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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

५९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
शनि की दशा में राहु की अन्तर्दशा में कलह, मानसिक कष्ट, शरीर में पीड़ा,
मन में सन्ताप, पुत्र से द्वेष, मन में पीड़ा॥६०॥
अर्थव्ययं राजभयं स्वजनादि ह्युपद्रवम् ।
विदेशगमनं चैव गृहक्षेत्रादिनाशनम् ॥६१॥
धन का व्यय, राजभय, आपस के लोगों का उपद्रव, विदेश यात्रा और गृह
क्षेत्र आदि का विनाश होता है॥६१॥
लग्नाधिपेन संयुक्ते योगकारकसंयुते ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे केन्द्रे दायेशाल्लाभराशिमे ॥६२॥
यदि राहु लग्नेश से वा योगकारक से युत हो तो अपने उच्च, अपने क्षेत्र,
केन्द्र में वा दशेश से लाभ स्थान में हो॥६२॥
आदौ सौख्यं धनावाप्तिं गृहक्षेत्रादिसंपदम् ।
देवब्राह्मणभक्तिं च तीर्थयात्रादिकं लभेत् ॥६३॥
आदि में सुख धन का लाभ, गृह क्षेत्र आदि का सुख, देवता, ब्राह्मण की
भक्ति, तीर्थ यात्रा आदि का लाभ॥६३॥
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्गृहे कल्याणवर्धनम् ।
मध्ये तु राजभीतिश्च पुत्रमित्र विरोधनम् ॥६४॥
चतुष्पद जीव का लाभ, गृह में कल्याण की वृद्धि होती है। मध्य में राजभय,
पुत्रमित्र आदि से विरोध होता है॥६४॥
मेषादौ कन्यकां चैव कुलीरे वृषभेतथा ।
मीनकोदंडसिंहेषु गजांतैश्वर्यमादिशेत् ॥६५॥
मेष-कन्या, कर्क, वृष, मीन, धन सिंह राशि में हो तो गजांत ऐश्वर्य का
लाभ॥६५॥
राजसन्मानभूषाप्तिं मृदुलाम्बरसौख्यकृत् ।
द्विसप्तमाधिपैर्युक्ते देहबाधाभविष्यति ॥६६॥
राजा से सन्मान, आभूषण का लाभ, कोमल वस्त्र से सुख होता है। यदि
दूसरे वा सातवें भाव के स्वामी से युक्त हो तो शरीर में बाधा होने की सम्भावना
होती है॥६६॥
मृत्युंजय प्रकुर्वीत छागदानं च कारयेत् ।
अनड्वाहं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ॥६७॥

अथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ५१५
इसकी शान्ति के लिये मृत्युंजय का जप, बकरी और बैल का दान करने
से सभी सम्पत्तियों का लाभ होता है।।६७।।
अथशनिदशायां गुर्वन्तर्दशाफलम्-
मन्दसस्यान्तर्गतेजीवे केन्द्रे लाभत्रिकोणभे ।
लग्नाधिपेन संयुक्ते स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपिवा ।।६८।।
शनि की दशा में केन्द्र, लाभ वा त्रिकोण में गये हुये लग्नेश से युत अपने
उच्च वा अपनी राशि में गये हुये गुरु के अन्तर में ।।६८।।
सर्वकार्यार्थसिद्धिः स्याच्छोभनं भवतिध्रुवम् ।
महाराजप्रसादेन धनवाहनभूषणम् ।।६९।।
सभी प्रकार के कार्यों की सिद्धि तथा धन का लाभ होता है। महाराजा की
प्रसन्नता से धन वाहन आभूषण का लाभ।।६९।।
देवतागुरुभक्तिश्च विद्वज्जनसमागमः ।
दारपुत्रादिलाभश्च पुत्रकल्याणवैभवम् ।।७०।।
देवता-गुरु में भक्ति विद्वानों का समागम, स्त्री पुत्र आदि का लाभ पुत्र को
सुख और वैभव की प्राप्ति होती है।।७०।।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा धने वा लाभगेऽपि वा ।
विभवं दारसौभाग्यं राजश्री धनसम्पदः ।।७१।।
दशेशं से केन्द्र-कोण वा दूसरे वा लाभ में हो तो वैभव, स्त्री का सुख,
राज्यलक्ष्मी, धन सम्पत्ति।।७१।।
भोजनाम्बर सौख्यं च दानधर्मादिकं लभेत् ।
ब्रह्मप्रतिष्ठासिद्धिश्च ऋतुकर्मफलप्रदम् ।।७२।।
भोजन वस्त्र का सुख, दान, धर्मादि क्रियायें, प्रतिष्ठा का लाभ, यज्ञकर्म का
फल।।७२।।
अन्नदानं महाकीर्त्तिर्वेदांतश्रवणादिकम् ।
षष्ठाष्टमव्यये जीवे नीचे वा पापसंयुते ।।७३।।
अन्नदान, अत्यन्त कीर्त्ति और वेदांत का श्रवण होता है। यदि गुरु ६।८।१२
भाव में हो वा नीच में वा पापयुत हो तो।।७३।।
आत्मसम्बंधि मरणं धनधान्यविनाशनम् ।
राजस्थानजनद्वेषः कार्यहानिर्भविष्यति ।।७४।।

वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
५१६
आत्मीय संबंधी का मरण, धन धान्य का नाश, राजकीय पुरुषों से द्वेष कार्य
की हानि होती है।।७४।।
विदेशगमनं चैव कुष्ठरोगादिसम्भवः ।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ।।७५।।
विदेश यात्रा और कुष्ठरोग की सम्भावना होती है। दशेश से ६ वा ८ वा
१२ स्थान में निर्बल हो तो।।७५।।
बंधुद्वेषं मनोदुःखं कलहं पदविच्युतिम् ।
कुभोजनं कर्महानिराजमूलाद्धनव्ययम् ।।७६।।
बंधुओं से द्वेष, मन को दुःख, कलह और पद की हानि, कुभोजन, कार्य
की हानि, राजमूल से धन का व्यय।।७६।।
