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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

४८६ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ।।२५७।।
२।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। काली गौ और भैंस
के दान करने से आरोग्यता का लाभ होता है।।२५७।।
अथराहुदशायां बुधान्तर्दशाफलम्-
राहोरन्तर्गते सौम्ये भाग्ये वा स्वक्षगेऽपिवा ।
तुङ्गे वा केन्द्रराशिस्थे पुत्रे वा लाभगेऽपिवा ।।२५८।।
राहु की दशा में भाग्य (९) वा अपनी राशि, अपने उच्च, केन्द्र, पंचम वा
एकादश में गये हुये।।२५८।।
राजयोगं प्रकुरुते गृहे कल्याणवर्धनम् ।
व्यापारेण धनप्राप्तिर्विद्यावाहनमुत्तमम् ।।२५९।।
बुध के अन्तर में राजयोग का उदय, नित्य कल्याण की वृद्धि, व्यापार से
धन लाभ, विद्या और वाहन का लाभ, विवाहोत्सव आदि कार्य, चतुष्पदों का लाभ
होता है।।२५९।।
विवाहोत्सवकार्याणि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।
सौम्यमासे महत्सौख्यं स्ववारे राजदर्शनम् ।।२६०।।
बुध के मास में महासुख और बुध के दिन राजा का दर्शन।।२६०।।
सुगन्धपुष्पशय्यादिस्त्रीसौख्यं चातिशोभनम् ।
महाराजप्रसादेन धनलाभो महद्यशः ।।२६१।।
सुगन्ध पुष्प, शय्या, और स्त्री का सुख होता है, महाराज के प्रसाद से धन
का लाभ और बड़ा यश होता है।।२६१।।
दायेशात्केन्द्रलाभे वा दुश्चिक्येः भाग्यकर्मगे ।
देहारोग्यं हृदुत्साहं इष्टसिद्धिः सुखावहा ।।२६२।।
दशेश से केन्द्र वा लाभ वा तीसरे वा ९।१० भाव में बुध शरीरारोग्यता,
हृदय में उत्साह, इष्टसिद्धि और सुख होता है।।२६२।।
पुण्यश्लोकादिकीर्त्तिश्च पुराणश्रवणादिकम् ।
विवाहो यज्ञदीक्षा च दानधर्मदयादिकम् ।।२६३।।
पुण्य-श्लोक, कीर्ति और पुराण श्रवण, विवाह, यज्ञ-दीक्षा दान-धर्म दया
आदि होता है।।२६३।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८७
षष्ठाष्टमव्यये सौम्ये मन्दराशियुतेक्षिते ।
दायेशात्षष्ठरिःफे वा रंध्रे वा पापसंयुते ॥२६४॥
६।८।१२ वें भाव में बुध हो और शनि की राशि में शनि से दृष्ट हो अथवा
दशेश से ६।१२।८ भाव में पापग्रह से युत हो तो ॥२६४॥
देवब्राह्मणनिन्दा च भोगभाग्यविहीनभाक् ।
सत्यहीनश्च दुर्बुद्धिश्चौराहिनृपपीडनम् ॥२६५॥
देवता-ब्राह्मण की निन्दा, भोगादि से विहीन, सत्य से हीन, दुर्बुद्धि का उदय,
चोर, सर्प राजा से पीड़ा होती है॥२६५॥
अकस्मात्कलहश्चैव गुरुपुत्रादि नाशनम् ।
अर्थव्ययो राजकोपो दारपुत्रादिपीडनम् ॥२६६॥
अकस्मात् कलह, गुरु पुत्र आदि का नाश, होता है। द्रव्य का व्यय, राजा
का कोप, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा होता है॥२६६॥
द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युं तयाऽश्रियम् ।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ।
स्वगृह्योक्तविधानेन शान्तिं कुर्याद्विचक्षणः ॥२६७॥
२।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु और दरिद्रता होती है। इस दोष के
शान्त्यर्थ विष्णुसहस्र नाम का जप और अपने शाखा के अनुसार शान्ति करना
चाहिये॥२६७॥
अथराहुदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्-
राहोरन्तर्गते केतौ भ्रमणं राजकृद्धनम् ।
वातज्वरादिरोगश्च चतुष्पाज्जीवहानिकृद् ॥२६८॥
राहु की दशा में केतु की अन्तर्दशा में भ्रमण और राजा से धन प्राप्ति और
वातज्वर आदि रोग, चतुष्पदजीवों की हानि होती है॥२६८॥
अष्टमाधिपसंयुक्ते देहजाड्यं मनोरुजम् ।
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे देहसौख्यं धनागमः ॥२६९॥
अष्टमेश से युत हो तो शरीर में जड़ता और मानसिक कष्ट होता है। शुभग्रह
से युत और दृष्ट हो तो सुख और धन का लाभ होता है॥२६९॥

४८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
राजसन्मानभूप्राप्तिर्गृहे शुभकरो भवेत् ।
लग्नाधिपेन सम्बन्धे इष्टसिद्धिः सुखावहा ॥२७०॥
राजा से सन्मान, धन, भूमि का लाभ और गृह में शुभ कार्य होंगे लग्नेश हो
सम्बंध होने से इष्ट सिद्धि होती है॥२७०॥
लग्नाधिपसमायुक्ते लाभोवा भवति ध्रुवम् ।
चतुष्पाज्जीवलाभः स्यात्केन्द्रे वाथ त्रिकोणगे ॥२७१॥
लग्नेश से सम्बन्ध हो तो अभीष्ट की सिद्धि और सुख होता है। यदि लग्नेश
से युत हो तो धन का लाभ होता है। केन्द्र त्रिकोण में रहने से चतुष्पद का लाभ
होता है॥२७१॥
रन्ध्रस्थानगते केतौ व्यये वा वलवर्जित ।
तद्भुक्तौ बहुरोगः स्याच्चौराग्निव्रणपीडनम् ॥२७२॥
८।१२ स्थान में निर्बल केतु हो तो उसके अन्तर में अनेक रोग, चोर, अग्नि
और फोड़ा से पीड़ा॥२७२॥
पितृमातृवियोगश्च भ्रातृद्वेषं मनोरुजम् ।
स्वप्रभोश्च महाकष्टं वैषम्यं चित्तहिंसकम् ॥२७३॥
