सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

क्या?''
देखते-देखते फौज ने काजली नदी पार कर ली। कुछ दूरी पर साखरपा गाँव
दिखाई देने लगा। शम्भूराजा के अंग-अंग से उमड़ने वाला उत्साह देखकर कविराज
का मन खिल उठा। उन्होंने कहा, "फिर भी राजन!"
"रहने दीजिए कविराज! आपकी चिन्ता भी ठीक है। संगमेश्वर की पूजा-
अर्चना जैसी बातें बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। औरंगजेब ने अकलूज के पास पड़ाव
डाल रखा है। सह्याद्रि के हरे-भरे जंगल में अब शीघ्र ही धमाका होने वाला है।
उसकी तैयारी के सम्बन्ध में अन्तिम विचार-विमर्श करने के लिए ही तो हमलोग
संगमेश्वर में केवल आधे दिन के लिए मिलने वाले हैं। वहाँ भी आपके समान
अनुभवी और जानकार व्यक्ति की उपस्थिति आवश्यक है। आपके कुशाग्र मस्तिष्क
मे नयी कल्पनाएँ आती हैं, तो हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं।
"जैसी आपकी आज्ञा, राजन!" कविराज ने कहा।
सात
संगमेश्वर का वातावरण अत्यन्त प्रसन्न और आह्लादकारक था। किसी समय
रामक्षेत्र के नाम से विख्यात यह छोटी सी नगरी हरे-भरे वृक्षों के बीच बसी हुई
थी। इस नगरी के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पुराने वृक्ष खड़े थे। जगह-जगह पर
नारियल, सुपारी के बाग लहलहा रहे थे।
बहुत दिनों के बाद सम्भाजी राजा के महल में सवेरे से ही भीड़-भाड़ और
लोगों की आवाजाही दिखाई दे रही थी। राजा के साथ लगभग दो हजार की फौज
आस पास छावनी डाले थी। गत वर्ष गर्मी के मौसम में राजा के ठहरने का प्रबन्ध
ऊपर कस्बे में किया गया था। उस समय इस महल की मरम्मत की जा रही थी।
इसीलिए सम्भाजी ने रगोबा सरदेसाई की लकड़ी की प्रशस्त कोठी में निवास किया
था। किन्तु उस समय का-सा उत्साह आज आंशिक रूप में भी दिखाई नहीं दे रहा
था। युद्ध समीप था। इसलिए आगे की तैयारी और व्यूह-रचना आवश्यक थी।
शम्भूराजा भी बहुत उतावली मे थे।
संगमेश्वर के ऊपरी हिस्से में, कस्बे के पीछे महादेव का एक छोटा-सा
मन्दिर था। वहाँ पर एक ओर शृंगारपुर की दिशा से वरुणा नदी प्रवाहित थी तो
सम्भाजी 631

दूसरी ओर से अलकनन्दा नदी आकर वहाँ मिलती थी। पहाड़ी चट्टानों से कूदते-
फाँदते, दौड़ते, चट्टानों से टकराकर कल-कल निनाद करते, शुभ्र और शीतल जल,
संगमेश्वर के ऐश्वर्य में वृद्धि कर रहा था। इसकी विपरीत दिशा में जयगढ़ की ओर
से अरब सागर की एक पतली खाड़ी संगमेश्वर से मिलती थी। ज्वार का जोश इतना
जोरदार होता था कि दोनों नदियों का जल पेट में भरकर ज्वार की तूफानी लहरें
गरजती हुई बढ़ती थीं। वेगवान खारा पानी नदियों के मीठे पानी को पेट में भरकर
दौड़ता हुआ महादेव मन्दिर की सीढ़ियों तक पहुँच जाता था।
एक ओर नावड़ी बन्दरगाह पर आज बहुत भीड़ भाड़ थी किनारे पर अनेक
छोटी किश्तियाँ और छोटी बड़ी नावें दिख रही थीं। सागर से अन्दर आकर दो बड़े
जलपोत लंगर डालकर खड़े थे। शरीर पर लाल कुर्ते और सिर पर फूलवाली
टोपियाँ पहने मछुआरे इधर-उधर भाग दौड़ कर रहे थे। पक्की काछ बाँधे और
कमर पर मछलियों से भरी टोकरियाँ लिए मछुआरिनें जल्दी जल्दी जा रही थीं।
मछुआरों ने अपने लाडले राजा के लिए मछलियों से भरे टोकरे राजमहल में भेज
दिये थे। वहीं किनारे पर लगभग सौ सवारों का एक दस्ता गश्ती के लिए खड़ा था।
इस दल के सभी सिपाही सावधान और चौकन्ने थे।
नदी के किनारे ही नावली और कस्बे के बीच राजा की प्रशस्त हवेली थी।
वह हरे-भरे पेड़ों के बीच छिपी सी रहती थी। कवि कलश ने स्वयं अपनी देख
रेख में इस हवेली का कार्य पूरा करवाया था। हवेली के बाहर बड़े बड़े गुलाबों से
भरा एक उद्यान था। कल दोपहर से ही हवेली की गति तेज हो गयी थी। रायगढ़
से महारानी येसूबाई और कवि कलश की पत्नी तेजसबाई एक दिन पहले ही दोपहर
में वहाँ पहुँच चुकी थीं। वे दोनों जल्दी ही महादेव के मन्दिर में पहुँच गयीं। उन्होंने
अभिषेक की पूरी तैयारी कर ली थी। शास्त्री उपाध्याय और उनके साथ पधारे स्वामी
रामदास के शिष्य रंगनाथ स्वामी की सहायता से पूजा विधि की सम्पूर्ण तैयारी की
गयी थी। इस धार्मिक अनुष्ठान के कारण महाराज के राजधर्म में कोई व्यवधान
उपस्थित न हो, इसका पूरा ध्यान येसूबाई रख रही थीं।
कल मध्य रात्रि में जब शम्भू महाराज अपनी हवेली के सामने उतरे तो उनकी
अगवानी में स्वयं महारानी येसूबाई, सेनापति म्हालोजी घोरपड़े, खंडो बल्लाल,
धनाजी सन्ताजी-मानाजी आदि सभी लोग खड़े थे। सभी लोग लगभग एक महीने
बाद महाराज को देख रहे थे। पिछले कुछ दिनों से निरन्तर जागरण का प्रभाव
शम्भुराजा के चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। उसके साथ ही कष्टसाध्य यात्रा ने उन्हें
तोड़कर रख दिया था। उनकी आँखें लाल और चढ़ी हुई दिखाई पड़ रही थीं थकान
से चूर-चूर हुए महाराज को लग रहा था कि सीधे जाकर अपने को बिछौने में झोंक
दें। किन्तु अपनी प्रतीक्षा में सारे दिन बैठे साथियों से चार शब्द बोलना भी अनिवार्य
632 :: सम्भाजी

था। आसन पर बैठते ही राजा का ध्यान सबसे पहले सेनापति म्हालोजी घोडपड़े की
ओर आकर्षित हुआ। घोडपड़े काका (शिवाजी महाराज के समय के अनुभवी
बुजुर्ग) अपनी उम्र के सत्तर वर्ष पार करने पर भी शरीर से स्वस्थ और बलिष्ठ थे।
वे पूरी तरह आत्मविश्वासी दिखाई पड़ रहे थे। निश्चिन्त भाव से शम्भूराजा ने कहा,
"म्हालोजी काका! आपको और आपके साथ सभी लोगों को यहाँ देखकर बहुत
अच्छा लग रहा है। पिछले आठ वर्षों मे निरन्तर लडता और जूझता रहा। अब
बादशाह पर एक अन्तिम हमला करना है। बस एक बार जोर लगाना है।"
"महाराज ! जिस प्रकार मगरमच्छों और घड़ियालों से भरी नदी में पैर रखने
की हिम्मत नहीं होती उसी प्रकार यहाँ के दरों में, पहाड़ियों में, घाटियों में उतरने
की हिम्मत उस औरंग्या ने नहीं की। यह आपकी बहादुरी का ही नतीजा है।"
सन्ताजी, धनाजी और खंडो बल्लाल जैसे युवकों की हार्दिक इच्छा थी कि
इतने दिनों बाद मिले अपने राजा से देर तक बातें करें किन्तु राजा की चढ़ी हुई आँखों
और थकी हुई मुख-मुद्रा को देखकर इन युवकों ने अपनी इच्छा को भीतर ही दबा
लिया।
सेनापति घोडपड़े ने महाराज की ओर चिन्तित होकर देखा। उन्होंने येसूबाई
से कहा, "महाराज को अब आराम करने दीजिए। कल बहुत काम है।"
महाराज उठे और शयन कक्ष की ओर चल दिए। बिस्तर पर बैठकर उन्होंने
येसूबाई की गोरी कलाई अपने हाथों में ले ली। उनका मन कर रहा था कि अपनी
लाडली रानी से खूब बातें करें। किन्तु पिछले अनेक दिनों के निरन्तर परिश्रम और
जागरण के कारण शरीर विद्रोह पर उतर आया था। बात करते समय भी उनकी
आँखें मूँदी जा रही थीं। शरीर पसीने से चीकट हो गया था। स्नान करने के बाद ही
सोने की इच्छा थी। किन्तु वे एक क्षण के लिए ही पलँग पर लेटे थे कि उन्हें नींद
आ गयी।
इतनी गहरी नींद से स्नान के लिए उठाने की इच्छा येसूबाई की नहीं हुई।
उन्होंने आगे बढ़कर महाराज के गले से पन्ने की माला की रेशमी गाँठें धीरे-से
खोल लीं। किमखाब का कमरबन्द भी निकाल लिया। जब उन्होंने सहज भाव से
महाराज के शरीर पर हाथ फेरा तो वे चौंक गयीं। वह किसी राजा का मुलायम शरीर
नहीं था बल्कि नित्य मिट्टी से जूझने वाले किसी मजदूर की खुरदुरी काया थी।
महाराज के शरीर में हल्का सा ज्वर भी था। येसूबाई ने तत्काल वैद्य को बुलवाया।
महाराज को थोड़ा-सा जगाया और उन्हें औषधि पिलाई। महाराज पुनः नींद के
अधीन हो गये।
शयनकक्ष का चिराग बुझाकर महारानी येसूबाई हल्के कदमों से बाहर की
ओर गयीं। वहाँ पर म्हालोजी घोडपड़े और कवि कलश अभी भी बैठे थे। महारानी
सम्भाजी :: 633

