ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअवभृथ—यज्ञादिके बाद समारोह पूर्वक जो सामूहिक स्नान होता है उसे अवभृथस्नान
कहते हैं । दक्षिणके जन-जीवनमें यह अत्यधिक प्रचलित है। जैसे मंदिरोंमें होनेवाले रथोत्सवादि
उत्सवानुष्ठान, भजन-सप्ताह,—सात दिन तक चलनेवाले भजनानुष्ठान-संपन्न होनेके बाद लोग आनं-
दोत्सव पूर्वक गुलाल उछालते हैं। हल्दी और चूना मिलाया हुवा लाल पानी बना कर उस पानीसे
खेलते हैं। वह पानी उछाला जाता है । एक दूसरे पर उंड़ेला जाता है। उसके बाद ऐसे ही गीले
कपड़ोंसे उछलते कूदते, नामस्मरणकी गर्जना करते, गांवके बाहरके जलाशय पर स्नान करने जाते हैं।
वहां स्नान करके वैसे ही भगवन्नाम-गाते मंदिर आते हैं । ऐसे समय अधिकतर पालकी
उत्सवमूर्ति-साथ होती है। इसको ओकली भी कहा जाता है ।
अविद्या—विद् धातुसे विद्या शब्द बना है। विद् का अर्थ है जानना । इस पर
अविद्याका अर्थ नहीं जानना ऐसा है। किंतु दर्शन-शास्त्रमें “असत् प्रकाशन शक्ति” माना गया
है । अर्थात् सत्यको नहीं जानना ही असत्का प्रकाशन है। इस शक्तिके दो रूप हैं। (१) सत्
को छिपाना । सत् पर परदा डालना (२) उसपर दूसरी वस्तुका आरोप करना या संभ्रम निर्माण
करना । आत्माके नित्यत्वको-आत्मबोधको छिपाना तथा शरीरभावको दिखाना । यह अविद्याका
कार्य है ।
अष्टमहासिद्धि—(१) अणिमा-शरीरको अत्यंत सूक्ष्म बना लेना—(२) महिमा—
शरीरको बडा और भारी बना लेना। (३) लघिमा-शरीरको अत्यंत हलका बना लेना—(४)
प्राप्ति-प्रत्येक इंद्रियकी एक अधिकारी देवता है। जैसे कानके-दिशा, नेत्रका सूर्य, जीभका वरुण,
नाकका अश्विनी, त्वचाका वायु, मुखका अग्नि, हाथका इंद्र, पायका उपेंद्र, लिंगका प्रजापति,
गुदाका यम, अपनी इंद्रियोंकी अधिष्ठात्री देवताओंसे संबंध जोड़ना—(५) प्राकाम्य-इस विश्व
तथा परलोकके अदृश्य विषयोंका ज्ञान प्राप्त करना । (६) ईशिता-ईश्वरी शक्तिकी उसके अंशोंकी
अन्यान्य स्थान और व्यक्तियोंमें जो जो सत्ता है उस पर स्वामित्व पाना । ईश्वरी सत्ता या प्रभावकी
प्राप्ति । (७) वशिता-भोग भोगते हुए भी अनासक्त रहनेकी शक्ति । (८) प्राकाम्य-जिस सुखकी
इच्छा करें उसकी अमर्याद् प्राप्ति !
अष्टलोकपाल—आठ दिशाओंके आठ स्वामी-(१) पूर्वका इंद्र (२) आग्नेयका अग्नि
(३) दक्षिणका यम (४) नैऋत्यका नैऋति (५) पश्चिमका वरुण (६) वायव्यका वायु
(७) उत्तरका कुबेर (८) ईशान्यका ईश ।
अष्टसात्विक भाव—ईश्वरीय भक्तिसे जब हृदय भर जाता है तब उसके जो परिणाम
शरीर पर स्पष्ट दीखते हैं उनको अष्ट-सात्विक भाव कहा जाता है । वे इस प्रकार हैं—(१)
स्तंभ=स्तब्धता (२) स्वेद=शरीरके रोमरोमसे स्वेदकण प्रस्फुटित होना (३) रोमांच=शरीरके
रोमरोम खिल उठते हैं (४) स्वरभंग=स्वर बदलना, गद् गद् होना (५) कंप=शरीर
कांपना, सिहर उठना (६) वैवर्ण्य=चेहरेका रंग बदलना-ऐसे समय-या तो चेहरा लाल हो जाता
है या फीका पडता है (७) अश्रुपात=आंखोंसे आनंदाश्रु स्रवना (८) प्रलय=भाव समाधि,
शरीर निश्चेष्ट होना ।
ज्ञानेश्वरी १०८