ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं। उन विषयोंसे चिपके रहती हैं। विषयोंसे चिपके रहनेवाली इंद्रियोंको उनसे तोडकर चित्तके
स्वरूपसे जोडना प्रत्याहार है। सामान्यतः मनुष्यकी इंद्रियां विषयोंके पीछे दौडती हैं तब चित्त
इंद्रियोंके साथ रहता है और चित्त भी विषयोंमें रमता है। इसकी उलटी प्रक्रिया इंद्रियोंको
विषयोंसे तोडकर चित्तमें रमने देना अंतर्मुख करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार धारणा और ध्यानका
पहला पाठ है। इसके लिये इंद्रिय निग्रहके कई प्रकार कहे गये हैं। कई मुद्राएं हैं। इन सबसे
अच्छा है सदैव ध्येय चिंतन। इससे चित्त तथा इंद्रियां विषय चिंतन भूल जाती हैं। जैसे मनुष्य
जब किसी गहरे सोचमें होता तब भूख प्यास भी भूल जाता है। सर्वत्र सदा ध्येय चिंतन और
ध्येय निष्ठा प्रत्याहारकी रचनात्मक साधना है।
इसका छठा अंग है धारणा-प्रत्याहारसे इंद्रियोंको अंतर्मुख करने पर चित्तका क्या हो ?
उसको किसी स्थानपर बांध रखना धारणा है। यह स्थान अपनी अंतःसृष्टिका हो। बाह्य सृष्टिका
न हो। जैसे नाभिस्थान, हृदय, भृकुटीमध्य, आदि। ऐसे स्थानोंका चुनाव करते समय स्थूलसे
सूक्ष्मकी ओर जाना। हठयोगमें इस धारणाकी सिद्धिके लिये भी कई मुद्राओंको कहा गया है।
योगग्रंथोंमें शरीरमें जो पंचमहाभूत हैं उनके मूल-स्थानका विवेचन करके चित्तको उन उन
स्थानों पर चिपका देने और उनके फलोंका विचार है। अपने शरीरके षट्चक्रोंपर भी स्थिर
करनेको कहा गया है। इन सबका मूल उद्देश्य इतना ही है कि चित्त सदैव अंतःसृष्टिमें ही रहे।
अपनेमें ही संतुष्ट रहे। तुष्टिके लिये बाहर दौडनेकी आदत छूट जाय ! यह चित्तशुद्धिकी साधना है।
इससे ध्यान सुलभ होता है।
धारणाके बाद इस योगका सातवा अंग है ध्यान-चित्तकी जो धारणा है उसकी समरसताकी
प्रतीति ध्यान है। ध्यानका अर्थ ध्येय वस्तुसे तद्रूप होना। बुद्धि शक्ति सदैव उस ध्येय वस्तुकी
ओरही प्रवाहित हो। इसका सर्वोपरि रूप सदैव और सर्वत्र अव्याहत ब्रह्मचिंतन ! यही ध्यानावस्था
है। धारणामें चित्तका आश्रय "स्थान" होता है तो ध्यानमें चित्तका आश्रय "भाव" होता है।
ब्रह्म भाव, सगुण ब्रह्म भाव और निर्गुण ब्रह्म भाव ! धारणा, शरीरके चक्रोंपर या पंचमहाभूतोंके
स्थान पर होती है तो ध्यान उनके तत्त्वोंका होता है। इसके अभ्यासके लिये प्रत्येक चक्रकी देवता
मानी गयी है। धारणामें चित्त चक्रका आश्रय लेता है तो ध्यानमें उसको उस चक्रके दैवतका
आश्रय दिया जाता है। इस प्रकार स-रूप ध्यानसे अरूप ध्यानकी ओर बढ़ना होता है। तब
हृद्व्यवस्था, आत्माका विश्वात्मक देवका ध्यान होने लगता है। अंतर्बाह्य वह जगदंतर्यामी ! आंखें
मूंदलीं तो हृदयमें स्थित शांत आत्मदेव और आंखें खोलीं तो अनंत कर्म रत विराट आत्मदेव !
आत्मरूप दर्शन और उसीका विश्वरूप दर्शन सर्वत्र ब्रह्म-दर्शन। ध्यानावस्थाका यह सातत्य
ही समाधि-प्रवेश है।
योगका अंतिम और आठवा अंग समाधि-यह योग विद्याका अंतिम अंग है। योग-प्रासाद
का कलश। ध्यान, ध्याता, और ध्येयका समरसैक्य ही समाधि है। मनमें है ब्रह्म, ध्यानमें भी
ब्रह्म। जागृति निद्रामें परब्रह्म ! इसके बिना और कुछ भी नहीं। जैसे कूपमें डूबा हुआ घडा।
पानीसे भरा हुआ पानीमें डुबा हुवा ! सदैव द्वंद्वातीत अखंड स्थिति ! सदैव ब्रह्मलीन अवस्था
सविकल्प समाधि है। इससे परे है निर्विकल्प समाधि ! निरालंब समाधि ! कुछ भी नहीं। निर्भाव,
निर्विचार। दुर्गंध और सुगंधसे भरे कमरेसे दुर्गंध हटाई। वह सुगंधसे भरा। फिर सुगंध हटाई।
निर्गंध किया ! आत्मा आत्मासे आत्मामें लीन !
ज्ञानेश्वरी ११०