छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 641, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंके दाँव पेंच किये जाएँगे, कितनी सामग्री अपेक्षित होगी ? आदि बातों पर शम्भू
महाराज बड़ी सावधानी से विचार कर रहे थे।
यद्यपि अकाल से प्रजा त्रस्त हो गयी थी, फिर भी शम्भू महाराज और
येसूबाई पर उनकी असीम श्रद्धा थी। यही महाराज की सच्ची शक्ति थी। किन्तु
जिस गति से सम्भाजी महाराज के सगे सम्बन्धी, स्वराज्य छोड़कर औरंगजेब की
शरण में भागे जा रहे थे, वह भी आज की बैठक में होने वाले विचार-विमर्श की
दृष्टि से एक बड़ी चिन्ता का विषय बन गया था। मनसबदारी के लोभ में अनेक
मराठा सरदारों और ब्राह्मणों ने स्वराज्य के साथ विश्वासघात किया था।
"म्हालोजी काका! अब आपको क्या लगता है ?"
"क्या लगना है ? बात तो स्पष्ट ही है—अब सह्याद्रि पर्वत उसकी तलहटी
का प्रदेश ही अन्तिम युद्ध का क्षेत्र बनेगा। यहीं पर अन्तिम मुठभेड़ रंग लाएगी।"
"इसीलिए महाराज ने खानदेश, बागलाण, नासिक आदि क्षेत्रों से अपनी
अधिकांश फौज हटा दी है। सारी सेना का रुख सह्याद्रि की ओर मोड़ दिया है।"
येसूबाई ने कहा।
शम्भुराजा ने सहज रूप से बात करते करते एक कच्चा नक्शा निकालकर
सामने रखा। उन्होंने कहा, "पन्हाला, शीखण, पुणे, चाकण, पनवेल, चौल,
हरिहरेश्वर से पुनः संगमेश्वर होते हुए पन्हाला, इस तरह का फौलादी घेरा हमलोग
बना रहे हैं। हमारा यह चक्रव्यूह भेदकर मनुष्य ही नहीं किसी चींटी का प्रवेश
करना भी हमारे लिए ठीक नहीं होगा। वह सुरक्षात्मक घेरा अपने अनुशासन और
अपनी मस्ती से बादशाह को लड़ाता रहेगा। फिर हम भी देखेंगे कि वह बुड्ढा
बादशाह यहाँ की मिट्टी और यहाँ के पत्थरों से कितने दिनों तक लड़ता रहता है।"
खानदेश की फौज पीछे हटा लेने से एक प्रकार की बड़ी हानि हो गयी थी।
वहाँ के अनेक जागीरदार और जमींदार मराठे एक एक करके मुगल सेना में जा
मिले। इससे बड़ी हानि हुई। शम्भुराजा के विरोध में सावन्तवाड़ी का खेम सावन्त,
मुगलों में मिल गया था। उसने महाराज के बहनोई महादजी निंबालकर के सुझाव
का बहुत अच्छा उपयोग किया था। पुणे की जेधे मंडली स्वराज्य के अनुकूल रही
है। वे लोग शम्भुराजा को मन से चाहते हैं। किन्तु पुणे, सतारा, फलटण, अकलूज,
तुलजापुर से उस्मानाबाद तक की हवा समान रूप से जहरीली हो गयी थी। कुछ
स्वार्थी जागीरदार विषैला प्रचार कर रहे थे कि, "पृथ्वीपति बादशाह के सामने
सम्भाजी पराजित हो जाएँगे। उनका राज्य समाप्त हो जाएगा। तो हम अपनी
जागीरदारी क्यों नष्ट करें।" कुछ जागीरदारों ने अपने बन्धु-बान्धवों को गुप्त पत्र
भेज दिए थे। सह्याद्रि के पास निरन्तर आग के खेल में उलझे शम्भू महाराज इन
बातों से अनभिज्ञ थे। मुगलिया प्रभाव में तीव्र गति से जाने वाले इन पत्रों की सूचना
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