ने कहा, "कविराज ! महाराज बहुत थके हुए दिखाई दे रहे हैं।"
"भाभीजी! महाराज इन दिनों अनिद्रा से बहुत परेशान हो गये हैं। ऊपर से वे
बहुत उत्साही और प्रसन्न दिखाई देते हैं। उनके चेहरे का तेज रंचमात्र भी कम नहीं
हुआ है। किन्तु अनन्त चिन्ताओं के कारण वे भीतर से खोखले होते जा रहे हैं।
कभी-कभी दायें कन्धे का जोड़ बहुत दर्द करता है। खाँसी से भी परेशान हो उठते
हैं।"
बाहर गहराते अँधेरे की ओर देखते हुए येसूबाई ने कहा, "कविराज ! घोड़े
की पीठ पर लदा हुआ महाराज का सिंहासन और कितने दिनों तक घोड़े की पीठ
पर ही लदा रहेगा ?"
"भाभीजी चिन्ता न करें। थोड़े ही दिनों में यह अरिष्ट समाप्त हो जाएगा।
सब कुछ क्षेम होगा।"
"कर्नाटक की लड़ाई में महाराज ने खन्दक की दूसरी ओर घोड़ा कुदा दिया
था। वह जानवर तो बेचारा वहीं पर प्राण त्याग गया। किन्तु महाराज की कन्धे से
गर्दन तक की हड्डी ठीक नहीं हो पायी। वह कभी-कभी बहुत तकलीफ देती है।
असहनीय वेदना होती है उन्हें।"
"खैर, भाभीजी। कल का विचार विमर्श एक बार पूरा हो जाय, फिर सब
कुछ ठीक हो जाएगा। भाभी जी ! अब उस पागल बादशाह के पास केवल दो पर्याय
ही बचे हैं। या तो उसे चुपचाप दिल्ली की ओर कूच करना होगा या फिर यहीं पर
आत्महत्या करके अल्लाह को प्यारा होना होगा।"
"बहुत सहा है इस लड़के ने। हमारे बड़े महाराज पर बड़े-बड़े संकट आये
और गये। किन्तु इतना लम्बा अरिष्ट शिवाजी महाराज ने कभी नहीं देखा था।"
म्हालोजी बाबा ने देखा।
येसूबाई ने माँ भवानी का स्मरण करते हुए आँखें मूँद लीं। उन्होंने धीमे से
कहा, "माँ! किसी तरह यह संकट दूर कर दे।" येसूबाई ने आगे कहा, "कल हम
यहाँ के संगमेश्वर मे अपनी रक्षा की प्रार्थना करेंगे। उनकी शरण में अपने को
समर्पित करेंगे। हमारे महाराज को कब सुख मिलेगा ? कितना काँटों भरा जीवन और
कितना कंटकाकीर्ण यह राजयोग ? माँ शब्द का अर्थ जानने के पहले ही माँ का
स्वर्गवास हो गया, असीम प्यार करने वाली जीजामाता भी जल्दी ही परलोक
सिधार गयीं। महाराज मुगलों से जा मिले। गलतफहमियों की काली घटायें घिरीं
और छँट भी गयीं। ईश्वर की कृपा से ही बड़े महाराज के साथ पन्हालगढ़ पर राजा
की भेंट हुई। यह अच्छा हुआ कि इस भेंट पे बड़े महाराज की सारी गलतफहमियाँ
जलकर खाक हो गयीं। उसके बाद केवल चार महीने में ही बड़े महाराज चल बसे।
उसके बाद खानदान में घोर कलह, भाई-भाई की दुश्मनी, गृहयुद्ध, मुंशी-मुहर्ररों
634 सम्भाजी

का विद्रोह, और पिछले आठ वर्षों में उस शैतान बादशाह के साथ निरन्तर टक्कर।
इस प्रकार की कितनी परीक्षाएँ? कैसा तूफानी जीवन ? संकट, बाधाएँ, कपट, धोखा,
षड्यन्त्र, अपयश, प्रवाद, जैसे कितने ही एक के बाद एक विष का प्याला महाराज
ने पिया और पचाया। कितनी प्रचंड शक्ति और हिम्मत है उनके सीने में?''
बोलते बोलते येसूबाई का गला भर आया। उन्होंने कहा, "उनका परिश्रम और
साहस विशाल पर्वत के समान है किन्तु उनकी सफलता मात्र एक छोटी टेकरी के
समान है।"
दूसरे दिन शम्भू महाराज बहुत जल्दी ही जाग गये। महाराज और महारानी ने
संगमेश्वर महादेव को पंचामृत अभिषेक कराया। धर्मशास्त्र का ठीक-ठीक पालन
हो रहा है या नहीं, इसका ध्यान स्वामी रामदास के शिष्य स्वामी रंगनाथ और कवि
कलश कर रहे थे। पूजा विधि में येसूबाई बड़े मनोयोग से भाग ले रही थीं।
भोर से ही चल रहा अभिषेक और उसके साथ के अन्य धार्मिक अनुष्ठान
नाश्ते के समय तक समाप्त हो गये। येसूबाई और शम्भूराजा की पालकियाँ हवेली
की ओर लौट पड़ीं। रंगोबा सरदेसाई अपनी हवेली के सामने खड़े थे। उनके
परिवार ने महाराज और महारानी का रास्ता रोक लिया। रंगोबा और विशेष रूप से
उनकी माताजी, श्रीमती कृष्णाबाई के आग्रह को महाराज टाल न सके। दही और
शक्कर के निमित्त से ही सही, महाराज और महारानी को वहाँ कुछ देर रुकना पड़ा।
सरदेसाई की दुमंजिली हवेली इतनी सुन्दर थी कि लोग आँखें फाड़कर देखते रह
जाते थे। हवेली के पीछे से ही शास्त्री नदी बहती थी इस समय खाड़ी में ज्वार का
पानी नहीं था। इसलिए घुटनों तक की गहराई का मीठा पानी कल-कल करता हुआ
बह रहा था। शम्भूराजा ने हवेली के भव्य मन्दिर में जाकर श्री गजानन के दर्शन
किये।
पास में ही श्री कर्णेश्वर का मन्दिर था। यह बहुत पुराना मन्दिर था। महाराज
और महारानी ने मन्दिर में जाकर, शीघ्रता से दर्शन किया। राजा का पूरा दल भी
शीघ्रता से हवेली पर लौट गया। मावल और कोंकण घाटी के कुछ चुनिन्दा सरदारों
और अधिकारियों को महाराज ने विचार विमर्श के लिए आमन्त्रित किया था।
दुश्मन राज्य की सीमा पर पहुँच चुका था इसलिए महत्त्वपूर्ण किलों और चौकियों
के सरदारों को महाराज ने सूचित कर दिया था कि अपने अपने स्थानों पर पहरे और
गश्त को तेज कर दें।
बहुत दिनों के बाद पिछली रात में महाराज की तीन घंटे की नींद हुई थी।
विशालगढ़ के सुदीर्घ जागरण का प्रभाव अभी समाप्त नहीं हुआ था। उनके शरीर में
हल्का सा ज्वर अभी भी था। किन्तु इन सारी बातों को भूलकर उनकी तेज नजर
अपने सहयोगियों का भेद ले रही थी।
सम्भाजी 635

