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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1055

ज्ञानेश्वरीमें कहीं कहीं इन्हे षट्-विकार भी कहा गया है ।
अष्टांगयोग—आठ अंगोंसे बना हुवा योग । इसको पतंजल ऋषिने कहा था इसलिये
पातंजल योग भी कहते हैं । वैसे ही यह सर्वश्रेष्ठ योग होनेके कारण राजयोग भी कहते हैं । इस
योगके (१) यम (२) नियम (३) आसन (४) प्राणायाम (५) प्रत्याहार (६) धारणा
(७) ध्यान (८) समाधि ये आठ अंग हैं ।
पहला अंग यम । यम पांच हैं । (१) अहिंसा-तन, मन, वचनसे किसीका द्वेष नहीं करना ।
किसीका बुरा न चाहना (२) सत्य, जिस बातको जब जैसे अनुभव किया हो तब वैसे कहना ।
यदि कहना ही पडता हो ! कोई बात कहते समय कोई हेतु मनमें रख कर नहीं कहना । जैसे
कहा है वैसे बर्ताव करना । चिंतन मनन करना । (३) अस्तेय-किसीकी कोई वस्तु मनसे भी
नहीं चुराना, चाहना । (४) ब्रह्मचर्य-सर्वत्र सदैव ब्रह्मचिंतनमें ही रत रहना, अन्य चिंतन
नहीं करना (५) अपरिग्रह-संग्रहार्थ किसीसे कुछ भी नहीं लेना ।
दूसरा अंग नियम-जैसे यम पांच हैं वैसे नियम भी पांच हैं । (१) शौच-तन मन वचन
शुद्धि । शरीर निरोग रखना । मन प्रसन्न रखना । वाणी पवित्र रखना । (२) संतोष-आशा
निराशाके परे, अपनी इच्छा कुछ न रख कर, परमात्मेच्छासे जीना । तृष्णा त्यागसे संतोष मिलता
है । (३) तप-सभी धर्मोंमें तपका महत्त्व गाया गया है । सदुद्देशकी सिद्धिके लिये नियम पूर्वक
सतत-कार्यरत रहना तप है । (४) स्वाध्याय-जीवन लक्ष्यके सहायक सद्ग्रंथोंका वाचन, मनन,
अथवा नामस्मरण उत्तम स्वाध्याय है । (५) ईश्वर प्रणिधान-“ इदं न मम ” भावनासे, जो कुछ है
वह सब परमात्माका है यह मानकर सर्व समर्पणमय जीवन बिताना ।
तीसरा अंग आसन-विशिष्ट रीतिसे बैठा रहना । हठयोगमें ८४ आसन कहे गये हैं । उनमेंसे
कई शरीर स्वास्थ्यके लिये हैं । किंतु अष्टांगयोगमें आसनका अर्थ सुस्थिर बैठनेके लिये है ।
इसके लिये भी सिद्धासन पद्मासन आदिका विचार किया गया है । किसी भी आसनमें बैठना हो
सीधा बैठना चाहिये ।
चौथा अंग हे प्राणायाम-प्राणायामका अर्थ श्वासको नियमित करना है । प्राणायाम एक गहरा
शास्त्र है । मानवशरीरमें अलग अलग काम करनेवाले पांच प्राण हैं । उन सबको नियमित
करना है । इसके लिये पूरक-श्वास अंदर खींचना, कुंभक रोकना, रेचक-श्वास बाहर छोडना
यह सामान्य नियम हैं । गुदद्वारसे श्वास खींचना, मूलबंध, प्राण और अपानका मिलन, श्वास
अंदर रोकनेकी भांति अंदरका सारा श्वास बाहर निकाल कर उसको बाहर रोकना । उड्डियान बंध
आदि कई प्रकार हैं । प्राणायामसे अनेक प्रकारके रोगोंका नाश होकर श्वासके विशिष्ट और विविध
प्रकारके स्पंदनोंसे शरीरके विविध प्रकारके कोशोंको जगाकर कार्यक्षम करना इसका वास्तविक
उद्देश्य है । प्राणायामसे अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश, तथा आनंद-
मयकोशको जागृत कर सकते हैं । इसको हठयोगमें विज्ञान कहते हैं । अनुभवी गुरूसे ही इसका
ज्ञान और अभ्यास हो सकता है ।
इस योगका पांचवा अंग है प्रत्याहार-पांच ज्ञानेंद्रियोंके पांच विषय हैं । (१) शब्द
(२) स्पर्श (३) रूप (४) रस (५) गंध । पांच ज्ञानेंद्रियां इन पांच विषयोंके पीछे दौडनी
१०९ परिशिष्ट ५