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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

-३. ७७ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५३
अत्रोद्देशकः
पञ्चानां राशीनां रूपांशानां युतिर्भवेद्रूपम् ।
षण्णां सप्तानां वा के हाराः कथय गणितज्ञ ॥७६॥
विषमस्थानां छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
एकांशकराशीनां द्व्याद्या रूपोत्तरा भवन्ति हराः । स्वासन्नपराभ्यस्ताः सर्वे दलिताः फले रूपे ॥७७॥
एकांशानामनेकांशानां चैकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिनमें प्रत्येक का अंश एक है ऐसी पांच या छः अथवा सात विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग
प्रत्येक दशा में १ है । हे गणितज्ञ ! चाहे हुए हरों को निकालो ॥७६॥
भिन्नों की अयुग्म संख्या लेने पर हरों को निकालने के लिये नियम—
जिनके प्रत्येक अंश १ हों ऐसी विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग १ हो, तो चाहे हुए हर २ से
आरम्भ होकर, उत्तरोत्तर मान में १ द्वारा बढ़ते चले जाते हैं । प्रत्येक ऐसा हर उस संख्या से गुणित
किया जाता है जो मान में तत्काल उत्तरवर्ती के बराबर होता है और तब उसे आधा किया
जाता है ॥७७॥
कुछ इष्ट भिन्नों के विषय में चाहे हुए हरों को निकालने के लिए नियम जबकि उनके अंशों में
प्रत्येक १ अथवा १ से अन्य हो और जब उनके भिन्नीय योग का अंश भी १ हो—
गुणोत्तर श्रेढि में जिसका प्रथम पद १/अ है और साधारण निष्पत्ति १/अ है अ की सभी पूर्णांक धनात्मक
अर्हाओं (मानों) के लिये योग १/(अ - १) से { १/((अ - १)/अ) × श्रेढि का (न + १) वां पद } न्यून होता
है । इसलिये, यदि हम गुणोत्तर श्रेढि के योग में इस गाथा के नियम के अनुसार अन्तिम भिन्न
{ १/((अ - १)/अ) × (न - १) वां पद } जोड़ते हैं तो हमें १/(अ - १) प्राप्त होगा । इस १/(अ - १) से योग १ प्राप्त करने
के लिये उसमें (अ - २)/(अ - १) जोड़ना पड़ता है । इस (अ - २)/(अ - १) को नियम में प्रथम भिन्न कहा गया है और
इसका मान ३ चुना गया है क्योंकि सभी भिन्नों का अंश १ होना चाहिए ।
(७७) यहाँ १/(२ × ३ × १/२) + १/(३ × ४ × १/२) + १/(४ × ५ × १/२) + ...... + १/((न - १) न × १/२)

  • १/(न × १/२)
    = २ [ १/(२ × ३) + १/(३ × ४) + १/(४ × ५) + ...... + १/((न - १) न) + १/न ]
    = २ [ (१/२ - १/३) + (१/३ - १/४) + ...... + (१/(न - १) - १/न) + १/न ]
    = २ × १/२ = १

५४ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ७८-
लब्धहरः प्रथमस्यच्छेदः सस्वांशकोऽयमपरस्य । प्राक् स्वपरेण हतोऽन्त्यः स्वांशेनैकांशके योगे ॥७८॥
अत्रोद्देशकः
सप्तकनवकत्रितयत्रयोदशांशप्रयुक्तराशीनाम् । रूपं पादः षष्ठः संयोगाः के हराः कथय ॥७९॥
एकांशकानामेकांशेऽनेकांशे च फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
सेष्टो हारो भक्तः स्वांशेन निरग्रमादिमांशहरः । तद्युतिहाराप्तष्टः शेषोऽस्मादित्थमितरेषाम् ॥८०॥
जब कुछ इष्ट भिन्नों के योग का अंश १ हो, तब उनके चाहे हुए हरों को निकालने के लिये
योग के हर को प्रथम राशि का हर मान लो और इस हर को अपने अंश से संयुक्त कर उसे उत्तरवर्ती
राशि का हर मान लो, और ऐसे प्रत्येक हर को क्रमवार तत्काल उत्तरवर्ती के द्वारा गुणित करते चले
जाओ । अन्तिम हर को उसी के अंश द्वारा गुणित करो ॥७८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिनके अंश क्रमशः ७, ९, ३ और १३ हैं ऐसे भिन्नों के योग १, १/४, १/६ हैं । बतलाओ कि
उन भिन्नीय राशियों के हर क्या हैं ॥७९॥
जिनका अंश १ है ऐसे कुछ इच्छित भिन्नों के हर निकालने के लिये नियम जब कि उन भिन्नों
के योग का अंश १ अथवा और कोई दूसरी राशि हो –
दिये गये योग के हर को जब कोई चुनी हुई राशि में मिलाते हैं और ताकि कुछ भी शेष न
बचे इस तरह उसे उस योग के अंश द्वारा विभाजित करते हैं तो वह भिन्नों की चाही हुई श्रेढि के
प्रथम अंश के सम्बन्ध में हर बन जाता है । ऊपर चुनी हुई राशि जब प्रथम भिन्न के हर द्वारा विभा-
जित की जाती है और दिये गये योग के हर द्वारा भी विभाजित की जाती है तब वह इष्ट श्रेढि के शेष
भिन्नों के योग को उत्पन्न करती है । इष्ट श्रेढि के शेष भिन्नों के इस ज्ञात योग से इसी तरह अन्य
हरों को निकालते हैं ॥८०॥
( ७८ ) बीजीय रूप से यदि योग १/न हो, और अ, ब, स तथा द दिये गये अंश हों तो भिन्नों
को निम्न रीति से जोड़ते हैं—
योग = अ / [न (न + अ)] + ब / [(न + अ) (न + अ + ब)] + स / [(न + अ + ब) (न + अ + ब + स)]

  • द / [द (न + अ + ब + स)]
    = [अ (न + अ + ब) + ब न] / [न (न + अ) (न + अ + ब)] + [स + न + अ + ब] / [(न + अ + ब) (न + अ + ब + स)]
    = [(न + अ) (अ + ब)] / [न (न + अ) (न + अ + ब)] + १ / [न + अ + ब] = [अ + ब + न] / [न (न + अ + ब)]
    = १ / न
    ( ८० ) बीजीय रूप से, यदि अ/न योग है तो प्रथम भिन्न १ / [(न + प)/अ] होता है; और नियम