पिता माता से वियोग, भाई से द्वेष, मानसिक कष्ट होता है और अपने मालिक
से बैर और उससे कष्ट होता है॥२७३॥
द्वितीयद्युनाथे तु देहवाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं छागदानं च कारयेत् ॥२७४॥
२।७ भाव का स्वामी हो तो शरीर में बाधा होती है। इसके शान्त्यर्थ बकरी
का दान करना चाहिये॥२७४॥
अथराहुदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्-
राहोरन्तर्गते शुक्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
लाभे वा वलसंयुक्ते योगप्रावल्यमादिशेत् ॥२७५॥
राहु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा एकादश स्थान में बलवान शुक्र
हो तो प्रबल योग होता है॥२७५॥
विप्रमूलाद्धनप्राप्तिर्गोमहिष्यादिलाभकृत् ।
पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे कल्याणसम्भवम् ॥२७६॥
इसके अन्तर में ब्राह्मण द्वारा धन का लाभ, गौ भैंस का लाभ, पुत्रोत्सव,
गृह में कल्याण॥२७६॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८९
सम्मानं राजसन्मानं राज्यलाभं महत्सुखम् ।
स्वोच्चे वा स्वर्शगे वापि तुङ्गांशे स्वांशगेऽपिवा ।।२७७।।
सम्मान, राजा से आदर, राज्य सुख का लाभ होता है। यदि शुक्र अपने
उच्च वा अपनी राशि में, उच्चांश में वा अपने नवांश में हो ।।२७८।।
नूतनगृहनिर्माणं नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् ।
कलत्रपुत्रविभवं मित्रसंयुक्तभोजनम् ।।२७८।।
नूतन गृह का निर्माण, नित्य मिठाई का भोजन, स्त्री, पुत्र वैभव और मित्रों
के साथ भोजन होता है।।२७८।।
अन्नदानप्रियं नित्यं दानधर्मादिसंग्रहम् ।
महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् ।।२७९।।
अन्नदान तथा अन्य धार्मिक क्रियायें और महाराज की प्रसन्नता से वाहन-
वस्त्र आभूषण का लाभ।।२७९।।
व्यवसायात्फलाधिक्यं विवाहो मौंजिबंधनम् ।
षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे नीचे शत्रुगृहेस्थिते ।।२८०।।
व्यवसाय से अधिक लाभ और विवाह यज्ञोपवीत आदि उत्सव होते हैं। यदि
शुक्र ६।८।१२ भाव में हो नीच में वा शत्रु गृह में हो।।२८०।।
मन्दारफणिसंयुक्ते तद्भुक्तौ रोगमादिशेत् ।
अकस्मात्कलहं चैव पितृपुत्रवियोगकृत् ।।२८१।।
शनि, भौम,राहु से युत हो तो इसके अन्तर में रोग, अकस्मात् कलह पिता-
पुत्र से वियोग।।२८१।।
स्वबंधुजनहानिश्च सर्वत्र जनपीडनम् ।
दायादि कलहं चैव स्वप्रभोः स्वस्यमृत्युकृत् ।।२८२।।
अपने बन्धुओं की हानि, सभी जनों को कष्ट, दायादों से कलह, अपने स्वामी
तथा अपने को मृत्युतुल्य कष्ट।।२८२।।
कलत्रपुत्रपीडां च शूलरोगादि सम्भवम् ।
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे वा समन्विते ।।२८४।।
स्त्री पुत्र को कष्ट और शूल रोग की सम्भावना होती है। दशेश से केन्द्र वा
त्रिकोण में वा युत हो।।२८४।।

४९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
लाभे वा धर्मराशिस्थे क्षेत्रपालान्महत्सुखम् ।
सुगंधवस्त्रशय्यादिं गानविद्यापरिश्रमम् ॥२८५॥
लाभ या नवम भाव में शुक्र हो तो क्षेत्रपाल से सुख होता है॥२८५॥
छत्रचामरवाद्यादिगंधपद्मसन्वितम् ।
दायेशाद्रिपुरंध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ॥२८६॥
और छत्र, चामर, बाजा आदि गंधादि से युक्त होता है। दशेश से ६।८।१२
भाव में पापग्रहं से मुत शुक्र हो तो॥२८६॥
विषाहिनृपचौरादिमूत्रकृच्छ्रकान्महद्भयम् ।
प्रमेहाद्रुधिरं रोग कुत्सितान्नं शिरोरुजम् ॥२८७॥
उसके अन्तर में विष-सर्प-राजा-चोर आदि से तथा कृच्छ्र (सुजाक) रोग से
भय होता है। प्रमेह से रक्त का रोग और खराब अन्न का भोजन तथा शिर में रोग
होता है॥२८७॥
कारागृहप्रवेशं च राजदंडाद्धनक्षयम् ।
द्वितीयद्यूननाथे वा दारपुत्रादिनाशनम् ॥२८८॥
कारागाह (जेल) में प्रवेश, स्त्री पुत्रादि का नाश होता है। २।७ भाव का
स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है॥२८८॥
आत्मपीडा भयं चैवाह्यपमृत्युस्तथाभवेत् ।
दुर्गालक्ष्मीजपं कुर्यान्मृत्युनाशकरो भवेत् ॥२८९॥
दुर्गा और लक्ष्मी का जय करने से मृत्यु का नाश होकर सुख होता है॥२८९॥
अथराहुदशायां सूर्यान्तर्दशाफलम्-
राहोरन्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे ।
त्रिकोणे लाभगे वापि तुंगांशेस्वांशमेऽपिवा ॥२९०॥
राहु की दशा में अपने उच्च में वा अपनी राशि में केन्द्र त्रिकोण, ग्यारहवें
वा अपने उच्चांश वा अपने नवांश में गये हुये॥२९०॥
शुभग्रहेण संदृष्टे राजप्रीतिकरं शुभम् ।
धनधान्यसमृद्धिश्च ह्यल्पसौख्यं सुखावहम् ॥२९१॥
शुभग्रह से देखे जाते हुये सूर्य के अन्तर में राजा से प्रेम, धन धान्य समृद्धि
की प्राप्ति, अल्पसुख॥२९१॥

