ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
मैंने शत्रुओंकी दुर्गत की होती !" और बृहन्नडा-अर्जुन-सारथ्य करने तैयार हो गयी । तब निरुपाय
हो कर उत्तरकुमार लड़ाईके लिये चल पड़ा । किंतु प्रत्यक्षमें शत्रुओंकी बड़ी भारी सेना देख कर
कांपता हुवा पीछे दौड़ने लगा । अर्जुन तब इसको रथमें बांध कर स्वयं लड़ने लगा । सबको
अर्जुनने मोहनास्त्रसे बेसुध कर दिया और उत्तर कुमारसे उन बड़े बड़े सेनानियोंके वस्त्राभरणादि
विजय वैभव चिन्होंको लुटवाकर उसके सिरपर मुफ्तका विजय और कर्तृत्वका सेहरा बांध दिया ।
इस प्रज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर
करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ ज्ञा० १३-२५ ॥
भगवान् शंकर अपना कैलासका राज्य छोड़कर शशानमें जा तप करने लगा । तब उस
तपका भी भंग करनेवाला मन्मथ-काम ! शंकरने अपने तृतीय नेत्रसे उसका नाश किया ।
ब्रह्मदेवके हृदयसे कामकी उत्पत्ति है । रति उसकी पत्नी । सबके तपो भंगमें यह आगे ।
कहते जिसे योगी-जन । सांख्य-योग अर्जुन ।
जिसको कहनेमें मान । हुवा मैं कपिल ॥ ज्ञा० १३-५५७ ॥
कर्दम ऋषि एक प्रजापति । मनु-कन्या देवहूति इसकी पत्नी । इनका पुत्र कपिल, विष्णुका
अवतार माना जाता है । कपिलका जन्म सिद्धपुरमें हुवा । कपिलका जीवन-वृत्त तीसरे परिशिष्टमें
आया है । कपिल सांख्यशास्त्रका आदि आचार्य माना जाता है । कपिल माताको ब्रह्मज्ञान देकर
पातालमें जा बसा ।
या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर ।
जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ज्ञा० १५-१३५ ॥
अपने वनवासके दिनोंमें राम लक्ष्मण सीता किसी एक आश्रममें रहते थे । सीता वहीं
सूखनेवाले अपने खाद्य-पदार्थोंकी रखवाली करते बैठी थी । तब वहां एक कौवा आ कर सीताको
बड़ा तंग करने लगा । उनके हकालने पर भी नहीं जाता था । रामने तब क्रोधसे इषीकास्त्रके
मंत्रसे वहीं पर पड़ा एक तिनका कौवे पर फेंका और वह तिनका उस कौवेके पीछे वैसे ही
पड़ गया जैसे दुर्वासा ऋषीके पीछे सुदर्शन पड़ा था । फिर बेचारा हताश कौवा, रामकी शरणमें
आकर अपने प्राणोंकी भीख मांगने लगा । रामको दया आ गयी । रामने कहा "यह अस्त्र व्यर्थ
नहीं जाता । इसलिये यह तुम्हारी एक आंख फोडेगा ।" रामकी आज्ञासे उस तिनकेने कौवेकी
एक आंख फोड कर कौवेको प्राणदान दिया । तबसे कौवा एकाक्ष कहलाता है और उसकी दृष्टि
दोनों आंखोंमें काम करती है !
वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान जो कीर्तिमुख होता ॥ ज्ञा० १५-५२७ ॥
दक्षिणमें प्रायः प्रत्येक मंदिरके गर्भ-गृहके दरवाजेमें, ठीक देहरीके ऊपर, बीचोबीच
सिंहकी-सी एक कराल मुखाकृति रहती है । उसको कीर्ति-मुख कहते हैं । कीर्तिमुखके विषयमें
स्कंद पुराणके शिवकांडके सत्रहवे अध्यायमें निम्न कथा है ।
शंकरकी तीसरी आंखकी अग्निसे जालंधर नामका एक राक्षस उत्पन्न हुवा । यह बड़ा
शास्त्रवेत्ता था । "बिना शंकर भगवानके और किसीसे उसकी मृत्यू नहीं होगी तथा जहांसे आया
९९ परिशिष्ट ४
था वहीं विलीन होगा" ऐसा वर भी उसको मिला था। शुक्राचार्य इसका गुरु । उससे संजीवनी
विद्या भी यह पा चुका था । परिणाम स्वरूप सारे ब्रह्मांड पर उसकी सत्ता हो गयी ।
सर्व सत्ताधीश जालंधर । जहाँ जो कुछ अच्छा हो वह सब उसके भोगका साधन होना
चाहिए। उसने पार्वतीके सौंदर्यकी कथा सुनी। उसके मनमें आया "ऐसा स्त्री-रत्न मेरे पास
होना चाहिए।" बस तुरंत उसने भगवान शंकरको आज्ञा दी "पार्वतीको तुरंत हमारे पास पहुँचा
दो !" जालंधरकी यह आज्ञा राहू वहां ले गया था।
राहूसे जालंधरका संदेशा-उदंडता भरी आज्ञा-सुनते ही भगवान शंकर क्रुद्ध हुए। उनकी
तीसरी नेत्रसे सिंहमुखका एक विकराल पुरुष निर्माण हुआ । राहू उससे पराजित होकर भागता
भागता जालंधरके पास आया। जालंधर भी अपनी दैत्य-सेना लेकर युद्ध करने गया। वह कराल
पुरुष जालंधरादि राक्षसोंको निगल गया। किंतु उसकी भूख नहीं मिटी। शंकरने उस पुरुषका भी
शिरश्छेद किया और उस मुखको अपनाही शरीर खानेकी आज्ञा दी। मुखने शरीर खाया और
जो मुख रहा वह कीर्ति-मुख कहलाया। प्रत्येक शिवालयमें यह कीर्तिमुख रहता है। इसका दर्शन
करनेके बाद शिव-दर्शन । यह शिवाज्ञा है।
जैसे कीर्तिमुखने प्रथम सभी राक्षसोंको खाकर अपना शरीर भी खाया वैसे ज्ञान अज्ञानको
निगलकर स्वयं नष्ट होता है यह इस छंदमें कहा गया है।
मुझ चैतन्य शंभुका माथा। जो गीता तत्व था वह पार्था ।
उसका गौतम बन आस्था । निधि तू आया ॥ ज्ञा० १५-५७९ ॥
नासिक जिलामें ब्रह्मगिरीके पास गौतम ऋषिका एक आश्रम है। उस आश्रममें गौतम
ऋषिके कई शिष्य भी रहते थे । गौतमके उन शिष्योंमें गणपति भी घुस गया ! गौतमके शिष्योंमें
ऐसे घुस जानेका गणपतिको भी एक प्रयोजन था।
सदैव शंकरके सिरपर गंगा ! पार्वतीको यह अच्छा नहीं लगता था। पार्वती गंगाको शिवके
सिरपरसे नीचे उतारना चाहती थी । इसलिये पार्वती ने गणपति को यह काम दिया था।
गणपतिने जया नामकी एक स्वर्गीय स्त्रीकी सहायता ली। जया गाय बनी। गाय खेत
चरने लगी। कोई गाय ऋषिका अन्न खाती है यह देखकर गौतमने एक दर्भ उस गाय पर फेंक
दिया। दर्भ लग गाय मर गयी । हां हां कहते गोहत्या हो गयी !
"गोहत्याका पातक अब कैसे मिटेगा !" गौतम सोचने लगा। गणपति सलाह देने आये ।
"शिवसे गंगा मांग लीजिये ! गंगा आयी कि गंगा स्नान कीजिये !"