परामर्श के लिए एकत्र बुजुर्गों की ओर आदरपूर्वक देखते हुए शम्भूराजा ने
कहा, "आप जैसे बुजुर्गों के आशीर्वाद और पिताजी के पुण्य के बल पर ही हम
पिछले आठ वर्षों से औरंगजेब जैसे शक्तिशाली शत्रु का सामना कर रहे हैं। कभी
सिर पर बर्फ का ठंडा गोला रखकर टक्कर दी तो कई बार दुश्मन की लाखों की
सेना को विनष्ट करने के लिए हवा के घोड़े पर सवार हुए। बुरहानपुर बागलाण से
कारवार-गोवा तक और नीचे कर्नाटक-जिंजी तक भाग दौड़ करते हुए अनेक बार
मुठभेड़ हुई। कई बार तो दुर्दैव से ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि जैसे पानी का भयंकर
सैलाब आकर दम घोंट रहा हो। किन्तु मामा हंबीरराव, कोंडाजी, मानाजी, रूपाजी
जैसे बहादुर साथियों और आपलोगों के बलबूते हम अनेक बार मुगल सेना को मात
देने में सफल हुए हैं।"
सेनापति म्हालोजी घोडपड़े ने कहा, "महाराज आपकी बहादुरी और दृढ़
निश्चयी संकल्पशक्ति की कोई तुलना ही नहीं है।"
"सच है घोडपड़े काका! इतनी बड़ी सेना जो इस भूभाग में आती है, इतने
वर्ष जूझती रहती है। उसका मुकाबला करने के लिए ये पगड़ी और फटे कम्बल
वाले लोग दृढ़ निश्चय के साथ खड़े हो जाते हैं। गोला बारूद न होने पर हाथ में
चट्टानों के पत्थर ले लेते हैं, दर्रे घाटियों में साहसपूर्वक शत्रु का सामना करते हैं। इस
प्रकार के कटु और सुदीर्घ जुझारूपन के उदाहरण विश्व के इतिहास में कम ही
होंगे।" बोलते-बोलते शम्भू महाराज थक गये। उन्होंने एक लम्बी साँस ली और
फिर निश्चिन्त स्वर में बोले, "किन्तु अब दिन बहुत बदल गये हैं। इतनी लड़ाइयाँ
लड़ने पर भी हमारे हिस्से में थोड़ा भी यश नहीं आया। निराशा के गर्त में गोता
लगाता बादशाह अब पूरी तरह से पागल हो गया है। अगले कुछ ही दिनों में वह
सीधा दौड़कर हमारे ऊपर आ गिरेगा। चाहे अगले दरवाजे से आये या पिछले
दरवाजे से, किन्तु पिंजरे में बन्द बिलाव की तरह वह बिना झपट्टा मारे नहीं
रहेगा।"
"सच है महाराज।" म्हालोजी घोडपड़े ने कहा।
"इसी बीच पूरे तीन वर्षों से महाराष्ट्र भयंकर अकाल से पीड़ित है। पानी
और चारे के अभाव में जनता और पशु दोनों बेहाल हो गये हैं। पिछले तीन वर्षों में
सेना में नयी भर्ती भी नहीं हुई है। अनेक अच्छे घोड़ों के अस्तबल ध्वस्त होने की
स्थिति में आ गये हैं। घरों के भीतर कलह है तो दरवाजे के बाहर अकाल की तपती
धूप। पानी के अभाव में धरती में दरारें पड़ गयी हैं और आकाश भी मानो कुपित हो
गया है। किन्तु दोस्तो! हमारे पास दो ऐसे अग्नि अस्त्र हैं कि उनसे हम बादशाह का
नशा बड़ी सहजता से उतार सकते हैं।"
शम्भूराजा की बातें सुनकर युवा धनाजी, सन्ताजी, खंडो बल्लाल आदि का
636 :: सम्भाजी

ध्यान अगला शब्द सुनने के लिए आकर्षित हुआ। महारानी येसूबाई भी सँभलकर
बैठ गयीं।
भावविभोर होकर शम्भू महाराज ने कहा, "हमारा पहला अस्त्र है, हमारे
शिवप्रभु अर्थात हमारे पूज्य पिता का पुण्य और दूसरा अस्त्र है सह्याद्रि की पर्वत
श्रेणियों में बने हमारे पहाड़ जैसे मजबूत दुर्ग। मान लीजिए कि वह उनसे बच जाता
है या सँभल जाता है और सह्याद्रि की घाटियों और दरों में घुसने की उसे दुर्बुद्धि आ
जाती है तो यहाँ के पाषाणी दुर्ग, ढालू चट्टानें उसे दौड़ा-दौड़ा कर भगाएँगी।"
बैठक में जमा लोगों पर एक आदेशात्मक और तेज नजर डालते हुए शम्भू
महाराज बोले, "मित्रो! साधन-सामग्री की दृष्टि से यह औरंगजेब सचमुच
आलमगीर है। यद्यपि वह पिछले अनेक वर्षों से दक्षिण में लड़ाइयाँ लड़ रहा है
तथापि उसका साम्राज्य विस्तार बहुत बड़ा है। काबुल-कन्दहार से लेकर बंगाल
आसाम तक और दक्षिण में मालवा तक उसका साम्राज्य फैला हुआ है। वहाँ से वह
करोड़ों रुपये की लगान वसूल करता है। उसकी तुलना में अपना स्वराज्य एकदम
छोटा सा है। बादशाह द्वारा शासित लगभग अठारह प्रदेशों में से एकाध किसी आधे
सूबे जितना, बस! आमदनी भी उसी अनुपात में कम। बड़े महाराज की जमापूँजी या
उनका खजाना मैंने कहीं भी फिजूलखर्ची में बर्बाद नहीं किया। बल्कि उस खजाने
को बड़ी सूझ बूझ से मैं उपयोग में लाया हूँ। इसीलिए आठ-नौ वर्षों तक हमने
दुश्मन के फौजी महासागर का मुकाबला किया है। दुर्भाग्य से पिछले तीन वर्षों के
अकाल ने राज्य की कमर तोड़कर रख दी है। फिर भी मेरे रणबाँकुरो, जिस साहस
और संकल्प के साथ आप जूझ रहे हैं, उसका कोई भी जोड़ नहीं है। अपने महाराष्ट्र
के अतिरिक्त, अन्य कोई भी प्रदेश ने उस पागल बादशाह को कभी भी इस तरह
परेशान नहीं किया।"
शम्भुराजा की आँखें नम हो गयीं। अपने जरीदार रेशमी दुशाले से आँखें
पोंछते हुए वे बोले, "आज मैंने इस आपातकालीन विचार विमर्श की बैठक के
लिए आपको यहाँ बुलाया है। इसमें म्हालोजी और सूर्याजी जैसे वरिष्ठ लोग भी हैं
और जिनकी मसें अभी अभी भीगी हैं ऐसे धनाजी, सन्ताजी और खंडो बल्लाल
जैसे तरुण भी हैं। म्हालोजी काका, कविराज और महारानी जी हम आपसे
शपथपूर्वक कह सकते हैं कि धनाजी सन्ताजी जैसे हट्टे कट्टे मजबूत जवान ही
कल हमारे स्वराज्य की बागडोर सँभालने वाले हैं। मित्रोऽऽ, आज तक आप सबने
यहाँ की धरती और इस राजा के प्रति जो निष्ठा दिखाई है, उसके लिए हम आपका
लाख-लाख आभार मानते हैं।"
शम्भुराजा का स्वर कातर हो गया था। म्हालोजी घोडपड़े अपनी जगह पर
उठकर खड़े हो गये। वे भी भावुक हो गये थे। उन्होंने कहा, "शम्भू महाराज ! हम
सम्भाजी :: 637

