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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 793 में से

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पृष्ठ 636

ने कहा, "कविराज ! महाराज बहुत थके हुए दिखाई दे रहे हैं।"
"भाभीजी! महाराज इन दिनों अनिद्रा से बहुत परेशान हो गये हैं। ऊपर से वे
बहुत उत्साही और प्रसन्न दिखाई देते हैं। उनके चेहरे का तेज रंचमात्र भी कम नहीं
हुआ है। किन्तु अनन्त चिन्ताओं के कारण वे भीतर से खोखले होते जा रहे हैं।
कभी-कभी दायें कन्धे का जोड़ बहुत दर्द करता है। खाँसी से भी परेशान हो उठते
हैं।"
बाहर गहराते अँधेरे की ओर देखते हुए येसूबाई ने कहा, "कविराज ! घोड़े
की पीठ पर लदा हुआ महाराज का सिंहासन और कितने दिनों तक घोड़े की पीठ
पर ही लदा रहेगा ?"
"भाभीजी चिन्ता न करें। थोड़े ही दिनों में यह अरिष्ट समाप्त हो जाएगा।
सब कुछ क्षेम होगा।"
"कर्नाटक की लड़ाई में महाराज ने खन्दक की दूसरी ओर घोड़ा कुदा दिया
था। वह जानवर तो बेचारा वहीं पर प्राण त्याग गया। किन्तु महाराज की कन्धे से
गर्दन तक की हड्डी ठीक नहीं हो पायी। वह कभी-कभी बहुत तकलीफ देती है।
असहनीय वेदना होती है उन्हें।"
"खैर, भाभीजी। कल का विचार विमर्श एक बार पूरा हो जाय, फिर सब
कुछ ठीक हो जाएगा। भाभी जी ! अब उस पागल बादशाह के पास केवल दो पर्याय
ही बचे हैं। या तो उसे चुपचाप दिल्ली की ओर कूच करना होगा या फिर यहीं पर
आत्महत्या करके अल्लाह को प्यारा होना होगा।"
"बहुत सहा है इस लड़के ने। हमारे बड़े महाराज पर बड़े-बड़े संकट आये
और गये। किन्तु इतना लम्बा अरिष्ट शिवाजी महाराज ने कभी नहीं देखा था।"
म्हालोजी बाबा ने देखा।
येसूबाई ने माँ भवानी का स्मरण करते हुए आँखें मूँद लीं। उन्होंने धीमे से
कहा, "माँ! किसी तरह यह संकट दूर कर दे।" येसूबाई ने आगे कहा, "कल हम
यहाँ के संगमेश्वर मे अपनी रक्षा की प्रार्थना करेंगे। उनकी शरण में अपने को
समर्पित करेंगे। हमारे महाराज को कब सुख मिलेगा ? कितना काँटों भरा जीवन और
कितना कंटकाकीर्ण यह राजयोग ? माँ शब्द का अर्थ जानने के पहले ही माँ का
स्वर्गवास हो गया, असीम प्यार करने वाली जीजामाता भी जल्दी ही परलोक
सिधार गयीं। महाराज मुगलों से जा मिले। गलतफहमियों की काली घटायें घिरीं
और छँट भी गयीं। ईश्वर की कृपा से ही बड़े महाराज के साथ पन्हालगढ़ पर राजा
की भेंट हुई। यह अच्छा हुआ कि इस भेंट पे बड़े महाराज की सारी गलतफहमियाँ
जलकर खाक हो गयीं। उसके बाद केवल चार महीने में ही बड़े महाराज चल बसे।
उसके बाद खानदान में घोर कलह, भाई-भाई की दुश्मनी, गृहयुद्ध, मुंशी-मुहर्ररों
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