कारागृहप्रवेशं च पुत्रदारादिपीडनम् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।।७७।।
जेलयात्रा, पुत्र स्त्री को कष्ट होता है। २।७ भाव का स्वामी हो तो शरीर
में बाधा होती है।।७७।।
आत्मसम्बन्धिमरणं भविष्यति न संशयः ।
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।
स्वर्णदानं प्रकुर्वीत आरोग्यं भवति ध्रुवम् ।।७८।।
आत्मीय सम्बन्धि का मरण होता है। इस दोष में शान्ति के लिये
शिवसहस्रनाम का जप और सुवर्ण का दान करने से आरोग्यता होती है।।७८।।
इति शनिदशायामन्तर्दशाफलम्।
अथबुधदशायांबुधान्तर्दशाफलम्-
मुक्ताविद्रुमलाभश्च ज्ञानकर्मसुखादिकम् ।
विद्यामहत्वं कीर्त्तिश्च नूतनप्रभुदर्शनम् ।।१।।
बुध की दशा में बुध के अन्तर में मुक्ता (मोती) मूङा का लाभ, ज्ञान, सत्कर्म,
लाभादि, विद्या का महत्व, कीर्त्ति, नये स्वामी का दर्शन।।१।।
विभवं दारपुत्रादिपितृमातृसुखोवहम् ।
नीचोग्रखेटसंयुक्ते षष्ठाष्टव्ययराशिगे ।।२।।
वैभव और स्त्री, पुत्र पिता का सुख होता हैं। यदि अपनी नीचराशि उग्रग्रह
से युक्त हो वा ६।८।१२ राशि में हो।।२।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५१७
पापयुक्तेऽथवा दृष्टे धनधान्यपशुक्षयम् ।
आत्मबन्धुविरोधं च शूलरोगादिसम्भवम् ॥३॥
पापयुक्त वा पापदृष्ट हो तो धन धान्य पशु का नाश, आत्मीय बन्धु से विरोध,
शूलरोगादि की सम्भावना॥३॥
राजकार्यकलापेन व्याकुलो भवति ध्रुवम् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु दारक्लेशो भविष्यति ॥४॥
और राजकार्य के सम्बन्ध से व्याकुलता होती है। २ वा ७ भाव का स्वामी
हो तो स्त्री को कष्ट॥४॥
आत्मसंबन्धिमरणं वातशूलादिसम्भवम् ।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ॥५॥
आत्मीय सम्बन्धी की मृत्यु औरै बातशूलादि रोगों की सम्भावना होती है।
इस दोष की शान्ति के लिये विष्णु सहस्र नाम का जप करना चाहिये॥५॥
बुधस्यान्तर्गते केतौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे लग्नाधिपसमन्विते ॥६॥
बुध की दशां में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में शुभग्रह से युक्त वा दृष्ट वा
लग्नेश से युक्त॥६॥
यीगकारकसम्वन्धे दायेशात्केन्द्रलाभगे ।
देहसौख्यं धनाल्पत्वं बन्धुस्नेहसहायकृत् ॥७॥
वा योगकारक से सम्बन्ध करते हुये दशेश से केन्द्र वा लाभ भाव में स्थित
केतु के अन्तर में देह का सुख, धन की अल्पता, बन्धुओं का स्नेह और
सहायता॥७॥
चतुष्पाज्जीवलाभः स्यात्संसारे देहसौख्यभाक् ।
विद्याकीर्त्तिप्रसंगश्च समानप्रभुदर्शनम् ॥८॥
चतुष्पद जीव का लाभ, देह सुखं, विद्या, और यश का प्रसंग अपने समान
स्वामी का दर्शन॥८॥
भोजनाम्बरसौख्यं च ह्यादौ मध्ये सुखावहम् ।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्ययेवा पापसंयुते ॥९॥
भोजन-वस्त्र, सुख पहले होता है मध्य में सुख होता है। दशेश से ६।८।१२
भाव में पापग्रह से युत हो तो॥९॥

५१८ वृहतपाराशरहोराशास्त्रम् ।
वाहनात्पतनं चैव पुत्रक्लेश समायुतम् ।
चौरादिराजभीतिश्च पापकर्मरतः सदा ।।१०।।
वाहन से पतन, पुत्र कष्ट से युक्त, चौर आदि से तथा राजा से भय, सदा
पापकर्म में रत।।१०।।
वृश्चिकादिविषाद्भीतिर्नीचैः कलहसंयुतः ।
शोकरोगादि दुःखं च संसाराद्विचलं भवेत् ।।११।।
वृश्चिक (बिच्छू) आदि जहरीले जानवरों के विष से भय, नीचों से झगड़ा,
शोक-रोग आदि दुःखों से युक्त और संसार से विचलित होता है।।११।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं छागदानं तु कारयेत् ।।१२।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर में जड़ता होती है। इसके शान्त्यर्थ
बकरी का दान करना चाहिये।।१२।।
अथबुधदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम् -
सौम्यस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रे लाभत्रिकोणगे ।
सत्कथापुण्यं धर्मादिसंग्रहः पुण्यकर्मकृत् ।।१३।।
'बुध की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में गये हुये शुक्र के अन्तर में
अच्छी कथा, पुण्य धर्मादि का संग्रह, पुण्य कर्म ।।१३।।
मित्रप्रभुवशादिष्टं क्षेत्रलाभः सुखं भवेत् ।
दशाधिपात्केन्द्रगतस्त्रिकोणे लाभगेऽपिवा ।।१४।।
मित्र और स्वामी के इष्ट की सिद्धि, क्षेत्र का लाभ, सुख दशेश से केन्द्र वा
लाभ वा त्रिकोण में हो तो।।१४।।
तत्काले श्रियमाप्नोति राजश्री धनसम्पदः ।
वापीकूपतडागादि दानधर्मादिसंग्रहः ।।१५।।
तत्काल धन का लाभ, राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति, वापी, कूप, तालाब, दान,
