बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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गुरु की दशा में अपनी उच्चराशि में वा केन्द्र में वा मूलत्रिकोण वा भाग्य
में केन्द्रेश से युत वा ।।७१।।
शुभयुक्तैक्षिते वापि योगप्रीतिं समादिशेत् ।
भुक्त्यादौ शरमासांश्च धनधान्य परिश्रमम् ।।७२।।
शुभग्रह से युक्त दृष्ट राहु के अन्तर में योग की प्रखरता होती है, अन्तर के
आदि में ५ मास धन-धान्य और परिश्रम ।।७२।।
देशग्रामाधिकारं च यवनप्रभुदर्शनम् ।
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्बहुसेनाधिपत्यताम् ।।७३।।
देश-ग्राम की स्वामिता, यवन राजा का दर्शन, गृह में कल्याण कार्य, सम्पत्ति
की प्राप्ति और अनेक अधिकार ।।७३।।
दूरयात्राभिगमनं पुण्यधर्मादिसंग्रहः ।
सेतुस्नानफलावाप्तिरिष्टसिद्धिसुखावहम् ।।७४।।
दूर की यात्रा, पुण्य-धर्म आदि का संग्रह, समुद्र स्नान का लाभ और सुखकर
इष्टसिद्धि होती है।।७४।।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा पापसंयुते ।
चौरादिब्रणभीतिश्च राजवैषम्यमेव च ।।७५।।
दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो चौर आदि से तथा ब्रण
से भय, राज से विरोध ।।७५।।
गृहे कर्मकलापने व्याकुलो भवति ध्रुवम् ।
सोदरेण विरोधः स्याद्दायादजनविग्रहम् ।।७६।।
गृह में कर्म कलाप से व्याकुलता, पुत्र से विरोध दायादों से विग्रह ।।७६।।
गृहेत्वशुभकार्याणि दुःस्वप्नादिभयं ध्रुवम् ।
अकस्मात्कलहश्चैव क्षुद्रशून्यादिरोगकृत् ।।७७।।
घर में अशुभ कार्य, दुःस्वप्न से भय, अकस्मात् कलह, क्षुद्र, लकवा आदि
रोग का भय होता है।।७७।।
द्विसप्तमस्थिते राहौ देहबाधां विनिर्दिशेत् ।
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजय जपं चरेत् ।
छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसौख्यादिमादिशेत् ।।७८।।