सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
कृतज्ञताज्ञापन
प्रातः स्मरणीय अनन्त श्रीविभूषित श्रीमद् दादूदयालु भगवान की अनोखी
अहैतुकी कृपा से ‘श्री दादूवाणी’ ग्रंथ मानव जीवन को शाश्वत शान्ति प्रदान
करने हेतु वरदान रूप में प्राप्त हुआ है ।
श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर अनंतश्री 1008 आचार्यश्री गोपालदास जी महाराज एवं
गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत श्री 108 स्वामी क्षमारामजी महाराज की
अदृश्य कृपावश ही ‘श्री दादूवाणी’ ग्रंथ का विद्युत संस्करण संभव हुआ है ।
इस संस्करण के निर्माण में, हम हृदय से आभारी हैं, श्री प्रीतम स्वामी
(दौसा-राजस्थान) एवं ‘बाईसा’ वर्षा पंवार (जोधपुर-राजस्थान) के, जिनका
सक्रीय सहयोग तथा मार्गदर्शन निरंतर प्राप्त होता रहा है ...
वाणी महिमा अपार है, मानुष क्या भला बतावेंगे ।
ज्ञानी ध्यानी ऋषि मुनी, गुण गावत शेष थकावेंगे ॥
धन्य धन्य प्रभु करके ख्याल, श्रीदादू ने अवतार लिया ।
वाणी पांच हजार सुना, सब जीवों का उपकार किया ॥
ॐ शान्ति शान्ति शान्ति
सेवक - सदस्य
‘श्री दादूलीला राम नाम परिक्रमा शोध संस्थान’
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अनुक्रमणिका
विषय पृष्ठ
1 - कृतज्ञताज्ञापन :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::2
2 - श्री दादूलीला विहंगावलोकन :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::6
3 - दादूवाणी महिमा महात्म्य ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::19
4 - दादूवाणी अंग नाम :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::21
5 - दादूवाणी राग नाम :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::22
6 - मंगलाचरण :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::23
साखीभाग
1 - गुरुदेव का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::24
2 - स्मरण का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::41
3 - विरह का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::55
4 - परिचय का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::71
5 - जरणा का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::104
6 - हैरान का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::108
7 - लै का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::112
8 - निष्कर्म पतिव्रता का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::117
9 - चितावणी का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::127
10 - मन का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::130
11 - सूक्ष्म जन्म का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::143
12 - माया का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::145
13 - साच का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::162
14 - भेष का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::179
15 - साधु का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::184
16 - मध्य का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::197
17 - सारग्राही का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::205
- 3 -
18 - विचार का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::208
19 - विश्वास का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::214
20 - पीव पहिचान का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::220
21 - समर्थता का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::224
22 - शब्द का अंग ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::229
23 - जीवित मृतक का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::233
24 - शूरातन का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::239
25 - काल का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::249
26 - सजीवन का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::257
27 - पारिख का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::263
28 - उपजन का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::268
29 - दया निर्वैरता का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::271
30 - सुन्दरी का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::275
31 - कस्तूँरिया मृग का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::279
