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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 637, कुल 793 में से

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पृष्ठ 637

का विद्रोह, और पिछले आठ वर्षों में उस शैतान बादशाह के साथ निरन्तर टक्कर।
इस प्रकार की कितनी परीक्षाएँ? कैसा तूफानी जीवन ? संकट, बाधाएँ, कपट, धोखा,
षड्यन्त्र, अपयश, प्रवाद, जैसे कितने ही एक के बाद एक विष का प्याला महाराज
ने पिया और पचाया। कितनी प्रचंड शक्ति और हिम्मत है उनके सीने में?''
बोलते बोलते येसूबाई का गला भर आया। उन्होंने कहा, "उनका परिश्रम और
साहस विशाल पर्वत के समान है किन्तु उनकी सफलता मात्र एक छोटी टेकरी के
समान है।"
दूसरे दिन शम्भू महाराज बहुत जल्दी ही जाग गये। महाराज और महारानी ने
संगमेश्वर महादेव को पंचामृत अभिषेक कराया। धर्मशास्त्र का ठीक-ठीक पालन
हो रहा है या नहीं, इसका ध्यान स्वामी रामदास के शिष्य स्वामी रंगनाथ और कवि
कलश कर रहे थे। पूजा विधि में येसूबाई बड़े मनोयोग से भाग ले रही थीं।
भोर से ही चल रहा अभिषेक और उसके साथ के अन्य धार्मिक अनुष्ठान
नाश्ते के समय तक समाप्त हो गये। येसूबाई और शम्भूराजा की पालकियाँ हवेली
की ओर लौट पड़ीं। रंगोबा सरदेसाई अपनी हवेली के सामने खड़े थे। उनके
परिवार ने महाराज और महारानी का रास्ता रोक लिया। रंगोबा और विशेष रूप से
उनकी माताजी, श्रीमती कृष्णाबाई के आग्रह को महाराज टाल न सके। दही और
शक्कर के निमित्त से ही सही, महाराज और महारानी को वहाँ कुछ देर रुकना पड़ा।
सरदेसाई की दुमंजिली हवेली इतनी सुन्दर थी कि लोग आँखें फाड़कर देखते रह
जाते थे। हवेली के पीछे से ही शास्त्री नदी बहती थी इस समय खाड़ी में ज्वार का
पानी नहीं था। इसलिए घुटनों तक की गहराई का मीठा पानी कल-कल करता हुआ
बह रहा था। शम्भूराजा ने हवेली के भव्य मन्दिर में जाकर श्री गजानन के दर्शन
किये।
पास में ही श्री कर्णेश्वर का मन्दिर था। यह बहुत पुराना मन्दिर था। महाराज
और महारानी ने मन्दिर में जाकर, शीघ्रता से दर्शन किया। राजा का पूरा दल भी
शीघ्रता से हवेली पर लौट गया। मावल और कोंकण घाटी के कुछ चुनिन्दा सरदारों
और अधिकारियों को महाराज ने विचार विमर्श के लिए आमन्त्रित किया था।
दुश्मन राज्य की सीमा पर पहुँच चुका था इसलिए महत्त्वपूर्ण किलों और चौकियों
के सरदारों को महाराज ने सूचित कर दिया था कि अपने अपने स्थानों पर पहरे और
गश्त को तेज कर दें।
बहुत दिनों के बाद पिछली रात में महाराज की तीन घंटे की नींद हुई थी।
विशालगढ़ के सुदीर्घ जागरण का प्रभाव अभी समाप्त नहीं हुआ था। उनके शरीर में
हल्का सा ज्वर अभी भी था। किन्तु इन सारी बातों को भूलकर उनकी तेज नजर
अपने सहयोगियों का भेद ले रही थी।
सम्भाजी 635