ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥ ३६ ॥
ज्ञानकी महानता--
यदि है आगर पापका । महासागरही है भ्रांतिका ।
हिमालय ही है व्यामोहका । तो भी पार्थ ॥ ७२ ॥
इस ज्ञान शक्तिके सम्मुख । यह सब कुछ नहीं देख ।
उसका सामर्थ्य है विशेष । ज्ञानका यहां ॥ ७३ ॥
निरास है विश्व भ्रमका । विस्तार है जो अमूर्तका ।
प्रकाश भी यहां उसका । अपर्याप्त ॥ ७४ ॥
उसकेलिये क्या मनोमल । बोलनेमें भी तुच्छसा बोल ।
उसके सम्मुख तुल्य बल । नहीं विश्वमें ॥ ७५ ॥
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥
अजी ! धूलको जो भुवनत्रयकी । गगनमें उडानेवाली आंधिकी ।
रुकावट होगी कैसी बादल्की । कह तू धनंजय ॥ ७६ ॥
अथवा पवनसे जो प्रक्षुब्ध । प्रलयाग्नि करता जलको दग्ध ।
होगा क्या वह कहो अवरुद्ध । तृणकाष्ठसे ॥ ७७ ॥
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥
पापियोंमें महा पापी होगा यदि शिरोमणि ।
तो भी तू ज्ञान-नौकासे तरेगा पाप-सागर ॥ ३६ ॥
संपूर्ण जलती आग करती राख काष्ठको ।
वैसे ज्ञानाग्नि है सारा जलाता सर्व कर्मको ॥ ३७ ॥
ज्ञान सम न है अन्य पवित्र जगमें कुछ ।
योग-युक्त यथा काल पाये जो निजमें स्वयं ॥ ३८ ॥
ज्ञानेश्वरी १२६