-३. ८४ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५५
अत्रोद्देशकः
त्रयाणां रूपकांशानां राशीनां के हरा वद् । फलं चतुर्थभागः स्याच्चतुर्णां च त्रिसप्तमम् ।।८१।।
एकांशानामनेकांशानां चानेकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
इष्टहता दृष्टांशाः फलांशसदृशो यथा हि तद्योगः । निजगुणहृतफलहारस्तद्धारो भवति निर्दिष्टः॥८२॥
अत्रोद्देशकः
एकांशांशेन राशीनां त्रयाणां के हरा वद । द्वादशाप्ता त्रयोविंशत्यशंका च युतिर्भवेत् ।।८३।।
त्रिसप्तकनवांशानां त्रयाणां के हरा वद । द्वयूनपञ्चाशदाप्ता त्रिसप्तत्यंशा युतिर्भवेत् ।।८४।।
एकांशकयो राश्योरेकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
१ ८३ और ८४ श्लोक B में छूट गये हैं ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग १/४ है, तथा उनमें से प्रत्येक का अंश १ है । ऐसी
चार अन्य राशियों का योग ३/७ है । बतलाओ कि हर क्या हैं ? ॥८१॥
जिनका अंश एक अथवा कोई और संख्या हो ऐसे कुछ इच्छित भिन्नों के हर निकालने के लिये
नियम जब कि उन भिन्नों के योग का अंश १ की अपेक्षा अन्य संख्या हो—
ज्ञात अंश कुछ चुनी हुई राशियों द्वारा गुणित किये जाते हैं, ताकि इन गुणनफलों का योग
इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के अंश के बराबर हो जावे । यदि इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के हर
को उसी गुणक से विभाजित किया जाय ( जिससे कि दिया गया अंश गुणित किया गया है ) तो वह
अंश सम्बन्धी चाहे हुए हर को उत्पन्न करता है ॥८२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन भिन्नीय राशियों में, प्रत्येक का अंश १ है । उनके हरों का मान निकालो जब कि उन
राशियों का योग २३/१२ हो ॥८३॥ क्रमशः ३, ७ और ९ अंशवाली तीन भिन्नीय राशियों के हरों का
मान बतलाओ जब कि उन राशियों का योग ७३/४८ हो ॥८४॥
१ अंशवाली दो भिन्नीय राशियों के हरों का मान निकालने के लिये नियम जब कि उन
भिन्नीय राशियों के योग का अंश १ हो—
दिये गये योग के हर को चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित करने पर किसी एक इष्ट भिन्नीय राशि
का हर प्राप्त होता है । यह हर, एक कम ( पिछली ) चुनी हुई संख्या द्वारा विभाजित किया जाने पर
में शेष भिन्नों का योग [ प / { ((न + प)/अ) · न } ] कथित है, जहां 'प' चुनी हुई राशि है । यह [ प / { ((न + प)/अ) · न } ] स्पष्ट रूप
से [ अ/न - १ / { (न + प)/अ } ] को हल करने से प्राप्त होती है । यहां प को इस तरह चुनना चाहिये कि (न + प)
में अ का पूरा पूरा भाग जा सके ।

५६ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ८५-
वाञ्छाहतयुतिहारश्छेदः स व्येकवाञ्छयाप्तोऽन्यः ।
फलहारहारलब्धे स्वयोगगुणिते हरौ वा स्तः ॥८५॥
अत्रोद्देशकः
राश्योरेकांशयोश्छेदौ कौ भवेतां तयोर्युतिः ।
षडंशो दशभागो वा ब्रूहि त्वं गणितार्थवित् ॥८६॥
एकांशकयोरनेकांशयोश्च एकांशेऽनेकांशेऽपि फले छेदोत्पत्तौ प्रथमसूत्रम्—
इष्टगुणांशोऽन्यांशप्रयुतः शुद्धं हतः फलांशेन । इष्टाप्तयुतिहरघ्नो हरः परस्य तु तदिष्टहतिः ॥८७॥
१ P और B में यह पाठान्तर जुड़ा है:—
शुद्धं फलांशभक्तः स्वान्यांशयुतो निजेष्टगुणितांशः ।
दूसरे इष्ट अंश को उत्पन्न करता है । अथवा, दिये गये योग के हर के सम्बन्ध में किसी चुने हुए
भाजक और प्राप्त भजनफल में से प्रत्येक को उनके योग द्वारा गुणित करने पर दो इष्ट हरों की उत्पत्ति
होती है ॥८५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे अंकगणित के सिद्धान्तों के ज्ञाता ! दो इष्ट भिन्नीय राशियों के हर निकालो जब कि उनका
योग या तो १/६ अथवा १/१० हो ॥८६॥
जिनका अंश १ अथवा कोई और संख्या है ऐसे दो इष्ट भिन्नों के हरों को निकालने के लिये
नियम जब कि उन भिन्नों के योग का अंश १ अथवा कोई और संख्या हो—
कोई भी एक (either) अंश चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित होकर, तब अन्य अंश द्वारा मिलाया
जाकर, तब इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के अंश द्वारा विभाजित होकर (ताकि कुछ भी शेष न रहे, )
और तब ऊपर की चुनी हुई संख्या द्वारा विभाजित होकर तथा इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा
गुणित होकर, चाहे हुए हर को उत्पन्न करता है । अन्य भिन्न का हर इस हर को ऊपर की चुनी हुई राशि
द्वारा गुणित कर प्राप्त कर सकते हैं ॥८७॥
( ८५ ) बीजीय रूप से, जब दो इष्ट भिन्नों का योग १/न है, तो इस नियम के अनुसार भिन्न
क्रमशः १/पन तथा १/((प न)/(प-१)) होते हैं, जहां प कोई भी चुनी हुई राशि है । यह शीघ्र देखने में
आवेगा कि इन दोनों भिन्नों का योग १/न है ।
अथवा, जब योग १/(अ ब) हो, तब भिन्नों को १/(अ (अ + ब)) और १/(ब (अ + ब)) लिया जा सकता है ।
( ८७ ) बीजीय रूप से, यदि अ और ब अंश वाले दो इष्ट भिन्नों का योग म/न है तो वे भिन्न
अ / [((अप + ब)/म) × (न/प)] और ब / [((अप + ब)/म) × (न/प) × प] होंगे, जहाँ 'प' कोई भी संख्या इस तरह चुनी गई है कि
अप + ब को म द्वारा विभाजित किया जा सके । इन भिन्नों का योग म/न प्राप्त होगा ।