32 - निन्दा का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::281
33 - निगुणा का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::284
34 - विनती का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::288
35 - साक्षीभूत का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::296
36 - बेली का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::299
37 - अबिहड़ का अंग :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::302
शब्द भाग
1 - राग गौड़ी (पद 1-79) ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::304/334
2 - राग माली गौड़ (पद 80-95) :::::::::::::::::::::::::::::::::335/341
3 - राग कल्याण (पद 96-97) ::::::::::::::::::::::::::::::::::342/343
4 - राग कान्हड़ा (पद 98-110) ::::::::::::::::::::::::::::::::::344/348
5 - राग अडाणा (पद 111-116) ::::::::::::::::::::::::::::::::::349/351
6 - राग केदार (पद 117-142) ::::::::::::::::::::::::::::::::::352/361
- 4 -
7 - राग मारू (पद 143-166) ::::::::::::::::::::::::::::362/371
8 - राग रामकली (पद 167-212) ::::::::::::::::::::::::::372/390
9 - राग आसावरी (पद 213-245) ::::::::::::::::::::::::::391/402
10 - राग सिन्दूरा (पद 246-253) ::::::::::::::::::::::::::::403/407
11 - राग देवगांधार (पद 254-256) ::::::::::::::::::::::::::408/409
12 - राग (कल्हेरौ) कालिंगड़ा (पद 257-258) :::::::::::::410/411
13 - राग परजिया (पद 259) ::::::::::::::::::::::::::::::::412
14 - राग भांणमली (भवानी) (पद 260-263) ::::::::::::::413/414
15 - राग सारंग (पद 264-268) ::::::::::::::::::::::::::::415/417
16 - राग (टोडी) तोडी (पद 269-288) ::::::::::::::::::::::418/425
17 - राग हुसेनी बंगाल (पद 289-390) ::::::::::::::::::::426/427
18 - राग नट नारायण (पद 291-297) ::::::::::::::::::::::428/430
19 - राग सोरठ (पद 298-311) ::::::::::::::::::::::::::::431/437
20 - राग गुंड (गौंड) (पद 312-332) ::::::::::::::::::::::438/446
21 - राग विलावल (पद 333-353) ::::::::::::::::::::::::::447/455
22 - राग सूहा (पद 354-355) ::::::::::::::::::::::::::::456/457
23 - काया बेली ग्रन्थ (पद 356-363) ::::::::::::::::::::::458/462
24 - राग बसंत (पद 364-372) ::::::::::::::::::::::::::::463/466
25 - राग भैरूं (पद 373-406) ::::::::::::::::::::::::::::467/479
26 - राग ललित (पद 407-411) ::::::::::::::::::::::::::::480/482
27 - राग जैत श्री (पद 412-413) ::::::::::::::::::::::::::483/484
28 - राग धना श्री (पद 414-444) ::::::::::::::::::::::::::485/498
परिशिष्ट
1 - श्री दादूवाणी जी की आरती ::::::::::::::::::::::::::::::::499
2 - उपदेश अष्टक ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::500
3 - श्री जैमलजी का रामरक्षा-मंत्र ::::::::::::::::::::::::::::::502
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श्री दादूलीला विहंगावलोकन
भगवदाज्ञा - सागर के मध्य में एक टापू पर तीन दिव्य सिद्ध महापुरुष
तपस्या कर रहे थे । भारतीय संस्कृति में तप की बहुत बड़ी महिमा बताई
गई है । दिव्य शक्ति तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए तप सदैव एक प्रमुख
साधन रहा है । सुर - नर - मुनि के तप की बात तो सर्वविदित ही है,
महाप्रतापी तथा शक्तिशाली दैत्य - दानव - राक्षस भी तप के द्वारा दुर्लभ
वरदान पाकर त्रिलोक विजयी हुए हैं । यहां तक कि ब्रह्मा - विष्णु - महेश
को भी सृजन - पालन और संहार की शक्ति तप के द्वारा ही प्राप्त हुई है ।
यथा -
तप बल रचई प्रपंचु विधाता । तप बल विष्णु सकल जग त्राता ।।
तप बल संभु करहिं संहारा । तप बल सेषु धरहिं महि भारा ।। (रा. च. मा.)
अब अपने विषय पर आइये । सागर के एक टापू पर तीन सिद्ध तप कर रहे
थे कि आकाशवाणी हुई - "आप में से एक संसारी जीवों का उद्धार करने
के लिए संसार में जाए ।" इस वाणी को परमात्मा की आज्ञा मानकर तीनों
ने विचार किया, फिर एक सिद्ध पुरुष सागर से भवसागर में जाने के उद्देश्य
से अदृश्य हो गए । इस प्रसंग में श्री दादूदयालजी महाराज के परम शिष्य
श्री राघवदासजी ने (भक्तमाल में) इस प्रकार लिखा है -
सागर में टापू ता में तीन सिद्ध ध्यान करें ।
एक को जु आज्ञा भई जीव निस्तारिए ।।
निजानंद निज ब्रह्म अपारा । तिनकी आज्ञा सौं तन धारा ।।
सब जीवन की पूरी आसा । भक्ति हेतु हरि कियो बिलासा ।।
इस आध्यात्मिक स्थिति तक अभी वर्तमान विज्ञान नहीं पहुंचा है । जिस दिन
ईश्वर की दिव्य लीलाओं का विज्ञान स्वीकार कर लेगा, उसी दिन से वह