अथान्नर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९१
अल्पग्रामाधिपत्यं च स्वल्पलाभो भविष्यति ।
भाग्यलग्नेशसंयुक्ते कर्मेशेन निरीक्षिते ॥२९२॥
छोटे ग्राम का आधिपत्य, अल्पलाभ होता है। भाग्येश और लग्नेश से युक्त
हो और कर्मेश से देखा जाता हो तो॥२९२॥
राजाश्रयो महत्कीर्त्तिर्विदेशगमनं महत् ।
देशाधिपत्ययोगं च गजाश्वाम्बरभूषणम् ॥२९३॥
राजा से आश्रय की प्राप्ति, बड़ा यश, विदेशयात्रा होती है। यह देश का
अधिपति योग होता है. इसमें ग्राम का अधिकार हाथी, घोड़ा वस्त्र आभूषण की
प्राप्ति॥२९३॥
मनोभीष्टप्रदानं च पुत्रकल्याणसम्भवम् ।
दायेशाद्विःफरन्ध्रस्थे षष्ठे वा नीचगेऽपि वा ॥२९४॥
मन के अनुकूल इष्टसिद्धि, पुत्र के लाभ का सम्भव होता है यदि दशेश
१२।८।६ स्थान में सूर्य हों वा नीच राशि में हों तो॥२९४॥
ज्वरातिसाररोगं च कलहंराजविद्विषम् ।
प्रयाणं शत्रुवृद्धिश्च नृपचौराग्निपीडनम् ॥२९५॥
ज्वरातिसार रोग, कलह, राजा से विद्वेष, यात्रा, शत्रुओं की वृद्धि, राजा चोर
अग्नि से पीड़ा होती है॥२९५॥
दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपिवा ।
विदेशे राजसन्मानं कल्याणं च शुभावहम् ॥२९६॥
दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे वा लाभ स्थान में हो तो विदेश में राजा
से सम्मान, कल्याण और शुभ होता है॥२९६॥
द्वितीयद्यूननाथेतु महारोगो भविष्यति ।
सूर्यप्रसन्नशान्ति च कुर्यादारोग्यसम्भवम् ॥२९७॥
२।७ भाव का स्वामी हो तो महारोग होता है। सूर्य की प्रसन्नता की शान्ति
करने से आरोग्यता होती है॥२९७॥
अथराहुदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम्-
राहोरन्तर्गते चन्द्रे स्वक्षेत्रे स्वर्क्षगेऽपि वा ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा मित्रर्क्षे शुभसंयुते ॥२९८॥
राहु की दशा में अपनी राशि, उच्चराशि में केन्द्रत्रिकोण, वा लाभ में वा
मित्र की राशि में शुभग्रह से युत चन्द्रमा हो तो उसके अन्तर में॥२९८॥

४९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
राज्यत्वं राजपूज्यत्वं धनार्थं धनलाभकृत् ।
आरोग्यभूषणं चैव मित्रस्त्रीपुत्रसंपदः ॥२९९॥
राजा होता है अथवा राजा से पूज्य होता है, धन के लिये धनका लाभ होता
है, आरोग्यता, आभूषण, मित्र, स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति का लाभ होता है॥२९९॥
पूर्णचन्द्रे पूर्णफलं राजप्रीत्या शुभावहम् ।
अश्ववाहनलाभः स्याद्गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् ॥३००॥
पूर्ण चन्द्रमा हो तो पूर्णफल होता है और राजा की प्रसन्नता से शुभद फल
होते हैं और घोड़ा आदि वाहनों का लाभ और गृह क्षेत्र आदि की वृद्धि होती
है॥३००॥
दायेशात्सुखभाग्यस्थे केन्द्रे वा लाभगेऽपिवा ।
लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि गृहे कल्याणसम्भवम् ॥३०१॥
दशेश से चौथे नवें, केन्द्र वा लाभ स्थान में हो तो लक्ष्मी की कृपा के चिह्न
दिखाई देते हैं, गृह में कल्याण होता है॥३०१॥
पूर्णकार्यार्थसिद्धिः स्याद्धनधान्यसुखावहम् ।
सत्कीर्त्तिलाभसन्मानं देव्याराधनमाचरेत् ॥३०२॥
पूर्णकार्य और धन का लाभ, कीर्त्ति वृद्धि और सन्मान होता है। देवाराधन
करना चाहिये॥३०२॥
दायेशात्षष्ठरंध्रस्थे व्यये वा बलसंयुते ।
पिशाचक्षुद्रव्याघ्रादिगृहक्षेत्रार्थनाशनम् ॥३०३॥
दशेश से ६।८।१२ वें भाव में बलवान् हो तो पिशाच, क्षुद्रजन्तु-व्याघ्र
आदि से गृह-खेती और धन का नाश होता है॥३०३॥
मार्गेचौरभयं चैव व्रणाधिक्यं महाभयम् ।
द्वितीयद्यूननाथेतु अपमृत्युस्तदा भवेत् ।
श्वेतांगा महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यता भवेत् ॥३०४॥
मार्ग में चोर का भय और व्रण (फोड़ा) से बड़ा भय होता है। २।७ भाव
के स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। सफेद गौ भैंस के दान से आरोग्यता
होती है॥३०४॥
अथराहुदशायां भौमान्तर्दशाफलम्-
राहोरन्तर्गतेभौमे लग्नाल्लाभत्रिकोणगे ।
केन्द्रे वा शुभसंयुक्ते स्वोच्चे स्वक्षेत्रमेऽपि वा ॥३०५॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९३
राहु की दशा में लग्न से लाभ वा त्रिकोण वा केन्द्र में शुभग्रह से अपने उच्च
वा अपनी राशि में गये हुये भौम के अन्तर में ॥३०५॥
नष्टराज्यधनप्राप्तिः गृहक्षेत्राभिवृद्धिकृत् ।
इष्टदेवप्रसादेन सन्तानसुखभोजनम् ॥३०६॥
नष्टराज्य की प्राप्ति गृह क्षेत्र की वृद्धि होती है। इष्टदेव की प्रसन्नता से सन्तान
का सुख, भोजन का सुख होता है॥३०६॥
क्षिप्रभोज्यान्महत्सौख्यं भूषणाम्बरलाभकृत् ।
दायेशात्केन्द्रकोणेवा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ॥३०७॥