-३. ९३ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५७
अत्रोद्देशकः
रूपांशकयो राश्योः कौ स्यातां हारकौ युतिः पादः ।
पञ्चांशो वा द्विहतः सप्तकनवकांशयोश्च वद ॥८८॥
द्वितीयसूत्रम्—
फलहारताडितांशः परांशसहितः फलांशकेन हृतः ।
स्यादेकस्य च्छेदः फलहरगुणितोऽयमन्यस्य ॥८९॥
अत्रोद्देशकः
राशिद्वयस्य कौ हारावेकांशस्यास्य संयुतिः । द्विसप्तांशो भवेद्ब्रूहि षडष्टांशस्य च प्रिय ॥९०॥
अर्धेत्र्यंशदशांशकपञ्चदशांशकयुतिर्भवेद्रूपम् । त्यक्ते पञ्चदशांशे रूपांशावत्र कौ योज्यौ ॥९१॥
दलपादपञ्चमांशकविंशानां भवति संयुती रूपम् । सप्तैकादशकांशौ कौ योज्याविह विना विंशम् ॥९२
युग्मान्याश्रित्य च्छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
युग्मप्रमितान् भागानेकैकांशान् प्रकल्प्य फलराशेः ।
तेभ्यः फलात्मकेभ्यो द्विराशिविधिना हराः साध्याः ॥९३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो इष्ट भिन्नीय राशियों में प्रत्येक का अंश १ है । इनके हरों को निकालो जब कि उन राशियों
का योग या तो १/४ अथवा २/५ हों । साथ ही, उन दो अन्य भिन्नीय राशियों के हर निकालो जिनके अंश
क्रमशः ७ और ९ हैं ॥८८॥
दूसरा नियम निम्नलिखित है :—
इष्ट भिन्नों में किसी एक के अंश को इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा गुणित कर दूसरे अंश में
मिलाते हैं । प्राप्त फल को इष्ट भिन्नों के योग के अंश द्वारा विभाजित करते हैं तो इष्ट भिन्नों में से
एक भिन्न का हर उत्पन्न होता है । इस हर को जब इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा गुणित करते हैं तब
वह दूसरे भिन्न का हर हो जाता है ॥८९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे मित्र ! मुझे बतलाओ कि दो भिन्नीय राशियों के (जिनमें प्रत्येक के अंश १, १ हैं) हर
क्या होंगे जब कि उन इष्ट भिन्नों का योग २/७ है । दो अन्य इष्ट भिन्नों के भी हर क्या होंगे जिनके अंश
क्रमशः ६ और ८ हों ॥९०॥ १/२, १/३, १/१० और १/१५ का योग १ है । यदि १/१५ छोड़ दिया जावे तो दो
ऐसे १ अंश वाले भिन्न बतलाओ जिनको शेष भिन्नों में जोड़ने पर योग पुनः कुल के तुल्य हो जावे ॥९१॥
१/२, १/४, १/५ और १/२० का योग १ है । यदि १/२० छोड़ दिया जाय तो क्रमशः ७ और ११ हर वाले ऐसे दो
भिन्न कौन से होंगे जिनको शेष में जोड़ने पर उनका योग कुल योग के तुल्य हो जावे ॥९२॥
कुछ इष्ट भिन्नों को युग्मों (pairs) में लेकर उनके हरों को निकालने के लिये नियम—
सब इष्ट भिन्नों के योग को दिये गये अंशों के युग्मों की संख्या के तुल्य भागों में विपाटित
करने के बाद, (इस तरह कि प्रत्येक के अंश १, १ हों), इन भागों को युग्मों के योग में अलग-अलग
(८९) गाथा ८७ में दिये गये नियम की यह विशेष स्थिति है क्योंकि इष्ट भिन्नों के हर का
आदेशन (substitution) इस नियम में, पिछले नियम में चुनी गई राशि के स्थान में करते हैं।
ग० सा० सं०-८

