजए ॥
नहिं भोजन सोहि गरम्म करै ।
उकरू नहिं बैठत भुंमि भरै ॥२५७॥
सरणागत आवत नाहिं तजै ।
पर बाम लखे मन माहिं लजै ॥
जहँ जाचत प्राण न राखत है।
नहिं झूठ अकारन ५ भाखत है ॥२५८॥
१ भूले । २ तहाँ कछु बर्नि न जाही । ३ वहाँ । ४ तैं ।
५ अकारथ ।
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४६ हम्मीररासो
रण मैं नहिं पिट्ठि दई कबहुँ ।
लखि आरतिवंतन सौं अबहूँ ॥
तहँ मेटत आरति वार तिहीं ।
बिन आसन बैठत है कबहीं ॥२५६॥
मुख सैं उचरै न टरै कबहीं ।
सब तैं मधुरे मुख बैन सही ॥
दृग लाज भरे रिझवार घनैं ।
रहनी करनी कविराज भनैं ॥२६०॥
महिमा महिमा नहिं जात कही ।
जस चाहक गाहक गाहक ही ॥
बरबीर महाररणधीर अरै ।
खँग खेत गहै अरि खंड करै ॥२६१॥
सुनि साहि मनै अचिरज्ज भयौ ।
ततकाल जु सेख बुलाय लयौ ॥
छिरकाय धरा जल सौं जु भरे ।
बहु भोजन आनि गरम्म घरे ॥२६२॥
तर गेरि पटंबर अंबरयं ।
करि पालथि छोरिय कंमरयं ॥
बहु भाँति सिराहि सुभाय मनं ।
करिये तब भोजन आय¹ अनं ॥२६३॥
मिलिए सब जो कछु बाल कहे ।
महिमा तिय जानि सनेह लहे² ॥
प्रजुरे पतिसाहि सु कोप कियं ।
मनु³ ज्वाल बिसाल सुघृत्त दियं ॥२६४॥
दृग लाल बिसाल सुबंक भुवं ।
१ आप । २ लग । ३ जनु ।
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हम्मीररासो ४७
रद दाबत १ ओठ सु ओठ दुवं ॥
करि क्रोध तवै पतिसाहि कहै ।
उर मै अति क्रोध २प्रचंड दहै ॥२६५॥
सुनि जाँमहिं जो तकसीर परै ।
तिहिं कौ न कहो अब दंड धरै ॥
कर जोरि उठ्यौ महिमा तबहीं ।
हम तो तकसीर भरे सबहीं ॥२६६॥
तुव गर्दन वेग कबूल करो ।
है तकसीर जु सेख भरो ॥
तब सेख कहै कर जोरि तवै ।
करिये मन भावतु है जु अचै ॥२६७॥
तब बोलि हुरम्म कहै मुख तैं ।
पहलैं तकसीर परी हम तैं ॥
गरदन्न कबूल करी अबहीं ।
पहलैँ हम तैं तकसीर भई ॥२६८॥
समझे पतिसाह तबै मन मैं ।
अबला हठ नाहिं मिटै मन ३ मैं ॥
इनकौ सब बेगम लोग कहैं ।
मन चाहत सो हठता जु गहैं ॥२६९॥
दोहरा छंद
हुरम बचन सुनि साह तब, मन बिचार तहँ कीन ४।
बेगम जाति जु तीय की, इन मरवै मन दीन ५ ॥२७०॥
जाहु सेख इत ६ मति रहो, जहाँ लगि मेरो राज ।
जो राखै ७ ताकौ हनूँ, प्रगट सुसाज़ समाज ॥२७१॥
१ दब्बत । २ कोप । ३ तन । ४ किन्न । ५ दिन्न । ६ इह । ७ रक्खै ।
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४८ हम्मीररासो
कट्टन गरदन जोग तू, कीनौ १ कुविध २ खरान ।
को रक्खै ३ या भूमि पर, रक्खि ४ करै को जवान ॥२७२॥
छप्पय छंद
यह महि मँडल जितो, आँन मेरी सब मांनैं।
खूनी रक्खै कौन, कोउ ऐसा तू जानै ॥
हम तैं बली बताय, ओट जाकी तू तकै।
बचै न काहू ठौर, एक बिन गए न मक्कै ॥
कर जोरि सेख इम उच्चरै, बली एक साहिब गिनूँ।