जैसे बलिष्ठ बूढ़ों के जीवित रहते आप तनिक भी दुखी न हों। महाराज! आप ही
हमारे राज्य के सच्चे रक्षक हैं। सभी के ऊपर आकाश की तरह छाया करने वाले बड़े
महाराज, हमें छोड़कर अचानक परलोक सिधार गये। तब इस राज्य का भार आप
जैसे बाइस-तेइस वर्ष के तरुण पर आ पड़ा। बुजुर्ग मंडली को धैर्य से काम लेकर
आपका मार्ग-दर्शन करना चाहिए था। किन्तु अनेक बुजुर्ग वह परिपक्वता नहीं
दिखा सके। अनेकों ने राजद्रोह जैसे भयंकर अपराध भी किये। ऐसे भयानक
अपराधियों को शिवाजी महाराज ने कभी भी माफ नहीं किया होता। इन अपराधियों
के पुराने सम्बन्धों और कार्यों का ध्यान करके आपने उन्हें पुनः उन्हीं पदों पर बहाल
कर दिया। आपने उन्हें रोजी-रोटी दी और उन्होंने आपके भोजन में जहर मिलाने
का काम किया। महाराज! एक बार दरवाजे पर खड़े शेर या बाघ से भी लड़ा जा
सकता है फिर चाहे जीत हो या हार। किन्तु घर के भीतर फैले चूहों की व्यवस्था
बहुत कठिन होती है। महाराज! नितान्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आप किस
प्रकार जूझते रहे, लड़ते रहे? यह इस बूढ़े ने बहुत निकट से देखा है। इसलिए मैं
अपने प्राण और अपनी तलवार आपके कदमों में समर्पित करता हूँ।''
अपने पैरों के पास म्हालोजी द्वारा रखी गयी तलवार को शम्भु महाराज ने
ध्यान से देखा और झुके हुए म्हालोजी का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उनका
आभार मानते हुए शम्भूराजा ने कहा, “घोडपड़े काका! आप स्वराज्य के पराक्रमी
सेनापति हैं। इसलिए कल जहाँ भी आवश्यकता पड़े वहाँ तत्काल दौड़ पड़ने के
लिए मैंने आपकी नियुक्ति पाचाड़ के दुर्ग पर की है। मुझे पूरा विश्वास है कि
रायगढ़ आपके संरक्षण में पूर्णतया सुरक्षित रहेगा।''
“अवश्य! अवश्य, महाराज। स्वराज्य की रक्षा के लिए यह म्हालोजी अपनी
जान की बाजी लगा देगा। '' बोलते-बोलते घोडपड़े का गला रुँध गया। वे अभिभूत
होकर बोले, “वैसे भी महाराज जिसे भी मराठी राज्य का सेनापति होना है, उसे
अन्ततः रक्षा करते-करते मृत्यु को गले लगाना ही होगा। अभी तक तो इस धरती का
यही नियम रहा है। नेमरी के जंगल में बहलोलखान से लड़ते हुए प्रतापराव जलकर
खाक हो गये। उनके बाद उन्हीं की रक्तरंजित तलवार उठाकर हंबीरराव ने सेनापति
पद सँभाला। वाई के युद्ध में उन्होंने सर्जाखान के साथ कड़ा मुकाबला किया।
‘शम्भु महाराज की जय' की गर्जना करते हुए हंबीरराव ने अपने प्राणों का अर्पण कर
दिया। महाराज! अब वही तलवार आपने बड़े विश्वास के साथ मुझे सौंपी है।
भगवान जाने, भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है?”
भविष्य में आने वाले संकटों के सम्बन्ध में विचार-विमर्श हो रहा था। खंडो
बल्लाल और येसूबाई, रायगढ़ और अन्य पहाड़ी किलों पर रखे गये द्रव्य और
गोला-बारूद की जानकारी दे रहे थे। अन्तिम लड़ाई को जीतने के लिए किस प्रकार
638 :: सम्भाजी

के दाँव पेंच किये जाएँगे, कितनी सामग्री अपेक्षित होगी ? आदि बातों पर शम्भू
महाराज बड़ी सावधानी से विचार कर रहे थे।
यद्यपि अकाल से प्रजा त्रस्त हो गयी थी, फिर भी शम्भू महाराज और
येसूबाई पर उनकी असीम श्रद्धा थी। यही महाराज की सच्ची शक्ति थी। किन्तु
जिस गति से सम्भाजी महाराज के सगे सम्बन्धी, स्वराज्य छोड़कर औरंगजेब की
शरण में भागे जा रहे थे, वह भी आज की बैठक में होने वाले विचार-विमर्श की
दृष्टि से एक बड़ी चिन्ता का विषय बन गया था। मनसबदारी के लोभ में अनेक
मराठा सरदारों और ब्राह्मणों ने स्वराज्य के साथ विश्वासघात किया था।
"म्हालोजी काका! अब आपको क्या लगता है ?"
"क्या लगना है ? बात तो स्पष्ट ही है—अब सह्याद्रि पर्वत उसकी तलहटी
का प्रदेश ही अन्तिम युद्ध का क्षेत्र बनेगा। यहीं पर अन्तिम मुठभेड़ रंग लाएगी।"
"इसीलिए महाराज ने खानदेश, बागलाण, नासिक आदि क्षेत्रों से अपनी
अधिकांश फौज हटा दी है। सारी सेना का रुख सह्याद्रि की ओर मोड़ दिया है।"
येसूबाई ने कहा।
शम्भुराजा ने सहज रूप से बात करते करते एक कच्चा नक्शा निकालकर
सामने रखा। उन्होंने कहा, "पन्हाला, शीखण, पुणे, चाकण, पनवेल, चौल,
हरिहरेश्वर से पुनः संगमेश्वर होते हुए पन्हाला, इस तरह का फौलादी घेरा हमलोग
बना रहे हैं। हमारा यह चक्रव्यूह भेदकर मनुष्य ही नहीं किसी चींटी का प्रवेश
करना भी हमारे लिए ठीक नहीं होगा। वह सुरक्षात्मक घेरा अपने अनुशासन और
अपनी मस्ती से बादशाह को लड़ाता रहेगा। फिर हम भी देखेंगे कि वह बुड्ढा
बादशाह यहाँ की मिट्टी और यहाँ के पत्थरों से कितने दिनों तक लड़ता रहता है।"
खानदेश की फौज पीछे हटा लेने से एक प्रकार की बड़ी हानि हो गयी थी।
वहाँ के अनेक जागीरदार और जमींदार मराठे एक एक करके मुगल सेना में जा
मिले। इससे बड़ी हानि हुई। शम्भुराजा के विरोध में सावन्तवाड़ी का खेम सावन्त,
मुगलों में मिल गया था। उसने महाराज के बहनोई महादजी निंबालकर के सुझाव
का बहुत अच्छा उपयोग किया था। पुणे की जेधे मंडली स्वराज्य के अनुकूल रही
है। वे लोग शम्भुराजा को मन से चाहते हैं। किन्तु पुणे, सतारा, फलटण, अकलूज,
तुलजापुर से उस्मानाबाद तक की हवा समान रूप से जहरीली हो गयी थी। कुछ
स्वार्थी जागीरदार विषैला प्रचार कर रहे थे कि, "पृथ्वीपति बादशाह के सामने
सम्भाजी पराजित हो जाएँगे। उनका राज्य समाप्त हो जाएगा। तो हम अपनी
जागीरदारी क्यों नष्ट करें।" कुछ जागीरदारों ने अपने बन्धु-बान्धवों को गुप्त पत्र
भेज दिए थे। सह्याद्रि के पास निरन्तर आग के खेल में उलझे शम्भू महाराज इन
बातों से अनभिज्ञ थे। मुगलिया प्रभाव में तीव्र गति से जाने वाले इन पत्रों की सूचना
सम्भाजी :: 639

रायगढ़ तक नहीं पहुँच पाती थी। हरकारों के मार्ग अवरुद्ध हो गये थे। सम्भवतः
परिवर्तित वातावरण के कारण ही कुछ खानदानी मराठे भी मुगलों से हाथ मिला रहे
थे। यह बीमारी सुपे और पुणे प्रदेशों में सर्वाधिक फैल रही थी।
मुगलों के साथ होने वाली अन्तिम लड़ाई की गन्ध, फौज को, जंगलों को
और पराक्रमी पुरुषों को लग चुकी थी। आज कवि कलश की गौर मुखमुद्रा अत्यन्त
तेजस्वी लग रही थी। उनकी ओर हाथ से संकेत करते हुए शम्भुराजा ने कहा,
"कविराज पन्हाला और विशालगढ़ का जंगली इलाका, हमारे राज्य की बलिष्ठ
भुजाएँ हैं। आप उस ओर पूरी तरह सावधान रहें। जागरूक पहरे रखें।"
"राजन! आप निश्चिन्त रहें। कड़वी और शहाली जैसी जंगली नदियों के
जल से जिनका पालन-पोषण हुआ है, उन घोड़ों ने कभी पराजय का मुँह नहीं देखा
है। मलकापुर की घुड़साल तो हमारी शक्ति है ही। किन्तु - " कहते-कहते
कविराज ने अपने लम्बे बालों की गाँठ बाँधी। अपनी गिरती मूँछों पर हाथ रखते हुए
कवि कलश बोले, "राजन! आपकी संगति में काव्यानन्द की धुन में मैंने सरस्वती
का मन्दिर महका दिया था। राजन! आपके साथ जीने में मुझे सदैव ही आनन्द आया
है। आपके लिए मरने में भी मुझे स्वर्ग सा आनन्द आएगा। औरंग्या से दो दो हाथ
करेंगे। राजन! हमारे बनारस की ओर एक कहावत कही जाती है, "बिगड़ा हुआ
ब्राह्मण, भगवान के भी होश उड़ा देता है। फिर राजन! यह बादशाह यह
बादशाह किस खेत की मूली?"
बादशाह के आक्रमण का स्वरूप क्या होगा? उसके सबल पक्ष कौन कौन से
हैं। उसकी कमजोरियाँ कौन सी हैं? आदि बातों पर विस्तार से चर्चा हो रही थी।
युद्ध का कच्चा नक्शा सामने रखा गया था। कवि कलश और शम्भू महाराज प्रत्येक
चौकी का गम्भीरता से विचार कर रहे थे। शम्भू महाराज की नींद न पूरी होने के
कारण लाल आँखें पश्चिमी किनारे की जाँच कर रही थीं। महाराज ने कहा,
"हमारी पहले की सूझ बूझ अच्छी ही रही। बादशाह के यहाँ पहुँचने के पहले ही
हमने पुर्तगालियों और सिद्दियों को रौंद दिया। यही कारण था कि पिछले छह
सात वर्षों में बादशाह के दक्षिण में स्वयं उपस्थित रहने पर भी न तो पुर्तगाली आँख
उठा सके और न सिद्दी ही जंजीरे की बिल से बाहर निकल सके। किन्तु अब
स्थितियाँ बदल गयी हैं। मुझे लगता है कि इस अन्तिम और निर्णायक संग्राम में
बादशाह, जंजीरे के सिद्दियों और गोवा के पुर्तगालियों को बिना अपने साथ लिये
नहीं रहेगा। इसलिए सिद्दियों और पुर्तगालियों के पैर तोड़कर, उन्हीं के क्षेत्र में
पीछे धकेल देना हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए।"
राजा के सुझाव से सभी लोग विचार मग्न हो गये। शम्भू महाराज ने रेख
उठान वाले तरुण धनाजी की ओर संकेत किया। धनाजी जाधव तत्काल उठकर खड़े
640 :: सम्भाजी