५८ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ९४-
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकत्रयोदशसप्तनवैकादशांशराशीनाम् । के हाराः फलमेकं पञ्चांशो वा चतुर्गुणितः ॥९४॥
एकसूत्रोत्पन्नरूपांशहारैः सूत्रान्तरतोत्पन्नरूपांशहारैश्च फले रूपे छेदोत्पत्तौ नष्टभागानयनेच
सूत्रम्—
वाञ्छितसूत्रजहारा हरा भवन्त्यन्यसूत्रजहरघ्नाः । दृष्टांशैक्योनं फलमभीष्टनष्टांशमानं स्यात् ॥९५॥
अत्रोद्देशकः
परहतिदलनविधानात्त्रयोदश स्वपरसंगुणविधानात् ।
भागाश्चत्वारोऽतः कति भागाः स्युः फले रूपे ॥९६॥
प्राक्स्वपरहूतविधानात्सप्तस्वाासन्नपरगुणार्धविधानात् ।
भागास्त्रितयञ्चातः कति भागाः स्युः फले रूपे ॥९७॥
रूपांशका द्विषट्द्वादशविंशतिहरा विनष्टोऽत्र । पञ्चमराशी रूपं सर्वसमासः स राशिः कः ॥९८॥
इति भागजातिः ।
लेते हैं । उनमें से चाहे हुए हरों को, दो घटक भिन्नीय राशियों के सम्बन्ध में बतलाये गये नियम
द्वारा निकालते हैं ॥९३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
उन इष्ट भिन्नों के हर क्या होंगे जिनके अंश क्रमशः ३, ५, १३, ७, ९ और ११ हैं, जब कि
उन भिन्नीय राशियों का योग १ अथवा दै है ? ॥९४॥
जिनका संवादी अंश १ है और जो उपर्युक्त नियमों द्वारा प्राप्त किये गये हैं ऐसे हरों की
सहायता से कुछ हरों को निकालने के लिये ( नियम ); तथा जिनका संवादी अंश १ है और जिनके
इष्ट भिन्नों का योग एक है तथा जो उपर्युक्त अन्य नियमों द्वारा प्राप्त किये गये हैं ऐसे भिन्नों की
सहायता से हरों को निकालने के लिये ( नियम ) और नष्ट भाग का मान निकालने के लिये नियम—
किसी भी चुने हुए नियम के अनुसार प्राप्त हरों को दूसरे नियम से प्राप्त हरों द्वारा गुणित करने
पर चाहे हुए हर प्राप्त होते हैं । इन भिन्नों का योग, विशिष्ट भाग के योग द्वारा हासित किये जाने
पर छोड़े हुए नष्ट भाग का मान होता है ॥९५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
नियम ७७ द्वारा प्राप्त भिन्नों की संख्या १३ है और नियम क्रम ७८ द्वारा प्राप्त भिन्नों की
संख्या ४ है । इन नियमों की सहायता से प्राप्त भिन्नों का योग १ है, तो बतलाओ कि विघटक भिन्न
कितने हैं ? ॥९६॥ गाथा ७८ के नियम द्वारा प्राप्त भिन्नों की संख्या ७ है और नियम ७७ गाथानुसार
प्राप्त संख्या ३ है । यदि इन नियमों द्वारा प्राप्त भिन्नों का योग १ हो तो बतलाओ विघटक भिन्न कितने
हैं ? ॥९७॥ जिनके अंश १, १ हैं ऐसे कुछ भिन्नों के हर क्रमशः २, ६, १२ और २० हैं । यहां
पांचवीं भिन्नीय राशि छोड़ दी गई है । इन पाँचों भिन्नों का योग १ है, बतलाओ कि वह छोड़ी
गई भिन्नीय राशि क्या है ? ॥९८॥
इस प्रकार, कलासवर्ण षड्जाति में भाग जाति नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
( ९३ ) दो भिन्नीय राशियों के सम्बन्ध में गाथा ८५, ८७ और ८९ में नियम दे दिये गये हैं ।

? Wait, look at L30: ५/१८ का ४/१३, १/८ काThen L31:९,-> wait, after९,what is next? Look at L31:१/९ का ४/१३! Wait, look at the fraction: top is १, bottom is ९. Then का. Then top is ४, bottom is १३! Wait, look at the denominator of ४/१३: it is १३? No, look at ४/१३: it has ४on top, and१३below. Wait, thenऔर! Then १/५ का ३/४ का १/२! Wait, verse 106 says: "पञ्चांशात् त्रिपादार्धम्" = 1/5 of 3/4 of 1/2! Yes! १/५ का ३/४ का १/२! Look at L31: १/५ का ३/४ का १/२ ॥१०५-१०६॥Yes! Top १, bottom ५, thenका, top ३, bottom ४, then का`, top १, bottom २. That matches "पञ्चांशात् त्रिपादार्धम्" perfectly!

Now let's check standard transcription practice:
Can we write fractions inline like १/२, `१/३ का

६० ] गणितसारसंग्रहः [ ३. १०७-
अत्रैकाव्यक्तस्यानयनसूत्रम्—
रूपं न्यस्यान्यक्ते प्राग्विधिना यत्फलं भवेत्तेन । भक्तं परिदृष्टफलं प्रभागजातौ तदज्ञातम् ॥१०७॥
अत्रोद्देशकः
राशेः कुतश्चिदष्टांशस्त्र्यंशपादोऽर्धपञ्चमः । षष्ठत्रिपादपञ्चांशः किमव्यक्तं फलं दलम् ॥१०८॥
अनेकाव्यक्तानयनसूत्रम्—
कृत्वाज्ञातनिष्ठान् फलसदृशो तद्युतिर्यथा भवति ।
विभजेत पृथग्व्यक्तैरविदितराशिप्रमाणानि ॥१०९॥
अत्रोद्देशकः
राशेः कुतश्चिदधं कुतश्चिदष्टांशकस्त्रिपञ्चांशः । कस्माद्द्वित्र्यंशाधं फलमधं के स्युरज्ञाताः ॥११०॥
भागभागजातावुद्देशकः
षट्सप्तभागभागस्त्र्यष्टांशांशश्चतुर्नवांशांशः । त्रिचतुर्थभागभागः किं फलमेतद्युतौ ब्रूहि ॥१११॥
[