धर्म आदि का संग्रह।।१५।।
व्यवसायात्फलाधिक्यं धनधान्यसमृद्धिकृत् ।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रस्तेव्यये वा बलवर्जिते ।।१६।।
व्यवसाय से अधिक लाभ और धन-धान्य समृद्धि का लाभ होता है। दशेश -
से ६।८।१२ भाव में निर्बल हो तो।।१६।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५१९
हृद्रोगो मानहानिश्च ज्वरातीसारपीडनम् ।
आत्मबन्धुवियोगश्च संसारे देहनिष्प्रभम् ।।१७।।
हृदय का रोग, मानहानि, ज्वर अतिसार की पीड़ा, आत्मीय बन्धु का वियोग,
संसार से विरूपता।।१७।।
आत्मक्लेशं मनस्तापमापदादि विपत्तयः ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादेवी जपं चरेत् ।।१८।।
अपने को क्लेश, मनमें संताप आदि विपत्तियाँ होती हैं। दूसरे वा सातवें
भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ दुर्गा देवी
का जप कराना चाहिये।।१८।।
अथ बुधदशायांसूर्यान्तर्दशाफलम्-
सौम्यस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे ।
त्रिकोणे धनलाभेषु तुङ्गांशे स्वांशगेऽपिवा ।।१९।।
बुध की दशा में अपनी उच्च, अपनी राशि, त्रिकोण वा धन वा लाभ वा
उच्चांश वा अपने नवांश में गये हुये सूर्य के अन्तर में।।१९।।
राजप्रसादसौभाग्यं मित्रप्रभुवशात्सुखम् ।
भूम्यात्मजेन संदृष्टे आदौ भूलाभमेव च ।।२०।।
राजा की प्रसन्नता का सौभाग्य, मित्र और स्वामी के द्वारा महासुख का लाभ
होता है। भौम से देखा जाता हो तो प्रथम भूमि का लाभ होता है।।२०।।
लग्नाधिपेन संदृष्टे बहुसौख्यं धनागमम् ।
ग्रामभूम्यादिलाभं च भोजनाम्बरसौख्यकृत् ।।२१।।
लग्नेश से दृष्ट हो तो बहुत सुख और धन का आगम, ग्राम, भूमि का लाभ
और भोजन वस्त्र का सुख होता है।।२१।।
षष्ठाष्टमव्यये वापि शन्यरफणिसंयुते ।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते ।।२२।।
यदि सूर्य ६।८।१२ भाव में शनि भौम राहु से युत हो वा दशेश से ६।८।१२
भाव में निर्बल होतो।।२२।।
चौराग्निशस्त्रपीडा च पित्ताधिक्यं भविष्यति ।
शिरोरूङ्मनसस्तापं इष्टबंधु वियोगकृत् ।।२३।।

५२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
चोर, अग्नि, शस्त्र से पीड़ा और अधिक पित्त होता है। शिर में रोग, मनमें
संताप, इष्ट बंधु का वियोग होता है।।२३।।
द्वितीयसप्तमाधीशे ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं शान्तिं कुर्याद्यथाविधि ।
सूर्यप्रीतिकरीं चैव दद्याद्धेनुं हिरण्यकम् ।।२४।।
२।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है! इसके शान्त्यर्थ
यथाविधि सूर्य के प्रसन्न करने वाली शान्ति करनी चाहिये और गौ तथा सुवर्ण का
दान करना चाहिये।।२४।।
अथ बुधदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् -
सौम्यस्यान्तर्गते चन्द्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्ष्मे वापि गुरुदृष्टिसमन्विते ।।२५।।
बुध की महादशा में लग्न-से केन्द्र वा त्रिकोण में अपने उच्च में वा अपनी
राशि में गुरु से देखे जाते हुये।।२५।।
योगस्थानाधिपत्येन योगप्राबल्यमादिशेत् ।
स्त्रीलाभं पुत्रलाभं च वस्त्रवाहनभूषणम् ।।२६।।
योगस्थान के अधिपति होने से योग प्रबल होता है, ऐसे चन्द्रमा के अन्तर
में स्त्री का लाभ, पुत्र का लाभ और वस्त्र, वाहन, आभूषण का लाभ।।२६।।
नूतनालयलाभं च नित्यं मिष्टान्नभोजनम् ।
गीतवाद्यप्रसंगश्च शास्त्रविद्याप्रशंसनम् ।।२७।।
नूतन गृह का लाभ नित्य मिष्टान्न का भोजन होता है। गाना-बाजा का सुख,
शास्त्र विद्या की प्रशंसा।।२७।।
दक्षिणांदिशमाश्रित्य प्रयाणं च भविष्यति ।
द्विपान्तरादि वस्त्राणां लाभश्चैवभविष्यति ।।२८।।
दक्षिण दिशा की यात्रा, द्वीपान्तर के वस्त्रों का लाभ।।२८।।
मुक्ताविद्रुमरत्नानि धौतवस्त्रादिलाभदम् ।
नीचारिक्षेत्रसंयुक्ते देहबाधा भविष्यति ।।२९।।
मुक्ता, मूङ्गा का लाभ और धौत वस्त्र का लाभ होता है। अपने नीच वा शत्रु
की राशि में स्थित हो तो शरीर में बाधा होती है।।२९।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२१
दायेशात्केन्द्रकोणस्थे दुश्चिक्ये लाभगेऽपिवा ।
तद्भुक्त्यादौ पुण्यतीर्थस्थानदैवतदर्शनम् ।।३०।।
दशेश से केन्द्र वा कोण वा तीसरे वा एकादश भाव में हो तो उसके अन्तर
के प्रारम्भ में पुण्यतीर्थ स्थान और देवता का दर्शन।।३०।।
मनोधैर्यं हृदुत्साहं विदेशेधनलाभकृत् ।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा पापसंयुते ।।३१।।