विशुद्ध विज्ञान के पथ का पथिक हो जाएगा ।
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
लोधीरामजी को वर प्राप्ति - बात वि. सं. 1600 में गुजरात के
अहमदाबाद शहर की है । वहां श्री लोधीराम नागर ब्राह्मण रहते थे, जो बड़े
सम्पन्न, यशस्वी एवं साधु - संतों के परम भक्त थे । सब सुख होते हुए भी
वे दुःखी रहा करते थे क्यों कि 40 - 50 वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी वे
निस्संतान थे । एक दिन साबरमती नदी में स्नान करके नागरजी घर पर आ
रहे थे तभी मार्ग में उन्हें एक परम दिव्यस्वरुप वाले संत के दर्शन हुए । ये
महात्मा टापू पर तपस्या करने वाले उन तीन सिद्धों में से एक थे, जो
भगवान के आदेशानुसार संसार का उद्धार करने के लिए वहां से चले थे ।
उन्हों ने नागरजी से कहा - “विप्रवर ! कल प्रातःकाल जब तुम स्नान करने
के लिए जाओगे तब एक विशद कमल पुष्प तैरता हुआ तुम्हारे निकट
आयेगा, उसमें एक दिव्य शिशु लेटा होगा । उसे उठा लेना, वही तुम्हारा
पुत्र कहलाएगा ।” इतना कह कर वे संत अदृश्य होगए । लोधीरामजी संत
का प्रकट होना, आदेश देना, और अदृश्य होना खड़े - खड़े देखते ही रह
गए । कुछ क्षणों में प्रकृतिस्थ हुए, मानो सोकर जागे हों । फिर अत्यंत
हर्षित हो जल्दी - जल्दी पैर बढाते हुए नागरजी घर को आए और धर्म -
पत्नि को अपना अलौकिक अनुभव सुनाया । ऐसी विलक्षण घटना सुनकर
वह भी भाव विभोर होगई और बोली - “दयासागर प्रभु ने हम पर बहुत
बड़ी कृपा की । प्रभु ने हमारी कामना पूरी करदी ।”
हर्षातिरेक के कारण लोधीरामजी को उस रात नींद नहीं आई । भावी संतान
के सुख की कल्पना तरंगों में वे रात भर हिचकोले खाते रहे । प्रातःकाल
होने के बहुत पहले ही वे उठ गए और दैनिक कार्यों से निपट कर स्नान
करने के लिए साबरमती नदी की ओर चल पड़े । अभी पौ नहीं फटी थी ।
वातावरण में अंधेरा था, किन्तु नागरजी को सर्वत्र आशा प्रकाश छिटका
हुआ दिखाई दे रहा था । उनकी चाल में पहले की तरह चिन्ता और उदासी
नहीं थी, वरन पद - पद पर आनंद, उमंग तथा स्फूर्ति की झलक थी ।
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
अवतरण - नदी तट पर पहुंच कर नागरजी ने बहुत दूर तक दृष्टि दौड़ाई
किन्तु उन्हें कुछ न दिखाई पड़ा । तब उन्हों ने जल में प्रवेश किया और
कमर तक पानी में खड़े होकर उत्सुक नेत्रों से वे जल - प्रवाह को देखते रहे
कि कमल पुष्प आ रहा है या नहीं । फिर भी कमल का कहीं पता न था ।
अधीर मन में शंका की एक क्षीण रेखा उभरी, किन्तु उनके आस्तिक भाव ने
तत्काल उस रेखा को मिटा कर विश्वास जगाया कि एक दिव्य संत के वचन
असत्य नहीं हो सकते । वास्तव में, पुत्र पाने की आतुरता में नागरजी यह
भूल ही गए कि एक दिव्य शिशु को स्पर्श करने के पहले उनका स्नान करके
पवित्र हो जाना बहुत आवश्यक है । भक्त की भूल को भगवान सुधार देते हैं
। दैवी प्रेरणा हुई । लोधीरामजी ने श्री हरि कह कर जल में डुबकी लगाई
और जैसे ही उन्हों ने अपना सिर बाहर निकाला कि उन्हें एक विशाल कमल
पुष्प जल में तैरता हुआ दिखाई पड़ा । उनका चित्त प्रफुल्लित होगया । जब
उन्हों ने कमल को अपनी ओर आते देखा तो उनका हर्ष सीमा पार करने
लगा । निकट आने पर उन्हों ने देखा कि कमल पर लेटा हुआ शिशु उनकी
ओर देखकर मन्द - मन्द मुस्कुरा रहा है । फिर तो नागरजी सुध - बुध
भूलकर आनंदमग्न हो गए । नागरजी ने देखा कि वह दिव्य तेजस्वी शिशु
अपनी मुस्कान चतुर्दिश बिखेर रहा है । फिर क्या था, लोधीरामजी ने बड़े
प्यार से शिशु को उठा लिया । नागरजी के हाथों में शिशु के पहुँचते ही
आकाश में देव - गंधर्व - किंन्नर प्रकट होकर जय - जयकार करने लगे ।
साथ ही में दिव्य पुष्प एवं केशर की वर्षा करने लगे । अप्सराएं नृत्य करती
हुई यशोगान करने लगीं । दिव्य वाद्य यंत्रों की झंकार से सारा वातावरण
गुंजारित हो उठा । आसपास में स्नान करते हुए सभी लोगों ने इस
अलौकिक दिव्य दृश्य को देखा और उनके मुख से यह उच्चारण हुआ
“नागर के भाग्य धन्य हैं, नागर के भाग्य धन्य हैं ।” लोधीरामजी समझ
गए कि कोई दिव्य विभूति उनको कृतार्थ करने उनके यहां पधारी है । वे
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
भाव - विभोर होकर भीगे वस्त्रों से ही घर की ओर चले । घर में नागरजी
की पत्नी स्नान कर शिशु सहित पति के आने की बाट जोह रही थी ।
नागरजी ने आकर शिशु को उसकी गोद में दिया । ऐसे तेजस्वी, मनोहर
शिशु को देखकर वह हर्ष से भर गई । उसके हृदय में वात्सल्य भाव इतने
वेग से उमड़ा कि दैवी कृपा से उसके स्तनों में दूध उतर आया । वे उस
बालस्वरूप को देखते - देखते भाव विभोर हो गईं । उस शुभ दिन वि. सं.