शीघ्र भोजन महासुख, भूषण, वस्त्रादि का लाभ होता है। दशेश से केन्द्र
वा कोण में वा तीसरे वा लाभ स्थान में हो तो॥३०७॥
रक्तवस्त्रादिलाभः स्यात्प्रयाणं राजदर्शनम् ।
पुत्रवर्गेषुकल्याणं स्वप्रभोश्च महत्सुखम् ॥३०८॥
लाल वस्त्रादि का लाभ, यात्रा और राजा का दर्शन, पुत्र वर्ग में कल्याण,
महासुख॥३०८॥
सेनापत्यं महोत्साहं भ्रातृवर्गधनागमम् ।
दायेशाद्रिःफरंध्रे वा षष्ठे पापसमन्विते ॥३०९॥
सेनापतिपद का लाभ बड़ा उत्साह और भाइयों से धन का लाभ होता है।
दशेश से १२।८।६ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो॥३०९॥
पुत्रदारादिहानिश्च सोदराणां च पीडनम् ।
स्थानभ्रंशं बंधुवर्गदारपुत्रविरोधनम् ॥३१०॥
पुत्र स्त्री की हानि, भाइयों को पीड़ा, स्थान भ्रष्ट, बंधुओं से तथा स्त्री, पुत्र
से विरोध होता है॥३१०॥
चौरादिब्रणभीतिश्च सोदराणां च पीडनम् ।
आदौ क्लेशकरंचैवमध्यान्ते सौख्यमाप्नुयात् ॥३११॥
चौर तथा व्रण से भय और भाइयों को कष्ट होता है। अन्तर पहले कष्ट और
मध्य तथा अन्त में सुख होता है॥३११॥
द्वितीयद्यूननाथेतु देहालस्यं महद्भयम् ।
अनड्वाहं च गांदद्याद्देहारोग्यं भविष्यति ॥३१२॥
यदि २।७ भाव का स्वामी हो तो देह में आलस्य और बड़ा भय होता है।
बैल और गौ का दान करने से आरोग्यता होती है॥३१२॥
इतिराहुदशायामन्तर्दशाफलम् ।

४९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथगुरुदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम्-
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
अनेकराज्याधीशश्च सम्पन्नो राजपूजितः ॥१॥
गुरु की दशा में अपने उच्च, अपनी राशि में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में
गये हुये गुरु के अन्तर में अनेक राज्यों का स्वामित्व सम्पन्नता और राजा से
पूजनीयता॥१॥
गोमहिष्यादिलाभश्च वस्त्रवाहनभूषणम् ।
नूतनस्थाननिर्माणं हर्म्यप्राकारसंयुतम् ॥२॥
गौ, भैंस आदि का तथा वस्त्र आभूषण का लाभ होता है। नये स्थान का
निर्माण गृह आदि का लाभ होता है॥२॥
गजान्तैश्वर्यसम्पत्तिर्भाग्यकर्मणिसंयुते ।
ब्राह्मणप्रभुसन्मानं समानप्रभुदर्शनम् ॥३॥
यदि गुरु भाग्य वा कर्म में हो तो हाथी आदि के ऐश्वर्य से युक्त॥३॥
स्वप्रभोः स्वफलाधिक्यं दारपुत्रादिलाभकृत् ।
नीचांशे नीचराशिस्थे षष्ठाष्टव्ययराशिगे ॥४॥
और अपने स्वामी से अधिक लाभ, स्त्री आदि का लाभ होता है। यदि गुरु
नीचांश वा नीच राशि में ६।८।१२ भाव में हो तो॥४॥
नीचसङ्गं महादुःखं दायादजनविग्रहम् ।
कलहो न विचारोस्य स्वप्रभुह्यापमृत्युकृत् ॥५॥
नीचों की सङ्गति महादुःख, दायादों से विरोध, कलह, अपमृत्यु का
भय॥५॥
पुत्रदारवियोगं च धनधान्यार्थहानिकृत् ।
सप्तमाधिपदोषेण देहवाधा भविष्यति ॥६॥
पुत्र स्त्री से वियोग, धन धर्म का नाश होता है। सप्तमेश होने से शरीर में
रोग होता है॥६॥
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।
रुद्रजाप्यं च गोदानं कुर्यादिष्टस्य प्राप्तये ॥७॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९५
इस दोष की शान्ति के लिये शिवसहस्र नाम का जप, रुद्राष्टाध्यायी का जप,
गोदान करने से अभीष्ट की प्राप्ति होती है॥७॥
अथगुरुदशायांशनेरन्तर्दशाफलम्-
जीवस्यान्तर्गते स्वोच्चे स्वक्षेत्रमित्रगे ।
लग्नात्केन्द्रत्रिकोणस्थे लाभे वा बलसंयुते ॥८॥
गुरु की दशा में अपने उच्च, अपने गृह वा अपने मित्र की राशि में लग्न
से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ में बलवान् शनि के अन्तर में॥८॥
राज्यलाभं महत्सौख्यं वस्त्राभरणसंयुतम् ।
धनधान्यादिलाभं च स्त्रीलाभं बहुसौख्यकृत् ॥९॥
राज्य का लाभ, महान् सुख, वस्त्र आभूषण का लाभ, धन धान्य का लाभ,
स्त्री का लाभ अनेक सुख॥९॥
वाहनाम्बरपश्वादिभूलाभं स्थानलाभदम् ।
पुत्रमित्रादिसौख्यं च नरवाहनयोगकृत् ॥१०॥
वाहन, वस्त्र, पशु आदि तथा भूमि का लाभ और स्थान का लाभ होता है।
पुत्र मित्र आदि का सुख और मनुष्य की सवारी का लाभ होता है॥१०॥
नीलवस्त्रादिलाभश्च नीलाश्वं लभते च सः ।
पश्चिमां दिशमाश्रित्य प्रयाणं राजदर्शनम् ॥११॥
नीले वस्त्र, नीले घोड़े का लाभ, पश्चिम दिशा की यात्रा और राजा का
दर्शन॥११॥
अनेकयानलाभं च निर्दिशेन्मन्दभुक्तिषु ।
लग्नात्षष्ठाष्टमे मंदेव्यये नीचेऽस्तगेऽप्यरौ ॥१२॥
और अनेक प्रकार की सवारी का लाभ होता है लग्न से ६।८।१२ स्थान
में शनि वा अस्त हो तो नीच वा शत्रु राशि में॥१२॥
धनधान्यादिनाशश्च ज्वरपीडा मनोरुजम् ।
स्त्रीपुत्रादिषु पीडा वा व्रणात्यादिकयुग्भवेत् ॥१३॥
धन धान्य का नाश ज्वर से पीड़ा-मानसिक कष्ट, स्त्री पुत्रादि को कष्ट व्रण
का दुःख॥१३॥
गृहेत्वशुभकार्याणि भृत्यवर्गादिपीडनम् ।
