सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 496, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 496

४९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अकस्मात् कलह-गृहकलह चतुष्पदों को हानि, व्यवहार में क्षति, अपमृत्यु
का भय शत्रुओं से कलह होता है।।२९।।
अपमृत्युभयं चैव शत्रूणां कलहो भवेत् ।
द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।।३०।।
२।७ भाव के अधिपति हो तो अकालमृत्यु का भय होता है।।३०।।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ।
बुधप्रीतिकरं चैव दानं शान्तिं च कारयेत् ।
आयुवृद्धिकरं चैव सर्व सौभाग्यसंपदम् ।।३१।।
विष्णु सहस्र नाम स्तोत्र का जप, बुध की प्रसन्नता की शान्ति करने से सभी
सौभाग्य और सम्पत्ति होती है।।३०।।
अथगुरुदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम् -
जीवस्यान्तर्गते केतौ शुभग्रह समन्विते ।
अल्पसौख्यधनावाप्तिर्कुत्सितान्नस्यभोजनम् ।।३२।।
गुरु की दशा में शुभग्रह से युक्त केतु के अन्तर में अल्प सुख धन का लाभ
होता है। कुत्सित अन्न का भोजन।।३२।।
परान्नं चैव श्राद्धान्नं पापमूलाद्धनानि च ।
दायेशात्सुतभाग्यस्थे वाहनेकर्मगेऽपि वा ।।३३।।
परान्न, वा श्राद्धान्न का भोजन, पापमूल से धन का लाभ होता है। दशेश
से ५।६।४।१० भाव में हो तो।।३३।।
नरवाहनयोगश्च गजाश्वाम्बरसंकुलम् ।
महाराज प्रसादेन इष्टकार्यार्थलाभकृत् ।।३४।।
मनुष्य की सवारी का योग हाथी-घोड़ा वस्त्र और व्यवसाय से अधिक लाभ,
महाराज की प्रसन्नता से इष्टकार्य की सिद्धि।।३४।।
व्यवसायात्फलाधिक्यंगोमहिष्यादिलाभकृत् ।
यवनप्रभुमूलाद्वा द्रव्यवस्त्रादिलाभकृत् ।।३५।।
और गौ, भैंस आदि का लाभ, नीच जातीय राजा से द्रव्य-वस्त्रादि का लाभ
होता है।।३५।।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।
राजकोपं धनच्छेदं बंधनं बन्धुपीडनम् ।।३६।।