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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 800 में से

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पृष्ठ 525

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२७
हृदयरोग, मानहानि, धन धान्य और पशु का नाश, स्त्री, पुत्र आदि को पीड़ा,
मनमें चंचलता होती है।।४।।
द्वितीयद्यूननाथेन सम्बन्धे तत्र संस्थिते ।
अनारोग्यं महत्कष्टमात्मबंधुवियोगकृत् ।
दुर्गादेवी जपं कुर्यान्मृत्युंजय जपं चरेत् ।।५।।
दूसरे वा सातवें भाव के स्वामी से सम्बंध करता हुआ स्थित हो तो रोगयुक्त,
महाकष्ट और आत्मीय बन्धु का वियोग होता है दुर्गा और मृत्युंजय का जप कराना
चाहिये।।५।।
अथ केतुदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्-
केतोरन्तर्गते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा राज्यनाथेनसंयुते ।।६।।
केतु की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ
में कर्मेश से युक्त शुक्र के अन्तर में।।६।।
राजप्रीतिं च सौभाग्यं राज्यात्स्वाम्बरसंकुलम् ।
तत्काले श्रियमाप्नोति भाग्यकर्मेशसंयुते ।।७।।
राजा से प्रेम, सौभाग्य, राज्य से वस्त्रादि का लाभ होता है। यदि भाग्येश
कर्मेश से युत हो तो।।७।।
नष्टराज्यधनप्राप्तिंसुखवाहनमुत्तमम् ।
सेतुस्नानादिकं चैव देवतादर्शनंमहत् ।।८।।
तत्काल लक्ष्मी की प्राप्ति, नष्ट हुये राज्य का लाभ, धन का लाभ, सुख उत्तम
वाहन का लाभ, समुद्रस्नान का लाभ देवता का दर्शन।।८।।
महाराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ।।९।।
और महाराज की प्रसन्नता से ग्रामभूमि आदि का लाभ होता है। दशेश से
केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे वा लाभ में हो तो।।९।।
देहारोग्यं शुभं चैव गृहेकल्याणशोभनम् ।
भोजनाम्बरभूपाप्तिमश्वदोलादिलाभकृत् ।।१०।।
देह आरोग्य, शुभफल, गृह में कल्याण, भोजन, वस्त्र, राजा से प्रेम, अश्व
आदि का लाभ होता है।।१०।।