गोहत्याके पाप-क्षालनके लिये गंगावतरण आवश्यक था। गौतम ब्रह्मगिरि पर तपस्या करने
लगे। शिवजी प्रसन्न हुए। जटाकी गंगा मुक्त हुई । गंगाद्वारसे, शिव-जटासे-मुक्त हो कर वह
कुशावर्तमें गिरती हुई आज भी दिखायी जाती है ।
जैसे रंभाके भी अनेक रूप। न जगा सके शुकमें कंदर्प ।
या राखमें न होती उहीप। घृतसे भी आग ॥ ज्ञा० १६-१२८ ॥
व्यास पुत्र शुक। जन्मता महा-ज्ञानी, विरक्त । उसका तपोभंग करनेकेलिये इंद्रने रंभाको
भेजा था किंतु शुकके तपाचरण पर रंभाका कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा ।
ज्ञानेश्वरी १०९
त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व-दुर्गमें अटका गया ।
आत्मा-शंभुने वह छुडा लिया । तेरे स्मरणसे ॥ ज्ञा० १७-२ ॥
मयासुर शिल्पका आचार्य । ब्रह्माके वरसे इसने अजेय ऐसे तीन नगर बसा लिये ।
लोह-नगर, रजत-नगर, स्वर्ण-नगर । एकके ऊपर एक । एकके अंदर एक । इसको त्रिपुर कहा
करते थे । मयासुरके बाद उसके अनुयायियोंने इस अभेद्य नगरकी सहायतासे देवोंको खूब सताना
प्रारंभ किया । सभी देव तब शंकर भगवानके पास गये । शंकर भगवानकी प्रार्थना की । सब
देवोंको साथ लेकर शंकर भगवान त्रिपुर पर चढ़ाई कर गये । किंतु जाते समय सर्वप्रथम गणपति
पूजन नहीं किया था । इससे त्रिपुर-विजय नहीं हुआ । वहीं घिर गये । तब, सबने वहां गणपति
पूजन कर युद्धारंभ किया और शंकर भगवान त्रिपुरोंका संहार कर सके ।
ज्ञानेश्वर महाराजने गणपतिरूप गुरुवंदन करते समय यह कथा सुनाई है ।
प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य-शंभुने गला ।
तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ज्ञा० १८-७८९ ॥
समुद्र-मंथनमें प्रथम हलाहल विष आया वैसे ही जीवन-मंथनमें प्रथम वैराग्य आता है ।
वहां इस हलाहलको शंकरने गलेमें धारण कर लिया । यहां पर धैर्य ही वह शंकर है । धैर्यसे
वैराग्यके झटके सहने पड़ते हैं । इसके बाद जैसे वह अमृत कुंभ निकला वैसे यहां निर्मल
ज्ञानामृतका महान आनंद मिलता है । जीवनकी आध्यात्मिक साधनाको दर्शाते समय पौराणिक
कथाकी उपमा दी है ।
जैसे है छठीकी रात । नहीं भूलते हैं ज्योत ।
वैसे ईश्वरकी बात । चित्तमें रखना ॥ ज्ञा० १८-८३७ ॥
बच्चा पैदा होनेपर छठी रातको छठीकी पूजा करते हैं । विश्वेशस्य जन्मदानां जीवन्यपर-
नाम्न्याः षष्ठीदेव्याः शस्त्रागर्भाभगवत्याश्च पूजनं करिष्ये । यह पूजाका संकल्प होता है । इसके बाद
पटलेपर चावल, उसपे चार पूगीफल-सुपारी-रखकर जीवंति, षष्ठी, शस्त्रागर्भा भगवती ऐसी तीन
देवियोंकी प्रतिष्ठा करते हैं । एक हंसिया रेशमी कपड़ेमें लपेटकर सूपमें रखा जाता है । फिर-
गौरीपुत्रो यथा स्कंदः शिशुत्वे रक्षितः पुरा ।
तथा ममाप्ययं बालः षष्ठिके रक्षतां नमः ॥
ऐसी प्रार्थना की जाती है । और रात भर ज्योति जलती रखी जाती है । क्यों कि कहीं
अंधेरेमें छठी बालकका घात नहीं करे ।
अमरत्व परोसा पानमें । कारण हुआ था मृत्यु लानेमें ।
न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ज्ञा० १८-१४७८ ॥
समुद्रमंथनमेंसे जब अमृत निकला तब वह देव और दानव दोनोंके अधिकारका था । किंतु
दानवोंको अमृत देकर अमर करना लोक-क्षयकारी होगा इस विचारसे विष्णूने मोहिनीके रूपमें
अमृत-कलश लूटा । इसके बाद देव और दानव भोजनके लिये-अमृतपानके लिये-सामने सामने बैठे ।
मोहिनीके रूपमें विष्णु देवोंको अमृत परोसने लगा । उसी समय राहू नामका दैत्य धोखा देकर
देवोंकी पंगतमें बैठ गया । साथ साथ उसने अमृतपान भी किया किंतु अमृत गलेके नीचे उतरनेके
पहले ही सूर्य और चंद्रने उसको पहचान लिया और विष्णुने सुदर्शनसे उसका शिरच्छेद किया ।
१०१ परिशिष्ट ४
नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार ।
जिससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ज्ञा० १८-१४७९ ॥
पुरूरवाका पोता राजा नहुष । अत्यंत पराक्रमी । सद्गुणी । ब्रह्महत्याके पापके कारण जब
इंद्रको इंद्रत्वसे हटना पड़ा तब देवऋषियोंने मिलकर नहुषको इंद्र बनाया । और नहुष "शानसे"
रहने लगा । नहुषकी इस शानमें इंद्राणीकी न्यूनता खटकने लगी । इंद्रके साथ इंद्राणीका होना
आवश्यक है । नहीं तो इंद्रपदकी शान कहां ? उसने तुरंत इंद्राणीको अंतःपुरमें आनेकी आज्ञा दी ।
इस आज्ञाने धर्म-संकटका काम किया । यह संकट टालनेके लिये इंद्राणीने अत्यंत चतुरतासे
"कृपया अपूर्व वाहनमें बैठकर मुझे ले जानेके लिये पधारिये ।" ऐसा संदेश भेज दिया । अब
नहुष अपूर्व वाहनका विचार करने लगा । वह सप्तऋषियोंको रथमें जोत कर उस "अपूर्व वाहन"
में इंद्राणीको लानेके लिये जाने लगा । नहुषको जल्दीसे जल्दी वहां पहुंचनेकी पड़ी थी और बेचारे
वृद्ध ऋषि रथ खींचकर जल्दी नहीं चल रहे थे । राजाने उनको “सर्प सर्प” जल्दी जल्दी कहते
हुए लात मारना प्रारंभ किया । इस पर अगस्तिने क्रोधमें आकर शाप दिया कि "तू अब अजगर
सर्पयोनिमें जा !” और नहुष रथमें ही अजगर बनकर भूमीपर गिर पडा ।
कोई पद मिलना कठिन नहीं किंतु योग्यता पूर्वक उसको संभालना कठिन है यह समझाते
हुए ज्ञानेश्वर महाराजने ऊपरकी कथा कही है ।
अथवा यहु गीता सप्तशती । जो मंत्रप्रतिपाद्या भगवती ।
मोह-महिषासुरसे मुक्ती । आनंदती है ॥ ज्ञा० १८-१६८८ ॥
महिषासुर रंभासुरका पुत्र । घोर तपस्या करके इसने ब्रह्मदेवसे पुरुषसे मृत्यु न होनेका वर
ले लिया । उसके बाद यह देवोंको तंग करने लगा । प्राणिमात्रका पीडन इसका कार्य । तब आदि
शक्तिने उसको युद्धके लिये प्रवृत्त करके उसका वध किया । महिषासुरने आदि शक्तिको सामान्य
स्त्री मानकर उसको मोहित करनेका प्रयत्न किया किंतु वह सब व्यर्थ था ।
श्रीगुरुके नामसे मृत्तिका । मूर्ति रख वनमें विद्याका ।
रोव कर डंका श्रेष्ठताका । बजाया भिल्लने ॥ ज्ञा० १८-१७३० ॥
हिरण्यधनु नामका एक भिल्ल-राज था । उसका पुत्र एकलव्य । वह अत्यंत बुद्धिमान् था ।
अस्त्र-विद्या सीखनेके लिये वह द्रोणाचार्यके पास गया । किंतु द्रोणाचार्यने वह भिल्ल होनेसे उसको
अस्त्र-विद्या सिखाना अस्वीकार कर दिया । तब उसने द्रोणाचार्यकी पादुकाएं मांग लीं, वनमें
जाकरके मिट्टीसे द्रोणाचार्य की एक मूर्ती बनायी और उसके सामने धनुर्विद्याका अभ्यास करने लगा ।
तथा इस अभ्यासमें वह इतना प्रवीण हुवा कि कोई भी उसकी समानता नहीं कर सकता
था । द्रोणाचार्यका सर्व श्रेष्ठ शिष्य अर्जुन ! इसने भी एकलव्यकी श्रेष्ठता स्वीकार करली ।
ॐ
ज्ञानेश्वरी १०२
परिशिष्ट पांचवा
इस परिशिष्टमें ज्ञानेश्वरीके कुछ शब्दोंकी विस्तृत
जानकारी दी है। इन शब्दोंकी पूर्ण जानकारीके बिना
ज्ञानेश्वरीका ही नहीं भारतीय तत्त्वज्ञानका, अथवा
चिंतन पद्धतिका मर्म समझना असंभव सा है और
इन शब्दोंके विषयमें अनेक प्रकारकी गलत धारणायें
भी बनी हुई हैं इसलिये विषयका ज्ञान होनेकी दृष्टिसे
इन शब्दोंकी कुछ अधिक जानकारी देना आवश्यक
समझा गया।
इस चित्र में कोई पाठ (text) या सामग्री दिखाई नहीं दे रही है; यह पृष्ठ पूर्णतः रिक्त (blank) है।
परिशिष्ट पांचवा
अंतःकरण—करणका अर्थ है इंद्रिय । अर्थात् अंतःकरणका अर्थ अंदरका इंद्रिय ऐसा
होता है । इंद्रियोंके दो प्रकार होते हैं । जैसे बाह्यचक्षु अंतरचक्षु । बाह्य इंद्रियां बाहरी विषयका
ज्ञान करा देती हैं । प्रांपंचिक ज्ञानका साधन बनती हैं किंतु अंतर्विषयोंके ज्ञानका क्या साधन ?
वह है अंतःकरण । इसी अंतःकरणके कारण सुख, दुःख, राग, द्वेष, आदिका ज्ञान होता है । यह
अंतःकरण बाह्य इंद्रियोंको—ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रियोंको—नियंत्रित करता है । दार्शनिक दृष्टिसे यह
अंतःकरण दर्पणकी भांति होता है अथवा जलाशयकी भांति होता है । जैसे स्वच्छ दर्पणमें
किसीका स्पष्ट प्रतिबिंब पड़ता है, या तरंग रहित शांत जलाशयमें विश्व प्रतिबिंबित होता है वैसे
शुद्ध निर्मल अंतःकरणमें ब्रह्म प्रतिबिंबित होता है । मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार मिलकर
अंतःकरण होता है । संदेह, निश्चय, स्मरण और अभिमान इनके विषय हैं ।
अक्षर—न + क्षर = अक्षर । जिसका क्षय नहीं होता, जो नहीं घुलता, गलता, वह अक्षर
है । अक्षरमें किसी प्रकारका विकार नहीं होता । परिवर्तन नहीं होता । वह नित्य है । सदैव एकसा
रहता है । वह भावोंसे परे, गुणोंसे परे, अर्थात भावातीत= निर्भाव, गुणातीत= निर्गुण, आकारा-
तीत= निराकार ऐसा है । वेदांतके मतसे यही परब्रह्म है । गीतामें भी अक्षर शब्द इसी अर्थमें
आया है । ओंकार, वेदसार, ईश्वरवाचक नाम, इसी अर्थमें गीतामें यह शब्द आया है । अर्थात
ज्ञानेश्वरीमें यह शब्द इसी अर्थमें लिया गया है । इसी अर्थका और एक शब्द अव्यय भी आया है ।
न + व्यय=अव्यय ।
अक्षौहिणीसेना—महाभारतयुद्धमें कुल अठारह अक्षौहिणी सेना थी । पांडवोंकी सात
अक्षौहिणी सेना और कौरवोंकी ग्यारह अक्षौहिणी सेना । अक्षौहिणी इस सेना विभागमें २१८४०
रथ, उतने ही हाथी, ६५६१० घोडे, तथा १०९३५० पादचारी सैनिक होत थे । प्रत्येक रथ, हाथी,
तथा घोडेके साथ ५ पैदल सैनिक रहा करते थे । कुल मिलाकर एक अक्षौहिणी सेनामें २१८७००
सैनिक होते थे । जिसके आधीन यह सेना होती थी उसको अक्षौहिणीपति कहा जाता था ।
अज्ञान—अविद्याकी जो बात वही अज्ञानकी बात है । गीताके, ज्ञानेश्वरीके तेरहवे
अध्यायमें–विस्तारपूर्वक इसके लक्षण कहे गये हैं । इसका लक्षण कहते समय " जो अनादि अनंत है,
नित्य है उस पर परदा डालनेवाला तत्व अज्ञान है" ऐसे कहा गया है । गीतामें " आत्मज्ञान को
ही नित्य कहा है । इस बोधको ज्ञान और उसके विपरीत सबको अज्ञान कहा है । " आत्मविषयक
अज्ञानके कारण ही मनुष्य अपूर्णताका अनुभव करता है और अपूर्णताके अनुभवसे वह विषयोंके
(8) १०५ परिशिष्ट ५
पीछे दौड़ता है। इस अज्ञानसे अविवेक, अविवेकसे अभिमान, और अभिमानसे राग-द्वेषादि द्वंद्व
परंपरा प्रारंभ होती है। इसीसे कर्मचक्र और जन्म मरणका चक्र, चलता रहता है। ज्ञानसे अज्ञान
नष्ट होता है। ज्ञान एक चिनगारी है जो अज्ञानका सारा कूड़ा जला कर राख कर देता है किंतु
जब तक कूड़ा है तब तक आग जलती रहती है। जब तक अज्ञान है तब तक ज्ञान रहता है। जैसे
कूड़ा जला कर आग स्वयं बुझ जाती है वैसे अज्ञानको नष्ट करके ज्ञान भी नष्ट हो जाता है। यही
सहज स्थिति है। ज्ञानेश्वर महाराजकी दृष्टिसे ज्ञानाज्ञानसे परेकी अवस्था मुक्तावस्था है। सामान्य
जीवन ज्ञानाज्ञानका कल्लोल है।
सद्गुरु ज्ञान देता है अर्थात् कूड़ेके ढेर पर चिनगारी रखता है। इसीका नाम दीक्षा है। उस
कूड़ेको जलाना साधना है। कूड़ेके साथ आगका भी बुझ जाना सिद्धि !