हो गये और महाराज के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। महाराज ने कहा, "धनाजी,
रत्नागिरि की चौकी पर आपको पैर गड़ाकर खड़ा रहना होगा। औरंगजेब की
सहायता से फिरंगियों का आक्रमण उस ओर से होने की आशंका है। हमारे सगे
रिश्तेदार, सावन्तवाड़ी वाले महादजी खेगमावन्त के साथ औरंगजेब से मिल गये
हैं। गोवा और सावन्तवाड़ी की सेनाएँ एक साथ मिलकर युद्ध में उतर सकती हैं।"
शम्भुराजा ने एक बार पुनः धनाजी की ओर देखा। तब धनाजी मुस्कराकर
बोले, "महाराज ! कनखजूरे के चाहे कितने ही पैर हो जायें, यदि एक बार उसकी
कमर कुचल दी जाये तो वह समाप्त हो जाता है। आपने मुझ पर जो दायित्व सौंपा
है उसे हम निश्चित रूप से पूरा करेंगे।"
महाराज ने सन्ताजी घोडपड़े को अपने पास बुला लिया। नक्शे पर
हरिहरेश्वर, दंडाराजपुरी, चौल से पनवेल तक का प्रदेश और पश्चिमी किनारे के
सारे बन्दरगाह और खाड़ियाँ उन्हें दिखाई। फिर महाराज ने ललकारते हुए कहा,
"संतोबा, आप पर हमारा अटूट विश्वास है। अभी-अभी आप जिंजी तक दौड़
लगाकर लौटे हैं। जंजीरा के मगरमच्छों की दुबारा याद दिलाने की आवश्यकता नहीं
है। सिद्दी बहुत बड़ा लुच्चा है। वह ऐन मौके पर धोखा करेगा। इसलिए आप
हरिहरेश्वर से पनवेल तक निरन्तर दौड़ लगाते रहें।"
सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। वे अपने तरुण
पुत्र को आनन्दविभोर होकर देख रहे थे। सन्ताजी ने येसूबाई, अपने पिता म्हालोजी
और खंडो बल्लाल की ओर दृष्टिपात करते हुए शम्भू महाराज से कहा, "महाराज !
सागर के इस किनारे की ओर से तो आप निश्चिन्त हो जाइये। आपने मुझ जैसे
नवयुवक पर विश्वास करके यह दायित्व सौंपा है। मैं स्वयं को धन्य अनुभव कर
रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि दंडाराजपुरी के जंगलों में घोड़ा कुदाते हुए मुझे
कोंडाजी बाबा की आत्मा मिलेगी। जहाँ कहीं भी हम भटकेंगे, कोंडाजी बाबा
हमारा मार्ग-दर्शन करेंगे। इतना अवश्य कहूँगा, महाराज ! कि आज इस सभा में बैठे
खंडो बल्लालजी से मुझे ईर्ष्या हो रही है।"
सन्ताजी की बात को सुनकर सभी लोग उनकी ओर आश्चर्य से देखने लगे।
सन्ताजी ने ही कहना आरम्भ किया, "महाराज खंडो बल्लाल भी मेरी ही उम्र के
हैं। गोवा की लड़ाई जब सागर की तूफानी लहरें बहाये लिये जा रही थीं तब इन्हीं
खंडोबा ने पानी में छलाँग लगाकर आपके प्राणों की रक्षा की थी! यदि कल यहाँ
आग का दरिया बहने लग जाये और उस उमड़ती आग में कूदकर मैं आपकी
थोड़ी-सी भी सहायता कर सकूँ तो अपना जन्म सार्थक मानूँगा।"
धनाजी और सन्ताजी के उद्गारों से विचार-विमर्श के लिए बैठे सभी लोगों
में उत्साह आ गया।
सम्भाजा [641]

सुदूर तमिलों के प्रदेश जिंजी में केसो त्रिमल के पास सात-आठ हजार की
सेना थी। उस पर भी विचार किया गया। म्हालोजी घोडपड़े ने कहा, "उस ओर
जब तक केसो पन्त की सुसज्ज सेना का दबाव बना रहेगा तब तक हरजी महाड़िक
की स्वार्थी महत्त्वाकांक्षाओं को बढ़ने का अवकाश नहीं मिलेगा। उन्हें अपनी जगह
पर ही रुका रहना होगा।"
महारानी येसूबाई और खंडो बल्लाल ने अपना हिसाब-किताब बैठक के
सामने प्रस्तुत किया। प्रत्येक किले पर कितने गोले-बारूद और कितने हीरे-
जवाहरात हैं? प्रत्येक क्षेत्र में कितनी सेना है? जंगलों, पहाड़ों और घाटियों में
कितनी चौकियाँ हैं और उन पर पहरे की कैसी व्यवस्था है? प्रत्येक किले में कितने
अनाज का भंडार है? यदि आसन्न युद्ध तीन वर्ष तक चलता रहे तो किस किले पर
कितने दिन का अनाज कम पड़ेगा? आवश्यकता पड़ने पर रसद किस क्षेत्र से ले
आयी जा सकती है? इस प्रकार के विषयों पर विस्तृत चर्चा हो रही थी। यद्यपि यह
सारा विवरण लिखित में रखा गया था, किन्तु महारानी येसूबाई और खंडो बल्लाल
को सबको जबानी याद था। शम्भूराजा चुप न रह सके। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा,
"महारानी येसूबाई! आप यह सारा हिसाब-किताब सँभालती हैं इसीलिए मुझ जैसे
सिपाही को रात-दिन युद्ध के मैदान में दौड़-धूप करने का अवसर मिलता है।"
शहजादा आजम अपनी बीस हजार की सेना के साथ चाकण के पास घेरा
डाले बैठा था। वह किसी भी समय कोंकण में उतर सकता है। इसके अतिरिक्त
फिरोजजंग सम्भवतः किसी बीच के रास्ते का फायदा उठाकर राजगढ़ में प्रवेश करने
की तैयारी कर रहा था। गुप्तचरों द्वारा इस प्रकार की खबरें मिल रही थीं। इन दोनों
मोर्चों पर किस प्रकार की तैयारी की जाय? इसका निर्देश भी महाराज ने दिया। इसी
बीच संगमेश्वर के सूबेदार एक हरकारे के साथ बैठक में प्रविष्ट हुए। घबराया हुआ
हरकारा बताने लगा, "महाराज इस खबर का पक्का प्रमाण तो नहीं है किन्तु बाहर
लोग इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि इस जंगल में महाराज के प्राणों को खतरा है।
इसलिए यहाँ से तत्काल कूच कर जाना ही उचित होगा।"
शम्भू महाराज क्षण भर के लिए चिन्तित दिखाई पड़े। उन्होंने तत्काल कहा,
"सच है, हमें यहाँ अधिक समय नहीं गँवाना चाहिए। बैठक समाप्त हो गयी है।
रात्रि-भोजन पूरा हो जाने के पश्चात् सभी को अपने-अपने कार्य पर चला जाना
है।"
उस गुप्तचर के आने के बाद बैठक में कुछ सुगबुगाहट आयी। उस समय
शम्भूराजा ने हँसते हुए कहा, "घबराने की कोई बात नहीं है। हमने यथायोग्य
सावधानी बरती है और आगे भी सावधान रहेंगे। इस प्रदेश के घनघोर जंगल में,
दिन में भी आवागमन करते समय शेर को भी पसीना छूट जाता है, सूर्य की किरणें
642 :: सम्भाजी