-३. ११७ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६१
द्वित्र्यंशाशं रूपं त्रिपादभक्तं द्विकं द्वयं चापि। द्वित्र्यंशोद्भूतमेकं नवकात्संशोध्य वद शेषम् ॥११२॥
इति प्रभागभागभागजाती।
भागानुबन्धजातौ सूत्रम्—
हरहवरूपेष्वंशान् संक्षिप भागानुबन्धजातिविधौ। गुणयांश्रांशच्छेदावंशयुतच्छेदहाराभ्याम् ॥११३॥
रूपभागानुबन्ध उद्देशकः
²द्वित्रिष्टकाष्टनिष्काणि द्वादशाष्टषडंशकैः। पञ्चाष्टमैः समेतानि विंशतेः शोधय प्रिय ॥११४॥
सार्धेनैकेन पङ्कजं साष्टांशैर्दशभिर्हिमम्। सार्धाभ्यां कुङ्कुमं द्वाभ्यां क्रीतं योगे कियद्भवेत्³ ॥११५॥
⁴साष्टमाष्टौ षडंशान् षड्द्वादशांशायुतं द्वयम्। त्रयं पञ्चाष्टमोपेतं विंशतेः शोधय प्रिय ॥११६॥
सप्ताष्टौ नवदशमाषकान् सपादान् दत्त्वा ना जिननिलये चकार पूजाम्।
उन्मीलत्कुरवककुन्दजातिमल्लीमालाभिर्गणक वदाशु तान् समस्य ॥११७॥
१ B में गुणयेदग्रांशहरौ सहितांश्छेद°, पाठ है। ३ M द्वदेत्
२ यह श्लोक P में अप्राप्य है। ४ यह श्लोक केवल P में प्राप्य है।
॥ १११ ॥ ९ में से १/(२/३), २/(३/४) और २/(३/४) तथा १/(२/३) घटाने पर क्या शेष रहेगा ? ॥ ११२ ॥
इस प्रकार, कलासवर्ण षड्जाति में, प्रभागजाति नामक परिच्छेद समाप्त हुआ।
भागानुबंध जाति [ संयव भिन्न ]
भागानुबंध भिन्नों के सरलीकरण के सम्बन्ध में नियम—
भागानुबंध भिन्न को सरल करने के लिये अंश को संयवित पूर्णसंख्या ( associated whole
number ) और हर के गुणनफल में जोड़ देते हैं। यदि सम्बन्धित संख्या पूर्णांक न होकर भिन्नीय
हो तो प्रथम भिन्न के अंश और हर को दूसरे भिन्न के क्रमशः अंशसहित हर तथा हर से गुणित
करो ॥११३॥
रूपभागानुबंध ( संयक्ति पूर्णांक वाले भागानुबंध भिन्न ) पर उदाहरणार्थ प्रश्न
निष्क क्रमशः २, ३, ६ और ८ हैं और वे १/१२, १/८, १/६ और ५/८ से संयवित हैं। हे मित्र इनके
योग को २० में से घटाओ ॥ ११४ ॥ १ १/२ निष्क के कमल, १० १/८ निष्क का कपूर और २ १/२ निष्क की
सौंफ खरीदी गई । योग करनेपर उनका कुल मान बतलाओ ? ॥ ११५ ॥ हे मित्र २० में से निम्न-
लिखित को घटाओ—८ १/८, ६ १/६, २ १/१२ और ३ ५/८ ॥११६॥ एक व्यक्ति जिन मंदिर में पूजन हेतु ७ १/४, ८ १/४,
९ १/४ और १० १/४ माषों के खिले हुए कुरवक, कुन्द, जाति और मल्लिका ( जूही ) फूलों के हार भेंट करता
है । हे गणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बताओ कि उन माषों को जोड़ने के बाद क्या प्राप्त होगा ? ॥ ११७ ॥
(११३) भागानुबंध का शाब्दिक अर्थ संयवित भिन्न है। यह नियम दो प्रकार के संयवित भिन्नों
में प्रयोज्य होता है। प्रथम मिश्र संख्या है अर्थात् पूर्णांक से संयवित भिन्न है, और दूसरा प्रकार वह है
जिसमें भिन्न से संयवित भिन्न रहते हैं। जैसे १/३ से संयवित १/२ ; स्व के १/३ से संयवित १/२ और इस
संयवित राशि के १/२ से संयवित १/२ । “१/३ से संयवित १/२” का अर्थ होता है १/२ + १/२ का १/३ ; दूसरे उदाहरण
का अर्थ है : १/२ + १/२ का १/३ + १/२ का ( १/२ + १/२ का १/३ ) इस प्रकार के संयवन को “योजित अनुगमन”
( additive consecution ) कहते हैं ।

६२ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ११८-
भागानुबन्ध उद्देशकः
स्वत्र्यंशपादसंयुक्तं दलं पञ्चांशकोऽपि च । त्र्यंशः स्वकीयषष्ठार्धसहितस्तद्युतौ कियत् ॥११८॥
त्र्यंशाद्यंशकसप्तमांशचरमैः स्वैरन्वितादर्धतः पुष्पाण्यर्धतुरीयपञ्चनवमैः स्वीयैर्युतात्सप्तमात् ।
गन्धं पञ्चमभागतो¹ऽर्धचरणत्र्यंशांशकैर्मिश्रिताद् धूपं चार्चयितुं नरो जिनवरान्राष्टौ किं तद्युतौ ॥
स्वदलसहितं पादं स्वत्र्यंशकेन समन्वितद्विगुणनवमं स्वाष्टांशत्र्यंशकार्धविमिश्रितम् ।
नवममपि च स्वाष्टांशाद्यर्धपश्चिमसंयुक्तं निजदलयुतं त्र्यंशं संशोध्य त्रितयात्प्रिय ॥१२०॥
स्वदलसहितपादं सस्वपादं दशांशं निजदलयुतषष्ठं सस्वकत्र्यंशमर्धम् ।
चरणमपि समेतस्वत्रिभागं समस्य प्रिय कथय समग्रप्रज्ञ भागानुबन्धे ॥१

-३. १२६ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६३

अत्रोद्देशकः
कश्चित्स्वगैरर्धतृतीयपादैरंशोऽपरः पञ्चचतुर्नवांशैः ।
अन्यस्त्रिपञ्चांशनवांशकार्धैर्युतो युती रूपमिहांशकाः के ॥१२३॥
कोऽप्यंशः स्वार्धपञ्चांशत्रिपादनवमैर्युतः । अर्धं प्रजायते शीघ्रं वदान्यक्तप्रमां प्रिय ॥१२४॥
शेषेष्टस्थानाव्यक्तभागानयनसूत्रम्—
लब्धात्कल्पितभागाः सवर्णितैर्व्यक्तरािशभिर्भक्ताः ।
क्रमशॊ रूपविहीनाः स्वेष्टपदेष्वविदितांशाः स्युः ॥१२५॥
इति भागानुबन्धजातिः ।
अथ भागापवाहजातौ सूत्रम्—
हरहतरूपेष्वंशानपनय भागापवाहजातिविधौ । गुणयाग्रांशच्छेदावंशोनच्छेदहाराभ्याम् ॥१२६॥
१ B गुणयेदग्रांशहरौ रहितांशच्छेदहाराभ्याम् ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
[L

] वियुत भिन्नों वाले भागापवाह भिन्नों पर प्रश्न`

  • क्रमशः १/६, १/४, १/४, १/३ और १/२ द्वारा हासित २/५, २/९, १/३, १/८ और २/७ को क्रमवार जोड़ो और तब
  • योगफल बतलाओ ॥ १२९ ॥ दिये गये ६/७ पण में, अनुगामी स्व की १/६, १/८, १/९ और १/१० राशियों को
  • हासित करो, पुनः स्व की १/४, १/३ और १/५ राशियों द्वारा ५/१२ को हासित करो, इसी तरह स्व की २/३, २/५
  • और १/२ राशियों द्वारा ५/६ को हासित करो और अन्य राशि २/३ को स्व की ५/८ संख्या द्वारा हासित करो । इन
  • सभी परिणामों को जोड़कर फल बतलाओ ॥ १३० ॥ भागापवाह भिन्न के सम्बन्ध में, हे मित्र, यदि
  • तुमने कष्ट किया है तो बतलाओ कि १/२ में से निम्नलिखित राशियाँ घटाने पर क्या शेष रहेगा ? स्व के
  • `३/८, १/४ और १/९ भागों द्वारा हासित १/२ ; इसी तरह स्व

