हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ हम्मीररासो
फुरथ्यौ¹ साह को सत्थ भोजत्थ तत्थं ।
भयौ घोर अंधार सुझै न हत्थं ॥
तजी बालकीड़ा जलं त्यागि भग्गी ।
जहीं ओर दौरी भयौ मुख अग्गी ॥२११॥
किहूँ ओर दासी किहूँ ओर खोजा* ।
कहूँ ओर हुरमैं कहूँ ओर कोजा ॥
जसो होनहारं बन्यौ आय जैसो ।
करो लाख कोऊ टरै नाहिं तैसो ॥२१२॥
लिखे लेख जो नाहिं मिट्टै सुकोई ।
यही बात निश्चै सुनो सर्व सोई ॥
सरं त्यागि चल्ली सुहुरमैं सुभीत ।
कँपै गात ताको रह्यौ व्यापि सीतं ॥२१३॥
तिहीं ठौर महिमा मिले सेख आई ।
महा साहसी सूर उद्धारताई ॥
निजं धर्म साधै तजै नाहिं राचं ।
कहै जो कछू² तो निवाहंत बाचं ॥२१४॥
मिली बाल ताकौं कही दीन बाँनी ।
समै³ बाम सेखं मनौं⁴ आप जानी ॥
डरो ना कहो आप हौ कौन कोई ।
कहूँ जो उढ़ावो यहाँ बैठि मोही ॥२१५॥
तवै बाजि तैं सेख भू पै जुआयौ ।
कछू वस्त्र हो अंग ताको उढ़ायौ ॥२१६॥
दोहरा छंद
महिमा उतरे बाजि तैं, दियौ वस्त्र तिहिँ हत्थ ।
१ फुत्र्यौ । २ कहूँ । ३ उमै । ४ मनं ।
+खोजा=सेवक ।
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