अद्वैत—जिसमें द्विधा-भाव नहीं वह अद्वैत है। जगद्गुरु श्रीआद्य शंकराचार्य इस अद्वैत
दर्शनके आद्य आचार्य माने जाते हैं। "केवल ब्रह्म ही सत्य है और सारा असत्य है यही वेद
उपनिषदादिमें कहा है" ऐसे आद्य शंकराचार्य कहते हैं। केवल ब्रह्म सत्य है। दीखनेवाला यह
नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है। जीव और ब्रह्म एक है। यह आद्य शंकराचार्यका सिद्धांत है।
किंतु ज्ञानेश्वर महाराज दीखनेवाले नामरूपात्मक जगतको मिथ्या न मानकर ब्रह्मका स्फुरण मानते
हैं यह स्फुरण सिद्धांत ज्ञानेश्वर महाराजका स्वतंत्र आविष्कार है। जैसे बीजसे वृक्षका स्फोट होता है,
शरीरसे रोमावलीका स्फुरण होता है वैसे ब्रह्मसे ब्रह्मांडका स्फोट या स्फुरण हुआ है। ब्रह्म जमा
हुवा घी तो ब्रह्मांड पिघला हुवा घी है। यह सारा, जो कुछ हम देखते हैं वह सब आत्माका विस्तार
है। यह सारी विविधता आत्माका ऐश्वर्य योग है। इसका बोध ही आत्मबोध है। ज्ञानेश्वरी और
अनुभवामृतमें इसीको विस्तारपूर्वक कहा गया है।
अनादि—जिसका कोई आदि नहीं। जो कबसे है यह नहीं कहा जाता वह अनादि है।
ब्रह्मका परिचय देते समय "अनादि अनंत" ऐसे दो शब्द आते हैं। अनादि अनंतका अर्थ देश-
कालमें न आनेवाला, बिना ओर छोरका अथवा देशकालातीत ऐसा मान सकते हैं। ब्रह्मके साथ मायाको
भी अनादि कहा गया है क्यों कि मायाका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। जिसका अस्तित्व ही नहीं
उसका भला आदि कैसे? वैसे ही जो है ही नहीं उसका अंत कहां? माया अस्तित्व हीनताके कारण
अनादि है किंतु ब्रह्मका अस्तित्व हो कर भी वह अनादि है। अनंत है। अर्थात् बिना ओर छोरका है।
ब्रह्म शब्दका अर्थ है बृहत, बडा; इतना बडा कि कोई भी उसको आच्छादित नहीं कर
सकता, उसका आदि अंत नहीं नाप सकता। उसका ओर छोर नहीं पा सकता। अनादि शब्दमें
आद्य तथा स्वसंबेद्य इन शब्दोंका भाव समाया हुवा है।
अनाहतध्वनि—योग-विद्यामें छ चक्रोंका विवेचन है। इसको षट्चक्र कहा गया है।
वे छ चक्र हैं (१) मूलाधार (२) स्वाधिष्ठान (३) मणिपूरक (४) अनाहत (५) विशुद्धि
(६) आज्ञाचक्र।
इसमें अनाहत हृदय-स्थानमें है। वह रक्तवर्ण है। बिना किसी ताडनाके, प्रेरणाके वह
शब्द-प्रत्यय देता है। इसलिये वह अनाहत चक्र है। अनाहत चक्रमें शब्द-ब्रह्मका बिना किसी
आघातके, अनुभव होता है। इसको अनाहत ध्वनि कहते हैं।
ज्ञानेश्वरी १०६
नाद आकाश तत्त्वका गुण है। यह दो प्रकारका होता है। एक आघात-जन्य दूसरा बिन
आघातके । हृदय चैतन्यका स्थान है। इसीमें शुद्ध-आकाशका एक स्थान है। वहाँ सदैव बिना
आघातके ही नाद गूंजता रहता है। किंतु बाह्य-विषयोंमें फंसा हुआ मनुष्य उसको नहीं सुन
सकता । योगी लोग इंद्रियोंको अंतर्मुख करके वह नाद सुननेका अभ्यास करते हैं। कुंडलिनी
शक्ति जगने पर ही यह ध्वनि आने लगती है।
कुंडलिनी शक्ति हृदय कमलके पास-अनाहत चक्रके पास-आनेपर, दस प्रकारसे यह अनाहत
ध्वनि सुनाई देती है । चिणी, चिणचिणी, घंटा, शंख, तंत्री, ताल, वेणु, मृदंग, भेरी, और मेघ ध्वनि ।
इसके बाद, आज्ञाचक्रके पास जाने पर वही सोऽहम् शब्द, ओंकार नादमें परिवर्तित होता है।
नाद अथवा ध्वनि अव्यक्त परतत्वके व्यक्तिकरणकी सूचना है। परा-वाणीमें सूक्ष्म रूपसे
निहित यही शब्द अपरावाणीमें आकर सदैव हृदयमें गूंजने लगता है। इसका रूप ॐ है। यही
ब्रह्मांडका मूलतत्त्व है। यह नाद अनाहत रूपसे व्यक्तिके हृदयाकाश तथा विश्वाकाशमें एकरूपसे
गूंजता रहता है। इस गूंजनकी एकताका अनुभव ही सोऽहं भाव है। सदैव इस सोऽहं भावमें
डूबा रहना ही अद्वैतस्थिति अथवा ब्राह्मी-स्थिति है जो सब प्रकारकी साधनाओंकी परम-सिद्धि है !
अपान—मनुष्यमें पांच प्रकारके प्राण होते हैं। इन्हें पंच-प्राण कहा जाता है ।
(१) प्राण (२) अपान (३) व्यान (४) उदान (५) समान ये उनके नाम हैं। शरीरमें
उनका भिन्न भिन्न स्थान और काम है। हठयोगमें इसका विस्तृत विवेचन किया गया है। अपान
वायु अधोमुखी होता है। मलमूत्रादि बाहर ढकेलना इसका सामान्य काम है। उपनिषदोंमें इसका
स्थान नाभी कहा गया है। अन्नादिके निस्सार भागको नाभीके नीचे ढकेलना, मूत्र शुक्रादिको बहाना
इसका कार्य है । किंतु योगी, योग विद्यासे इसको ऊर्ध्वमुख करके अपनी सुप्त शक्तिको जगाते हैं ।
अपानको ऊर्ध्वमुख करके प्राण और अपानको मिलानेसे मनुष्योंमें नयी शक्ति जगती है।
अमृत—जिसको पीनेसे मृत्यु नहीं होती वह अमृत । इसको पीयूष, सुधा आदि भी
कहा गया है। समुद्र मंथनसे अमृतकी प्राप्ति हुई । यद्यपि देव और दानव दोनोंने समुद्र मंथन
किया था अंतमें देवोंको ही अमृत मिला। दैत्योंको नहीं मिला। यह पौराणिक कथा है। किंतु वैदिक
“ऋषिकी प्रतिभा=अमृत” रहस्य जाननेके लिये स्वर्ग-मृत्यु पातालका अतिक्रमण करती है। उपनिषद्
“ मृत्योर्मामृतं गमय ” कहते हैं। उपनिषद् अमृत न कहकर अमृतत्व कहते हैं। वह है जन्म
मरणका अतिक्रमण करके पानेवाली स्थिति। जिसे पीनेसे मरण ही नहीं तब भला पुनर्जन्म कैसे ?