मन में धैर्य, हृदय में उत्साह और विदेश से धन का लाभ होता है। यदि
चन्द्रमा दशेश से ६ या ८ या १२ भाव में पापग्रह से युत हो तो।।३१।।
चौराग्निनृपभीतिश्च स्त्रीसंगेगमनंतथा ।
दुष्कृतिर्धनहानिश्च कृषिगोऽश्वादिनाशनम् ।।३२।।
चोर, अग्नि, राजा से भय, स्त्री संग में यात्रा, दुष्कीर्त्ति और धन की हानि,
कृषि, गौ, घोड़ा की हानि होती है।।३२।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुगंदेवी जपं चरेत् ।
वस्त्रदानं प्रकुर्वीत आयुर्वृद्धिसुखावहम् ।।३३।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर की बाधा होती है। इस दोष की शान्ति
के लिये दुर्गा देवी का जप करना चाहिये। आयु वृद्धि और सुख के लिये वस्त्र का
दान करना चाहिये।।३३।।
अथ बुधदशायां भौमान्तर्दशाफलम्-
सौम्यस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वर्क्ये भौमे लग्नाधिपसमन्विते ।।३४।।
बुध की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा अपने उच्च वा अपनी राशि
में लग्नेश से युत भौम के अन्तर में।।३४।।
राजानुग्रह शान्तिं च गृहे कल्याण संभवम् ।
लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि नष्टराज्यार्थलाभकृत् ।।३५।।
राजा की कृपा, शान्ति, गृह में कल्याण और लक्ष्मी की प्रसन्नता के चिह्न,
नष्ट हुये राज्य तथा धन का लाभ।।३५।।
पुत्रोत्सवादिसंतोषं गृहे गोधनसंकुलम् ।
गृहक्षेत्रादिलाभं च गजवाजिसमन्वितम् ।।३६।।

५२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
पुत्रोत्सव, गोधन की वृद्धि हाथी घोड़े के साथ गृहभूमि का लाभ।।३६ ।।
राजप्रीतिकरं चैव स्त्रीसौख्यं चातिशोभनम् ।
नीचक्षेत्रसमायुक्ते ह्यष्टमे वा व्ययेऽपिवा ।।३७।।
राजा की प्रसन्नता और स्त्री का सुख प्राप्त होता है। यदि भौम नीच राशि
में आठवें या बारहवें भाव में।।३७।।
पापदृष्टियुते वापि देहपीडा मनोव्यथा ।
उद्योगभङ्गो देशादौ स्वग्रामे धान्यनाशनम् ।।३८।।
पापग्रह से दृष्ट वा युत हो तो शरीर में पीड़ा, मानसिक कष्ट, देश में उद्योग
की हानि और अपने ग्राम में धान्य की हानि।।३८।।
ग्रन्थिशस्त्रव्रणादीनां भयंतापज्वरादिकम् ।
दायेशात्केन्द्रगे भौमे त्रिकोणे लाभगेऽपिवा ।।३९।।
ग्रन्थि, शस्त्र, व्रण आदि का भय, तापज्वर आदि होता है। दशेश से केन्द्र
वा त्रिकोण वा लाभ में भौम हो।।३९।।
शुभदृष्टेश्च सम्प्राप्तिर्देहसौख्यं धनागमम् ।
पुत्रलाभं यशोवृद्धिं मातृवर्गो महाप्रियः ।।४०।।
शुभग्रह से दृष्ट हो तो द्रव्य की प्राप्ति, देहसुख, पुत्र का लाभ, यश की वृद्धि
और भाइयों से प्रीति होती है।।४०।।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।
तद्भुक्त्यादौ महाक्लेशं भ्रातृवर्गे महद्भयम् ।।४१।।
दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युक्त भौम हो तो अन्तर के आरम्भ
में महाक्लेश, भाइयों से भय।।४१।।
नृपाग्निचौरभीतिश्च पुत्रमित्रविरोधनम् ।
स्थानभ्रंशं महद्वैरं मध्ये सौख्यं धनागमम् ।।४२।।
राजा, अग्नि, चोर का भय, पुत्र-मित्र से विरोध, स्थान की हानि, महावैर
होता है, मध्य में सुख और धन का आगम।।४२।।
अंते तु राजभीतिः स्यात्स्थानभ्रंशोह्यथापिवा ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युभयं भवेत् ।
अनड्वाहं प्रकुर्वीत मृत्युंजय जपं चरेत् ।।४३।।
और अंत में राजभय, स्थान की हानि होती है। दूसरे या सातवें भाव के

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२३
स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। बैल का दान और मृत्युंजय का जप कराना
चाहिये।।४३।।
अथ बुधदशायांराह्वन्तर्दशाफलम्-
बुधस्यान्तर्गते राहौ केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
कुलीरे मकरे वापि कन्यायां वृषभेऽपि वा ।।४४।।
बुध की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में वा कर्क वा मकर वा कन्या
वा वृष राशि में गये हुये राहु के अन्तर में।।४४।।
राजसम्मानकीर्त्तिं च धनंधान्यं भविष्यति ।
पुण्यतीर्थस्थानलाभं देवतादर्शनं तथा ।।४५।।
राजा से सम्मान, कीर्ति, धन धान्य का लाभ, पुण्यतीर्थ का लाभ, देवता
का दर्शन।।४५।।
इष्टापूर्त्ते च महतो मानश्चाम्बरलाभकृत् ।
भुक्त्यादौ देहपीडा च अंते सौख्यं विनिर्दिशेत् ।।४६।।
यज्ञ और मान, वस्त्र का लाभ होता है। अंतर के आदि में देह पीड़ा और
अन्त में सुख होता है।।४६।।
लग्गाद्युपचये राहौ शुभग्रहसमन्विते ।
राजसंलापसन्तोषं नूतनप्रभुदर्शनम् ।।४७।।