भी जमीन पर पहुँचने के पहले पेड़ों की टहनियों पर झूलती लटकती हैं। नीचे
उतरने के लिए उनसे अनुमति माँगती हैं।" बोलते-बोलते शम्भूराजा रुक गये।
उनकी नजरें चौकन्नी होकर देखने लगीं। उन्होंने हरकारे से केवल एक प्रश्न पूछा,
"वह मुकर्रबखान कहाँ है?"
"कोल्हापुर के पास केला के पठार पर। कहते हैं कि उसे अचानक ठंडे
बुखार ने घेर लिया है। वह पिछले तीन दिनों से अपने डेरे से बाहर ही नहीं
निकला। इसकी मेरे पास पक्की खबर है।"
"और अपना मलकापुर का अश्वदल?" महाराज ने कवि कलश की ओर
मुड़ते हुए पूछा।
"महाराज! मलकापुर में केवल चार हजार घुड़सवार हैं। शेष छह हजार
अश्वदल आंबा घाटी के मुहाने पर और विशालगढ़ के रास्ते पर तैनात हैं।"
"कविराज!" महाराज ने आश्चर्यचकित होकर कहा।
कवि कलश ने कहा, "हाँ, राजन! विशालगढ़ की ढलान उतरने मे पहले ही
मैंने मलकापुर के लिए दूत भेज दिये थे। राजन! समय का कोई भरोसा नहीं होता।
प्रतिकूल समय कहकर नहीं आता। एक बार हवा के साथ भले ही खिलवाड़ कर लें
लेकिन समय के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।"
महाराज ने अपने आस पास मौजूद सेना का अन्दाजा लगाया। समीप ही
श्रृंगारपुर में पाँच हजार घोड़े तैयार खड़े थे। ऊपर प्रतीचगढ़ पर पाँच सौ सिपाहियों
का दल था। निवरे के रास्ते ऊपर जाने वाले और आगे कराड़ की ढलान पर मालेघाट
पर एक हजार सवारों का रात दिन सावधान पहरा था। यह मार्ग घनघोर और दुर्गम
जंगल से होकर जाता था। इस ओर से किसी के प्रवेश करने की सम्भावना नहीं थी।
दूसरी ओर गोवा मार्ग पर हातखंबे के पास दो हजार सिपाही पहरे पर तैनात थे।
इसके अतिरिक्त जयगढ़ और नावड़ी बन्दरगाह पर भी पहरा बैठाया गया था। कुल
मिलाकर थल अथवा जल मार्ग से किसी के भी संगमेश्वर पहुँचने की कोई
सम्भावना नहीं थी। फिर भी वहाँ से शीघ्र निकलकर राजगढ़ की ओर बढ़ना
महाराज को आवश्यक लग रहा था।
बड़े उत्साह से विचार विमर्श चल रहा था। देखते देखते सूर्यास्त हो गया।
संगमेश्वर के जंगल में अँधेरा गहराने लगा था। चर्चा के अधिकांश मुद्दे
समाप्त हो चुके थे। शम्भू महाराज ने अपने सभी साथियों को पान सुपारी भेंट की।
उन्होंने अपने महल से बाहर के अँधेरे की ओर देखा। हरी-भरी पर्वत-श्रेणियाँ
अन्धकार के गहवर में डूब चुकी थीं। नारियल, सुपारी एवं अन्य वृक्षों से हवा के
टकराने की ध्वनियाँ कानों में पड़ रही थीं। शम्भू महाराज ने बड़ी गम्भीर मुद्रा में
सभी की ओर देखा। उन्होंने आशा भरे स्वर में पूछा, "दोस्तो! क्या आपको लगता
सम्भाजी : 643

है कि भय के इस भयानक पर्वत को लाँघकर हम आगे बढ़ सकेंगे?''
"क्यों नहीं? क्यों नहीं महाराज?'- खंडो बल्लाल कहते हुए खड़े हो गये।
उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, "महाराज! आपने बहुत झेला और सहन
किया है। नासिक-वगलाण की ओर कुछ टूट-फूट हुई होगी। फिर भी आपने
सह्याद्रि पर्वत के बहुत से सशक्त किलों में से एक भी उस गीदड़ औरंगजेब के
क़ब्ज़े में नहीं जाने दिया। बड़े महाराज के जंगी बेड़े में से एक भी जहाज कम नहीं
होने दिया है। उल्टे आपने उनमें साठ-सत्तर जलपोतों की वृद्धि की है। हमारे पास
इतनी शक्ति है कि हम आने वाले पचास वर्षों तक उस पापी औरंगजेब के सेना-
समुद्र को पछाड़ते रहेंगे।"
उस महत्त्वपूर्ण बैठक के समाप्त होते-होते शाम घिर आयी। सन्ध्या समय
की ठंडी हवा चल रही थी। महल में चिरागों की लव फरफरा रही थी। मन्त्रणा
समाप्त हो जाने पर भी महाराज के पैर वहीं पर ठिठके हुए थे। आगे नहीं बढ़ रहे
थे। यह देखकर अन्य लोग भी वहीं पर खड़े हो गये।
महाराज ने गर्जना की, "दोस्तो! औरंगजेब जैसे कलिकाल का मुकाबला
करने के लिए मैंने हर सम्भव उपाय किये। आप ही लोगों की सहायता से हमने
जंजीरे के सिद्दियों को ऐसा कुचला कि औरंगजेब जैसे सहायक के होने पर भी वे
जंजीरे की बिल से बाहर नहीं निकल सके। गोवा के पुर्तगालियों की सारी मस्ती
उतारकर हमने उन्हें वहीं पर रोक दिया। एक ओर अरबों से मित्रता की तो दूसरी
ओर अंग्रेजों को छावनियों से निकलने नहीं दिया। तमिल और कर्नाटक पर दो-दो
बार आक्रमण करके उनके किलों पर भगवा झंडा फहराया। बीजापुर और गोलकुंडा
वालों से मित्रता करके दिल्लीश्वर बादशाह को लाचार बना दिया। उसकी पाँच
लाख की सेना को आठ वर्ष तक नंगा नाच नचाया और महाराष्ट्र को बचाया।"
"वाह! महाराज, वाह!" सभी ने एक साथ गर्जना की। ऐसा लगा मानो
शम्भू महाराज की बात सुनकर वर्षा ऋतु के मेघ घहराने लगे। महाराज की आँखों
की पुतलियाँ कड़कती बिजलियों की तरह चमकने लगीं। उन्होंने सभी की ओर
देखकर धीमे किन्तु दृढ़ स्वर में कहा, "एक शिवाजी महाराज के यश की ध्वजा,
आकाश की ऊँचाई तक फहराने के लिए, मेरे जैसे सैकड़ों सम्भाजी सिरों की बौछार
युद्ध भूमि में हो जाये तो अच्छा ही होगा।"
644 :: सम्भाजी

घात और अपघात
एक
ऐसा भयानक धोखा करने वाला और भयंकर ढलान वाला जंगल अपने सात जन्मों
में भी नहीं देखा था। पिछले एक दिन और एक रात इन लोगों ने बड़ी दौड़ की थी
परन्तु अणुस्कुरा के जंगल में उतरते ही उन्हें छठी का दूध याद आ गया।
अणुस्कुरा घाटी की उतराई इतनी कँटीली और ढालू थी कि पहले झटके में
ही मुगल फौज का सारा जोश ठंडा पड़ गया। मुकर्रबखान, इखलास और गणोजी
के साथ सभी लोग चुपचाप घोड़ों से उतर गये। जहाँ जानवरों को खाली शरीर भी
उतर पाना कठिन हो रहा था वहाँ पीठ पर बोझ लादकर कैसे उतरते ?
घाटी की उतराई पर ऊँचे-ऊँचे पेड़, घनी लताएँ, कँटीली झाड़ियाँ, घनी
जंगली घास आदि भरे पड़े थे। इसलिए जमीन तक चन्द्रमा की किरणें तक नहीं
पहुँच पा रही थीं। जिस पगडंडी पर वे चल रहे थे वह भी हाथ-डेढ़ हाथ से
अधिक चौड़ी न थी। उस रास्ते से एक बार में केवल एक घोड़ा आगे बढ़ सकता
था। वह उतराई की राह कभी उल्टी-पुल्टी गोलाकार होती तो कभी एक लकीर
की तरह सीधी हो जाती, कभी तिरछी होती तो कभी सर्पीली तो कभी सिर तक
ऊँची घासों के बीच में छिप जाती थी। कभी-कभी ऐसा लगता कि वह लकड़ी का
सहारा लेकर थकी हुई किसी बुढ़िया की तरह धीरे-धीरे नीचे उतर रही है।
कभी-कभी नीचे फैली काई के कारण घोड़ों के पैर रपट जाते और भयभीत
जानवर आसपास किसी पत्थर की चट्टान देखकर सहारा पाने के लिए उस पर अपने
को झोंक देते। इस प्रकार अपनी लम्बी जीभ को बाहर निकालकर प्राणों की रक्षा का
उपाय करते। परन्तु कुछ घोड़े पत्थरों और सूखी घासों से इस प्रकार फिसलते कि
उनके सावधान होने के पहले ही उनका सन्तुलन बिगड़ जाता था। जैसे कोई भरी
गागर किसी खाली कुएँ में गिर जाये वैसे ही ये घोड़े बगल की घाटी में गिर जाते
थे। कँटीली झाड़ियों से होकर गिरने वाले घोड़ों की करुण चीत्कार फौज के कलेजे
सम्भाजी :: 645