अर्थात् ज्ञानेश्वर या ज्ञानेश्वरीका अमृत या अमृतत्त्व जन्म-मरण रहित मुक्तावस्था है।
अरणी—दो लकड़ीके टुकड़ोंके घर्षणसे यज्ञाग्निका निर्माण किया जाता है। इसके लिये
पीपलकी लकड़ी काममें लायी जाती है। इन लकड़ीके दो टुकड़ोंमेंसे जो नीचेका टुकड़ा रहता है
उसे अधरारणी कहते हैं तो ऊपरके टुकड़ेको उत्तरारणी कहते हैं। अधरारणीमें खांच करके जो
लकड़ीका टुकड़ा बिठाते हैं उसको मंथा कहते हैं। ऋग्वेदमें इस प्रकारके अग्निस्फोटका वर्णन
आता है।
अर्धमात्रा—ॐकारकी साढ़ेतीन मात्राओंमें अर्धमात्रा । योग-शास्त्रमें परा ब्रह्मांडमें
मूर्धन्याकाशका भाग। आज्ञाचक्र, जो भृकुटीमध्यमें होता है और सहस्रार ब्रह्मरंध्र सहस्रदल-
लाखमें होता है, इसकी मध्यसंधि है। ज्ञानेश्वरीके छठे अध्यायमें इसका विस्तृत विवेचन है।
१०७ परिशिष्ट ५
अवभृथ—यज्ञादिके बाद समारोह पूर्वक जो सामूहिक स्नान होता है उसे अवभृथस्नान
कहते हैं । दक्षिणके जन-जीवनमें यह अत्यधिक प्रचलित है। जैसे मंदिरोंमें होनेवाले रथोत्सवादि
उत्सवानुष्ठान, भजन-सप्ताह,—सात दिन तक चलनेवाले भजनानुष्ठान-संपन्न होनेके बाद लोग आनं-
दोत्सव पूर्वक गुलाल उछालते हैं। हल्दी और चूना मिलाया हुवा लाल पानी बना कर उस पानीसे
खेलते हैं। वह पानी उछाला जाता है । एक दूसरे पर उंड़ेला जाता है। उसके बाद ऐसे ही गीले
कपड़ोंसे उछलते कूदते, नामस्मरणकी गर्जना करते, गांवके बाहरके जलाशय पर स्नान करने जाते हैं।
वहां स्नान करके वैसे ही भगवन्नाम-गाते मंदिर आते हैं । ऐसे समय अधिकतर पालकी
उत्सवमूर्ति-साथ होती है। इसको ओकली भी कहा जाता है ।
अविद्या—विद् धातुसे विद्या शब्द बना है। विद् का अर्थ है जानना । इस पर
अविद्याका अर्थ नहीं जानना ऐसा है। किंतु दर्शन-शास्त्रमें “असत् प्रकाशन शक्ति” माना गया
है । अर्थात् सत्यको नहीं जानना ही असत्का प्रकाशन है। इस शक्तिके दो रूप हैं। (१) सत्
को छिपाना । सत् पर परदा डालना (२) उसपर दूसरी वस्तुका आरोप करना या संभ्रम निर्माण
करना । आत्माके नित्यत्वको-आत्मबोधको छिपाना तथा शरीरभावको दिखाना । यह अविद्याका
कार्य है ।
अष्टमहासिद्धि—(१) अणिमा-शरीरको अत्यंत सूक्ष्म बना लेना—(२) महिमा—
शरीरको बडा और भारी बना लेना। (३) लघिमा-शरीरको अत्यंत हलका बना लेना—(४)
प्राप्ति-प्रत्येक इंद्रियकी एक अधिकारी देवता है। जैसे कानके-दिशा, नेत्रका सूर्य, जीभका वरुण,
नाकका अश्विनी, त्वचाका वायु, मुखका अग्नि, हाथका इंद्र, पायका उपेंद्र, लिंगका प्रजापति,
गुदाका यम, अपनी इंद्रियोंकी अधिष्ठात्री देवताओंसे संबंध जोड़ना—(५) प्राकाम्य-इस विश्व
तथा परलोकके अदृश्य विषयोंका ज्ञान प्राप्त करना । (६) ईशिता-ईश्वरी शक्तिकी उसके अंशोंकी
अन्यान्य स्थान और व्यक्तियोंमें जो जो सत्ता है उस पर स्वामित्व पाना । ईश्वरी सत्ता या प्रभावकी
प्राप्ति । (७) वशिता-भोग भोगते हुए भी अनासक्त रहनेकी शक्ति । (८) प्राकाम्य-जिस सुखकी
इच्छा करें उसकी अमर्याद् प्राप्ति !
अष्टलोकपाल—आठ दिशाओंके आठ स्वामी-(१) पूर्वका इंद्र (२) आग्नेयका अग्नि
(३) दक्षिणका यम (४) नैऋत्यका नैऋति (५) पश्चिमका वरुण (६) वायव्यका वायु
(७) उत्तरका कुबेर (८) ईशान्यका ईश ।
अष्टसात्विक भाव—ईश्वरीय भक्तिसे जब हृदय भर जाता है तब उसके जो परिणाम
शरीर पर स्पष्ट दीखते हैं उनको अष्ट-सात्विक भाव कहा जाता है । वे इस प्रकार हैं—(१)
स्तंभ=स्तब्धता (२) स्वेद=शरीरके रोमरोमसे स्वेदकण प्रस्फुटित होना (३) रोमांच=शरीरके
रोमरोम खिल उठते हैं (४) स्वरभंग=स्वर बदलना, गद् गद् होना (५) कंप=शरीर
कांपना, सिहर उठना (६) वैवर्ण्य=चेहरेका रंग बदलना-ऐसे समय-या तो चेहरा लाल हो जाता
है या फीका पडता है (७) अश्रुपात=आंखोंसे आनंदाश्रु स्रवना (८) प्रलय=भाव समाधि,
शरीर निश्चेष्ट होना ।
ज्ञानेश्वरी १०८
ज्ञानेश्वरीमें कहीं कहीं इन्हे षट्-विकार भी कहा गया है ।
अष्टांगयोग—आठ अंगोंसे बना हुवा योग । इसको पतंजल ऋषिने कहा था इसलिये
पातंजल योग भी कहते हैं । वैसे ही यह सर्वश्रेष्ठ योग होनेके कारण राजयोग भी कहते हैं । इस
योगके (१) यम (२) नियम (३) आसन (४) प्राणायाम (५) प्रत्याहार (६) धारणा
(७) ध्यान (८) समाधि ये आठ अंग हैं ।
पहला अंग यम । यम पांच हैं । (१) अहिंसा-तन, मन, वचनसे किसीका द्वेष नहीं करना ।
किसीका बुरा न चाहना (२) सत्य, जिस बातको जब जैसे अनुभव किया हो तब वैसे कहना ।
यदि कहना ही पडता हो ! कोई बात कहते समय कोई हेतु मनमें रख कर नहीं कहना । जैसे
कहा है वैसे बर्ताव करना । चिंतन मनन करना । (३) अस्तेय-किसीकी कोई वस्तु मनसे भी
नहीं चुराना, चाहना । (४) ब्रह्मचर्य-सर्वत्र सदैव ब्रह्मचिंतनमें ही रत रहना, अन्य चिंतन
नहीं करना (५) अपरिग्रह-संग्रहार्थ किसीसे कुछ भी नहीं लेना ।
दूसरा अंग नियम-जैसे यम पांच हैं वैसे नियम भी पांच हैं । (१) शौच-तन मन वचन
शुद्धि । शरीर निरोग रखना । मन प्रसन्न रखना । वाणी पवित्र रखना । (२) संतोष-आशा
निराशाके परे, अपनी इच्छा कुछ न रख कर, परमात्मेच्छासे जीना । तृष्णा त्यागसे संतोष मिलता
है । (३) तप-सभी धर्मोंमें तपका महत्त्व गाया गया है । सदुद्देशकी सिद्धिके लिये नियम पूर्वक
सतत-कार्यरत रहना तप है । (४) स्वाध्याय-जीवन लक्ष्यके सहायक सद्ग्रंथोंका वाचन, मनन,
अथवा नामस्मरण उत्तम स्वाध्याय है । (५) ईश्वर प्रणिधान-“ इदं न मम ” भावनासे, जो कुछ है
वह सब परमात्माका है यह मानकर सर्व समर्पणमय जीवन बिताना ।
तीसरा अंग आसन-विशिष्ट रीतिसे बैठा रहना । हठयोगमें ८४ आसन कहे गये हैं । उनमेंसे
कई शरीर स्वास्थ्यके लिये हैं । किंतु अष्टांगयोगमें आसनका अर्थ सुस्थिर बैठनेके लिये है ।
इसके लिये भी सिद्धासन पद्मासन आदिका विचार किया गया है । किसी भी आसनमें बैठना हो
सीधा बैठना चाहिये ।
चौथा अंग हे प्राणायाम-प्राणायामका अर्थ श्वासको नियमित करना है । प्राणायाम एक गहरा
शास्त्र है । मानवशरीरमें अलग अलग काम करनेवाले पांच प्राण हैं । उन सबको नियमित
करना है । इसके लिये पूरक-श्वास अंदर खींचना, कुंभक रोकना, रेचक-श्वास बाहर छोडना
यह सामान्य नियम हैं । गुदद्वारसे श्वास खींचना, मूलबंध, प्राण और अपानका मिलन, श्वास
अंदर रोकनेकी भांति अंदरका सारा श्वास बाहर निकाल कर उसको बाहर रोकना । उड्डियान बंध
आदि कई प्रकार हैं । प्राणायामसे अनेक प्रकारके रोगोंका नाश होकर श्वासके विशिष्ट और विविध
प्रकारके स्पंदनोंसे शरीरके विविध प्रकारके कोशोंको जगाकर कार्यक्षम करना इसका वास्तविक
उद्देश्य है । प्राणायामसे अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश, तथा आनंद-
मयकोशको जागृत कर सकते हैं । इसको हठयोगमें विज्ञान कहते हैं । अनुभवी गुरूसे ही इसका
ज्ञान और अभ्यास हो सकता है ।
इस योगका पांचवा अंग है प्रत्याहार-पांच ज्ञानेंद्रियोंके पांच विषय हैं । (१) शब्द
(२) स्पर्श (३) रूप (४) रस (५) गंध । पांच ज्ञानेंद्रियां इन पांच विषयोंके पीछे दौडनी
१०९ परिशिष्ट ५
हैं। उन विषयोंसे चिपके रहती हैं। विषयोंसे चिपके रहनेवाली इंद्रियोंको उनसे तोडकर चित्तके
स्वरूपसे जोडना प्रत्याहार है। सामान्यतः मनुष्यकी इंद्रियां विषयोंके पीछे दौडती हैं तब चित्त
इंद्रियोंके साथ रहता है और चित्त भी विषयोंमें रमता है। इसकी उलटी प्रक्रिया इंद्रियोंको
विषयोंसे तोडकर चित्तमें रमने देना अंतर्मुख करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार धारणा और ध्यानका
पहला पाठ है। इसके लिये इंद्रिय निग्रहके कई प्रकार कहे गये हैं। कई मुद्राएं हैं। इन सबसे
अच्छा है सदैव ध्येय चिंतन। इससे चित्त तथा इंद्रियां विषय चिंतन भूल जाती हैं। जैसे मनुष्य
जब किसी गहरे सोचमें होता तब भूख प्यास भी भूल जाता है। सर्वत्र सदा ध्येय चिंतन और
ध्येय निष्ठा प्रत्याहारकी रचनात्मक साधना है।
इसका छठा अंग है धारणा-प्रत्याहारसे इंद्रियोंको अंतर्मुख करने पर चित्तका क्या हो ?