लग्न से उपचय (३।६।१०।११) स्थान में शुभग्रह से युक्त राहु हो तो राजा
से सम्मान संतोष और नवीन स्वामी का दर्शन होता है।।४७।।
षष्ठाष्टव्ययराशिस्थे तद्भुक्तौ धननाशनम् ।
भुक्त्यादौ देहनाशं च वातज्वरमजीर्णकृत् ।।४८।।
यदि राहु ६।८।१२ भाव में हो तो उसके अंतर के आरम्भ में धन का नाश,
देह का नाश, वात ज्वर अजीर्ण से होता है।।४८।।
दायेशात्षष्ठरिःफेवा ह्यष्टमे पापसंयुते ।
निष्ठुरं राजकार्याणि स्थानभ्रंशोमहद्भयम् ।।४९।।
दशेश से ६।१२।८ भाव में पापग्रह से युत हो तो कड़े राजकार्य, स्थान
की हानि, महाभय।।४९।।
बंधनं रोगपीडा च आत्मबन्धु मनोव्यथा ।
हृद्रोगो मानहानिश्च धनहानिर्भविष्यति ।।५०।।

५२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
बंधन, रोगापीड़ा, आत्मीय बंधु को मानसिक कष्ट, हृदय रोग, धन की हानि,
मानहानि और धनहानि होती है॥५०॥
द्वितीयसप्तमस्थे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गालक्ष्मीजपं चरेत् ।
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यदायिनीम् ॥५१॥
२ वा ७ भाव में हो तो अपमृत्यु होती है। इस दोष की शान्ति के लिये
दुर्गा लक्ष्मी का जप करना चाहिये और आयु और आरोग्यता को देने वाली श्वेत
गौ और भैंस का दान करना चाहिये॥५१॥
अथ बुधदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम्-
बुधस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्षेंगे वापि लाभे वा धनराशिगे ॥५२॥
बुध की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा अपने उच्च वा अपनी राशि
वा लाभ वा दूसरे स्थान में गये हुये गुरु के अन्तर में॥५२॥
देहसौख्यं धनावाप्तिं राजप्रीतिं तथैव च ।
विवाहोत्सवकार्याणि नित्यमिष्टान्नभोजनम् ॥५३॥
देहसुख, धन की प्राप्ति, राजा से प्रेम, घिवाहोत्सव, नित्य मिष्टान्न का
भोजन॥५३॥
गोमहिष्यादिलाभं च पुराणश्रवणादिकम् ।
देवतागुरुभक्तिश्च दानधर्ममखादिकम् ॥५४॥
देवता गुरु में भक्ति, दान, धर्म, गौ, भैंस आदि का लाभ, पुराण आदि का
श्रवण॥५४॥
यज्ञकर्मप्रवृद्धिं च शिवपूजाफलं तथा ।
दायेशात्केन्द्रकोणेवा लाभे वा बलसंयुते ॥५५॥
यज्ञ की वृद्धि शिवपूजन का फल होता है। दशेश से केन्द्र वा कोण वा लाभ
स्थान में बली हो तो॥५५॥
बंधुपुत्रहृदुत्साहं शुभं शोभनसंयुतम् ।
पशुवृद्धियशोलाभमन्नदानादिकं फलम् ॥५६॥
बंधु पुत्र का सुख हृदय में उत्साह और शुभ फल, पशु वृद्धि, यश का लाभ,
अन्न दानादि फल होते हैं॥५६॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः ॥ ५२५
नीचे वास्तंगते वापि षष्ठाष्टव्ययगेऽपिवा ।
शन्र्यारफणिसंयुक्ते कलहोराजविग्रहम् ॥५७॥
यदि गुरु अस्त हो वा ६।८।१२ में हों शनि, भौम राहु से युक्त हो तो कलह,
राजा से विरोध ॥५७॥
चौरादिदेहपीडा च पितृमातृविनाशनम् ।
दायेशात्षष्ठरंध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ॥५८॥
चोर आदि से शरीर में पीड़ा पिता माता का नाश होता है। दशेश से ६।८।१२
में निर्बल हो तो ॥५८॥
अङ्गतापश्च वैकल्यं देहबाधा भविष्यति ।
कलत्रबंधुवैषम्यं राजकोपो धनक्षयः ॥५९॥
शरीर में ताप, अङ्ग में विकलता, देह में बाधा, स्त्री बंधु से बैर, राजकोप,
धन की हानि ॥५९॥
अकस्मात्कलहाद्भीतिः प्रमादो राजविद्विषम् ।
द्वितीय सप्तमस्थे वा देहबाधा भविष्यति ॥६०॥
अकस्मात् कलह से भय प्रमाद से राजा से शत्रुता होती है। २।७ भाव में
हो तो शरीर बाधा होती है॥६०॥
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।
गोभूहिरण्‍यदानेन सर्वानिष्टं प्रणश्यति ॥६१॥
इस दोष के परिहार के लिये शिवसहस्रनाम का जप और गौ, भूमि, सोना
के दान से सभी अरिष्ट नष्ट हो जाते हैं॥६१॥
अथ बुधदशायांशन्‍यन्तर्दशाफलम् -
सौम्यस्यान्तर्गतेमन्दे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे ।
त्रिकोणलाभगे वापि गृहे कल्याणवर्धनम् ॥६२॥
बुध की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण में वा लाभ
में गये हुये शनि के अन्तर में गृह में कल्याण की वृद्धि॥६२॥
राज्यलाभं महोत्साहं गृहे गोधनसंकुलम् ।
शुभस्थानफलावाप्तिं तीर्थादौ भ्रमणं तथा ॥६३॥
राज्य का लाभ, अत्यंत उत्साह, गौ, धन की वृद्धि, शुभ स्थान की प्राप्ति,
तीर्थ आदि में भ्रमण होता है॥६३॥

५२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
षष्ठाष्टमव्यये मन्दे दायेशाद्वा तथैव च ।
अरातिदुःखबाहुल्यं दारपुत्रादिपीडनम् ।।६४।।
६।८।१२ भाव में शनि हो दशेश से भी इन्हीं स्थानों में हो तो शत्रु...
