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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 800 में से

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पृष्ठ 527

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२९
दशेश से केन्द्र वा कोण वा लाभ वा दूसरे भाव में हो तो देह-सुख, धन
का लाभ, पुत्र लाभ और मन में दृढ़ता।।१७।।
यातुः कार्यार्थसिद्धि स्यात्स्वल्पग्रामाधिपत्ययुक् ।
षष्ठाष्टव्ययराशिस्थे पापग्रहसमन्विते ।।१८।।
तथा यात्रा में कार्य और धन की सिद्धि और छोटे ग्राम की स्वामिता होती
है। यदि सूर्य ६।८।१२ भाव में हो पापग्रह से युक्त हो तो।।१८।।
तद्भुक्तौ राजभीतिश्च पितृमातृवियोगकृद् ।
विदेशगमनं चैव चौराहिविषपीडनम् ।।१९।।
अंतर में राजभय और पिता माता का वियोग, विदेशयात्रा, चोर सर्प विष
से पीड़ा।।१९।।
राजमित्रविरोधश्च राजदंडाद्धनक्षयः ।
शोकरोगभयं चैव उष्णाधिक्यं ज्वरोभवेत् ।।२०।।
राजा मित्र से विरोध, राजदंड से धन का नाश, शोक रोग का भय, अधिक
ताप से युक्त ज्वर होता है।।२०।।
दायेशादष्टरिःफेवा षष्ठे वा पापसंयुते ।
अन्नविघ्नो मनोभीतिर्धनधान्यपशुक्षयः ।।२१।।
दशेश से ८।१२।६ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो अन्न प्राप्ति में बाधा,
मनमें भय, धन-धान्य, पशु का नाश होता है।।२१।।
आदौ मध्ये महाक्लेशमन्ते सौख्यं विनिर्दिशेत् ।
द्वितीयसप्तमाधीशे ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तस्यशान्तिं प्रकुर्वीत स्वर्णधेनुं प्रदापयेत् ।।२२।।
आदि और मध्य में महाक्लेश तथा अन्त में सुख होता है। २ वा ७ भाव
का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति करनी चाहिये और सुवर्ण
की गौ का दान करना चाहिये।।२२।।
अथ केतुदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् -
केतोरन्तर्गते चन्द्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रराशिगे ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वां धने सुखसमन्विते ।।२३।।
केतु की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ
स्थान वा धन वा सुख स्थान में गये हुये चंद्रमा के अंतर में।।२३।।