उसको किसी स्थानपर बांध रखना धारणा है। यह स्थान अपनी अंतःसृष्टिका हो। बाह्य सृष्टिका
न हो। जैसे नाभिस्थान, हृदय, भृकुटीमध्य, आदि। ऐसे स्थानोंका चुनाव करते समय स्थूलसे
सूक्ष्मकी ओर जाना। हठयोगमें इस धारणाकी सिद्धिके लिये भी कई मुद्राओंको कहा गया है।
योगग्रंथोंमें शरीरमें जो पंचमहाभूत हैं उनके मूल-स्थानका विवेचन करके चित्तको उन उन
स्थानों पर चिपका देने और उनके फलोंका विचार है। अपने शरीरके षट्चक्रोंपर भी स्थिर
करनेको कहा गया है। इन सबका मूल उद्देश्य इतना ही है कि चित्त सदैव अंतःसृष्टिमें ही रहे।
अपनेमें ही संतुष्ट रहे। तुष्टिके लिये बाहर दौडनेकी आदत छूट जाय ! यह चित्तशुद्धिकी साधना है।
इससे ध्यान सुलभ होता है।
धारणाके बाद इस योगका सातवा अंग है ध्यान-चित्तकी जो धारणा है उसकी समरसताकी
प्रतीति ध्यान है। ध्यानका अर्थ ध्येय वस्तुसे तद्रूप होना। बुद्धि शक्ति सदैव उस ध्येय वस्तुकी
ओरही प्रवाहित हो। इसका सर्वोपरि रूप सदैव और सर्वत्र अव्याहत ब्रह्मचिंतन ! यही ध्यानावस्था
है। धारणामें चित्तका आश्रय "स्थान" होता है तो ध्यानमें चित्तका आश्रय "भाव" होता है।
ब्रह्म भाव, सगुण ब्रह्म भाव और निर्गुण ब्रह्म भाव ! धारणा, शरीरके चक्रोंपर या पंचमहाभूतोंके
स्थान पर होती है तो ध्यान उनके तत्त्वोंका होता है। इसके अभ्यासके लिये प्रत्येक चक्रकी देवता
मानी गयी है। धारणामें चित्त चक्रका आश्रय लेता है तो ध्यानमें उसको उस चक्रके दैवतका
आश्रय दिया जाता है। इस प्रकार स-रूप ध्यानसे अरूप ध्यानकी ओर बढ़ना होता है। तब
हृद्व्यवस्था, आत्माका विश्वात्मक देवका ध्यान होने लगता है। अंतर्बाह्य वह जगदंतर्यामी ! आंखें
मूंदलीं तो हृदयमें स्थित शांत आत्मदेव और आंखें खोलीं तो अनंत कर्म रत विराट आत्मदेव !
आत्मरूप दर्शन और उसीका विश्वरूप दर्शन सर्वत्र ब्रह्म-दर्शन। ध्यानावस्थाका यह सातत्य
ही समाधि-प्रवेश है।
योगका अंतिम और आठवा अंग समाधि-यह योग विद्याका अंतिम अंग है। योग-प्रासाद
का कलश। ध्यान, ध्याता, और ध्येयका समरसैक्य ही समाधि है। मनमें है ब्रह्म, ध्यानमें भी
ब्रह्म। जागृति निद्रामें परब्रह्म ! इसके बिना और कुछ भी नहीं। जैसे कूपमें डूबा हुआ घडा।
पानीसे भरा हुआ पानीमें डुबा हुवा ! सदैव द्वंद्वातीत अखंड स्थिति ! सदैव ब्रह्मलीन अवस्था
सविकल्प समाधि है। इससे परे है निर्विकल्प समाधि ! निरालंब समाधि ! कुछ भी नहीं। निर्भाव,
निर्विचार। दुर्गंध और सुगंधसे भरे कमरेसे दुर्गंध हटाई। वह सुगंधसे भरा। फिर सुगंध हटाई।
निर्गंध किया ! आत्मा आत्मासे आत्मामें लीन !
ज्ञानेश्वरी ११०
अष्टादश पुराण—जन-सामान्यमें भारतीय धर्म, संस्कृति परमार्थ तथा सभ्यताका
प्रसार करनेका काम पुराणोंने किया है। पुराण सदैव सामान्य-लोक-शिक्षाका माध्यम रहे हैं।
इसलिये पुराणोंको “लोक-वेद" कहा गया है। वेद, उपनिषदादि जन-सामान्यका साहित्य नहीं
हो सकता था। अनुभवी विद्वान ही उसको समझ सकते थे। इसलिये भारतीय मनीषियोंने
लोक-शिक्षाके लिये तत्वज्ञानको आख्यानोंद्वारा समझाया है। पुराणोंमें सदाचार, नीति, धर्म;
इतिहास, दर्शन, संस्कृति आदि सरल सुगम कहानियोंके रूपमें जनताके सम्मुख रखा ही है। साथ
ही साथ राजनीति, अर्थनीति, समाजनीतिका शिक्षण दिया है। पुराणोंके कारण हिंदू-धर्ममें एक
भव्यता आयी है। वैसे ही साहित्यकी दृष्टिसे भी पुराणोंका बड़ा महत्त्व है। पुराणोंमें कई जगह
श्रेष्ठतम साहित्यका दर्शन हो जाता है। भारतीय जीवनपरंपरा, इतिहास आदि जाननेके लिये
पुराणोंका-विश्लेषणात्मक दृष्टिसे अध्ययन करना आवश्यक है। तथा यह नित्य-नूतन है। पुराण
शब्दका अर्थ ही “पुराना होकर नया” ऐसा है। पुराणोंमें (१) सृष्टिवर्णन (२) सृष्टि उत्पत्ति
(३) जीवन निर्वाहका साधन (४) परमात्माद्वारा सज्जनोंकी रक्षा और दुर्जनोंका संहार (५)
मन्वंतर (६) वंशोंका इतिहास (७) वंशचरित्र और चारित्र्य (८) विविधप्रकारकी क्रांतियां
और नाश (९) जीव-वर्णन (१०) उसकी दशा-अवस्थात्रयोंका विवेचन - इन दस विषयोंका
विवेचन और विश्लेषण होता है। साथ साथ भारतमें प्राचीन कालमें प्रचलित अनेक प्रकारकी
विद्या, कला तथा विज्ञानका भी वर्णन पुराणोंमें है। पुराणोंमें (१) पशुविद्या (२) आयुर्विद्या,
(३) रत्नपरीक्षा (४) वास्तु-शिल्पविद्या (५) सामुद्रिक (६) धनुर्विद्या आदि विद्याओंके
साथ प्रसिद्ध (१) अनुभूति विद्या (२) स्वेच्छा रूपधारिणी विद्या (३) अक्षग्राम हृदयविद्या (४)
सर्वभूतरूप विद्या (५) पद्मिनी विद्या (६) जालंदरी विद्या (७) पराबाला विद्या (८) रक्षोघ्न
विद्या, (९) पुरुषप्रमोदिनी विद्या (१०) उच्छापनविधान विद्या (११) देवहूति विद्या (१२)
युवकरण विद्या (१३) वज्रहवनिका विद्या (१४) गोपालमंत्र विद्या ऐसे १४ विद्याओंका वर्णन
है। पुराणोंमें विषयानुसार, सूत्रात्मक, विवेचनात्मक, व्याख्यात्मक, रसात्मक, भावात्मक,
विविध प्रकारकी भाषाशैलियोंका सुंदर दर्शन होता है। साहित्य तथा भाषाशैलियोंके
अध्येताओंके लिये पुराण आदर्श ग्रंथ है। पुराण कथनका मूल उद्देश्य, लोकरंजनके साथ
जन-सामान्यको गहरेसे गहरे विषयको समझाना है। इसीलिये वहां सभी प्रकारकी भाषा-
शैलियोंका प्रयोग देखनेको मिलता है। ऐसे अनेक दृष्टिसे पुराण भारतीय-जीवन परंपराके
ज्ञानकोश हैं। ऐसे अठारह पुराण हैं। (१) ब्रह्मपुराण (२) पद्मपुराण (३) विष्णुपुराण
(४) वायुपुराण (५) भागवतपुराण (६) नारदपुराण (७) मार्कंडेयपुराण (८)
अग्निपुराण (९) भविष्यपुराण (१०) ब्रह्मवैवर्तपुराण (११) लिंगपुराण (१२) वराहपुराण
(१३) स्कंदपुराण (१४) वामनपुराण (१५) कूर्मपुराण (१६) मत्स्यपुराण (१७)
गरुडपुराण (१८) ब्रह्मांडपुराण । इसके अलावा अठारह उपपुराण हैं।
अहंकार—"मैं" का भ्रामक भाव, नामरूपात्मक शरीरको मैं मानना। इसी अहं-
कारके आवरणमें जीव अपनेको परमात्मासे भिन्न मानने लगता है। इसीको चिजड ग्रंथी कहते
हैं। इस अहंकारके नाशसे जीवात्मा और परमात्माके एकत्वका बोध होता है।
१११ परिशिष्ट ५
सांख्यमतानुसार-अव्यक्त प्रकृति महत्तत्त्व-अहंकार इस क्रमसे सृष्टिकी उत्पत्ति है। अहंकारके
सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक इन त्रिविध रूपोंसे (१) ज्ञानेंद्रिय (२) कर्मेंद्रिय (३) पंच
तन्मात्राओंकी उत्पत्ति हुई। यह सारी स्थूलसृष्टिका आधार है।
त्रिगुणोंके कारणसे क्रियाशील महत्तत्त्वसे अहंकारकी निष्पत्ति होती है। "मैं" और
"मेरा" यह भाव ही अहंकारका रूप है।
अभिमान गर्व, घमंड, मैंपना यह इसके रूप हैं तथा दंभ इसकी विकृति ।
आकाश-इस शब्दके कई अर्थ हैं। वैसे आकाशका वाच्यार्थ रिक्तता है। सर्वव्यापी
अनंत आकाशरूप है। आकाश पंचमहाभूतोंमें अंतिम तथा सूक्ष्मतम सर्वव्यापी तत्त्व है।
घनमें भी आकाश-तत्त्व रहता है। अणुमें भी रहता है। उपनिषदमें "सारा आकाशसे प्रकट होकर
आकाशमें लीन होता है!" ऐसे कहा गया है। विश्व-निर्माणकी इस कल्पनाको सर्वश्रेष्ठ माना
जाता है। जैन दार्शनिकोंने लोकाकाश तथा अलोकाकाश ऐसे दो आकाश माने हैं। लोकाकाश
कुछ द्रव्योंका आधारभूत है तो अलोकाकाशमें किसी प्रकारके द्रव्य नहीं हैं। और बौद्ध दार्श-