अधिक दुःख, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा।।६४।।
बुद्धिभ्रंशं बंधुनाशं कर्मनाशं मनोरूजम् ।
विदेशगमनंचैवदुःस्वप्नस्यप्रदर्शनम् ।।६५।।
बुद्धि का नाश, बंधु का नाश, कर्म का नाश, मन में दुःख, विदेश यात्रा,
दुःस्वप्नों का दर्शन होता है।।६५।।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजय जपं चरेत् ।
कृष्णां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धिनम् ।।६६।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष की
शान्ति के लिये काली गौ और भैंस का दान आयु आरोग्यता की वृद्धि के लिये
देना चाहिये।।६६।।
इति बुधदशायामन्तर्दशाफलम्।
अथ केतुदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्-
केन्द्रे त्रिकोणलाभे वा लग्नाधिपसमन्विते ।
भाग्यकर्मेशसम्बन्धे वाहनेशसमन्विते ।।१।।
केतु की दशा में केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ स्थान में लग्नेश से युत वा भाग्येश
कर्मेश से अच्छे सम्बन्ध से युक्त वाहनेश से युत केतु के अन्तर में।।१।।
तद्भुक्तौ धनधान्यादि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।
पुत्रदारादिसौख्यं च राजप्रीति मनोरूजः ।।२।।
धन धान्य से युक्त चतुष्पद जीव का लाभ, पुत्र स्त्री का सुख, राजा से प्रेम
मानसिक कष्ट।।२।।
ग्रामभूम्यादिलाभश्च गृहं गोधनसंकुलम् ।
नीच ऽखेटसंयुक्ते ह्राष्टमे व्ययगेऽपिवा ।।३।।
ग्राम भूमि आदि का लाभ और घर गोधन से परिपूर्ण होता है। नीच बा अस्त
में गये हुये ग्रह से युक्त हो वा आठवें वा बारहें भाव में हो तो ।।३।।
हृद्रोगं मानहानिं च धनधान्यपशुक्षयम् ।
दारपुत्रादिपीडां च मनश्चांचल्यमेव च ।।४।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२७
हृदयरोग, मानहानि, धन धान्य और पशु का नाश, स्त्री, पुत्र आदि को पीड़ा,
मनमें चंचलता होती है।।४।।
द्वितीयद्यूननाथेन सम्बन्धे तत्र संस्थिते ।
अनारोग्यं महत्कष्टमात्मबंधुवियोगकृत् ।
दुर्गादेवी जपं कुर्यान्मृत्युंजय जपं चरेत् ।।५।।
दूसरे वा सातवें भाव के स्वामी से सम्बंध करता हुआ स्थित हो तो रोगयुक्त,
महाकष्ट और आत्मीय बन्धु का वियोग होता है दुर्गा और मृत्युंजय का जप कराना
चाहिये।।५।।
अथ केतुदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्-
केतोरन्तर्गते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा राज्यनाथेनसंयुते ।।६।।
केतु की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ
में कर्मेश से युक्त शुक्र के अन्तर में।।६।।
राजप्रीतिं च सौभाग्यं राज्यात्स्वाम्बरसंकुलम् ।
तत्काले श्रियमाप्नोति भाग्यकर्मेशसंयुते ।।७।।
राजा से प्रेम, सौभाग्य, राज्य से वस्त्रादि का लाभ होता है। यदि भाग्येश
कर्मेश से युत हो तो।।७।।
नष्टराज्यधनप्राप्तिंसुखवाहनमुत्तमम् ।
सेतुस्नानादिकं चैव देवतादर्शनंमहत् ।।८।।
तत्काल लक्ष्मी की प्राप्ति, नष्ट हुये राज्य का लाभ, धन का लाभ, सुख उत्तम
वाहन का लाभ, समुद्रस्नान का लाभ देवता का दर्शन।।८।।
महाराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ।।९।।
और महाराज की प्रसन्नता से ग्रामभूमि आदि का लाभ होता है। दशेश से
केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे वा लाभ में हो तो।।९।।
देहारोग्यं शुभं चैव गृहेकल्याणशोभनम् ।
भोजनाम्बरभूपाप्तिमश्वदोलादिलाभकृत् ।।१०।।
देह आरोग्य, शुभफल, गृह में कल्याण, भोजन, वस्त्र, राजा से प्रेम, अश्व
आदि का लाभ होता है।।१०।।

दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।
अकस्मात्कलहंचैव पशुधान्यादिपीडनम् ।।९१।।
दशेश से ६।८।१२ भाव में पापयुक्त हो तो अकस्मात् कलह, पशु, धान्य
आदि की हानि होती है।।९१।।
नीचस्थखेटसंयुक्ते लग्नात्षष्ठाष्टराशिगे ।
स्वबन्धुजनवैषम्यं शिराक्षिब्रणपीडनम् ।।९२।।
नीच में गये हुये ग्रह से युक्त हो और लग्न से ६ वा ८ भाव में हो तो आत्मीय
बन्धुओं से शत्रुता, नख, नेत्र व्रण आदि से पीडा।।९२।।
हृद्रोगं मानहानिं च धनधान्यपशुक्षयम् ।
कलत्रपुत्रपीडाप्तस्संचारं देहरोगयुक् ।।९३।।
हृदय रोग, मानहानि, धन धान्य पशु का नाश, स्त्री, पुत्र के रोगी होने का
भय शरीर में रोग होता है।।९३।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं मनोरूजम् ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुगदिवीजपं चरेत् ।
श्वेतां गां च महिषीं दद्यादारोग्यप्रदायिनीम् ।।९४।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो देह में जड़ता और मानसिक रोग होता है।
इस दोष के शान्त्यर्थ दुर्गा देवी का जप करना चाहिये और आरोग्य देने वाली सफेद
गौ और भैंस का दान करना चाहिये।।९४।।
अथ केतुदशायां सूर्य्यान्तर्दशाफलम् -
केतोरन्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपिवा ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा शुभग्रहनिरीक्षिते ।।९५।।