1601 की फाल्गुन शुक्ल अष्टमी थी ।
कई दादू जीवनियों में उस दिन चैत्र शुक्ल अष्टमी भी बताते हैं ।
तत्पश्चात् अत्यंत लाड़ प्यार से बालक का पालन - पोषण होने लगा ।
बचपन से ही यह बालक तीव्र बुद्धि का तथा भगवद्भावों वाला था ।
असाधारण दयालुता उसका विशेष गुण था । उसकी इच्छा सदा दूसरों को
देने की ही रहती थी, इसलिए उसका नाम दादू रख दिया गया । इस
अवतरण प्रसंग को संतदासजी द्वारा रचित जन्मलीला में इस प्रकार वर्णित
किया है -
संवत सोलह सौ लागत ही, गुजरात धरा मधि अहमदाबाद्,
ब्रह्म प्रकाश उदय भयो भानु जू, आय दुनि मध्य अवतरे दादू ।
हर्ष उछाह भयो तिहूँ लोक में, गावत यशश मुनि - सिद्ध - साधू,
शेष, महेश, ब्रह्मा, ध्रुव में, सूर सुयशश करें संत आद् ॥
गैब को बालक आयो गगन थैं, नदी प्रवाह में खेलत पायो,
पिछले प्रहर नहान गयो विप्र, बालक देखि उठाकर लायो ।
आपनी नारि को आन दियो घर, गैब को दूध प्रवाह बहायो,
गावत मंगल नारि दसों दिश, बांट बधाई उछाह करायो ॥
सद्गुरु की प्राप्ति - बालक दादू की आयु सात वर्ष की हुई । एक दिन वे
अन्य बालकों के साथ कांकरिया तालाब के कि नारे खेल रहे थे । तभी
एक परमतेजस्वी संत सहसा वहां प्रगट हो गए । इस आकस्मिक घटना को
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
देख कर दूसरे बालक तो डर के मारे भाग खड़े हुए, किन्तु दादूजी बड़ी
प्रसन्नतापूर्वक संत के समीप गए और उन्हों ने श्रद्धा से संत को प्रणाम
किया । प्रभु प्रेरणा से आए हुए गुरु रूप संत दादूजी का श्रद्धा, विनय
देखकर हर्षित हो गए और अविलम्ब भक्ति - ज्ञान - वैराग्य का शुभ
आशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान होगए -
बालपने दर्शन दियो, भगवत् बूढ़न होय ।
नगर अहमदाबाद में, दादू भज तूं मोय ॥
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
दादूजी को तो भक्ति - ज्ञान - वैराग्य मूलतः प्राप्त था, इसलिए उन्हें गुरु की
खोज नहीं करनी पड़ी। सद्गुरु ने उनके पास आने की कृपा की और गुरु
की कमी पूरी कर दी, क्योंकि सद्गुरु की प्राप्ति भी बहुत आवश्यक है।
एकादश वर्ष की अवस्था में गुरुदेव ने पुनः दादूजी को दर्शन दिए। यह इस
बात का संकेत था कि शिक्षा पूर्ण हो गई और अब दादूजी को चाहिये कि वे
दूसरों को शिक्षा - उपदेश दें। यह सब दो सिद्धों का मौन वार्तालाप था।
ज्ञानपुंज दादूजी ने गुरुदेव के संकेतानुसार श्रद्धालु जनता के समक्ष प्रवचन
करना आरम्भ कर दिया। वे निर्गुण ब्रह्म तथा योग की गूढ़ साधना की
व्याख्या अत्यंत सरल एवं सर्वग्राह्य भाषा में प्रस्तुत करने लगे ।
“तत्वमसि”, “सोहं”, “एको हम् द्वितीयो नास्ति” आदि वेद के महावाक्यों
का सारगर्भित अर्थ बड़ी सहजता से कर देते थे। उनके अकाट्य तर्क को
सुनकर बड़े - बड़े महापंडित विस्मित हो जाते थे। सारा नागर समाज
उनपर गर्वान्वित था। प्रवचन के अतिरिक्त दादूजी साखी एवं पदों का प्रयोग
भी करते थे। उनकी काव्य रचना शक्ति स्वयं-स्फूर्त थी। इसलिए उनके
साखी एवं पदों को समझने में साधारण जनता को किसी प्रकार की कठिनाई
का अनुभव नहीं होता था।
स्वतंत्र विचरण - एक दिन श्री दादूजी ने सद्गुरु की प्रेरणा का अन्तर्मन
में अनुभव किया - 'तुम अपने नगर में ही सीमित न रहो, बाहर निकलो।
असंख्य जीवों का निस्तार करने के लिए तुम संसार में आए हो।' ऐसी
दिव्य प्रेरणा से प्रेरित होकर वे भक्ति का प्रचार करने के लिए अहमदाबाद से
निकल पड़े । श्री दादूदयालजी महाराज पेटलाद, आबू पर्वत होते हुए
राजस्थान में पहुँचे । वहाँ से करडाला, अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़,
