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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 793 में से

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रायगढ़ तक नहीं पहुँच पाती थी। हरकारों के मार्ग अवरुद्ध हो गये थे। सम्भवतः
परिवर्तित वातावरण के कारण ही कुछ खानदानी मराठे भी मुगलों से हाथ मिला रहे
थे। यह बीमारी सुपे और पुणे प्रदेशों में सर्वाधिक फैल रही थी।
मुगलों के साथ होने वाली अन्तिम लड़ाई की गन्ध, फौज को, जंगलों को
और पराक्रमी पुरुषों को लग चुकी थी। आज कवि कलश की गौर मुखमुद्रा अत्यन्त
तेजस्वी लग रही थी। उनकी ओर हाथ से संकेत करते हुए शम्भुराजा ने कहा,
"कविराज पन्हाला और विशालगढ़ का जंगली इलाका, हमारे राज्य की बलिष्ठ
भुजाएँ हैं। आप उस ओर पूरी तरह सावधान रहें। जागरूक पहरे रखें।"
"राजन! आप निश्चिन्त रहें। कड़वी और शहाली जैसी जंगली नदियों के
जल से जिनका पालन-पोषण हुआ है, उन घोड़ों ने कभी पराजय का मुँह नहीं देखा
है। मलकापुर की घुड़साल तो हमारी शक्ति है ही। किन्तु - " कहते-कहते
कविराज ने अपने लम्बे बालों की गाँठ बाँधी। अपनी गिरती मूँछों पर हाथ रखते हुए
कवि कलश बोले, "राजन! आपकी संगति में काव्यानन्द की धुन में मैंने सरस्वती
का मन्दिर महका दिया था। राजन! आपके साथ जीने में मुझे सदैव ही आनन्द आया
है। आपके लिए मरने में भी मुझे स्वर्ग सा आनन्द आएगा। औरंग्या से दो दो हाथ
करेंगे। राजन! हमारे बनारस की ओर एक कहावत कही जाती है, "बिगड़ा हुआ
ब्राह्मण, भगवान के भी होश उड़ा देता है। फिर राजन! यह बादशाह यह
बादशाह किस खेत की मूली?"
बादशाह के आक्रमण का स्वरूप क्या होगा? उसके सबल पक्ष कौन कौन से
हैं। उसकी कमजोरियाँ कौन सी हैं? आदि बातों पर विस्तार से चर्चा हो रही थी।
युद्ध का कच्चा नक्शा सामने रखा गया था। कवि कलश और शम्भू महाराज प्रत्येक
चौकी का गम्भीरता से विचार कर रहे थे। शम्भू महाराज की नींद न पूरी होने के
कारण लाल आँखें पश्चिमी किनारे की जाँच कर रही थीं। महाराज ने कहा,
"हमारी पहले की सूझ बूझ अच्छी ही रही। बादशाह के यहाँ पहुँचने के पहले ही
हमने पुर्तगालियों और सिद्दियों को रौंद दिया। यही कारण था कि पिछले छह
सात वर्षों में बादशाह के दक्षिण में स्वयं उपस्थित रहने पर भी न तो पुर्तगाली आँख
उठा सके और न सिद्दी ही जंजीरे की बिल से बाहर निकल सके। किन्तु अब
स्थितियाँ बदल गयी हैं। मुझे लगता है कि इस अन्तिम और निर्णायक संग्राम में
बादशाह, जंजीरे के सिद्दियों और गोवा के पुर्तगालियों को बिना अपने साथ लिये
नहीं रहेगा। इसलिए सिद्दियों और पुर्तगालियों के पैर तोड़कर, उन्हीं के क्षेत्र में
पीछे धकेल देना हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए।"
राजा के सुझाव से सभी लोग विचार मग्न हो गये। शम्भू महाराज ने रेख
उठान वाले तरुण धनाजी की ओर संकेत किया। धनाजी जाधव तत्काल उठकर खड़े
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