केतु की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण में लाभ
में शुभग्रह से देखे जाते हुये सूर्य के अन्तर में।।९५।।
धनधान्यादिलाभश्च राजानुग्रहवैभवम् ।
अनेकशुभकार्याणि चेष्टासिद्धिः सुखावहा ।।९६।।
धन धान्यादि का लाभ, राजा की कृपा से वैभव का लाभ, अनेक शुभ कार्य
और सुखकर अभीष्ट की सिद्धि होती है।।९६।।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनसंस्थिते ।
देहसौख्यं कार्यलाभं पुत्रलाभं मनोदृढम् ।।९७।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२९
दशेश से केन्द्र वा कोण वा लाभ वा दूसरे भाव में हो तो देह-सुख, धन
का लाभ, पुत्र लाभ और मन में दृढ़ता।।१७।।
यातुः कार्यार्थसिद्धि स्यात्स्वल्पग्रामाधिपत्ययुक् ।
षष्ठाष्टव्ययराशिस्थे पापग्रहसमन्विते ।।१८।।
तथा यात्रा में कार्य और धन की सिद्धि और छोटे ग्राम की स्वामिता होती
है। यदि सूर्य ६।८।१२ भाव में हो पापग्रह से युक्त हो तो।।१८।।
तद्भुक्तौ राजभीतिश्च पितृमातृवियोगकृद् ।
विदेशगमनं चैव चौराहिविषपीडनम् ।।१९।।
अंतर में राजभय और पिता माता का वियोग, विदेशयात्रा, चोर सर्प विष
से पीड़ा।।१९।।
राजमित्रविरोधश्च राजदंडाद्धनक्षयः ।
शोकरोगभयं चैव उष्णाधिक्यं ज्वरोभवेत् ।।२०।।
राजा मित्र से विरोध, राजदंड से धन का नाश, शोक रोग का भय, अधिक
ताप से युक्त ज्वर होता है।।२०।।
दायेशादष्टरिःफेवा षष्ठे वा पापसंयुते ।
अन्नविघ्नो मनोभीतिर्धनधान्यपशुक्षयः ।।२१।।
दशेश से ८।१२।६ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो अन्न प्राप्ति में बाधा,
मनमें भय, धन-धान्य, पशु का नाश होता है।।२१।।
आदौ मध्ये महाक्लेशमन्ते सौख्यं विनिर्दिशेत् ।
द्वितीयसप्तमाधीशे ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तस्यशान्तिं प्रकुर्वीत स्वर्णधेनुं प्रदापयेत् ।।२२।।
आदि और मध्य में महाक्लेश तथा अन्त में सुख होता है। २ वा ७ भाव
का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति करनी चाहिये और सुवर्ण
की गौ का दान करना चाहिये।।२२।।
अथ केतुदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् -
केतोरन्तर्गते चन्द्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रराशिगे ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वां धने सुखसमन्विते ।।२३।।
केतु की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ
स्थान वा धन वा सुख स्थान में गये हुये चंद्रमा के अंतर में।।२३।।

५३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
राजप्रीतिर्महोत्साहः कल्याणं च महत्सुखम् ।
महाराजप्रसादेन गृहभूम्यादिलाभकृत् ।।२४।।
राजा से प्रीति बड़ा उत्साह, कल्याण और बड़ा सुख, महाराजा की प्रसन्नत
से गृह-भूमि का लाभ।।२४।।
भोजनाम्बरपश्वादि व्यवसायेऽधिकं फलम् ।
अश्ववाहनलाभश्च वस्त्राभरणभूषणम् ।।२५।।
भोजन, वस्त्र, पशु आदि के व्यवसाय में अधिक लाभ होता है। अश्व वाहन
का लाभ, वस्त्र आभूषण का लाभ।।२५।।
देवालयतडागादिपुण्यधर्मादिसंग्रहम् ।
पुत्रदारादिसौख्यं च पूर्णचन्द्रस्तथैव च ।।२६।।
देवालय तालाब आदि पुण्य धार्मिक कार्यों का संग्रह, पुत्र, स्त्री आदे का
सुख पूर्णचंद्र के होने से होता है।।२६।।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा बलसंयुते ।
कृषिगोभूमिलाभं च इष्टबन्धुसमागमम् ।।२७।।
दशेश से केंद्र कोण वा लाभ में बलीचंद्र हो तो कृषि, गौ, भूमि का लाभ,
इष्टबंधुओं का समागम।।२७।।
तामसात्कार्यसिद्धिं च गृहे गोक्षीरमेव च ।
भूकृत्यं शुभमारोग्यं मध्ये राजप्रियंशुभम् ।।२८।।
अंते तु राजभीतिं च विदेशगमनं तथा ।
दूरयात्रादिसञ्चारं सम्बंधिजनपूजनम् ।।२९।।
तामसी प्रकृति से कार्य की सिद्धि और घर में गोदुग्ध का सुख भूमिसंबंधि
कार्य, शुभ आरोग्यता मध्य में राजा से प्रेम, अंत में राजभय, विदेशयात्रा, दूर
यात्रा की सम्भावना और संबंधियों का पूजन होता है।।२९।।
नीचगे वा क्षीणगेचन्द्रे षष्ठाष्टव्ययराशिगे ।
आत्मसौख्यं मनस्तापं कार्यविघ्नं महद्भयम् ।।३०।।
यदि चन्द्रमा क्षीण हो और ६।८।१२ भाव में हो तो अपने सुख में मन
को सन्ताप, कार्य में विघ्न, महाभयं।।३०।।
पितृमातृवियोगं च देहजाड्यं मनोव्यथाम् ।
व्यवसायात्फलं नष्टं गोमहिष्यादिनाशकृत् ।।३१।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५३१
पिता माता का वियोग, देह में जड़ता, मन में व्यथा, व्यवसाय (रोजगार)
में असफलता, गौ-भैंस की हानि होती है।।३१।।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वां बलवर्जिते ।
धनधान्यादिहानिश्च मनोव्याकुलमेव च ।।३२।।
दशेश से ६।८।१२ में निर्बल चन्द्र हो तो धन-धान्य की हानि, मन में
व्याकुलता।।३२।।
स्वबंधुजनशत्रुत्वं मातृपीडा तथैव च ।
निधनाधिप दोषेण द्विसप्ताधिपसंयुते ।।३३।।
अपमृत्यु तस्य शान्तिं कुर्याद्यथाविधि ।
चन्द्रप्रीतिकरञ्चैव ह्यायुरारोग्य संभवम् ।।३४।।
अपने बंधुओं से शत्रुता, भाइयों से पीड़ा होती है। अष्टमेश हो और २।७