करौली, सांभर, आमेर, नरायणा, भैराणा तथा सीकरी आदि स्थानों पर श्री
महाराजजी ने अपनी दिव्य अमृतमयी वाणी की वर्षा करी । सीकरी में 40
दिनों तक अकबर ने भी इनके सत्संग का लाभ प्राप्त किया।
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श्री दादूदयालजी महाराज के उपदेशों से हिन्दू एवं मुसलमान दोनों ही
सम्प्रदायों में आपसी प्रेम, मैत्री एवं भाईचारे की भावनाओं में वृद्धि हुई ।
अनेक वर्षों तक आपने ज्ञान तथा भक्ति पूर्ण मधुर प्रवचनों द्वारा श्री दादूजी
ने जनसमुदाय को प्रभावित किया तथा लोगों को कल्याण - पथ पर आगे
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
बढ़ाया । साथ ही वे स्वयं अपनी साधना में भी रत रहते थे । कभी - कभी
आत्म - रमण के उद्देश्य से श्री महाराजजी दीर्घकाल तक एकान्तवास किया
करते थे ।
महामंत्र सत्यराम द्वारा अनंत प्राणीमात्र व भूत प्रेतों का उद्धार श्री दादूजी
महाराज ने किया । सत्यराम महामंत्र इसलिए है कि यह सभी मंत्रों का सार
है, तात्विक ज्ञानरुप चारों वेदों ( ऋग्वेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद, सामवेद ) के
रहस्यों सदैव अकीलित है, अक्षुण्ण है, प्रज्वलित एवं नित्य चैतन्य रहनेवाला
है । इसमें “राम नाम सत्य है” का रहस्य भी अंतर्निहित है । श्री दादूजी
महाराज हठयोग, नाड़ीयोग, सामान्य योग तथा साधन योग इन सब तंत्रों में
पारंगत थे और इनके रहस्य को वे सरल सुबोध भाषा में जनता के समक्ष
प्रस्तुत भी करते थे । वे जानते थे कि सारे वायुमंडल सहित समस्त प्राणी
एक ऐसे अनोखे तंत्र में बंधे हुए हैं जिसमें प्रत्येक कामना की सिद्धि तथा
सम्पूर्ति के लिए लाखों मंत्र तंत्र रचे हुए हैं । सभी मंत्रों का रहस्य अनावृत
करने वाले श्री दादूदयालजी महाराज ने सर्वसाधारण को “सत्यराम” का
ऐसा महामंत्र दिया जिसका महत्व अनिर्वचनीय है और जो निरन्तर
दैदिप्यमान रहता है ।
संत शिरोमणि श्री दादूदयालजी महाराज आनंद की वर्षा करते हुए नारायणा
पहुँचे । वहां तत्कालीन राजा नारायणदासजी के विशेष आग्रह पर श्री
महाराजजी रघुनाथजी के मंदिर में ठहर गए, जहां तीन दिन तक सत्संग का
दुर्लभ लाभ राजा तथा प्रजाजनों को प्राप्त हुआ । बाद में श्री महाराजजी ने
सात दिन तक त्रिपोलिया के ऊपर एकांत वास किया । आठवें दिन श्री
महाराजजी के आसन के निकट एक नाग प्रकट हुआ और फण के द्वारा उन्हें
अपने पीछे चलने का संकेत दिया । श्री दादूजी महाराज इसे भगवदाज्ञा
समझ कर नाग के पीछे चल पड़े । नाग जल से परिपूर्ण तालाब के ऊपर
चला एवं महाराज श्री भी उसके पीछे पधारे । तालाब से होकर नाग एक
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
घने खेजड़ा ( राजस्थानी शमी वृक्ष ) के नीचे रुक गया और उन्हें बैठने का
संकेत कर लुप्त होगया । श्री दादूदयालजी महाराज तत्काल इस घटना का
आशय समझ गए और पद्मासन लगाकर आत्मचिंतन में लीन होगए । ऐसी
आत्म - लीनावस्था में श्री महाराजजी के अंगों से दिव्य तेज विकीर्ण होकर
समस्त क्षेत्र को आलोकित करने लगा । दैव प्रेरित होकर राजा
नारायणदासजी भी प्रजा वर्ग के साथ उसी स्थान पर आ पहुँचे । सबने
महाराज श्री के अंगों से निकलता दिव्य तेज देखा और यह भी देखा कि
महाराजजी के आस - पास नाना प्रकार के प्राणी घूम रहे हैं जिनमें कुछ के
मुख मनुष्य जैसे तथा शरीर का शेष भाग विभिन्न पशुओं जैसा तथा कुछ के
मुख पशुओं जैसे तथा शरीर का शेष भाग मनुष्य जैसा था । ऐसा अनोखा
दृश्य देख सभी लोग आश्चर्यचकित होगए और कुछ लोग भयभीत भी हुए ।
तीसरे दिन सारे विचित्र प्राणी लुप्त होगए तथा स्थिति सामान्य होगई ।
उसी समय श्री दादूदयालजी महाराज के नेत्र खुले और उन्होंने वरदमुद्रा