निर्वीज धरा ५ कबहुँ न है, ६ मैं हमीर स्रवनन सुनूँ ७ ॥२७३॥
तब सुसेख सिर नाय, रजा हजरति जो पाऊँ ।
जौ न गिनै पतिसाह, सर्न मैं ताकी ८ जाऊँ ॥
तुमहिं न नाऊँ सोस, नहिंन फिरि दिल्लिय आऊँ ।
जुद्ध जुरे नहिं टरौं, हत्थ तुम कौ जु दिखाऊँ ॥
यह कहत सेख सल्लम किय, तबहिं चला चलचित्त भुब ।
निज धाम आय अप अनुज सों, बिबर बिबर बातें जु हुब ॥२७४॥
छंद पद्धरी
आए जु सेख घर तब सरोष ।
जिय जान्यौ अपनो सकल दोष ॥
मिलिय ९ जु मीर गबरू सुधाय ।
चलचित्त देखि तिहिं पूछि १० जाय ॥२७५॥
किहिँ हेतु आज चिंतत सुभाय ।
किहिँ कियव वैर सो मुहिँ ११ बताय ॥
तिहिँ मारि करूँ ततकाल टूक १२ ।

१ किन्नौ । २ कुबदि । ३ राखै । ४ राखि । ५ भुंमि । ६ हैं ।
७ गिन्यौ, सुन्यौ अंत्यानुप्रास । ८ जाकी । ६ मिल्ली । १० पुच्छि ।
११ मो । १२ दुक्क ।
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हम्मीररासो ४९
हिय क्रोध अगिन साँ^१ उठत ऊक^२ ॥२७६॥
को^३ करै बैर बिन कर्म्मबीर ।
मिट^४ गये अन्न जल को सु सोर ॥
तिहिं^५ कौन रहै रक्खै सु कौन ।
यह जानि मर्म तुम रहो मौन ॥२७७॥
यह सुनत मीर गबरू सुभाय ।
सो^६ पर्यौ धर्नि मुच्छा सु खाय ॥
तदि कर्यौ बोध यहु बिधि सुताहिं ।
नहिँ करो सोच रहो^७ निकट साहि ॥२७८॥
तब कहूँ मीर गबरू सु ताहिं ।
सब तजो देश मक्के सु जाहि ॥
कै रहो राव हम्मीर पास ।
तन रहै खुसी नासै जु त्रास ॥२७६॥
तब चलिव सेख तजि साहि देस ।
सब^८ सुभट संग लिन्हे^९ सुबेस ॥
सत पंच सैन गजराज पंच ।
रथ सत्थ लिये निज नारि संच ॥२८०॥
सब रखत साज निज संग लीन ।
दासी^१० जु दास सुंदर नवीन ॥
सजि साज बाज डेरे अनूप ।
लदि ऊँट किते सँग चलिय^११ जूप ॥२८१॥
चढ़ि^१२ सैन सज्योँ निज संग बाँम ।
१ यौं । २ हूक हुक्क । ३ महिमा साहोवाच । ४ मिटि अन्न जहाँ
जाके सनीर । ५ तव । ६ सुइ परचो धरनि मुर्छा सुखाइ । ७ रहु ।
८ निज । ६ लीन्हे । १० सब दासि दास । ११ चले । १२ सजि
सेख चढ्यौ ।
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५० हम्मीररासो
बज्जिव निसाँन गज्जिव सु ताँम ॥
मग चलत करत मृगया अनेक ।
मिलि चलिय१ सकल बर बीर एक२ ॥२८२॥
जिहिं मिलै राव राजा सु जाय ।
पतिसाहू बैर सुनि रहै चाय ॥
चहुँ चक्क फिरयौ महिमा सुधीर ।
नहिं३ कह्यौ रहन काहू सुबीर ॥२८३॥
द्वै४ दीन सेख देखे सुझारि ।
बिन राव दसौँ दिसि फिरिव हारि ॥
तब तक्कि५ सेख हम्मीर राव ।
सोइ आइ सरन परसे जु पाव ॥२८४॥
दोहरा छंद
गढ़ बंका६ वंको सुधर, बंका६ राव हमीर ।
लखि प्रतीति मन महँ७ भइय, हर्षे महिमा मीर ॥२८५॥
देखि जलासय बिटप बहु, उतरि सुडेरा कीन८ ।
हय गय बंधे तरुन तर, खाँन पाँन बिधि लीन९ ॥२८६॥