निकोंके मतमें आकाशका अर्थ सूक्ष्म-वायु अथवा शून्य = रिक्तता है। विश्वके प्रत्येक दर्शनने जैसे
आकाशका विचार किया है, वैसे ही विश्वके प्रत्येक धर्ममें आकाशको देवता माना है। आकाश-
देवताके कार्योंके विषयमें सभी धर्म-ग्रंथोंमें जो लिखा है वह करीब करीब एकसा है। ऋग्वेदमें
उसे अमृतधारण करके अमृतवर्षा करनेवाला देव कहा है। इससे पृथ्वी खिलती है। ऋग्वेदमें
द्यावा-पृथ्वी (आकाश और भूमिको) पिता तथा माता कहा गया है। इस माता पिता पर
ऋग्वेदमें छ सूक्त हैं।
किंतु योगमार्गमें बाह्य आकाशकी भांति मानवी शरीरमें भी आकाशका वर्णन है।
शरीरमें स्थान स्थान पर जो रिक्तता है वहां वहां होनेवाले कार्योंका वर्णन करते समय हृदयाकाश
मूर्धन्याकाश आदि शब्द आये हैं। भारतीय दर्शनमें पिंड ब्रह्मांड न्याय प्रसिद्ध है। मानव देह
समग्र विश्वकी या ब्रह्मांडकी छोटी प्रतिकृति है। जैसे ब्रह्मांडमें स्वर्ग, मृत्यु, पाताळ ऐसे त्रिलोककी
कल्पना की गयी है वैसे शरीरमें भी त्रिलोक हैं। शरीरके ऊपरके भागको परा ब्रह्मांड माना
गया है। बीचका भाग स्व-ब्रह्मांड है। नीचेका भाग अपर ब्रह्मांड। इस स्व-ब्रह्मांडमें हृदयाकाश
माना गया है। यह हृदयाकाश ऋषिमूनि तथा संत-सिद्ध पुरुषोंके सारे अमृत अनुभवोंकी
जन्मभूमि है। यही परमात्मधाम है। भारतीय ही नहीं विश्वका संत साहित्य यहांके मधुर अमृत
तुल्य अनुभवोंकी बांसरी बजाता है।
आत्म-निवेदन-वैष्णवोंके भक्ति-शास्त्रमें भक्तिके नौ प्रकार कहे गये हैं। (१)
श्रवण (२) कीर्तन (३) स्मरण (४) पादसेवन (५) अर्चन (६) वंदन (७) दास्य
(८) सख्य (९) आत्मनिवेदन। आत्म-निवेदन इस नव-विधा भक्तीका अंतिम रूप है।
और इस भक्तीका आदर्श-पुरुष बलि है। आत्म-निवेदनमें भक्त अपना सब कुछ परमात्माके
चरणोंमें अर्पण करता है। अंतमें अपनेको भी। आत्म-निवेदनको सर्वसमर्पण कह सकते हैं।
आत्मबोध-आत्मज्ञान-अपनेको जानना। अपने आपको जानना। हर समय मनुष्य
जो "मैं" कहता है वह "मैं" कौन है? क्या है? इस तत्त्वको जाननेकी साधना आत्म-साधना
ज्ञानेश्वरी ११२
है । अपने आपको जानना ज्ञान है । "मैं" वह शरीर है क्या ? तो हम मेरा शरीर स्वस्थ है कहते
हैं । तब शरीरसे भिन्न यह मैं कौन ? मन है क्या ? नहीं; आज मेरा मन प्रसन्न है कहता है मनुष्य !
मेरा मन कहनेवाला मैं कौन ? वैसे ही "मेरी बुद्धि" और "मेरी भावना" कहनेवाला मैं कौन ?
मनुष्य जब सोता है तब उसे इस "मैं" का भान नहीं होता किंतु उठते ही कहता है "मैं"
सो गया था । सो जानेवाला मैं कौन ? कौन ? और क्या ? प्रश्न पूछते पूछते हम ऐसी एक स्थितिमें
पहुंच जाते हैं "जहां कुछ भी (उत्तर) नहीं है। जहां कुछ भी नहीं वहीं स्थिर रह कर देखनेसे
वहां जो कुछ "है" का बोध होगा वही आत्मबोध है। "कुछ भी नहीं है" "में" "है"
पाना ही आत्मबोध है ! आत्मबोध मौन होता है। वह मौन अनुभव है । जैसे "मरा हुवा
मनुष्य मैं मरा" नहीं कह सकता वैसे आत्मबोध पाया हुवा मनुष्य आत्मबोध क्या है यह नहीं
कह सकता । पानीमें घुला हुवा नमक अपना रूप खोकर केवल "खारा पन" से रहता है वैसे है
आत्म-बोध । केवल अनुभव गम्य !
आत्मा—सतत सर्वव्यापी गतिशील, अर्थात् जो सर्वव्यापी है, सर्वग्राही है, सदैव
जिसका अस्तित्व रहता है उसे आत्मा कहते हैं। यह आत्मा शब्दका शब्दार्थ है। वैसे अन्यान्य
दार्शनिकोंने इसका भिन्न भिन्न अर्थ किया है। ऋग्वेदमें "मर्त्य शरीरसे अमर्त्य संलग्न" इस प्रकार
इसका वर्णन किया गया है। वायुके अर्थमें भी इसका उल्लेख है। यह "अहम्" का बोधक भी
रहा है। किंतु उपनिषदोंमें इसका अर्थ बदला है। सर्वप्रथम उपनिषदोंमें फिर जागतिक दार्शनिक
ग्रंथोंमें आत्माकी कल्पना विकसित हुई है। मनुष्यने अपनी जीवन शक्तिको "मैं" कहते हुए
उस "मैं" को आत्मा माना । अर्थात् आत्माका अर्थ है मैं । अहं ब्रह्मास्मि, अथवा सोऽहं
शिवोऽहम् । "मैं ही विश्व शक्ति हूँ !" अथवा "विश्व शक्ति मैं है !" यह दर्शानेवाले महावाक्य
हैं । इस एकात्म-भावका बीज वेदोंमें भी देखनेको मिलता है। "विश्व-शक्ति ही आत्मा है और
मनुष्य विश्व-शक्तिका रूप है" यह उपनिषदोंका अंतिम निर्णय है। उपनिषद् मानव मात्रको
कहते हैं तत्=वह विश्व शक्ति त्वम् असि=तू है। और "सोऽहमस्मि" "वह मैं हूं"
उपनिषद् गानेवालोंका अनुभव है। इसीलिये वह "पूर्ण है वह पूर्ण है यह" कहते हैं। यह
अनुभव मनुष्यको निर्भय बनाता है। द्वंद्वातीत बनाता है। सदैव आनंद विभोर रखता है।
"विश्वमें मेरे बिना कुछ भी नहीं। यह सारा केवल मैं हूं" ऐसे अनुभव आनेके बाद किसका
भय ? किसका द्वेष ? किससे प्रेम या काम ? अपनेमें इस विश्व शक्तिका अनुभव करना आत्म-
दर्शन है तो विश्वमें अपनेको देखना विश्वरूप दर्शन है। उपनिषद, गीता, ज्ञानेश्वरी इसीको कहते
हैं। अपनेको विश्वमें विलीन करके संपूर्ण विश्व स्वयं बन जाना आध्यात्मिक जीवनका अंतिम
साध्य है ! उपनिषदादि ग्रंथ इसका साधन भी सिखाते हैं और साध्यकी ओर इंगित भी कहते हैं।
आत्मानंद-आत्मसुख—सारे विश्वमें जो एक शक्ति अखंड रूपसे व्याप्त है वही शक्ति
मनुष्यमें भी विद्यमान है। उस शक्तिको आत्मा कहते हैं। इसी शक्तिको मनुष्य "मैं" कहता है।
यह "मैं" ही आत्मा है। यह मैं विश्वाकार है। वही विश्वका भी संचालन करता है। इस विश्व
संचालक शक्तिको परमात्मा अथवा ब्रह्म कहा है। जब मनुष्य अपना सीमित मैं भूलकर विश्व-
संचालक शक्ति ही मैं हूं अथवा-विश्व-शक्ति और मैं एक हूं" यह अनुभव करने लगता है तब
११३ परिशिष्ट ५
जो सुख तथा तज्जन्य आनंद या समाधान होता है वह आत्मानंद और आत्मसुख है। यह आत्मा
परमात्माके समरसैक्यका सुख है।
यह आत्म-सुख निरालंब है। जैसे इंद्रियजन्य सुख या तज्जन्य आनंदके लिये बाहरी वस्तुओंकी
आवश्यकता अथवा आलंबनकी आवश्यकता है वैसे इस आत्म-सुखके लिये किसी प्रकारके
आलंबनकी आवश्यकता नहीं है। यह अपनेमें अपनेसे आप ही अनुभव करना होता है। इसलिये
वह निरालंब सुख, क्षणिक न होकर तात्कालिक न होकर सतत टिकता है। आत्म सुख वर्षामें
कड़कनेवाली बिजली अथवा इंद्रधनुष्यकी भांति नहीं किंतु सूर्य प्रकाशकी भांति एक बार प्राप्त
होकर अंतकाल तक टिका रहता है। इसलिये यह सबसे महान सुख है। इससे अन्य सुखकी अथवा
अन्य आनंदकी तुलना नहीं की जा सकती। यह आत्म-सुख ही मानवमात्रका अंतिम और एका
मात्र साध्य है। और सब साध्य उसके साधन रूप हैं।
आत्मानात्म विचार — आत्मा=शुद्ध चैतन्य और देह, इंद्रिय, विषयादिकी भिन्नताका
विचार। "मैं शुद्ध चैतन्यरूप आत्मा हूं" यह इस विचारका स्वीकारात्मक भाव है। तथा "मैं
शरीर नहीं। मैं मन या बुद्धि नहीं।" यह उसका निषेध भाव है। "चैतन्य रूप जो मैं" छोड़ कर
अन्य सब देह मन बुद्धि आदि अनात्म है इसका विवेक आत्मानात्म विचार है।
आदिमाया—पर-ब्रह्मकी स्वाभाविक स्फुरण शक्ति। इसी स्फुरण-शक्तिसे ब्रह्ममें
ब्रह्मांडका आभास होता है और उसीमें विलीन भी हो जाता है। इसको ज्ञानेश्वरीमें विश्वाभास
कहा गया है। ब्रह्मकी इसी स्फुरण-शक्तिको माया, आदिमाया, अव्यक्त प्रकृति आदि नाम दिये
गये हैं। इसी मायाके कारण सच्चिदानंद अखंड ब्रह्मतत्वके स्थान पर विविधता रूप, दुःखमय