में "सत्यराम" आशीर्वाद दिया ।
वाणीजी की रचना - वाणीजी का रचना काल आजसे लगभग 450 वर्ष
पूर्व का है । महाप्रभु दादूदयालजी महाराज ने रचना की दृष्टि से कोई
स्वतन्त्र काव्य नहीं रचा है; प्रत्युत समय समय पर शरणागत मुमुक्षुजनों को
महाराज पद्यमय वाणी में आत्मोपदेश करते, उन्हीं को उनके शिष्यादि ने
संग्रहित कर लिए ।
मोहनदासजी(दफ्तरी), जगन्नाथजी, संतदासजी दादूजी महाराज के अनन्य
शिष्य भक्त थे; जो सदा उनकी शरण में रहते थे । शरणागत मुमुक्षुओं को
महाप्रभु जो आत्मोपदेश करते, उनको अक्षरशः ये तीनों महात्मा संग्रहित
कर लेते थे । उन पद्यों के 'लिपि-संग्रह' का कार्य शिष्य मोहनजी दफ्तरी
करते थे, मोहनजी की 'दफ्तरी' संज्ञा इसी कारण पडी थी । दादूजी महाराज
अपनी साधना में प्रार्थना का स्थान भी रखते थे । समस्त 'वाणी' संग्रह को
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
शिष्यवर पंडित जगजीवन जी(दौसा) और रज्जब जी ने क्रमानुसार संकलित
किया था ।
हस्तलिखित वाणी जी
चित्र सौजन्य-महंत रामगोपालदास तपस्वी बाबाजी
इसी तरह उपदेश, साधना, प्रार्थना के साथ-साथ 'श्री दादूवाणी' की रचना
होने लगी, जिसको प्रसंगानुसार बाद में रज्जब जी ने प्रकरणों (अंगों-
उपांगों) में विभाजित कर क्रमबद्ध किया गया । 'वाणीजी' में दादूजी महाराज
के भावों, विचारो तथा निश्चयों का संग्रह है । मुख्यतया इसकी रचना उस
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१. साखी भाग (पूर्वार्ध): गुरु-देव, विरह, परिचय, ज्ञान-योग व साध-महिमा
श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
समय की बोलचाल की भाषा में की गई है । स्थल विशेषों में अरबी,
फ़ारसी, गुजराती, मराठी, सिंधी व् पंजाबी भाषा का प्रयोग हुआ है । इससे
सिद्ध होता है कि दादूजी महाराज कई भाषाओं पर अधिकार रखते थे ।
‘वाणीजी’ में सभी तरह के शास्त्रीय, वेदांत, योग, सांख्य, उपनिषद व गीता
के सिद्धांतों का प्रकरण-विशेष में अच्छा समन्वय है । इससे प्रतीत होता है
कि - जिज्ञासुओं ने महाराज से सभी विषयों पर प्रश्न किये थे, उनका उत्तर
आपने बड़ी सुगम व प्रांजल भाषा में दिया है । दादूवाणी में माधुर्य की तो
अजस्र धारा ही बह चली है ।
अन्त समय में उनके पट्टशिष्य गरीबदासजी ने प्रश्न किया - “स्वामिन् !
आपने ऐसा मार्ग दिखाया है जो हिन्दू मुसलमानों की सीमित सीमा से आगे
का है । किन्तु इसका आगे कैसे निर्वाह होगा ?” महाराज ने कहा - “तुम
ऐसा विचार मत करो, जो अपने धर्म में रहेंगे उनकी रक्षा राम करेंगे, और
तुम विशेष चाहो तो हमारा शरीर रखलो, जो भी पूछना चाहोगे उसी का
उत्तर इससे मिलता रहेगा, तथा ऐसा भी न समझो कि वह शरीर खराब हो
जायगा, यह पंच तत्व से बना हुआ नहीं है, यह तो दर्पण में प्रतिबिंबित
शरीर के समान है । यदि तुम्हें संशय हो तो हाथ फेर कर देखलो ।”
गरीबदासजी ने हाथ फेरा तो शरीर दीपक ज्योति सा प्रतीत हुआ, दीखता
तो था किन्तु पकड़ने में नहीं आता था । फिर गरीबदासजी ने कहा - “जब
आपने ऐसा देह बना लिया तो कुछ दिन इसे और रखने से तो हम शवपूजक
कहलाएंगे जो आपके उपदेश के अनुसार उचित नहीं ।” महाराज बोले -
“तो फिर यहां एक बिना तेल - घृत और बत्ती के अखंड ज्योति रहेगी
उससे तुम्हारे सभी कार्य सिद्ध होते रहेंगे ।” गरीबदासजी ने कहा - “उस
ज्योति के महान् चमत्कार को देखकर यहां जनता का आना जाना अधिक
रहेगा जो हमारे साधन में पूर्ण विघ्न बनेगा, हम पंडे बन जाएंगे, अतः यह
भी ठीक नहीं है ।” गरीबदासजी की निष्कामता देखकर महाराज प्रसन्न हुए
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
