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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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५०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
गुरु की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में अपने उच्च वा अपनी राशि
में गया हुआ पूर्णचन्द्र बली हो।।५७।।
दायेशाच्छुभराशिस्थे राजसन्मानवैभवम् ।
दारपुत्रादिसौख्यं च क्षीराणां भोजनं तथा ।।५८।।
वा दशेश से उक्त भावों में शुभ राशि में हो तो चन्द्रमा के अन्तर में राजा
से सन्मान और वैभव का लाभ, स्त्री पुत्र आदि को सुख, दूध का भोजन।।५८।।
सत्कर्म च तथा कीर्तिः पुत्रपौत्रादि वृद्धिमत् ।
महाराजप्रसादेन सर्वसौख्यं धनागमम् ।।५९।।
अच्छे कर्म, यश, पुत्र पौत्र की वृद्धि, महाराज की प्रसन्नता से सभी सुख,
धन का आगम।।५९।।
अनेकजनसौख्यं च दानधर्मादिसंग्रहः ।
षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे संस्थिते पापसंयुते ।।६०।।
अनेक लोगों से सुख और दान धर्मादि कृत्यों का संग्रह होता है।।६०।।
दायेशात्षष्ठरंध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ।
मानार्थबन्धुहानिश्च विदेशपरिविच्युतिः ।।६१।।
यदि चन्द्रमा ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो वा दशेश से ६।८।१२
भाव में निर्बल हो तो इसके अन्तर में मान, धन, बन्धु की हानि, विदेश में
हानि।।६१।।
नृपचौरादिपीडा च दायादजन विद्विषम् ।
मातुलादिवियोगश्च मातृपीडा तथैव च ।।६२।।
राजा, चोर आदि से कष्ट, दायादों से विग्रह, मामा आदि का वियोग और
माता को कष्ट होता है।।६२।।
द्वितीयषष्ठयोरीशे देहपीडा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गापाठं च कारयेत् ।।६३।।
२ वा ६ भाव का स्वामी हो तो शरीर में पीड़ा होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ
दुर्गापाठ को कराना चाहिये।।६३।।
अथगुरुदशायांभौमान्तर्दशाफलम्-
जीवस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्षेत्रगे वापि तुङ्गांशे स्वांशमेऽपिवा ।।६४।।