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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 733

जैसे वे कभी किसी समय । मद्य मौढ्यमें आ धनंजय ।
करते यज्ञका दंभमय । सारा स्वांग ॥ ८३ ॥
न कुंड न मंडप न वेदी । न उचित साधन समृद्धी ।
तथा उसकी न कुछ विधी । जिससे द्वेष ही सदा ॥ ८४ ॥
देव ब्राह्मणोंके नामका मान । गंध भी उसे न होता सहन ।
तब वहां आयेगा कैसे कौन । अपने मनसे ॥ ८५ ॥
बछियाका बनाकर भूत । गायके सम्मुख रख नित ।
चूस लेते हैं दूध सतत । धूर्त जैसे ॥ ८६ ॥
वैसे यज्ञका लेकर नाम । जगको दिखाकर धरम ।
लोगोंके चूस लेते हैं दाम । उपहार रूप ॥ ८७ ॥
सोचके अपना उत्कर्ष । होममें जो कुछ विशेष ।
उससे वे सर्व-नाश । चाहते औरोंका ॥ ८८ ॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषंतोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥
आसुरी बर्तावसे अंतरात्माको दुःख होता है—
आगे आगे भेरी फिर निशान । लगाके अपना दीक्षितपन ।
जगमें करते आप घोषण । भले रे हम भले ॥ ८९ ॥
ऐसे महत्त्वसे तब ये अधम । अहंतासे बनते महा-महिम ।
मानो काले पुटसे बनता तम । घोर अमावस काली ॥ ३९० ॥
इससे होती मूढता दृढ । बढती उद्दंडता उद्दंड ।
चढते अहंकारपे गाढ । पुट अविवेकके ॥ ९१ ॥
फिर दूसरोंकी भाष । करनेमें पूर्ण नाश ।
बल चढता विशेष । सामर्थ्यका ॥ ९२ ॥
भरके काम औ' क्रोध अहंता बल दर्पसे ।
मेरा स्व-पर देहोंमें करते द्वेष मत्सर ॥ १८ ॥
६६१ देवासुर-संपद्विभाग-योग