को कँपा देती थी। बचे हुए घोड़े अपनी जगह पर रुक जाते और भय से देखते हुए
मूतने लगते।
उतराई पर पैरों की गति इतनी धीमी हो जाती कि समझ में ही नहीं आता कि
यह कठिन राह कभी समाप्त भी होगी या नहीं? दूसरी ओर की घाटी से रात की
ठंडी हवा शरीर को छू रही थी। परन्तु घबराये हुए मनुष्यों और जानवरों को पसीने
छूट रहे थे। उनका शरीर पसीने से तर हो रहा था। उस दानवी रास्ते ने देखते-देखते
चालीस घोड़ों को निगल लिया। उस रात के अँधेरे में अनेक प्राणी पहाड़ से नीचे
गिर गये। कुछ पन्द्रह-सत्रह फौजियों के जाते मुकर्रबखान के पेट में भी भय का
गोला घूमने लगा। मुकर्रब के साथी उसके आसपास इकट्ठे हुए। अँधेरे के कारण
उनके चेहरे का भाव स्पष्ट नहीं हो रहा था। किन्तु उनकी अवरुद्ध साँस, नाक से
निकलने वाली गर्म हवा एक ही प्रश्न पूछ रही थी, "खान साहब! इस मौत के कुएँ
में हमें लेकर कहाँ जा रहे हैं?"
मुकर्रब ने उन्हें निश्चयपूर्ण शब्दों में उत्तर दिया, "मैंने तो पहले ही कह
दिया था कि जिन्हें मौत कबूल हो वही हमारे साथ चलें।"
मुकर्रब के इस उत्तर से रुके हुए पैर फिर से चलने लगे। घोड़ों के पैरों में गति
आ गयी। उतार पर चलते हुए जंघाओं और पिंडलियों में गोले फूट रहे थे। पैरों के
फिसलने से नाखूनों का टूटना-फूटना तो मामूली बात थी। अनेकों के पैर फिसले
और वे मोच खाकर पंगु हो गये थे। उस भयंकर उतार पर अब कोई किसी के लिए
रुकने को तैयार न था। घोड़े एक-दूसरे के शरीर को रगड़ते हुए चल रहे थे। सैनिक
एक-दूसरे को हाथों का सहारा दे रहे थे। ठंड से ठिठुरते हुए सैनिक और जानवर
किसी प्रकार अंपनी जान बचाते हुए नीचे उतर रहे थे। बीच में किसी सैनिक का पैर
फिसल जाता तो वह लकड़ी के गट्ठे की तरह बगल की खड़ी चट्टान से नीचे गिर
जाता। 'या खुदाऽऽ, या खुदाऽऽ' की करुण चीत्कार की ओर कोई ध्यान न देता।
नीचे गिरा सैनिक किसी का चचेरा या मौसेरा भाई हुआ तो भी कोई ध्यान न देता।
सभी को अपनी जान बचाकर जल्दी से नीचे उतर जाने की चिन्ता थी। गिरे हुए
सैनिक के सम्बन्ध में केवल 'कौन था?' जैसी मामूली पूछताछ कर ली जाती थी।
आगे बढ़ते सैनिक अपने ठिठुरते स्वर में एक-दूसरे से बीच बीच में कानाफूसी
करते, 'यह शैतान गणोजी हमें कहाँ लिये जा रहा है?'
इस प्रकार के घने जंगल, पहाड़ियाँ, घाटियाँ हमेशा मराठों के अनुकूल होती
हैं। यही सोचकर मुकर्रब की फौज को भय लग रहा था। मराठे यदि बन्दरों की तरह
छलाँग लगाते अचानक सामने आ जाएँगे तो हम जाएँगे कहाँ? इस शैतानी रास्ते में
नष्ट हो जाने का खतरा था। भय के कारण घोड़ों के मुँह से फेन निकल रहा था।
उनकी पीठें पसीने से भीगी थीं।
646 :: सम्भाजी

रात समाप्त होने को आयी। आकाश में चाँद और चाँदनी डूबने लगे। दिन
निकल आया। सैनिक अपनी जगह पर ही ठिठक गये। पीछे के ऊँचे पहाड़ की
खड़ी चट्टान देखकर आँखों के आगे अँधेरा छा गया। अभी तक केवल आधा रास्ता
ही पार हुआ था। पीछे ऊँची खड़ी चट्टान और सामने गहरी खाई। सैनिकों और
जानवरों की देह भय के मारे गोल-गोल घूमने लगी। रात के अँधेरे के कारण ही वे
यह भयानक यात्रा कर सके थे। अन्यथा एक मुकर्रबखान को छोड़कर दूसरा कोई भी
सैनिक इन चट्टानों से उतरने के लिए तैयार न होता। दाहिने हाथ की बड़ी खाई और
पैरों के नीचे की भयंकर उतराई देखकर जानवर भी हड़बड़ा गये। समीप के पत्थरों
और पेड़ों से चिपककर नाक फुलाये खड़े हो गये। मुकर्रबखान जोर से चिल्लाया,
"चलो बेवकूफो, जल्दी चलो नहीं तो मराठे पीछे पड़ जाएँगे।"
घोड़ों की लगाम पकड़े सैनिक उन्हें नीचे की ओर खींचने लगे। परन्तु एक
भी जानवर आगे पैर रखने को तैयार न था। तब जानवरों के शरीर पर बेंत और कोड़े
पड़ने लगे। नीचे उतरने के स्थान पर जानवर वहीं पर झुक गये। भयभीत होकर
मूतने और लीद करने लगे। किन्तु भय के कारण एक ने भी आगे कदम नहीं
बढ़ाया। मुकर्रब ने सभी की ओर संकेत किया। उसने अपनी नुकीली टोपी पर बँधा
हुआ साफा खोला और उस लम्बे साफे से अपने घोड़े की आँखें बाँध दीं। अन्य
सैनिकों ने भी ऐसा ही किया। जिनके पास साफे नहीं थे उन्होंने अपने लम्बे कुर्ते
उतारे और घोड़ों की आँखों पर पट्टी बाँध दी। जो भी हो वह भयानक उतराई घोड़ों
की आँखों से दूर हो गयी। उन्हें भी कुछ साहस मिला। उनके पैरों में शक्ति का
संचार हुआ। घोड़े अपने मालिकों द्वारा खींची जाने वाली लगाम के सहारे चलने
लगे। जानवरों का सहारा लेकर सैनिक भी बचते-बचाते घाटी में उतरने लगे।
दोपहर होते-होते तीन हजार की फौज वह दुर्गम घाटी उतरकर एक बार नीचे आ
गयी।
घाटी में उतरते हुए जब सैनिकों और जानवरों ने सामने का समतल मैदान
देखा तो वे खुशी से नाच उठे। सैनिकों के पाँव, मोच खाकर अकड़कर, ऐंठकर,
लचककर बेजार हो गये थे। घोड़ों ने सामने घास से भरा मैदान देखा तो खुशी से
दौड़ने लगे। अपने शरीर को विश्राम देने के लिए जैसे हाथी पानी में अस्त-व्यस्त
होकर लेट जाता है उसी तरह घोड़े घास पर लोटने लगे। सिपाहियों ने भी बकरी के
बच्चों की तरह उछलते हुए अपने को घास पर झोंक दिया। विश्राम कर रहे सैनिक
और घोड़े रस्सी की तरह लटकने वाली चट्टान की पगडंडी को आश्चर्य से देख रहे
थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वे सचमुच इसी पगडंडी से उतरकर नीचे
आये हैं।
घास के मैदान पर सैनिकों और घोड़ों का फैला हुआ वह मेला बगल के
सम्भाजी :: 647