-३. १३६ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६५
अत्रोद्देशकः
कश्चित्स्व कैश्चरणपञ्चमभागषष्ठैः कोऽप्यंशको दलषडंशकपञ्चमांशैः ।
हीनोऽपरो द्विगुणपञ्चमपादषष्ठैः तत्संयुतिर्दलमिहाविदितांशकाः के ॥१३३॥
कोऽप्यंशस्स्वार्धषड्भागपञ्चमाष्टमसप्तमैः । १ विहीनो जोयते षष्ठः स कोऽशो गणितार्थवित् ॥१३४॥
शेषेष्टस्थानाव्यक्तभागानयनसूत्रम्—
लब्धात्कल्पितभागाः सवर्णितैर्य्यक्तराशिभिर्भक्ताः ।
रूपात्पृथगपनीताः स्वेष्टपदेष्वविदितांशाः स्युः ॥१३५॥
इति भागापवाहजातिः ।
भागानुबन्धभागापवाहजात्योः सर्व्व व्यक्तभागानयनसूत्रम्—
त्यक्त्वैकं स्वेष्टांशान् प्रकल्पयेदविदितेषु सर्वेषु ।
एतैस्तं पुनरंशं प्रागुक्तेरानयेत्सूत्रैः ॥१३६॥
१ P, K और B में जायते के लिए तद्युतिः ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई भिन्न निज की १/४, १/५ और १/६ राशियों द्वाराअनुगमन में ( in consecution ) ह्रासित
किया जाता है । दूसरा भिन्न भी इसी तरह निज के १/२, १/६, और १/५ भागों द्वारा ह्रासित किया
जाता है । तीसरा भिन्न भी इसी तरह निज के २/५, १/४ और १/६ भागों द्वारा ह्रासित किया जाता है ।
इन तीनों ह्रासित राशियों का योग १/२ है । बतलाओ कि वे अज्ञात भिन्न कौन-कौन हैं ? ॥१३३॥
कोई भिन्न निज के १/२, १/६, १/५ तथा १/८ और १/७ भागों द्वारा अनुगमन में ह्रासित किया जाता है और इस
तरह १/६ हो जाता है । हे अंकगणित सिद्धान्त वेत्ता ! बतलाओ कि वह अज्ञात क्या है ? ॥१३४॥
अन्य चाहे हुए स्थानों वाला कोई अज्ञात भिन्न निकालने के नियम—
दिये गये योग से प्राप्त मन से चुने हुए विपाटित भाग क्रमशः इष्ट भागापवाह भिन्नों वाली
सरलीकृत ज्ञात राशियों द्वारा विभाजित होकर और तब १ में से अलग अलग घटाये जाकर, चाहे हुए
स्थानों की भिन्नीय राशियाँ हो जाते हैं ॥१३५॥
इस प्रकार कलासवर्ण षड्जाति में भागापवाह जाति नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
भागानुबन्ध अथवा भागापवाह प्रकार के भिन्नों के सम्बन्ध में अंतिममान ज्ञात होने पर
(सर्व स्थान वाले) अज्ञात भिन्नों को निकालने के लिये नियम—
मन से, इच्छानुसार, केवल एक स्थान छोड़कर सब अज्ञात स्थानों सम्बन्धी भिन्न चुनो । तब
ऊपर लिखे हुए नियमों द्वारा, उस अज्ञात भिन्न को, इन मन से चुनी हुई भिन्नीय राशियों की सहायता
से प्राप्त करो ॥१३६॥
(१३५) गाथा १२५ में दिये गये नियम के समान यह भी है ।
(१३६) १२२, १२५, १३२ और १३५ गाथाओं में दिये गये नियमानुसार यह भी है ।
ग० सा० सं०-९

६६ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. १३७-
अत्रोद्देशकः
कश्चिदंशोऽशकैः कैश्चित्पञ्चभिः स्वैर्युतो दलम् ।
वियुक्तो वा भवेत्पादस्तानंशान् कथय प्रिय ॥१३७॥
भागमातृजातौ सूत्रम्—
भागादिमजातीनां स्वस्वविधिर्भागमातृजातौ स्यात् ।
सा षड्विंशतिभेदा रूपं छेदोऽच्छिदो राशेः ॥१३८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक भिन्न निज के पाँच अन्य भिन्नों से मिलाया जाने पर १/२ हो जाता है; और, एक अन्य
भिन्न निज के पाँच अन्य भिन्नों द्वारा ह्रासित होकर १/४ हो जाता है । हे मित्र ! उन सब अज्ञात भिन्नों
का मान निकालो ॥१३७॥
भागमातृ जाति [ दो या अधिक प्रकार के भिन्नों से संयुक्त भिन्न ]
ऊपर वर्णित सभी प्रकार के भिन्नों का जिसमें समावेश है ऐसे भागमातृ प्रकार के भिन्न सरल
करने के लिये नियम—
भागमातृ भिन्नों में, सरल भिन्नों को आदि लेकर विभिन्न प्रकार के भिन्नों सम्बन्धी नियम
प्रयोज्य होते हैं । भागमातृ भिन्न के २६ प्रकार होते हैं । जिस राशि का हर नहीं होता उस राशि का
[L

-३. १४० ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६७

अत्रोद्देशकः

ड्यंशः पादोऽर्धोर्धं पञ्चमषष्ठत्रिपादहृतमेकम् ।
पञ्चार्धहृतं रूपं सषष्ठमेकं सपञ्चमं रूपम् ॥१३९॥
स्वीयतृतीययुग्दलम्तो निजषष्ठयुतो द्विसप्तमो
हीननवांशमेकमपनीतदशांशकरूपमष्टमः ।
स्वेन नवांशकेन रहितश्चरणः स्वकपञ्चमोज्झितो
ब्रूहि समस्य तान् प्रिय कलासमकोत्पलमालिकाविधौ ॥१४०॥
इति भागमातृजातिः ।
इति सारसङ्ग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ कलासवर्णो नाम द्वितीयव्यवहारस्समाप्तः ॥


