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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1062

उसको विसर्जन कहते हैं। पूजा में आवाहन विसर्जनकी विधि होती है। आवाहनसे पूजा-प्रारंभ
होती है और विसर्जनसे पूजाकी समाप्ति ।
इडा - पिंगला—वेदमें इडा अथवा इलाको वाग्देवी अथवा पृथ्वीकी देवता माना गया
है और योग-शास्त्रमें तथा आयुर्वेदमें जो नाडी-ज्ञान है उसमें सुषुम्ना नाडीके दोनों ओर-सुषुम्ना
देखें-इडा व पिंगला नाडी है । ये नाडियां मेरूदंडके बाहर हैं। इडा मूल बंधसे बाई ओर
चलती हुई सभी नाडी-चक्रोंको लपेटती हुई नासापुटि अथवा नासिका रंध्र तक चली है और
पिंगला वैसे ही दाहिनी ओर । इडा पिंगला सुषुम्नासे ऐसी गुंथी हुई है कि ये तीनों एकत्र हो
गयी है। इसी लिये कहीं कहीं इन्हे त्रिवेणी कहा गया है। इन नाडियोंके साथ दूसरी ११ नाडियां
हैं जिनका विवेचन सुषुम्नाके साथ तथा षट्‌चक्रके विवेचनमें किया गया है।
इंद्रिय—शरीरस्थित इंद्रके बाह्य रूप । इंद्रिय दो प्रकारकी होती हैं। ज्ञानेंद्रियाँ और
कर्मेंद्रियाँ । जब तक इंद्र शरीरमें रहता है तब तक सभी इंद्रियां स्व-कर्ममें रत रहती हैं। अपने
अपने विषयोंका ग्रहण करना इन इंद्रियोंका काम है । जैसे आंखोंका रूपावलोकन, कानोंका
शब्दश्रवण, नाकका गंधग्रहण, जिव्हाका रस-सेवन और त्वचाका स्पर्शग्रहण । यदि
ये इंद्रियां नहीं होती तो मनुष्यको विषयोंका ज्ञान नहीं होता । सारा विश्व आत्माका
ऐश्वर्य-योग है । आत्माका वैभव है । उस वैभवके ग्रहण या रस-सेवनके लिये इंद्रियाँ
बहिर्मुख हैं मनकी प्रेरणासे बाह्य-विषयोंका ज्ञान संग्रह करके मनके आधीन करती हैं।
इसलिये इन्हें शरीरसे जुडे हुए ज्ञान साधन कहा गया है। ये ज्ञानेंद्रियाँ पांच हैं। वैसे ही मुख,
हाथ, पाय, गुदा तथा जननेंद्रिय ये पांच कर्मेंद्रियां हैं। ज्ञानेंद्रियोंद्वारा प्राप्त ज्ञानके अनुसार ये कर्म
करती हैं।
न्यायशास्त्रानुसार बहिरिंद्रिय और अंतरिंद्रिय ऐसे इंद्रियोंके दो प्रकार हैं। पांच ज्ञानेंद्रियां
और पांच कर्मेंद्रियां बाहरी इंद्रियां हैं और मन अंतरिंद्रिय । यह मन अणु समान है और हृदय
स्थानमें रहता है। यही बहिरिंद्रियोंको प्रेरणा देता है। उनसे प्राप्त ज्ञानसंग्रह करता है। और
सांख्योंके मतसे इंद्रियां ग्यारह हैं। मनको भी उन्होंने इंद्रियोंमें गिना है।
इंद्रियनिग्रह—आत्मदेवका ऐश्वर्य देखनेके लिये बहिर्मुख होकर विषय ग्रहण, विषय सेवन
तथा विषयानंदमें मग्न इंद्रियोंको संयमसे बांधकर आत्माकी ओर मोडना इंद्रिय निग्रह है। विषय
रस ग्रहण करनेकी आदत अथवा व्यसनसे इंद्रियां विषयानंदमें ही व्यस्त हो जातीं हैं तब
आत्मानंद नहीं मिल सकता। इसलिये जैसे घोडेकी रस्सी खींच कर घोडेको अपनी इच्छाके
अनुसार अपने गंतव्यकी ओर चलाते है वैसे इंद्रियोंको मनके लगामसे बुद्धिके हाथमें देकर
आत्म-रत करनेकी प्रक्रियाको इंद्रिय निग्रह कहा गया है। इंद्रिय जयभी कहा है।
ईश्वर—यह शब्द ईश अथवा वैदिक संस्कृतके ईशर् धातुसे बना है। इन दोनों का
अर्थ सत्तासे व्याप्त रहना। यह सत्ता स्वाश्रयी है। स्वयंभू है। जैसे किसी वृक्षमें रस रहता है,
वह रस किसीपर निर्भर न रह कर स्वयंसिद्ध है, और उसी रसके कारण वृक्षको जीवन मिलता
है वैसे ईश तत्व है। यह ईशर् या ईश तत्वके कारण विश्वमें, अर्थात् विश्वके प्रत्येक वस्तुमें
हलचल है। जीवन है। यदि यह नहीं होता तो विश्वमें कोई हलचल नहीं होती। जीवन नहीं होता ।
ज्ञानेश्वरी ११६