भाव के स्वामी से युत हो तो अपमृत्यु का भय होता है। उसकी शान्ति के लिये
चन्द्रमा के प्रसन्न होनेवाली और आयु आरोग्यता देनेवाली शान्ति करनी
चाहिये।।३४।।
अथकेतुदशायांभौमान्तर्दशाफलम्-
केतोरन्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणभे ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे भौमे शुभदृष्टियुतेक्षिते ।।३५।।
केतु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में वा अपने उच्च वा अपनी राशि
में शुभग्रह से दृष्ट वा युत भौम के अन्तर में।।३५।।
आदौ शुभफलं चैव ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
धनधान्यादिलाभश्च चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।।३६।।
पहले शुभफल, ग्राम, भूमि आदि का लाभ, धन, धान्य आदि का लाभ,
चतुष्पद जीव का लाभ।।३६।।
गृहारामक्षेत्रलाभं राजानुग्रह वैभवम् ।
भाग्यकर्मेशसम्बन्धे भूलाभं सौख्यमेव च ।।३७।।
गृह, बगीचा, क्षेत्र का लाभ, राजा की कृपा से वैभव का लाभ होता है। भाग्येश
कर्मेश से सम्बन्ध हों तो भूमि का लाभ और सुख होता है।।३७।।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपिवा ।
राजप्रीति यशोलाभं पुत्रमित्रादि सौख्यकृत् ।।३८।।

५३२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
दशेश से केन्द्र वा कोण वा तीसरे वा लाभ में हो तो राजा से प्रेम, यश
का लाभ; और पुत्र मित्र आदि का सुख होता है ॥३८॥
षष्ठाष्टमव्यये भौमे दायेशाद्धनगेऽपि वा ।
द्रुतं करोति मरणं विदेशेचापदं भ्रमम् ॥३९॥
यदि भौम ६।८।१२ स्थान में वा दशेश से २ स्थान में हो तो शीघ्र ही
मृत्यु होती है॥३९॥
प्रमेहमूत्रकृच्छ्रादिचौराहिनृपपीडनम् ।
कलहादौ व्यथायुक्तं किंचित्सुखविवर्धनम् ॥४०॥
प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र आदि रोग, चौर-सर्प-राजा से पीड़ा, आदि में कलह और
व्यथा तथा कुछ सुख की वृद्धि होती है॥४०॥
द्वितीयद्यूननाथे तु तापज्वर विषाद्भयम् ।
दारपीडामनःक्लेशमपमृत्युभयं भवेत् ।
अनड्वाहं प्रदद्यात्तु सर्वसम्पत्सुखावहम् ॥४१॥
२।७ भाव के स्वामी हों तो ताप ज्वर और विष का भय, स्त्री को पीड़ा,
मन में क्लेश और अपमृत्यु का भय होता है। सभी सम्पत्ति और सुख प्राप्ति के
लिये वृष का दान करना चाहिये॥४१॥
अथ केतुदशायांशन्यन्तर्दशाफलम्–
केतोरन्तर्गते राहौ स्वोच्चे मित्रस्वराशिगे ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा दुश्चिक्ये धनसंज्ञके ॥४२॥
केतु की दशा में अपने उच्च वा मित्र के गृह वा अपनी राशि वा केन्द्र वा
कोण वा लाभ वा तीसरे भाव में गये हुये राहु के अन्तर में ॥४२॥
तत्काले धनलाभः स्यात्संसारे भवति ध्रुवम् ।
म्लेक्षप्रभुवशात्सौख्यं धनधान्यफलादिकम् ॥४३॥
तत्काल धन का लाभ होता है, म्लेक्ष राजा के वश से सुख, धन-धान्य आदि
का लाभ॥४३॥
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
भुक्त्यादौ क्लेशमाप्नोति मध्यान्ते सौख्यमाप्नुयात् ॥४४॥
चतुष्पद जीव का लाभ, ग्राम, भूमि आदि का लाभ होता है। अन्तर के आरम्भ
में कष्ट होता है मध्य और अन्त में सुख होता है॥४४॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५३३
रंध्रे वा व्ययगे राहौ पापसंदृष्टिसंयुते ।
बहुपुत्रं कृशं देहं शीतज्वरविषाद्भयम् ।।४५।।
यदि राहु ८।१२ भाव में पापग्रह से दृष्ट वा युत हो तो अनेक पुत्र होते
हैं। शरीर में दुर्बलता, शीत ज्वर और विष से भय।।४५।।
चातुर्थिकज्वरं चैव शूद्रोपद्रवपीडनम् ।
अकस्मात्कलहं चैव प्रमेहं शूलमेव च ।।४६।।
चौथिया ज्वर, शूद्र के उपद्रव से पीड़ा, अकस्मात्कलह, प्रमेह और शूलरोग
होता है।।४६।।
द्वितीयसप्तमस्थे वा यदा क्लेशं महद्भयम् ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुगदेवी जपं चरेत् ।
अयुतहोमश्च कर्त्तव्यः सर्वसौख्यप्रदायकः ।।४७।।
द्वितीय वा सातवें हों तो महा क्लेश और महा भय होता है। इस दोष के
शान्त्यर्थ दुर्गा देवी का जप और सभी सुख को देने वाला अयुत होम कराना
चाहिये।।४७।।
अथकेतुदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम्-
केतोरन्तर्गते जीवे केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वापि लग्नाधिपसमन्विते ।।४८।।
केतु की दशा में केन्द्र, लाभ वा त्रिकोण में वा उच्च वा अपनी राशि में वा
लग्नेश से युत गुरु के अन्तर में ।।४८।।
कर्मभाग्याधिपैर्युक्ते धनधान्यार्थसम्पदम् ।
राजप्रीतिं मनोत्साहमश्वांदोल्यादिलाभकृत् ।।४९।।
अथवा कर्मेश भाग्येश से युत गुरु के अन्तर में धन, धान्य आदि सम्पत्ति
का लाभ।।४९।।
गृहे कल्याण सम्पत्तिं पुत्रलाभं महोत्सवम् ।
पुण्यतीर्थ मनोत्साहं सत्कर्म च सुखावहम् ।।५०।।
गृह में कल्याण सम्पत्ति, पुत्रलाभ का उत्सव, पुण्यतीर्थ का दर्शन, मन में
उत्साह, अश्व-पालकी का लाभ, राजा से प्रेम, अच्छे कर्म, सुख।।५०।।
इष्टदेवप्रसादेन विजयं कार्यलाभकृत् ।
राजसंल्लापकार्याणि नूतन प्रभुदर्शनम् ।।५१।।