उदाहरणार्थ प्रश्न

दिया गया है कि भिन्न २/३, १/४, १/२ का १/२, १/५ का १/६; १ / (३/४) , १ / (५/२) ; १ १/६, १ १/५; १/२ अपने १/३ भाग
से संयुक्त है; पुनः

४. प्रकीर्णक व्यवहारः
प्रणतानन्तगुणौघं प्रणिपत्य जिनेश्वरं महावीरम् । प्रणतजगत्त्रयवरदं प्रकीर्णकं गणितमभिधास्ये॥१॥
$^१$विध्वस्तदुर्नैयध्वान्तः सिद्धः स्याद्वादशासनः । विद्यानन्दो जिनो जीयाद्वादीन्द्रो मुनिपुङ्गवः ॥२॥
इतः परं प्रकीर्णकं तृतीयव्यवहारमुदाहरिष्यामः—
भागः शेषो मूलकं शेषमूलं स्यातां जाती द्वे द्विरग्रांशमूले ।
भागाभ्यासोऽतोंऽशवर्गोऽथ मूलमिश्रं तस्माद्द्विन्नदृश्यं दशामूः ॥ ३ ॥
१ B और M में यह श्लोक छूटा हुआ है ।
४. प्रकीर्णकव्यवहार
[ भिन्नों पर विविध प्रश्न ]
स्तवनीय अनन्त गुणों से पूर्ण और नमन करते हुए तीनों लोकों के जीवों को वर
देने वाले जिनेश्वर महावीर को नमस्कार कर मैं भिन्नों पर विविध प्रश्नों का प्रतिपादन करूँगा ॥१॥
जिन्होंने दुर्नय के अंधकार का विध्वंस कर स्याद्वाद शासन को सिद्ध किया है, जो विद्यानन्द हैं,
वादियों में अद्वितीय हैं और मुनिपुंगव हैं ऐसे जिन सदा जयवंत हों । इसके पश्चात्, मैं तीसरे विषय
(भिन्नों पर विविध प्रश्न) का प्रतिपादन करूँगा ॥२॥ भिन्नों पर विविध प्रश्नों के दस प्रकार हैं; भाग,
शेष, मूल, शेषमूल, द्विरग्रशेषमूल, अंशमूल, भागाभ्यास, अंशवर्ग, मूलमिश्र और भिन्नदृश्य ॥३॥
( ३ ) 'भाग' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें निकाली जानेवाली कुल राशि के कुछ विशिष्ट
भिन्नीय भागों को हटाने के पश्चात् शेष भाग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है । हटाये गये
भिन्नीय भाग में से प्रत्येक 'भाग' कहलाता है और ज्ञात शेष का संख्यात्मक मान 'दृश्य' कहलाता है ।
'शेष' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें निकाली जानेवाली कुल राशि के ज्ञात भिन्नीय भाग को
हटाने के पश्चात् अथवा उत्तरोत्तर शेष के कुछ ज्ञात भिन्नीय भाग हटाने के पश्चात् शेष भाग का
संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।
'मूल' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें कुल राशि में से कुछ भिन्नीय भाग अथवा उस कुल
राशि के वर्गमूल का गुणक घटाने के पश्चात् शेष भाग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।
'शेषमूल', 'मूल' से केवल इस बात में भिन्न है कि यह वर्गमूल पूरी राशि के स्थान में उसका
वर्गमूल होता है जो दिये गये भिन्नीय भागों को घटाने के पश्चात् शेष रूप में बचता है ।
'द्विरग्र शेषमूल' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें ज्ञात वस्तुओं की संख्या पहिले हटाई जाती है;
तब उत्तरोत्तर शेष के कुछ भिन्नीय भाग और तब अग्र शेष के वर्गमूल का कोई गुणक हटाया जाता है;
और अन्त में, शेष भाग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है । प्रथम हटाई गई ज्ञात संख्या पूर्वाग्र
कहलाती है ।
'अंशमूल' प्रकार में कुल संख्या के भिन्नीय भाग के वर्गमूल के एक गुणक को हटाया जाता है
और तब शेष भाग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।