गोमहिष्यादिहानिश्च बन्धुद्वेष्यो भविष्यति ॥१४॥

४९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
घर में अशुभ कार्य, नौकरों को कष्ट, गौ, भैंस आदि को कष्ट बन्धुओं से
द्वेष होता है॥१४॥
दायेशात्केन्द्रकोणस्थे लाभे वा धनगेऽपिवा ।
भूलाभश्चार्थलाभश्च पुत्रलाभसुखंभवेत् ॥१५॥
दशेश से केन्द्र वा कोण वा लाभ वा धन स्थान में हो तो भूमि का लाभ,
पुत्र का लाभ सुख॥१५॥
गोमहिष्यादिलाभश्च शूद्रमूलाद्धनं भवेत् ।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थेव्यये वा पापसंयुते ॥१६॥
गौ, भैंस का लाभ और शूद्र के द्वारा धन का लाभ होता है। दशेश से
६।८।१२ वें स्थान में पापग्रह से युत हो तो॥१६॥
धनधान्यादिनाशश्च बंधुमित्र विरोधकृत् ।
उद्योगभङ्गो देहार्तिः स्वजनानां महद्भयम् ॥१७॥
धन धान्य का नाश, बंधु मित्रादि से विरोध, उद्योगहीन, शरीर में कष्ट, और
स्वजनों से भय होता है॥१७॥
द्विसप्तमाधिपे मंदे ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ।
कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ॥१८॥
२।७ भाव का स्वामी शनि हो तो अपमृत्यु का भय होता है॥१८॥
इसकी शान्ति के लिये विष्णु सहस्र नाम का जप काली गौ और भैंस का
दान करने से आरोग्यता प्राप्त होती है॥१९॥
अथगुरुदशायां बुधार्न्तदशाफलम्-
जीवस्यान्तर्गते सौम्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्षेंगे वापि दशाधिपसमन्विते ॥२०॥
गुरु की दशा में केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये अपने उच्च वा अपनी राशि
में वा दशेश से युत बुध के अन्तर में॥२०॥
अर्थलाभं देहसौख्यं राज्यलाभं महत्सुखम् ।
महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा ॥२१॥
धन का लाभ, अत्यंत सुख, राज्य का लाभ और देह का सुख महाराज की
प्रसन्नता से इष्ट की सिद्धि सुख होता है॥२१॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९७
वाहनाम्बरपश्चादिगोधनैः संकुलं गृहम् ।
दायेशाद्भाग्यकोणे वा केन्द्रे वा तुङ्गगेऽथवा ।।२२।।
वाहन, वस्त्र, पशु आदि से पूर्णता होती है। दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण स्थान
में अपने उच्च में हो तो।।२२।।
स्वदेशेधनलाभश्च पितृमातृसुखावहम् ।
गजवाजिसमायुक्तो राजमित्रप्रसादकः ।।२३।।
स्वदेश में ही धन का लाभ, पिता माता को सुख हाथी-घोड़ा से युक्त और
राजा से मित्रता होती है।।२३।।
शुभदृष्टौ शुभैर्युक्तं दारसौख्यं धनागमम् ।
आदौ शुभं देहसौख्यं वाहनाम्बरलाभदम् ।।२४।।
शुभग्रह से दृष्ट और युत हो तो देह सुख, वाहन, वस्त्र का लाभ होता
है।।२४।।
अन्तेतु धनहानिः स्यात्स्वात्मसौख्यं च जायते ।
महीसुतेन संदृष्टे शत्रुवृद्धिः सुखक्षयम् ।।२५।।
अन्त में धन की हानि और आत्मसुख होता है। मंगल से दृष्ट हो तो शत्रुओं
की वृद्धि और सुख की हानि होती है।।२५।।
व्यवसायात्फलं नेष्टं ज्वरातीसारपीडनम् ।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।।२६।।
शुभदृष्टिविहीनश्चेद्धनधान्यपरिच्युतिः ।
विदेशगमनं चैव मार्गे चौरभयं तथा ।।२७।।
दशेश से ६।८।१२ वें भाव में हो और पापग्रह से युत हो तो रोजगार में
हानि, ज्वर और अतिसार से कष्ट होता है। शुभग्रह से न देखा जाता हो तो धन
धान्य का नाश और बंधु मित्रों से विरोध, उद्योग की हानि देह में पीड़ा, स्वजनों
को पीड़ा, बड़ा भय।।२६-२७।।
व्रणदाहाक्षिरोगश्च नानादेशपरिभ्रमणम् ।
लग्नात्षष्ठाष्टरिःफे वा लाभे वा पापसंयुते ।।२८।।
व्रण, दाह, नेत्र का रोग अनेक देशों का भ्रमण होता है। लग्न से
६।८।१२।११ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो।।२८।।
अकस्मात्कलहश्चैव गृहे निष्ठुरभाषणम् ।
चतुष्पाज्जीवहानिश्च व्यवहारस्तथैव च ।।२९।।

४९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अकस्मात् कलह-गृहकलह चतुष्पदों को हानि, व्यवहार में क्षति, अपमृत्यु
का भय शत्रुओं से कलह होता है।।२९।।
अपमृत्युभयं चैव शत्रूणां कलहो भवेत् ।
द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।।३०।।
२।७ भाव के अधिपति हो तो अकालमृत्यु का भय होता है।।३०।।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ।
बुधप्रीतिकरं चैव दानं शान्तिं च कारयेत् ।
आयुवृद्धिकरं चैव सर्व सौभाग्यसंपदम् ।।३१।।
विष्णु सहस्र नाम स्तोत्र का जप, बुध की प्रसन्नता की शान्ति करने से सभी
सौभाग्य और सम्पत्ति होती है।।३०।।
अथगुरुदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम् -
जीवस्यान्तर्गते केतौ शुभग्रह समन्विते ।
अल्पसौख्यधनावाप्तिर्कुत्सितान्नस्यभोजनम् ।।३२।।
गुरु की दशा में शुभग्रह से युक्त केतु के अन्तर में अल्प सुख धन का लाभ