और बोले - “जो हमारी वाणी का आश्रय लेकर निर्गुण भक्ति करेंगे, उनकी
परब्रह्म रक्षा करेंगे और जो इष्ट - भ्रष्ट होगा, उसे परम - पद नहीं मिलेगा
।” इसी कारण श्री महाराजजी के महाप्रयाण के बाद उनकी वाणी ही सबसे
अधिक पूज्यनीय सिद्ध हुई । आज भी दादू - सम्प्रदाय के सभी पूजन
स्थलोंमें श्रीवाणीजी का प्रमुख पूजन होता है । कहीं कहीं भक्तजनों ने अपनी
भावनानुसार चित्र भी प्रतिष्ठित किए हैं ।
निजस्वरूप में प्रवेश शनैः शनैः तपोमूर्ति श्री दादूदयालजी महाराज के
लीला संवरण का समय आ पहुँचा । परमज्योति से ज्योति का मिलन तो
अवश्यंभावी है । उस समय श्री महाराजजी नारायणा में विराजमान थे । संत
माधोदासजी के अनुसार -
बासुर होय समीप रहे दिन, आवत पालकी पंथ आकाशा ।
के शर चन्दन छाय सुगन्धित, ल्याय धरे सुर मंदिर पासा ।।
ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी वि. सं. 1660, उस दिन चार दिव्य पार्षद पुरुष पालकी
लिए हुए आकाश मार्ग से धरा पर उतरे । सभी शिष्यों ने, राजा
नारायणदासजी ने तथा उनकी प्रजा ने इस अदभुत दृश्य को देखा । सबने
महाराजजी से पालकी के आने का कारण पूछा तब उन्हों ने कहा
“कल करिहैं निज लोक प्रवेशा ”
दूसरे दिन परम पावन पुण्य तिथि अष्टमी को तीन बार आकाशवाणी द्वारा
महाराज श्री को पालकी में बिराजमान होने का निर्देश मिला । श्री
महाराजजी शांतभाव से पालकी में बिराजमान हुए । दिव्य पालकी के आने
एवं महाराज श्री के निजस्वरूप में प्रवेश का समाचार तो पहले दिन ही पूरे
क्षेत्र में फैल चुका था । हजारों, हजारों की संख्या में दूर - दूर से आए
भक्त गण नारायणा में श्री महाराजजी के दर्शनार्थ एकत्र होगए । एकत्र
विशाल जनसमुदाय के सामने ही श्री महाराजजी ने शांत भाव से पालकी में
प्रवेश किया । तब दिव्य पार्षद - पुरुषों द्वारा संचालित वह पालकी ऊपर
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
उठ कर आकाश मार्ग से होती हुई धीरे धीरे भैराणा पर्वत के एक खोल
(वर्तमान दादूखोल) में पहुँची । सारा शिष्यवृंद तथा विशाल जनसमुदाय भी
पालकी के पीछे - पीछे वहां पहुँच गया । दादू खोल में पालकी के स्थित
होते ही एक अद्भुत दिव्य दृश्य नभ मंडल में दिखाई पड़ा । देव, गंधर्व,
किन्नर आदि प्रकट होकर जय जयकार करते हुए पुष्प केशर की वर्षा करने
लगे, अप्सराएं यशोगान करती हुई नृत्य करने लगीं । ठीक यही दृश्य श्री
महाराजजी के प्राकट्य के दिन भी उपस्थित हुआ था और संयोग से उस
दिन भी अष्टमी तिथि थी । सारे भक्तजन इस अनोखे दृश्य को देखकर
आश्चर्य, आनंद एवं श्रद्धा से प्लावित हो गए । तत्पश्चात् अचानक पालकी
फिर ऊपर उठी और उड़ती हुई भैराणा पर्वत की एक गुफा ( यहां वर्तमान
गुफा मंदिर है ) के द्वार तक गई । पालकी के गुफा में प्रविष्ट होने के पूर्व श्री
महाराज जी ने दाहिना कर - कमल वरद मुद्रा में उठाकर उच्च स्वर से
“संतों ! भक्तों ! सत्यराम” का उद्घोष किया और पालकी गुफा में
अंतर्ध्यान होगई । तभी से दादू सम्प्रदाय में “सत्यराम” महामंत्र का प्रयोग
आशीर्वादात्मक तथा अभिवादनात्मक दोनों भावों में किया जाता है । जब भी
दादू भक्तों को परस्पर अभिवादन करना होता है या आशीर्वाद देना होता है
तब अपने सद्गुरुदेव का स्मरण करते हुए “सत्यराम” का उच्चारण करते हैं,
अतः यह श्रेष्ठ अभिवादन है ।
( परम श्रद्धेय श्री दादूदयालजी महाराज की यह संक्षिप्त जीवनी है )
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श्री स्वामी दादूदयालजी महाराज की वाणी
।। महिमा - महात्म्य ।।
।। दोहा ।। प्रगट कल्प तरु अवनि परि, उदय भयो इक आय ।
कृतसु दादूदास को मनवांछित फल दाय ॥ 1 ॥