-४.५ ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ .६९
तत्र भागजातिशेषजात्योः सूत्रम्—
भागोनरूपभक्तं दृश्यं फलमत्र भागजातिविधौ । अंशोनितरूपाहतिहृतमग्रं शेषजातिविधौ ॥ ४ ॥
भागजातावुद्देशकः
दृष्टोऽष्टमं पृथिव्यां स्तम्भस्य त्र्यंशको मया तोये ।
पादांशः शैवाले कः स्तम्भः सप्त हस्ताः खे ॥ ५॥
षड्भागः पाटलीषु भ्रमरवरततस्तत्त्रिभागः कदम्बे
पादश्चूतद्रुमेषु प्रदलितकुसुमे चम्पके पञ्चमांशः ।
भिन्नों पर विविध प्रश्नों में 'भाग' और 'शेष' भिन्नों सम्बन्धी नियम -
'भाग' प्रकार ( भाग प्रकार की प्रक्रियाओं ) में, ज्ञात भिन्न से ह्रासित १ के द्वारा दी
गई राशि को भाजित कर चाहा हुआ फल प्राप्त किया जाता है । 'शेष' प्रकार की प्रक्रियाओं में, ज्ञात
भिन्नों को एक में से क्रमशः घटाने से प्राप्त राशियों के गुणनफल द्वारा दी गई राशि को भाजित कर इष्ट
फल प्राप्त किया जाता है ॥४॥
'भाग' जाति के उदाहरणार्थ प्रश्न
मेरे द्वारा एक स्तम्भ का १/८ भाग जमीन में; १/३ पानी में १/४ काई में और ७ हस्त हवा में देखा
गया । बतलाओ स्तम्भ की लम्बाई क्या है ? ॥५॥ श्रेष्ठ भ्रमरों के समूह में से १/६ पाटली वृक्ष में, १/३
कदम्ब वृक्ष में, १/४ आम्र वृक्ष में, १/५ विकसित पुष्पों वाले चम्पक वृक्ष में, ३/१० सूर्य किरणों द्वारा पूर्ण
विकसित कमल वृन्द में आनन्द ले रहे थे और एक मत्त भृङ्ग आकाश में भ्रमण कर रहा था ।'
( ४ ) 'भाग' प्रकार के सम्बन्ध में नियम बीजीय रूप से यह है : क = अ / (१ - ब) . जहाँ क अज्ञात
समुच्चय राशि है, जिसे निकालना है; अ 'दृश्य' अथवा अग्र है; और, ब दिया गया भाग अथवा दिये
'भागाभ्यास' अथवा 'भाग सम्वर्ग' प्रकार में, कुल संख्या के कुछ भिन्नीय भागों के गुणनफल
अथवा गुणनफलों को दो, दो के संचय में लेकर उन्हें कुल संख्या में से घटाने से प्राप्त शेष भाग का
संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।
'अंशवर्ग' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें कुल में से भिन्नीय भाग का वर्ग ( जहां, यह भिन्नीय
भाग दी गई संख्या द्वारा बढ़ाया अथवा घटाया जाता है ) हटाने के पश्चात् शेष भाग का संख्यात्मक
मान दिया गया होता है ।
'मूलमिश्र' प्रकार में वे प्रश्न होते हैं जिनमें कुछ दी गई संख्याओं द्वारा घटाई या बढ़ाई गई कुल
संख्या के वर्गमूल में कुल के वर्गमूल को जोड़ने से प्राप्त योग का संख्यात्मक मान दिया गया होता है ।
'भिन्न दृश्य' प्रकार में कुल का भिन्नीय भाग, दूसरे भिन्नीय भाग द्वारा गुणित होकर, उसमें से
हटा दिया जाता है और शेष भाग कुल के भिन्नीय भाग के रूप में निरूपित किया जाता है । यह
विचारणीय है कि इस प्रकार में, अन्य प्रकारों की अपेक्षा शेष को कुल के भिन्नीय भाग के रूप में
रखा जाता है ।

  • Line 31 (Text): दिशा में उड़े उनके अन्तर को निज की आधी राशि द्वारा ह्रासितकर और पुनः इस परिणामी राशि की
    • Line 32 (Text): (Blank space / separator line)
    • Line 33 (Text): गये भिन्नीय भागों का योग है। यह स्पष्ट है, कि यह समीकरण क - बक = अ द्वारा प्राप्त किया जा
    • Line 34 (Text): सकता है। शेष प्रकार का नियम, बीजीय रूप से निदर्शित करने पर,
    • Line 35 (Text): अ
    • Line 36 (Text): क = --------------------------------- होता है, जहाँ ब_१, ब_२, ब_३ आदि उत्तरोत्तर शेषों के
    • Line 37 (Text): (१ - ब_१) (१ - ब_२) (१ - ब_३) X .......
  1. Final Polish:
    • Ensure all Sanskrit words are spelled exactly as in the image (e.g., मयोपद्दष्टा -> wait, is it मयोपद्दष्टा or मयोपदृष्टा? The image says मयोपद्दष्टा with a double 'द' or 'दृ'? It looks like मयोपद्दष्टा or मयोपदृष्टा. Let's look closely: `मयोपद्दष्टा

[-४. २२ ] प्रकीर्णकव्यवहारः [ ७९

फलभारनम्रकम्रे शालिक्षेत्रे शुकाः समुपविष्टाः । सहसोत्थिता मनुष्यैः सर्वे संत्रासिताः सन्तः ॥१२॥
तेषामर्धं प्राचीमाग्नेयीं प्रति जगाम षड्भागः ।
पूर्वाग्नेयीशेषः स्वदलोनः स्वार्धवर्जितो यामीम् ॥१३॥
याम्याग्नेयीशेषः स नैर्ऋतिं स्वद्विपञ्चभागोनः । यामोनैर्ऋत्यंशकपरिशेषो वारुणीमाशाम् ॥१४॥
नैर्ऋत्यपरविशेषो वायव्यां सस्वकत्रिसप्तांशः । वायव्यपरविशेषो युतस्वसप्ताष्टमः सौमीम् ॥१५॥
वायव्युत्तरयोर्युतिरैशानीं स्वत्रिभागयुगहीना । दशगुणिताष्टाविंशतिरवशिष्टा व्योम्नि कति कीराः॥१६॥
काचिद्वसन्तमासे प्रसूनफलगुच्छभारनम्रोद्याने ।
कुसुमासवरसरञ्जितशुककोकिलमधुपमधुरनिस्वननिचिते ॥१७॥
हिमकरधवले पृथुले सौधतले सान्द्ररुन्द्रमृदुतल्पे ।
फणिफणनितम्बबिम्बा कनदमलाभरणशोभाङ्गी ॥१८

७२ ] गणितसारसंग्रहः [ ४. २३-
१स्फुरदिन्द्रनीलवर्णं षट्पदवृन्दं प्रफुल्लितोद्याने । दृष्टं तस्याष्टांशोऽशोके कुटजे षडंशको लीनः ॥२३॥
कुटजाशोकविशेषः षड्गुणितो विपुलपाटलीषण्डे ।
पाटल्याशोकशेषः स्वनवांशोनो विशालसालवने ॥२४॥
पाटल्याशोकशेषो युतः स्वसप्तांशकेन मधुकवने । पञ्चांशः संदृष्टो बकुलेषूत्फुल्लमुकुलेषु ॥२५॥
तिलकेषु कुरवकेषु च सरलेष्वाम्रेषु पद्मषण्डेषु । वनकरिकपोलमूलेष्वपि सन्तस्थे स एवांशः ॥२६॥
किञ्जल्कपुञ्जपिञ्जरकञ्जवने मधुकर्रास्त्रयस्त्रिंशत् । दृष्टा भ्रमरकुलस्य प्रमाणमाचक्ष्व गणक त्वम् ॥२७॥
गोयूथस्य क्षितिभृति दलं तद्दलं शैलमूले षट् तस्यांशा विपुलविपिने पूर्वपूर्वार्धमानाः ।
संतिष्ठन्ते नगरनिकटे धेनवो दृश्यमाना द्वा