होता है। कुत्सित अन्न का भोजन।।३२।।
परान्नं चैव श्राद्धान्नं पापमूलाद्धनानि च ।
दायेशात्सुतभाग्यस्थे वाहनेकर्मगेऽपि वा ।।३३।।
परान्न, वा श्राद्धान्न का भोजन, पापमूल से धन का लाभ होता है। दशेश
से ५।६।४।१० भाव में हो तो।।३३।।
नरवाहनयोगश्च गजाश्वाम्बरसंकुलम् ।
महाराज प्रसादेन इष्टकार्यार्थलाभकृत् ।।३४।।
मनुष्य की सवारी का योग हाथी-घोड़ा वस्त्र और व्यवसाय से अधिक लाभ,
महाराज की प्रसन्नता से इष्टकार्य की सिद्धि।।३४।।
व्यवसायात्फलाधिक्यंगोमहिष्यादिलाभकृत् ।
यवनप्रभुमूलाद्वा द्रव्यवस्त्रादिलाभकृत् ।।३५।।
और गौ, भैंस आदि का लाभ, नीच जातीय राजा से द्रव्य-वस्त्रादि का लाभ
होता है।।३५।।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।
राजकोपं धनच्छेदं बंधनं बन्धुपीडनम् ।।३६।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९९
दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो राजा के कोप से धन
की हानि, बंधुओं को कष्ट।।३६।।
बलहानिः पितृद्वेषो भ्रातृद्वेषो मनोरुजः ।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।।३७।।
पिता से द्वेष, भाई से द्वेष, मानसिक कष्ट होता है। २ वा ७ भाव का स्वामी
हो तो देहबाधा होती है।।३७।।
छागदानं प्रकुर्वीत मृत्युंजय जपं चरेत् ।
सर्वदोषोपशमनीं शान्तिं कुर्याद्विधानतः ।।३८।।
बकरी का दान और मृत्युंजय का जप कराना चाहिये। सभी दोषों के शमन
करने वाली शान्ति को विधानपूर्वक करना चाहिये।।३८।।
अथगुरुदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्-
जीवस्यानागते शुक्रे भाग्यकेन्द्रेशसंयुतं ।।३९।।
लाभे वा सुतराशिस्थे स्वक्षेत्रेशुभसंयुते ।
गुरु की दशा में भाग्येश केन्द्रेश से युत वा लाभ स्थान वा पांचवें स्थान
में अपनी राशि में शुभग्रह से युत शुक्र के अन्तर में ।।३९।।
महाराजप्रसादेन देशाधिक्यं महत्सुखम् ।।४०।।
महाराजा की प्रसन्नता से देश का लाभ और सुख।।४०।।
नीलाम्बराणि शस्त्राणिलाभश्चैव भविष्यति ।
पूर्वस्यां दिशि आश्रित्य प्रयाणं धनलाभदम् ।।४१।।
नीले रंग के वस्त्र, शस्त्र, का लाभ, पूर्व दिशा की यात्रा से धन का लाभ
होता है।।४१।।
कल्याणं च महाभीतिः पितृमातृ सुखावहा ।
देवतागुरुभक्तिंश्च अन्नदानं महत्तथा ।।४२।।
कल्याण, महाभय, पिता-माता को सुख, देवता-गुरु में भक्ति और बड़े पैमाने
पर अन्न का दान।।४२।।
तडागगोपुरादीनि कृत्वां पुण्यानि भूरिशः ।
षष्ठाष्टमव्यये नीचे दायेशाद्वा तथैव च ।।४३।।
ताडाग-गोपुर आदि पुण्यदायक अनेक कार्य होते हैं। यदि शुक्र लग्न से वा
दशेश से ६।८।१२ स्थान में वा नीच में हो तो।।४३।।

५०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
कलहो बंधुवैषम्यः दारपुत्रादिपीडनम् ।
मन्दारराहुसंयुक्ते कलहो राजविड़्वरम् ॥४४॥
उसके अन्तर में कलह, बंधुओं से बैर, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा होती है।
शनि भौम राहु से युत हो तो कलह, राजा से शत्रुता ॥४४॥
स्त्रीमूलात्कलहं चैव श्वशुरात्कलहं तथा ।
सोदरेण विवादः स्याद्धनधान्यपरिच्युतिः ॥४५॥
स्त्री के कारण कलह श्वसुर से कलह, भाई से झगड़ा और धन धान्य की
हानि होती है॥४५॥
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे धने वा भाग्यगेऽपिवा ।
धनधान्यादिलाभश्च स्त्रीलाभं राजदर्शनम् ॥४६॥
दशेश से केन्द्र वा धन, वा भाग्य में हो तो धन धान्य का लाभ, स्त्री का
लाभ, राजा का दर्शन ॥४६॥
वाहनं पुत्रलाभं च पशुवृद्धिमहत्सुखम् ।
गीतवाद्यप्रसंगादिविद्वज्जनसमागमम् ॥४७॥
वाहन और पुत्र का लाभ, पशुओं की वृद्धि और सुख, गीत बाजा का प्रसंग,
विद्वानों का समागम ॥४७॥
दिव्यान्न भोजनं सौख्यं स्वबन्धुजनपोषकम् ।
द्विसप्तमाधिपे शुक्रे तद्दशायां यशक्षतिः ॥४८॥
दिव्य पदार्थ का भोजन सुख और अपने बंधुओं का भरणपोषण होता है।
यदि शुक्र २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो उसके अन्तर में यश की हानि होती
है॥४८॥
अपमृत्युभयं तस्य स्त्रीमूलादौषधादिभिः ।
तस्य रोगस्य शान्त्यर्थं शान्तिकर्मसमाचरेत् ।
श्वेतां गां महिषींदद्यादायुरारोग्यवृद्धिकृत् ॥४९॥
स्त्री के कारण औषधि आदि से अपमृत्यु का भय होता है उस रोग की शान्ति
के लिये शान्तिकर्म करना चाहिये और आयु आरोग्यता के लिये श्वेत (सफेद) गौ
भैंस का दान करना चाहिये ॥४९॥
अथगुरुदशायांसूर्यान्तर्दशाफलम्-
जीवस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपिवा ।
केन्द्रेवाथ त्रिकोणे च दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ॥५०॥

अथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ५०१