डेरा ड्यौढ़ी करि खरे, करी बिछायती बेस ।
करि१० मसलति कौँ सलि जुरी, सब भर सरस सुदेस ॥२८७॥
मंत्री मंत्र सुपूच्छि११ तब, इक चर लीन सु बोलि ।
जाहु राव के पास तुम, कहो बात सब खोलि१२ ॥२८८॥
प्रथम सलाँम कहो जु तुम, बिरत१३ कहो सु बिसेष ।
हुकम होय जो मिलन कौं, तो हजूर है सेख ॥२८६॥
इतने मैं जानी परै, पन भ्रम प्रीति प्रतीति ।
१ चलै । २ केक । ३ नन कह्यौ । ४ द्वै, दोउ दोन, दोय । ५ तके ।
६ बंको । ७ जिय मैं । ८ किन्न । ६ लिन्न । १० करी कचहरी आप तत्र ।
११ पुच्छि । १२ बुल्लि, खुल्लि । १३ वृत्त, वृत्तांत ।
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हर्ष सोक यहिँ गति लख्यौ, तुम जानत सब रीति ॥२६०॥
तब सु दूत गय राव पहँ, करी खबरि दरबाँन ।
बोलि हजूरि सुदूत कौ, पूछत कुसल सुजाँन ॥२९१॥
सकल बात सुनि दूत मुख, हर्ष राव बहु कीन१ ।
तबहिं उलटि पठयौ सु वह, सेख बुलाय सुलीन२ ॥२९२॥
नाराच छंद
चल्यौ जु सेख राव पहँ बनाय साज कीनयं३ ।
तुरंग पंच नाग एक साज साजि लीनयं४ ॥
कमाँन दोय टंकनो सु देस मुल्लताँन की ।
कृपाँन एक५ बेस देस पालकी सुजाँन की ॥२६३॥
लिये सु दोय बज्र लाल एक५ मुक्त मालयं ।
कही जु एक५ दोय बाज स्वाँन दोय पालयं ॥
सवार एक आपही सबै 'पयाद चल्लियं ।
रहे तनक्क पौरि जाय फेरि अग्ग हल्लियं ॥२६४॥
सुबेतहार अग्ग६ जाय राव कौ सुनाइयं ।
हमीर राव बेगि आय७ रावतं खँदाइयं ॥
चले लिवाय सेख कौ जहाँ जु राव बट्टियं ।
सभा समेत राव देखि सेख कौ सु उठ्ठियं ॥२९५॥
मिले उभै समाज सौं कुसल्ल छेम पुच्छियं ।
परस्सि पानि पाव सेख हाथ८ जोरि सुच्छियं ॥
करी जुअग्ग सेख भेंट बुल्लियौ सु बाचयं ।
सरन्नि राव राखि९ राखि मैं सरन्नि साचयं ॥२६६॥
फिरचौ सु मैं सु दीन दोय खाँन जाँति सब्वयं ।
जितेक राज रावताय छत्र जाति सब्वयं ॥


१ किन्न । २ लिन्न । ३ किन्नयं । ४ तुरंग पंच नाग इक्क साज सज्जि
लिन्नयं । ५ इक्क । ६ अग्र । ७ आप । ८ हत्थ । ६ रक्खि रक्खि ।

५२ हम्मीररासो
दिसा दसौँ जितेक भूप और बीर बंक जे ।
रहो कह्यौ सु कौन हू रहूँ तहाँ सुधीर जे १ ॥२९७॥
हँसे हमीर राव बात सेख की सुनंतही ।
कहा अलावदीन, पातसाह, सोभनंतही ॥
रहो यहाँ अभै सदा हमीर राव यों कहै ।
तजूँ ज तोहिं प्राण साथि और बात यों २ कहै ॥२९८॥
चौपाई छंद
राव हमीर नजरि सब रक्खिय ।
बचन सेख कौ यहि बिधि भक्खिय ॥
तन धन गढ़ घर ए सब जावैँ ।
पै महिमा पतिसाह न पावैँ ॥२९९॥
कहै सेख प्रण समुझि सु किज्जिय ३ ।
मेरी प्रथम अर्ज सुनि लिज्जिय ४ ॥
दसों दिसा मैं मैं फिरि आयव ।
जिते खाँन सुलतान सु गायव ॥३००॥
गजा राँन. राव जितने जग ।
दीन होय देखे ५ सु अगम मग ॥
बाँध तेग साहस करि कोई ६ ।