सृष्टिका भास होता है। द्वैतका भास होता है जो सभी प्रकारके दुःख और द्वंद्वका कारण है।
आदिसंकल्प—विश्वोत्पत्तिका कारण रूप ब्रह्मका मूल-संकल्प अथवा इच्छा। वेदोप-
निषदोंमें ऐसे कहा गया है कि जब कुछ भी नहीं था उस समय जो मूलतत्व था उसके मनमें
इच्छा होनेसे उसके कामसे-यह विश्व निर्माण हुवा। पहले ब्रह्म अकेला था। निराकार, निर्विकार,
निर्विशेष ! उसके मनमें इच्छा हुई-संकल्प जगा-मुझे अनेक होना चाहिए। इस संकल्पस्फुरणसे
यह सारा विश्व प्रकट हुवा। ब्रह्मकी जिस इच्छासे यह विश्व स्पष्ट हुवा, अथवा ब्रह्मकी जिस
कामनासे इस विश्वका स्फुरण हुवा उस इच्छाको "आदि संकल्प" कहा गया है।
आद्य—संभवतः केवल ज्ञानेश्वर महाराजने नमन करते समय परमात्माके लिये इस
शब्दसे संबोधन किया है। आद्य कुछ भी नहीं था तब जो था वह ! ऋग्वेदके नासदीयसूक्तमें
जैसे "वह" शब्द आया है उसी शब्दका द्योतक यह आद्य शब्द है। आद्य-जिससे सारे
विश्व अथवा ब्रह्मांडका स्फुरण हुवा है। आद्य=सबसे प्रथम जो था और जिसके प्रथम कुछ भी
नहीं था।
आधारचक्र—योग-शास्त्रमें षट्चक्रोंका विवेचन है। आगे "षट्चक्र" में इसका
पूरा विवेचन देखनेको मिलेगा। आधारचक्रको मूलाधारचक्र कहा गया है। यह चक्र शिश्न और
गुदाके बीचमें मेरुदंडके प्रारंभमें-सुषुम्ना नाडीके मूलमें (?) स्थित है। -नाडी देखें-सुस
ज्ञानेश्वरी ११४
कुंडलिनीका वास यहीं होता है। योग, भक्ति, ज्ञानादि साधनासे वह सुप्त कुंडलिनी शक्ति जागृत
होती है। हठयोगमें सिद्धासनसे इसपर दबाव लाकर-मूलबंध-क्रियासे-आधार मुद्रा देखें-इस
सुप्त-शक्तिको जागृत करनेका विधान है। इस आधारचक्र अथवा आधारकमलकी चार पंखुडियां
होतीं हैं। यह आधारकमल लाल रंगका होता है। इस कमलकी-पंखुडियों पर वं. शं. षं. सं. ये
बीज होते हैं। प्रत्येक मंत्र तथा देवताका बीज-मंत्र होता है । इस बीजमें देवता शक्ति है।
अन्यान्य मंत्रोंके साथ इन बीजोंको जोडनेसे शरीरस्थित उन उन देवताओंसे संबंध जुडकर
विश्वकी उसी देवतासे साधक समरस हो जाता है । भिन्न भिन्न बीजसे जुडी देवता शरीरके
भिन्न भिन्न स्थान पर स्थित हैं। इसीलिये उस स्थानको बीजके नामसे जाना जाना है।
आधारमुद्रा—हठयोगकी प्रणालीमें कई प्रकारके बंध हैं। इनको मुद्रा भी कहा गया
है। अन्यत्र षट्चक्रोंका विवेचन किया गया है। इन चक्रोंको जागृत तथा कार्यक्षम बनानेके लिये
हठयोगमें अन्यान्य क्रियायें हैं। उन क्रियाओंमें यह बंध अथवा मुद्रायें हैं। इस आधारमुद्राका
दूसरा नाम मूलबंध है। मूलबंध एक प्रकारका प्राणायाम है। मूलबंधका अर्थ गुदद्वारसे अपानको
अंदर खींचना। मूलबंध क्रिया करते समय सिद्धासन-वज्रासन सबसे अच्छा है। प्राणायाम
करते समय जब नाकसे अंदर श्वास लिया जाता है उसी समय गुदद्वारसे अपानको भी अंदर
खींचा जाता है। ऐसे करनेसे प्राण और अपानके दबावमें कुंडलिनी जागृत होती है। प्राण और
अपानका मिलन भी होता है। जिससे अपानसिद्धि होती है। अपानसिद्धि इंद्रिय-जयमें महत्व-
पूर्ण कार्य करती है। हठयोगमें बंधत्रय मूलबंध, उड्डियानबंध तथा जलंधरबंध अत्यंत महत्वके माने
गये हैं। शरीर निरोग रखनेके लिये बंधसह प्राणायाम महान् वरदान माना गया है।
आनंदत्रय—ब्रह्मानंद। वासनानंद। विषयानंद।
आसन—योगाभ्यासके लिये सहज स्थिरतापूर्वक बैठनेकी प्रक्रिया। मनकी एकाग्रताके
लिये आसनका अत्यंत उपयोग होता है। हठयोग और राजयोग दोनों योगमें आसनका महत्व
कहा गया है। योग-सूत्रमें जिससे स्थिर रहकर मनको सुख मिलता है, अधिकसे अधिक समय
बैठनेकी इच्छा होती है उसको आसन कहा गया है। किसी भी महान् कार्यके लिये, साधन
अथवा योगाभ्यासके समय पृथ्वीकी प्रार्थना करके बैठनेकी क्रियाको आसनविधि कहा गया है।
कहीं कहीं भिन्न भिन्न प्रकारके कार्यके भिन्न भिन्न प्रकारसे बैठनेकी भी विधि है। ज्ञानेश्वरीके छठे
अध्यायमें आध्यात्मिक साधनामं बैठनेकी आसनविधिका विस्तृत विवेचन देख सकते हैं
आहार—यह सभी जानते हैं कि आहरका अर्थ है खाना। आहारका शब्दार्थ अंदर लेना
है। संभवतः इसी परसे जगद्गुरु श्रीशंकराचार्यजीने आहारका अर्थ करते समय "किसी भी इंद्रियकी
ओरसे किया जानेवाला विषयसेवन" ऐसे किया है। देखना आंखोंकी भूख है और सुनना कानोंकी
भूख जैसे चखना जिव्हाकी भूख है! अर्थात् प्रत्येक इंद्रियकी ओरसे अपनी अपनी भूख मिटानेके
लिये "अपना विषय सेवन" करना भी आहार है। इस गहरे अर्थको ग्रहण करके ही गीताके
"युक्ताहारविहार" का भाव ग्रहण करना चाहिए।
आवाहन-विसर्जन—आवाहन पूजाके लिये किसी देवताको बुलाना। देवतागमनके
लिये जो प्रार्थना की जाती है उसे आवाहन कहते हैं, और पूजाके बाद देवताको लौटाया जाता है
११५ परिशिष्ट ५
उसको विसर्जन कहते हैं। पूजा में आवाहन विसर्जनकी विधि होती है। आवाहनसे पूजा-प्रारंभ
होती है और विसर्जनसे पूजाकी समाप्ति ।
इडा - पिंगला—वेदमें इडा अथवा इलाको वाग्देवी अथवा पृथ्वीकी देवता माना गया
है और योग-शास्त्रमें तथा आयुर्वेदमें जो नाडी-ज्ञान है उसमें सुषुम्ना नाडीके दोनों ओर-सुषुम्ना
देखें-इडा व पिंगला नाडी है । ये नाडियां मेरूदंडके बाहर हैं। इडा मूल बंधसे बाई ओर
चलती हुई सभी नाडी-चक्रोंको लपेटती हुई नासापुटि अथवा नासिका रंध्र तक चली है और
पिंगला वैसे ही दाहिनी ओर । इडा पिंगला सुषुम्नासे ऐसी गुंथी हुई है कि ये तीनों एकत्र हो
गयी है। इसी लिये कहीं कहीं इन्हे त्रिवेणी कहा गया है। इन नाडियोंके साथ दूसरी ११ नाडियां
हैं जिनका विवेचन सुषुम्नाके साथ तथा षट्चक्रके विवेचनमें किया गया है।
इंद्रिय—शरीरस्थित इंद्रके बाह्य रूप । इंद्रिय दो प्रकारकी होती हैं। ज्ञानेंद्रियाँ और
कर्मेंद्रियाँ । जब तक इंद्र शरीरमें रहता है तब तक सभी इंद्रियां स्व-कर्ममें रत रहती हैं। अपने
अपने विषयोंका ग्रहण करना इन इंद्रियोंका काम है । जैसे आंखोंका रूपावलोकन, कानोंका
शब्दश्रवण, नाकका गंधग्रहण, जिव्हाका रस-सेवन और त्वचाका स्पर्शग्रहण । यदि
ये इंद्रियां नहीं होती तो मनुष्यको विषयोंका ज्ञान नहीं होता । सारा विश्व आत्माका
ऐश्वर्य-योग है । आत्माका वैभव है । उस वैभवके ग्रहण या रस-सेवनके लिये इंद्रियाँ
बहिर्मुख हैं मनकी प्रेरणासे बाह्य-विषयोंका ज्ञान संग्रह करके मनके आधीन करती हैं।
इसलिये इन्हें शरीरसे जुडे हुए ज्ञान साधन कहा गया है। ये ज्ञानेंद्रियाँ पांच हैं। वैसे ही मुख,
हाथ, पाय, गुदा तथा जननेंद्रिय ये पांच कर्मेंद्रियां हैं। ज्ञानेंद्रियोंद्वारा प्राप्त ज्ञानके अनुसार ये कर्म
करती हैं।
न्यायशास्त्रानुसार बहिरिंद्रिय और अंतरिंद्रिय ऐसे इंद्रियोंके दो प्रकार हैं। पांच ज्ञानेंद्रियां
और पांच कर्मेंद्रियां बाहरी इंद्रियां हैं और मन अंतरिंद्रिय । यह मन अणु समान है और हृदय
स्थानमें रहता है। यही बहिरिंद्रियोंको प्रेरणा देता है। उनसे प्राप्त ज्ञानसंग्रह करता है। और
सांख्योंके मतसे इंद्रियां ग्यारह हैं। मनको भी उन्होंने इंद्रियोंमें गिना है।
इंद्रियनिग्रह—आत्मदेवका ऐश्वर्य देखनेके लिये बहिर्मुख होकर विषय ग्रहण, विषय सेवन
तथा विषयानंदमें मग्न इंद्रियोंको संयमसे बांधकर आत्माकी ओर मोडना इंद्रिय निग्रह है। विषय