गुरु की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे
वा लाभ स्थान में॥५०॥
भाग्ये वा बलसंयुक्ते दायेशाद्वा तथैव च ।
तत्काले धनलाभः स्याद्राजसन्मानवैभवम् ।।५१।।
वा भाग्य स्थान में गये हुये बलवान् ग्रह से युक्त, इसी प्रकार दशेश से भी
हों तो सूर्य के अन्तर में धन का लाभ, राजा से सन्मान, वैभव की प्राप्ति।।५१।।
वाहनाम्बरपश्चादिभूषणम् पुत्रसम्भवम् ।
मित्रप्रभुवशादिष्टं सर्वकार्ये शुभावहम् ।।५२।।
मित्र और राजा के द्वारा इष्ट की सिद्धि और सभी कार्य में सफलता की प्राप्ति
होती है।।५२।।
षष्ठाष्टमव्यये सूर्ये दायेशाद्वा तथैव च ।
शिरोरोगादिपीडा च ज्वरपीडा तथैव च ।।५३।।
लग्न से वा दशेश से ६।८।१२ भाव में सूर्य हो तो शिर में रोग, ज्वर आदि
से कष्ट।।५३।।
सत्कर्मणि विहीनत्वं पापकर्म तथैव च ।
सर्वत्रजनविद्वेषो ह्यात्मबन्धुवियोगकृत् ।।५४।।
अच्छे कर्मों से विरक्ति, पापकर्म में तल्लीनता सभी लोगों से विरोध, आत्मीय
बंधुओं से वियोग।।५४।।
अकस्मात्कलहं चैव जीवस्यान्तर्गते रवौ ।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहपीडा भविष्यति ।।५५।।
अकस्मात् कलह होता है। यदि सूर्य २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो गुरु
दशा में इसके अन्तर में देह में पीड़ा होती है।।५५।।
तद्दोषपरिहारार्थमादित्यहृदयं जपेत् ।
सर्वपीडोपशमनं सूर्यप्रीतिं च कारयेत् ।।५६।।
इस दोष के शान्त्यर्थ आदित्य हृदय का जप कराना चाहिये और सभी पीड़ाओं
के शान्त्यर्थ सूर्य को प्रसन्न करना चाहिये।।५६।।
अथगुरुदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् -
जीवस्यान्तर्गते चन्द्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्षंराशिस्ये पूर्णचन्द्रवलैयुते ।।५७।।

५०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
गुरु की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में अपने उच्च वा अपनी राशि
में गया हुआ पूर्णचन्द्र बली हो।।५७।।
दायेशाच्छुभराशिस्थे राजसन्मानवैभवम् ।
दारपुत्रादिसौख्यं च क्षीराणां भोजनं तथा ।।५८।।
वा दशेश से उक्त भावों में शुभ राशि में हो तो चन्द्रमा के अन्तर में राजा
से सन्मान और वैभव का लाभ, स्त्री पुत्र आदि को सुख, दूध का भोजन।।५८।।
सत्कर्म च तथा कीर्तिः पुत्रपौत्रादि वृद्धिमत् ।
महाराजप्रसादेन सर्वसौख्यं धनागमम् ।।५९।।
अच्छे कर्म, यश, पुत्र पौत्र की वृद्धि, महाराज की प्रसन्नता से सभी सुख,
धन का आगम।।५९।।
अनेकजनसौख्यं च दानधर्मादिसंग्रहः ।
षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे संस्थिते पापसंयुते ।।६०।।
अनेक लोगों से सुख और दान धर्मादि कृत्यों का संग्रह होता है।।६०।।
दायेशात्षष्ठरंध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ।
मानार्थबन्धुहानिश्च विदेशपरिविच्युतिः ।।६१।।
यदि चन्द्रमा ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो वा दशेश से ६।८।१२
भाव में निर्बल हो तो इसके अन्तर में मान, धन, बन्धु की हानि, विदेश में
हानि।।६१।।
नृपचौरादिपीडा च दायादजन विद्विषम् ।
मातुलादिवियोगश्च मातृपीडा तथैव च ।।६२।।
राजा, चोर आदि से कष्ट, दायादों से विग्रह, मामा आदि का वियोग और
माता को कष्ट होता है।।६२।।
द्वितीयषष्ठयोरीशे देहपीडा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गापाठं च कारयेत् ।।६३।।
२ वा ६ भाव का स्वामी हो तो शरीर में पीड़ा होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ
दुर्गापाठ को कराना चाहिये।।६३।।
अथगुरुदशायांभौमान्तर्दशाफलम्-
जीवस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्षेत्रगे वापि तुङ्गांशे स्वांशमेऽपिवा ।।६४।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५०३

गुरु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा अपने उच्च वा अपनी राशि
वा उच्चांश वा अपने नवांश में गये हुये भौम के अन्तर में ।।६४।।
विद्याविवाहकार्याणि ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
जनसामर्थ्यमाप्नोति सर्वकार्यार्थसिद्धिदम् ।।६५।।
विद्या, विवाह आदि कार्य, ग्राम भूमि आदि की प्राप्ति, लोगों से सम्पर्क और
सभी कार्य की सफलता और धन का लाभ होता है ।।६५।।
दायेशात्केन्द्रकोणेवा लाभे वा धनगेऽपिवा ।
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे धनधान्यादिसम्पदम् ।।६६।।
दशेश से केन्द्र कोण में वा लाभ स्थान वा धन स्थान में शुभग्रह से युक्त
शुभग्रह से दृष्ट हो तो धन धान्य आदि सम्पत्ति का लाभ ।।६६।।
मिष्ठान्नदानविभवं राजप्रीतिकरं शुभम् ।
स्त्रीसौख्यं च सुतावाप्तिः पुण्यतीर्थफलप्रदम् ।।६७।।