।। कवित्त ।। अवनि कल्प तरु प्रगट, भई दादू की वाणी ।
साखी शब्द दोई ग्रन्थ, सुतो बड़ स्कन्द पिछाणीं ॥
साखी स्कन्द में डारि, अंग सैंतीस सुनाऊँ ।
पद स्कन्द में डारि, सप्त अरु बीस बताऊँ ॥
पच्चीससै पैंसठि साखि, सोउ पुनि साखा ।
चार सैं चंव्वालीस, पद सोउ उपदाखा ॥
पत्र अक्षर लक्ष कहै साठि, सहज पुनि और गनि ।
भक्ति पहुप वैराग्य फल, ब्रह्म बीज जगन्नाथ भनिं ॥ 2 ॥
प्रथम सत्ताईस राग पोई, अब मोटी डारा ।
तामैं छोटी और अंग, सैंतीस बिचारा ॥
पद जू चंव्वालीस चारि, सत ऊपर डलियाँ ।
उभय सहस शत पंच, साखी इकतीस दुकलियाँ ॥
अब पात सो अक्षर एक लख, साठ सहस पुनि और गन ।
भक्ति पहुप अरु दर्श फल, ब्रह्म बीज कहै लालजन ॥ 3 ॥
ज्ञान भक्ति वैराग्य भाग, बहु भेद बतायो ।
कोटि ग्रंथ को मन्त, पन्थ संक्षेप लखायो ॥
विशुद्धि बुद्धि अविरुद्धि, शुद्धि सर्वज्ञ उजागर ।
परमानंद प्रकाश नाश, बिगदंड महाधर ॥
वर्णबूँद साखी सलिल, पद ललिता सागर हरि ।
दादूदयालु दिनकर दुती, जिन विमल वृष्टि वाणी करी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-महिमा महात्म्य
भये सम्पूर्ण पद अरु साखी, भक्ति मुक्ति तिनमें सो भाखी ।
मनसा वाचा बाचै कोई, ताकूँ आवागमन न होई ॥5॥
वाणी दादू दयालु की, सब शास्त्रन को सार ।
पढे विचारे प्रीती सूं, जे जन उतरे पार ॥ 6 ॥
दादू दीन दयालु की, वाणी विस्वावीस ।
तिनकूं खोजि विचार करि, अंग धरे सैंतीस ॥ 7 ॥
तिन माहीं जो हारडे, तिनके तिते स्वरुप ।
कोई विवेकी केलवे, काढै अर्थ अनूप ॥ 8 ॥
वाणी दादू दयालु की, वाणी कंचन रूप ।
कोई इक सोनी संत जन, घड़ि हैं घाट अनूप ॥ 9 ॥
वाणी दादू दयालु की, वाणी अनुभव सार ।
जो जन या हृदय धरै, सो जन उतरे पार ॥ 10 ॥
जे जन पढ़े जु प्रीति सूं, उपजे आत्मज्ञान ।
तिनकूं आनन भास ही, एक निरंजन ध्यान ॥ 11 ॥
जिनके या हृदय बसी, याही में मन दीं ।
तिनकूं अति मीठी लगी, आठ पहर लैलीन ॥ 12 ॥
वेद पुराण सब शास्त्र, और जीते जो ग्रन्थ ।
तिनको बोध बिलोइकै, यह काढ्या निज मंथ ॥ 13 ॥
बोले दादू दासजी, साचै शब्द रसाल ।
तिनकी उपमा को कहै, मानो उगले लाल ॥ 14 ॥
या वाणी सुनि ज्ञान ह्वे, याही तै वैराग्य ।
या सुन भजन भक्ति बढ़े, या सुन माया त्याग ॥ 15 ॥
या वाणी पढ़ि प्रेम ह्वे, या पढ़ि प्रीति अपार ।
या पढ़ि निश्चय नाम की, या पढ़ि प्राण अधार ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-दादूवाणी के अंग नाम
या पढ़ि कूँ खोजतां, क्षमा शील संतोष ।
याही विचारत बुद्धि ह्वे, या धारत जिव मोक्ष ॥ 17 ॥
आदि निरंजन अन्त निरंजन, मध्य निरंजन आदू ।
कहि जगजीवन अलख निरंजन, तहाँ बसे गुरु दादू ॥ 18 ॥
बषना वाणी बरसणी, बरसो गहर गंभीर ।
सूकानैं हरिया करे, गुरु वाणी का नीर ॥ 19 ॥
अविचल मंत्र जपे निशि वासुर, अविचल आरती गावै ।
अविचल इष्ट रहै शिर ऊपरि, अविचल ही पद पावै ॥ 20 ॥
जिनकी वाणी अमृत बखानी, सन्तन मानी सुखदानी ।
जो सुनकर प्राणी हिरदै आनी, बुद्धि थिरानी उन जानी ॥
यह अकथ कहानी प्रगट प्रवानी, नाहिं न छानी गंगा सी ।
गुरु दादू आया शब्द सुनाया, ब्रह्म बताया अविनाशी ॥
दादूवाणी के अंग नाम
गुरु मिल सुमिरण सों लागा, बिरहा जब आया ।
परचा पिवजी सों भया, जरना ठहराया ॥ 1 ॥
हैरान देख लय लग रही, निहकर्मी पतिवन्ता ।
चिंतामणि मन को भई, सूक्ष्म-जन्म अनन्ता ॥ 2 ॥
माया त्यागी, साँच गहि, भेख रु पंथ निराले ।
साध अंग सब सोध कर, मध मारग चालै ॥ 3 ॥
सारगृही जू विचार कर, विश्वास हरि दीया ।
पीव पिछाना आपना, समरथ सब कीया ॥ 4 ॥
सब्द सुना श्रवणों धरा, जीवत मिरतक हूवा ।
सूरातन साहस किया, अरु इन्द्रिय मूवा ॥ 5 ॥
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