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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 611

न होना इसका रूप । व्याप्ति है इसकी अमाप ।
निद्रस्तके यह समीप । जगते ही दूर ॥ ८८॥
मैं सोता तब यह जगती । ब्रह्मांड उदरमें रखती ।
सत्ता-संभोगसे है बनती । गर्भवती यह ॥ ८९॥
प्रकृतिके आठ विकारोंकी सहायतासे अनेक ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं—
इसी महद्ब्रह्मका उदर । प्रकृतिके आठ ही विकार ।
गर्भ अभिवृद्धि धनुर्धर । करता जगद्रूप ॥ ९० ॥
उभय संगसे प्रथम । बुद्धि तत्वका हुवा जन्म ।
रजस वह भरा सम । बनता मन ॥ ९१ ॥
ममता तरुणी तब भनकी । रचना करती अहंकारकी ।
उसने की पंच-महाभूतोंकी । अभिव्यक्ति ॥ ९२ ॥
विषयेंद्रिय जो स्वभावता । रहती भूतोंके अंतर्गत ।
जिससे वे भी भूतोंके साथ । लेते आकार ॥ ९३ ॥
बने हुए विचार-क्षोभसे । पीछे त्रिगुण खडे होनेसे ।
तब जीव वासना गर्भसे । जाता स्थान स्थानपे ॥ ९४ ॥
जैसे बीजका एक कण । पानीसे कर संघटण ।
वृक्षका रूप सुलक्षण । लेता अपनेमें ॥ ९५ ॥
वैसे मेरे ही संग । अविद्या नाना जग ।
नित ले आता डग । अंकुर रूप ॥ ९६ ॥
अजी ! फिर वह गर्भ-गोल । जैसे रूप ले आता सकल ।
वह तू सुन अब निर्मल । चित्त देकर ॥ ९७ ॥
मणिज स्वेदज । उद्बिज जारज ।
उगते सहज । अवयव ॥ ९८ ॥
व्योम वायु-वश । बढा गर्भ-रस ।
मणिज ले खास । अवयव ॥ ९९ ॥
५३९ गुण-निस्तारयोग