तजै लोभ जीवन को सोई ७ ॥३०१॥
यह जिय जानि बास मुहिं दीजे ८ ।
सेख राखि ९ सरनै जस लीजे १० ॥
इतनी धरा सेष सिर होई ।
कहै साहि रक्खै नहिँ कोई ॥३०२॥
१ सुतंक जे । २ त्यों । ३ कीजे । ४ लीजे । ५ दिक्खे । ६ कोइय ।
७ सोइय । ८ दिजिय । ९ रक्खि । १० लिजिय ।
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हम्मीररासो ५३
छप्पय छंद
बार बार क्यों कहै सेख उत्कर्ष बढ़ावै।
एक¹ बार जो कही बहुरि कछु और कहावै² ॥
प्रथम बंस चहुवाँन टेक गहि कबहुँ न छंदै।
बहुरि राव हम्मीर हठ न छुटै तन खंडै ॥
थिर रहहु³ राव इम उच्चरै न डरि न डरि अब सेख तुव ॥
उगै न सूर जो तजहुँ⁴ तोहिं चलहिं५ मेरु अरु भुम्मि ध्रुव ॥२०३॥
बकसि सेख कौ बाजि⁶ साज कंचन के साजे।
मुक्त माल सिरपेंच जटित हीरा⁷ छबि छाजे ॥
सकल सथ्थ सिरपाव साल दिन्नव अति⁸ भारिय।
पंच लक्ख को पटौ दियौ आदर भुवकारिय९ ॥
दिन्नी सुठौर¹⁰ सुंदर इकै¹¹ तिहिं देखत¹² हिय हर्षियउ।
उछाह सहित उठि सेख तब आनँद मंगल बर्षियउ ॥३०४॥
दोहरा छंद
महिमा साह जु तुरतही¹³ गए हवेली आप।
देखत ही सब भाँति सुख मिटी सकल तन ताप ॥
महिमानो पठई नृपति, सबै सथ्थ के हेत।
खाँन पाँन लायक जिते, मधु आमिष¹⁴ सु समेत ॥३०५॥
ज दिन सेख दिल्ली तजी, दूत सथ्थ दिय ताहिं।
को रक्खै कित¹⁵ जात यह, लखो जु तुम हूँ वाहि ॥३०६॥
राख्यो¹⁶ राव हमीर तब, महिमा साहु जु पास।
कहै राव सों दूत तब, मत रक्खो तुम¹⁷ पास ॥३०७॥
१ इक्क। २ कढावै। ३ होहु। ४ तजों। ५ चलैं। ६ वाच।
७ हीरन। ८ असि। ९ बहुधारिय। १० जु। ११ यकै।
१२ पिक्खत। १३ तुरत तब। १४ अमिपहा। १५ कत जाइ यह।
१६ रक्खिउ। १७ निज बास।
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५४ हम्मीररासो
अलादीन सू¹ औलिया, फिरत चहूँ दिसि आनि ।
निबल सबल के बाद सों, किन सुख पायौ जानि ॥३०८॥
·मुक्तादाम² छंद
कहै तब दूत सुनो नृप बात ।
बड़ो तुव बंस प्रताप सुहात³ ॥
तजो⁴ रतनागर को सर हेत ।
रत्न अमूल्य⁵ तजो रज हेत ॥३०९॥
कहो गुन कौन रखे इहि⁶ सेख ।
जरत्त जु बाल गहो⁷ सुबिसेष ॥
अजाँन असी जु करै नहिं राव ।
सुनो⁸ तुम नीति जु राज स्वभाव ॥३१०॥
तजो अब इक्क⁹ कुटुंब बचाय ।
तजो गृह इक्क सुग्राम सहाय ॥
तजो पुर इक सुदेस बचाय ।
तजो सब आतम हेत सुभाय ॥३११॥
महा यह नीच अधम्मिय¹⁰ सेख ।
टरचौ नहिं स्वामि तिया गुन देख ॥
बढ़ै पतिसाह¹¹ दिलीपति¹² बैर ।
लख्यौ नहिं आँनन प्रात सुफेर ॥३१२॥
प्रलै जिहिं रोष तजै धर देह ।
हमीर सु राव सुनो रस¹³ भेव ॥
बढ़ै निति नेह तुमै पतिसाह ।
अमीरस मैं बिष घौरत काह ॥३१३॥
१ से । २ मोतीदाम । ३ सुतात । ४ तजो सरनागत । ५ अमोल ।
६ इह । ७ गही । ८ सुनी । ९ एक । १० अधर्मिय । ११ पुनि साह ।
