हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो ३७
कहूँ¹ बीन बादित्र बाजंत ऐसी।
सुने राग मोहं² मृगं माल बैसी ॥२०५॥
करैं गान ताँनं पसू पच्छि मोहैं।
सुनै जीव आवंत³ जानैं न को हैं॥
सुने बीन पब्बीन⁴ सुर नाय रागैं।
रहे मोहि कै माल डारे न भागे ॥२०६॥
कहूँ राग ऐसो करैं मेघ आवैं।
तबै साह ताको बड़ी मौज चावैं ॥
असी भाँति आखेट कै रंग भीनो।
निसा घौस जातंन काहू न चीनो ॥२०७॥
तिहीं ठौर बित्यौ सुसारौ बसंतं।
रमै पातसाहं मनौ र्तिकंतं ॥
तिहीं ठौर ग्रीखम्म किन्नौ प्रबेसँ।
महा संकुलं बृक्ष राजं सुदेसं ॥२०८॥
तहाँ तेज भाँनं न जाँनं न जाँनं।
तिहीं हेत साहं रहे तास थानं⁵ ॥
समौ एक ऐसो तहाँ रौद्र आयौ।
महा पौन प्रचंड औ मेघ छायौ ॥२०९॥
कहूँ ओर पतसाह खेलैं सिकारं।
करैं केलि जेती जलं बाल लारं* ॥
भयौ अंधकारं महाघोर ऐनं।
गई सुद्धि सुझै नहीं अप्प⁶ नैनं ॥२१०॥
१ बहू। २ मोहे। ३ आनंद। ४ पर्वीन। ५ तिहीं तेज भाँनंन जाँनं
नं जातं। तिहीं हेत साहं रहे संक वातं। ६ आप।
*लार (लाल)=जो क्रीड़ा में अन्यों के पूर्व विजय प्राप्त करती हो।
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