रस ग्रहण करनेकी आदत अथवा व्यसनसे इंद्रियां विषयानंदमें ही व्यस्त हो जातीं हैं तब
आत्मानंद नहीं मिल सकता। इसलिये जैसे घोडेकी रस्सी खींच कर घोडेको अपनी इच्छाके
अनुसार अपने गंतव्यकी ओर चलाते है वैसे इंद्रियोंको मनके लगामसे बुद्धिके हाथमें देकर
आत्म-रत करनेकी प्रक्रियाको इंद्रिय निग्रह कहा गया है। इंद्रिय जयभी कहा है।
ईश्वर—यह शब्द ईश अथवा वैदिक संस्कृतके ईशर् धातुसे बना है। इन दोनों का
अर्थ सत्तासे व्याप्त रहना। यह सत्ता स्वाश्रयी है। स्वयंभू है। जैसे किसी वृक्षमें रस रहता है,
वह रस किसीपर निर्भर न रह कर स्वयंसिद्ध है, और उसी रसके कारण वृक्षको जीवन मिलता
है वैसे ईश तत्व है। यह ईशर् या ईश तत्वके कारण विश्वमें, अर्थात् विश्वके प्रत्येक वस्तुमें
हलचल है। जीवन है। यदि यह नहीं होता तो विश्वमें कोई हलचल नहीं होती। जीवन नहीं होता ।
ज्ञानेश्वरी ११६
अर्थात् विश्वमें जहां कहीं हलचल है वहां यह तत्व व्याप्त है और सब पर अपना स्वामित्व रखता
है। ईश्वर शब्दसे स्वामित्व और सर्व-व्यापकत्वका बोध होता है।
भारतीय तत्त्वज्ञान तथा सांस्कृतिक साहित्यमें इस शब्दका अत्यंत महत्त्व है। ऋग्वेदमें
ईश्वर शब्द कहीं नहीं आया है। किंतु ईश ईशर् धातुजन्य ईश, ईशज, ईशान आदि शब्द
इंद्रादिके लिये आये हैं। संभवतः भगवद्गीतामें ईश्वर शब्दका पहला ?- प्रयोग हुआ है।
मनुस्मृतिमें भी इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। वहांसे यह परमेश्वरके रूपमें - संप्रदायातीत रूप-
भारतीय तत्त्वज्ञानमें स्थान स्थान पर आया है। ईश्वर या परमेश्वर वैदिक देवता समूहका देवता
नहीं है। यह उससे परेकी शक्ति है। ब्रह्मा विष्णु महेश भी परमेश्वर नहीं है। वस्तुतः वैदिक
देवताओंके पीछे जो एक शक्ति थी और इंद्र, अग्नि, यम मातरिश्वा आदि नामसे पहचानी जाती थी
उस शक्तिका परिचय देनेके लिये ईश्वर या परमेश्वर शब्दका प्रयोग किया गया है। संभवतः
वेदांतके नपुंसकलिंगी ब्रह्मका - पूजार्थ - पुल्लिंगी ईश्वर अथवा परमेश्वर बन गया हो, क्यों कि
नपुंसकलिंगीकी पूजा अर्चा नहीं होती। इस दृष्टिसे ज्ञानमार्गके ब्रह्मका भक्तिमार्गी ईश्वरमें परिवर्तन
कह सकते हैं। या ईश्वर निराकार निर्गुण ब्रह्मका साकार सगुण रूप है ! वेदांतियोंका "ब्रह्म"
नकारात्मक सत्ता है। नेति नेति है। प्रत्येक प्रश्नका नहीं नहीं नहीं उत्तर देनेके बाद जो
रहता है - प्रश्न और उत्तर दोनों मौन है - वह ब्रह्म है तो ईश्वर प्रत्येक प्रश्नका उत्तर "हाँ"
में देता है। ईश्वर सर्वव्यापी है। सभी ईश्वर है। भारतके विविध दर्शनोंके मूल सूत्रोंमें ईश्वरका
दर्शन होता है। उसका रूप खिलता जाता है। यह ईश्वर संप्रदायातीत है। विश्व-व्यापारमें
जो योजकता और नियमितता दिखाई देती है उसको देख कर "यह सब चलानेवाला कोई
शासक" है इस कल्पनामेंसे ईश्वरका उदय हुआ होगा। ब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंमें "शासक"
का भाव नहीं है। इसी बातको लेकर दार्शनिकोंने ईश्वरके विषयमें निम्न आठ बातें कहीं हैं।
(१) विश्व रचना और व्यापार नियमबद्ध है। इसकी गतिके नियम सूक्ष्म, सुसूत्र और
निश्चित हैं। कहीं कोई गड़बड़ नहीं, अव्यवस्था नहीं। इसलिये इसका निर्माण तथा संचालन करने-
वाला कोई शासक है और वह ईश्वर है।
(२) विश्वकी गतिमें एक निश्चित प्रेरणा है। इसलिये इसका कोई प्रेरक है। वही ईश्वर है।
(३) विश्वमें सर्वत्र संकल्प और हेतुका दर्शन होता है। वह जिसके मतमें है
वही ईश्वर है।
(४) प्राणियोंके सो जाने पर भी विश्व रहता ही है। इसलिये इन सबका अनुभव
लेनेवाला कोई है। और वही ईश्वर है।
(५) इस विश्वमें सुंदर मंगलमय जो जो कुछ है उसके मूलमें नित्य नूतन अनंत प्रतिभा
होनी ही चाहिए। यह प्रतिभा जिसकी है वही ईश्वर है।
(६) शुभ-अशुभ, भला-बुरा आदिका निश्चय करनेवाली कोई शक्ति होनी ही चाहिए,
वैसे ही उसका निर्णय करनेवाला कोई न्यायाधीश। वही ईश्वर है।
(७) जिसका मूल्य माने बिना धैर्यसे संसारमें कुछ करना असंभव है वह मूल्य
ही ईश्वर है।
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(८) विश्वके अग्याग्य मानवोंके धार्मिक जीवनके परिणामस्वरूप जो अतींद्रिय अनुभव
आता है वही ईश्वर साक्षात्कारका अनुभव है। विश्वके अग्याग्य मानवी समुदायके मनीषी ऋषी
मुनि तथा साधुसंतोंका अनुभव इसका साक्षी है।
(१) न्याय-दर्शनमें ईश्वरका महत्त्वका स्थान है। बिना ईश्वरानुग्रहके किसीके विश्वकी
समस्याओंका यथार्थ ज्ञान हो ही नहीं सकता। बिना ईश्वरानुग्रहके मुक्ति असंभव है। ईश्वर सृष्टि
स्थिति लयका कर्ता है। नैयायिक (१) कार्यकारण संबंध (२) अदृष्ट, (३) वेदप्रामाण्य
इन तीन आधारभूत प्रमाणोंसे ईश्वरका प्रतिपादन करते हैं।
(२) योग-दर्शनमें ईश्वर ही सब कुछ है। योगमें क्लेश, कर्म विपाक और आशयसे रहित
पुरुष विशेष ही ईश्वर है। योगदर्शनके ईश्वर प्रमाणके आधार है (१) वेद (२) विश्वकी
ज्ञान प्रवाहका मूलस्रोत ही ईश्वर है। गुरुत्वका आदिपीठ ईश्वर है। (३) प्रकृति पुरुषकी
संयोजक शक्ति ही ईश्वर है।
(३) मीमांसादर्शनमें प्राचीन मीमांसक निरीश्वरवादी थे किंतु आगे यह बात गलत
होनेका भान हुवा होगा मीमांसकोंको। उत्तरकालीन मीमांसकोंने (१) कर्मफलके दाताके
रूपमें (२) तथा यज्ञपतिके रूपमें ईश्वरको स्वीकार किया।
(४) वेदांतदर्शनमें (१) सविशेष ब्रह्म ईश्वर है (२) विश्वके सृष्टि स्थिति लयका
कारण ईश्वर है। (३) यह सारा विश्व उस सर्वज्ञ ईश्वरकी लीला है।
(५) गीतामें सभी पहलुओंसे ईश्वरका विचार हुवा है। ज्ञानेश्वरीके सैकडो ओवियोंमें
इसका विवेचन देखनेको मिल सकता है।
उड्डियानबंध - उड्डियान — सारा श्वास बाहर करके पेट अंदर खींच कर निःश्वास करना ।
एक प्रकारसे यह बाह्य-कुंभक-सा है। प्राणायाममें बाहरका वायु-पूरकद्वारा-अंदर खींच कर पेटमें
रोककर कुंभक करते हैं। वैसे ही पेटका वायु-श्वास-बाहर डालकर-रेचकद्वारा उड्डियान करके बाहर
रोका जाता है। पेटको संपूर्ण श्वास रहित करके पापडकी भांति-पीठसे चिपका देनेकी क्रिया ही
उड्डियानबंध है। हठ योगमें इसको "मृत्युगण केसरी" कहा गया है। यह बंध त्रिदोषोंका
नाश करता है। प्राणको स्थिर करता है। सुषुम्नाका द्वार खोलता है।
उत्तरायण — सूर्यका उत्तरकी ओर मुडना । मकर संक्रांतिसे कर्क संक्रांति तक
का काळ सामान्यतया जानेवारी १४ से छ महीने। इन दिनोंमें मरनेसे मोक्ष प्राप्ति होती है ऐसी
मान्यता है। उत्तरायणमें अधिक सूर्यप्रकाश रहता है।
उदान — पंच-प्राणमें यह चौथा है। यह कंठस्थानमें होता है। इसकी गति ऊपरकी
ओर होती है। यह वाणीका-वाक् शक्तिका-आधार है। बोलना गाना आदि क्रियायें इसी उदानके
कारण होती हैं। वाणी मनुष्यका सारतत्त्व है। वाङ्मय इसका रूप है। इसी उदानके कारण
वाग्ब्रह्मका स्फोट होता है। उदानसे शब्दोत्पत्ति है ! संभवतः इसीलिए प्रणवको उद्गीथ कहते
हों। बौद्ध साहित्यमें उदानका अत्यंत महत्त्व माना गया है। यह कहा गया है कि बुद्धके सारे
उपदेशका मूल उदान है। उपनिषदमें प्रणवको उद्गीथ कहा गया है।
ज्ञानेश्वरी ११८