१२ दिलीसहिं । १३ इह ।
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३. तृतीय भाग: अलाउद्दीन खिलजी की चढ़ाई, नुसरत खान वध व रणथम्भौर घेरा

हम्मीररासो ५५

परो १ फिर आप नहीं दुख आय ।
तजो यह जानि प्रथम्म सुभाय ॥
जथा वह रावन जित्ति २ त्रिलोक ३ ।
सुरन्नर नाग रहैं तिहिं ओक ४ ॥३१४॥
करचौ तिन बैर जबै रघुनाथ ।
मिट्यौ गढ़ लंक सुबंकम पाथ ५ ॥
कहो सर ६ कोन करैं पतिसाह ।
करै तब जंग बचो नहिं ताहि ७ ॥३१५॥
छप्पय छंद
कह हमीर सुनि दूत बचन निज असत भाखौं ।
मो बिन ८ और न कोय सेख को सरनै राखौं ॥
गहूँ खाग ९ सनमुक्ख दुहुँ अति गर्व सुद्ध द्रढ़ ।
लहै मुक्ति मग सत्य किधौं रणथंभ महा गढ़ ॥
कहियो निसंक पतिसाह सों सेख सरनि हम्मीर किय ।
सामाँन युद्ध जेते कछू सो अनंत दुग्गह जु लिय ॥३१६॥
दातार छंद
सुनि हमीर के बचन, दूत दिक्खिय दिस आयव ।
करि सलाँम कर जोरि, साह कौं १० सीस नमायव ॥
पूरब दच्छिन देस और पच्छिम दिसि आयव ।
सवै सेख फिरि थकि, कहूँ काहू न रखायव ॥
तब सेख आय रणथंभ गढ़, दीन बचन इम भक्खियौ ११ ।
सुनि हमीर करुणा सहित, सेख बचन दै राक्खयौ १२ ॥३१७ ॥
महरम खाँ वजीरोवाच
समद पार गय सेख, बार हजरत वह नहीं ।


१ परै । २ जीति । ३ तिलोक । ४ वोक । ५ माथ । ६ सरि ।
७ आहि । ८ मुझ बिन । ६ तेग । १० सौं । ११ भाखियौ । १२ राखियौ ।

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५६ हम्मीररासो
राव शेख क्यों रखै, रहत हजरत घर माहीं ॥
फिर न कहो यह वचन, बृथा¹ कबहूँ² अनजानै ।
दूत साह के बचन, सुने सत्कार सुमानै ॥
महरम्म खाँन इम उच्चरै, खबरदार नहिं बेखबरि ।
कहिये जु बात निज द्रगन लखि, असी बात नहिं कहो फिरि ॥३१८॥
दोहरा छंद
महरम खाँ उजीर सों, कहैं बैन पतिसाहि ।
इक फरमाँन हमीर कौं, लिखि भेजहु अब ताहि ॥३१६॥
छप्पय छंद
लिखि हजरति फरमाँन उलटि एलची पठाए ।
हठ मति करो हमीर चौर मति रखो पराए ॥
हम दिल्लो के ईस राव तुमहूँ जु कहावो ।
बढ़े अलसि जिय माहिं³ बैर मैं कहा जु पावो ॥
माल मुलक चाहो जितौ, कहै साहि बहु लिज्जिये⁴ ।
फरमाँन वाँचि⁵ जिय राव तुम, चोर हमारौ दिज्जिये⁶ ॥३२०॥
दोहरा छंद
वाँचि³ राव फुरमाँन तब, दियउ सेस तब अंग ।
वचन दिये मैं सेख कौं, करों शाह सों जंग ॥३२१॥
दियउ⁷ उलटि फरमाँन तब, राव साहि कौ ज्वाब ।
रख्यौ महिमा साहि मैं, तजूँ न तिहिं मैं अब ॥३२२॥
यह फरमाँन जु बाँचि³ कै, करिव साह तब क्रोध ।
खिज्यौ देखि पतिसाह कौ, कियौ उजीर सुवोध ॥३२३॥
छप्पय छंद
कित्तौ गढ़ रणथंभ राव जिस पहँ गर्बाए ।
दसूँ देस बसि किये जीति करि पाँव लगाए ॥
१ व्यर्थ । २ कबहूँन । ३ माँझ । ४ लीजिए । ५ वंचि । ६ दीजिए । ७ दियौ ।