मिष्ठान्न का दान, वैभव का लाभ, राजा से प्रेम, स्त्री को सुख, पुत्र का लाभ
और पुण्यतीर्थ का लाभ होता है ।।६७।।
दायेशात्षष्ठरंध्रे वा व्ययेवा नीचगेऽपिवा ।
पापयुक्तेक्षिते वापि धान्यार्थगृहनाशनम् ।।६८।।
दशेश से ६।८।१२ भाव में वा नीच राशि में पापग्रह से युत दृष्ट हो तो
धन धान्य गृह नाश ।।६८।।
नानारोगभय दुःखं नेत्ररोगादिसम्भवम् ।
पूर्वार्धे क्लेशमधिकमपरार्धे महत्सुखम् ।।६९।।
अनेक रोगों का भय, दुःख, नेत्ररोग की सम्भावना होती है। अन्तर के पूर्वार्ध
में अधिक कष्ट और उत्तरार्ध में बड़ा सुख होता है ।।६९।।
द्वितीयद्यूननाथेतु देहजाड्यं मनोरुजम् ।
अनड्वाहं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।७०।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो देह में जड़ता होती है और मन में विकार
होता है। वृष का दान करने से सभी सम्पत्तियों का लाभ होता है ।।७०।।
अथगुरुदशायांराह्वन्तर्दशाफलम् -
जीवस्यान्तर्गते राहौ स्वोच्चे वा केन्द्रगेऽपिवा ।
मूलत्रिकोणभाग्ये च केन्द्राधिपसमन्विते ।।७१।।

५०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
गुरु की दशा में अपनी उच्चराशि में वा केन्द्र में वा मूलत्रिकोण वा भाग्य
में केन्द्रेश से युत वा ।।७१।।
शुभयुक्तैक्षिते वापि योगप्रीतिं समादिशेत् ।
भुक्त्यादौ शरमासांश्च धनधान्य परिश्रमम् ।।७२।।
शुभग्रह से युक्त दृष्ट राहु के अन्तर में योग की प्रखरता होती है, अन्तर के
आदि में ५ मास धन-धान्य और परिश्रम ।।७२।।
देशग्रामाधिकारं च यवनप्रभुदर्शनम् ।
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्बहुसेनाधिपत्यताम् ।।७३।।
देश-ग्राम की स्वामिता, यवन राजा का दर्शन, गृह में कल्याण कार्य, सम्पत्ति
की प्राप्ति और अनेक अधिकार ।।७३।।
दूरयात्राभिगमनं पुण्यधर्मादिसंग्रहः ।
सेतुस्नानफलावाप्तिरिष्टसिद्धिसुखावहम् ।।७४।।
दूर की यात्रा, पुण्य-धर्म आदि का संग्रह, समुद्र स्नान का लाभ और सुखकर
इष्टसिद्धि होती है।।७४।।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा पापसंयुते ।
चौरादिब्रणभीतिश्च राजवैषम्यमेव च ।।७५।।
दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो चौर आदि से तथा ब्रण
से भय, राज से विरोध ।।७५।।
गृहे कर्मकलापने व्याकुलो भवति ध्रुवम् ।
सोदरेण विरोधः स्याद्दायादजनविग्रहम् ।।७६।।
गृह में कर्म कलाप से व्याकुलता, पुत्र से विरोध दायादों से विग्रह ।।७६।।
गृहेत्वशुभकार्याणि दुःस्वप्नादिभयं ध्रुवम् ।
अकस्मात्कलहश्चैव क्षुद्रशून्यादिरोगकृत् ।।७७।।
घर में अशुभ कार्य, दुःस्वप्न से भय, अकस्मात् कलह, क्षुद्र, लकवा आदि
रोग का भय होता है।।७७।।
द्विसप्तमस्थिते राहौ देहबाधां विनिर्दिशेत् ।
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजय जपं चरेत् ।
छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसौख्यादिमादिशेत् ।।७८।।

अथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ५०५
२ वा ७ भाव में हो तो शरीर बाधा होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ मृत्युंजय
का जप और बकरी का दान करने से सभी सुख की प्राप्ति होती है।।७८।।
इति गुर्वन्तर्दशाफलम्।
अथशनिदशायांशन्यन्तर्दशाफलम्-
मूलत्रिकोण स्वक्षें वा तुलायामुच्चगेऽपिवा ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा राजयोगादिसंयुते ।।१।।
शनि की दशा में अपने मूलत्रिकोण, अपनी राशि, तुला राशि में परमोच्च
में केन्द्र त्रिकोण वा लाभ में गये राजयोग से पूर्ण शनि के अन्तर में।।१।।
राज्यलाभं महत्सौख्यं दारपुत्रादिवर्धनम् ।
वाहनत्रयसंयुक्तं गजाश्वाम्बरसंकुलम् ।।२।।
राज्य का लाभ, अधिक सुख, स्त्री पुत्र आदि की वृद्धि होती है। तीनों वाहनों
का सुख, घोड़ा हाथी वस्त्र का सुख होता है।।२।।
महाराजप्रसादेन अश्वदौत्यादिलाभकृत् ।
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।।३।।
महाराजा के प्रसाद से घोड़ा सवारी और दूत का लाभ, चौपाये-जीव का लाभ
और ग्राम तथा भूमि का लाभ होता है।।३।।
षष्ठाष्टमव्यये मन्दे नीचे वा पापसंयुते ।
तद्भुक्त्यादौ राजप्रीतिर्विषशस्त्रादिपीडनम् ।।४।।
यदि शनि ६।८।१२ भाव में वा अपनी नीच राशि में पापग्रह से युत हो
तो, अन्तर में राजा से प्रेम, विष-शस्त्र आदि से पीड़ा।।४।।
रक्तस्रावं गुल्मरोगतिसारादिपीडनम् ।
मध्ये चौरादिभीतिश्च देशत्यागं मनोरुजम् ।।५।।
रक्त स्राव, गुल्मरोग, अतिसार से पीड़ा होती है। अन्तर के मध्य में चौरआदि
से भय, देशत्याग, मानसिक कष्ट।।५।।
अंते शुभकरं चैव ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोष परिहारार्थ मृत्युंजय जपं चरेत् ।।६।।