पीपल के नीचे खड़े गाँव वाले बड़े कुतूहल से देख रहे थे। कल हवा के पैरों से
भागने वाले कुछ हरकारों और कुछ मार्ग दिखाने वालों को गणोजी ने आगे भेजा
था। गणोजी ने सन्देश भेजा था कि मुगलों की सेना का एक हिस्सा मराठों के साथ
मिल गया है। वह दल सम्भाजी राजा से मिलने के लिए इसी रास्ते से आने वाला
है। आसपास की बस्तियों में भोर से ही रोटी-नाश्ते की व्यवस्था कर ली गयी थी।
गाँव वाले रोटी-चटनी लेकर इसी सेना की प्रतीक्षा कर रहे थे।
थोड़े विश्राम के बाद लोग रोटी-चटनी और जानवर हरी नरम घास पर टूट
पड़े। वहाँ बहुत समय रुकना खतरे से खाली नहीं था। मुकर्रबखान और गणोजी ने
जल्दी मचाई। सभी तरोताजा होकर दलान के सामने का रास्ता नापने लगे।
सामने का रास्ता चट्टान की ढलान की तरह नहीं था। फिर भी ठीक तरह से
दिखाई नहीं पड़ रहा था। ऊबड़-खाबड़ गड्ढों पोरसाभर ऊँचे-ऊँचे पत्थरों और
कँटीली झाड़ियों से होकर रास्ता आगे सरक रहा था। मुकर्रब के साथियों से जब न
रहा गया तो उन्होंने खान के सामने ही गणोजी की शिकायत की, "यह शैतान
गणोजी हमें कहाँ लिए जा रहा है ? उस ओर गोवा की ओर से आने वाली घोड़ों के
लिए सुगम राह को क्यों छोड़ रहा है ?"
इस शिकायत पर गणोजी हँस पड़े। मुकर्रब के सैनिकों से उन्होंने कहा,
"वह गोवा की ओर से आने वाला रास्ता सीधे आगे जाता है। परन्तु संगमेश्वर तक
कम-से कम दो जगहों पर सम्भाजी की पाँच पाँच हजार की सेनाएँ तैयार खड़ी
हैं। आपको हमारे पीछे पीछे आना है या सीधे सम्भाजी के जबडे में पहुँचना है ?"
गणोजी ने किसी को जवाब देने का मौका ही नहीं दिया। अँधेरा होते-होते
एक गाँव के मैदान में घोड़े रुक गये। गणोजी द्वारा पहले भेजे सन्देश के अनुसार
कोंकण क्षेत्र से खेममावन्त, देशमुख, दलवी जैसे अनेक जागीरदार पूरे प्रबन्ध के
साथ वहाँ एकत्र हुए थे। गणोजी से मिलते ही उन लोगों ने उन्हें बाँहों में भर
लिया। गणोजी के निर्देश के अनुसार उन लोगों ने चार सौ हृष्ट-पुष्ट घोड़े तैयार रखे
थे। मुकर्रब ने शीघ्रता की। उसने थके हारे और जख्मी घोड़ों को बदल दिया।
तरोताजा घोड़ों के मिलने से मुस्लिम सैनिक प्रसन्न हो गये।
अब संगमेश्वर तक का रास्ता केवल एक रात का रह गया था। अब लगातार
तीसरी रात का वह जानलेवा रास्ता आरम्भ हुआ।
इसी समय कुछ गुप्तचरों से गणोजी को समाचार मिला। डेढ़-दो दिन पहले
शम्भुराजा विशालगढ़ से उतरकर इसी रास्ते से संगमेश्वर से आगे गये हैं। यह खबर
सुनते ही मुकर्रब थरथरा गया। उसके सैनिक भी चौकन्ने हो गये। जिस शिकार के
लिए पिछली तीन रातों से इस भयानक जंगल में वे कुत्तों की तरह दौड़ रहे थे उस
शिकार की गन्ध आसपास के जंगल मे उनकी नाक में आने लगी। यह सोचकर
648 :. सम्भाजी

सभी प्रसन्न हो रहे थे। प्यारे गणोजी ने खाने पीने की कोई कमी नहीं होने दी थी।
अब केवल आगे-आगे बढ़ना था। यदि शम्भू महाराज संगमेश्वर छोड़कर चले गये
तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। अपने हिस्से में अपयश आने का भी भय था।
यदि शम्भू न मिले और अपयश का भागी होना पड़ा तो इस रास्ते से पीछे आकर
सुरक्षित ठिकाने पर पहुँचना बहुत कठिन था। यह तो सीधे मृत्यु के सामने खड़ा
होना था।
मुकर्रब जिस हट्टे-कट्टे घोड़े पर सवार था उसे कभी हाथों से थपकियाँ दे रहा
था तो कभी चमड़े के पट्टे से मारकर नचा रहा था। उसे सामने जंगल की गड्ढेदार
पगडंडी की कोई चिन्ता न थी। वह इस तरह भाग रहा था मानो शिकार उसके हाथ
में आ गया हो। सैनिक और जानवर सभी उत्साहित हो गये थे।
आधी रात हो गयी। मुगल सेना के साथ उस वन-प्रान्तर में चारों ओर चाँदनी
छा गयी। उनकी थकान दूर करने के लिए ठंडी हवा बहने लगी। ऐसा लगा मानो
गणोजी दादा के साथ प्रकृति भी दुश्मनों के साथ हो गयी थी। मुकर्रब पूरी तरह
एकाग्र हो गया था। उसकी आँखें जग रही थीं। उसके घोड़े के आगे गणोजी के
रास्ता दिखाने वाले दस-पन्द्रह घोड़े दौड़ रहे थे। उन्हीं की सहायता से मुकर्रब और
तीन हजार की फौज पूँछ की तरह पीछे-पीछे भाग रही थी।
मुकर्रब को लगा कि कोई उसे पुकार रहा है। उसने उसी क्षण घोड़े को रोक
दिया। उसका जवान बेटा इखलास 'अब्बाजानऽऽ, अब्बाजानऽऽ' कहते हुए उसके
पास आ गया। अपने पिताजी के घोड़े के बहुत समीप आकर इखलास ने मुकर्रब के
कानों में कुछ कहा। घोड़े अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो गये। फौज के पीछे
पीछे चलने वाले गणोजी को आगे बुलाया गया। गणोजी मुकर्रबखान के पास आये।
उनका उतरा हुआ चेहरा रात की चाँदनी में भी स्पष्ट दिख रहा था। गणोजी को
देखते ही मुकर्रब ने उन्हें फटकारते हुए कहा, "क्यों गणोजी! क्या बात है?"
"सरकार! मैं आपको बाघ की खोह तक ले आया हूँ। मेरे रहबर, मेरी रसद
सब आपकी सेवा में हैं। पर सरकार मुझ पर रहम कीजिए। मुझे यहाँ से पीछे जाने
की इजाजत दीजिए।"
"आप पागल तो नहीं हो गये?"
गणोजी का गला भर आया। आवाज भरभरा गयी। वे बड़ी कठिनाई से बोले,
"खानसाहब! आपसे क्या कहूँ? इन पहाड़ियों के भोले और पागल लोग उस
शिवाजी और सम्भाजी को भगवान मानते हैं। कल यदि सम्भा हाथ से निकल गया
तो वह आग का खेल खेलेगा। हमारी जड़-शाखा कुछ भी उपचार के लिए नहीं
बच पाएगी।"
मुकर्रबखान और इखलास ने आपस में बात की। उसके बाद मुकर्रब ने शिर्के
सम्भाजी :: 649

से कहा, "गणोजी आप घबराइये नहीं। हम आपको अगुआइ करने के लिए नहीं
कहेंगे। आपको फौज के पीछे रखेंगे। किन्तु किसी भी स्थिति में आपको साथ तो
चलना ही है।"
"परन्तु सरकार आपके साथ रसद, राह दिखाने वाले सब कुछ दे देता हूँ
किन्तु मुझे वापस जाने की इजाजत दीजिए।" गणोजी ने दोनों हाथ जोड़कर घबराये
हुए स्वर में कहा।
पहले ही देर हो चुकी थी। फौज बीच में रुकी थी। गणोजी ऐन मौके पर
हिम्मत हार रहा था। यह देखकर मुकर्रब लाल-पीला होने लगा। घोड़े पर से ही
अपने मजबूत दाहिने हाथ से गणोजी के गले की पट्टी पकड़कर खींचा और कहा,
"शिर्के, तुम क्या मुझे मूर्ख समझते हो? तुम्हारे बाप दादों ने कुछ शताब्दी पहले
इन्हीं जंगल-घाटियों में सात हजार की फौज के साथ मलिक उत्तुजार बन्दे को धोखे
से मार दिया था। वैसी स्थिति आयी तो मैं भी डूब मरूँगा लेकिन तुम्हें साथ लेकर।
चलो, बचपना छोड़ो।"
छिटकी चाँदनी में फौज की दौड़ पुनः आरम्भ हो गयी। घोड़े सरपट भाग रहे
थे। रास्ते की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ और खाइयाँ पीछे छूटती जा रही थीं। भोर के
समय संगमेश्वर से निकलकर आ रहे कुछ पथिक मिले। उनसे खबर मिली कि
कल दिन भर सम्भाजी राजा संगमेश्वर में ही थे। किन्तु आने वाली सुबह को
रायगढ़ की ओर निकलने वाले हैं। यह समाचार सुनते ही मुकर्रब के घोड़ों को मानो
पंख उग आये। मुकर्रब, इखलास और गणोजी साथ तीन हजार की फौज तेजी से
भागते हुए कँटीले रास्ते को पार करने लगी। संगमेश्वर के संगम पर जीवन-मृत्यु
की आर-पार की लड़ाई ही अब उनका एकमात्र लक्ष्य था।
दो
पानी में छपाक से कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी। येसूबाई की आँख एकाएक
खुल गयी। वे बिस्तर पर उठ बैठीं। उन्होंने अनुमान लगाया कि पीछे की नदी में
कोई पेड़ की डाली गिरी होगी। येसूबाई अचकचाकर इधर-उधर देखने लगीं।
महल के पर्दे हल्की हवा से सरसरा रहे थे। पर्दों के साथ बँधे घुँघरुओं की भी
आवाज आ रही थी। चिरागदान का तेल समाप्त होने को आया था। थोड़ी देर पहले
650 :: सम्भाजी