बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
नाभसादियोगाध्यायः २०३
वज्रयोगफलम्-
आद्यन्तवयः सुखिनः शूराः सुभगा निरीहाश्च ।
भाग्यविहीना वज्रे जाता खला विरुद्धाश्च ॥२७॥
वज्र योग में उत्पन्न पुरुष आदि और अंत अर्थात् बाल्य और वृद्ध
अवस्था में सुखी, शूर, सुंदर, निर्दय और भाग्यहीन होते हैं ॥२७॥
यवयोगफलम्-
व्रतनियममङ्गलपरा वयसो मध्ये सुखार्थपुत्रयुताः ।
दातारः स्थिरचित्ता यवयोगभवाः सदा पुरुषाः ॥२८॥
यव योग में उत्पन्न पुरुष व्रत, नियम, मंगल को करने वाले, आयुष्य
के मध्य में सुख, धन, पुत्र से युक्त, दाता और स्थिरचित्त होते हैं ॥२८॥
कमलयोगफलम्-
विभवगुणाढ्याः पुरुषाः स्थिरायुषो विपुलकीर्तयः शुद्धाः ।
शुभशतकाः पृथ्वीशाः कमलभवा मानवा नित्यम् ॥२९॥
कमल योग में उत्पन्न पुरुष धन-ऐश्वर्य एवं गुणों से युक्त, दीर्घायु,
अत्यंत कीर्तिमान्, सैकड़ों शुभ कार्य करने वाले राजा होते हैं ॥२९॥
वापीयोगफलम्-
निधिकरणे निपुणधियः स्थिरार्थसुखसंयुताः सुतयुताश्च ।
नयनसुखसम्पहृष्टा वापीयोगेन राजानः ॥३०॥
वापी योग में उत्पन्न पुरुष धनसंग्रह में चतुर, स्थिर धन और
संपत्ति से युक्त, पुत्रवान्, नेत्र को सुख देने वाले पदार्थों से युक्त राजा होते
हैं ॥३०॥
यूपयोगफलम्-
आत्मविदिज्यानिरतः स्त्रिया युतः सत्त्वसम्पन्नः ।
व्रतयमनियमे निरतो यूपे जातो विशिष्टश्च ॥३१॥
यूपयोग मे उत्पन्न पुरुष ज्ञानी, यज्ञकर्ता, स्त्री से युत, सत्त्वयुक्त,
व्रत-नियम में संपृक्त और विशिष्ट व्यक्ति होता है ॥३१॥
शरयोगफलम्-
इषुकरणे च समर्था मृगयाधनसेविताश्च मांसादाः ।
हिंस्राः कुशिल्पकराः शरयोगे मानवाः प्रसूयन्ते ॥३२॥
२०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
शरयोग में उत्पन्न पुरुष बाण बनाने वाले, आखेट के धन से सुखी,
मांस खाने वाले, हिंसक, कुत्सित शिल्प करने वाले होते हैं।।३२।।
शक्तियोगफलम्-
धनरहितविफलदुःखितनीचालसाश्चिरायुषः पुरुषाः।
संग्रामबुद्धिनिपुणाः शक्त्यां जाताः स्थिराः सुभगाः।।३३।।
शक्ति योग में उत्पन्न पुरुष दरिद्र, निष्फल, दुःखी, नीच, आलसी,
दीर्घजीवी, झगड़ालू बुद्धि और निपुण होते हैं।।३३।।
दण्डयोगफलम्-
हतदारपुत्रनिःस्वाः सर्वत्र च निर्घृणाः स्वजनबाह्याः।
दुःखितनीचप्रेष्या दण्डंप्रभवा भवन्ति नराः।।३४।।
दंड योग में उत्पन्न पुरुष स्त्री-पुत्र से हीन, निर्धन, निर्लज्ज, अपने
स्वजनों से त्यक्त, दुःखी और नीचों के दास होते हैं।।३४।।
नौकायोगफलम्-
सलिलोपजीविविभवा बह्वाशाः ख्यातकीर्त्तयो दुष्टाः।
कृपणा मलिना लुब्धा नौसञ्जाताः खलाः पुरुषाः।।३५।।
नौका योग में उत्पन्न पुरुष जल से उत्पन्न पदार्थों से जीविका वाले,
बहुत भोजन करने वाले, प्रसिद्ध कीर्त्ति वाले, दुष्ट, कृपण, मलिन और
लोभी होते हैं।।३५।।
कूटयोगफलम्-
अनृतकथनवधपापा निष्किञ्चनाः शठाः क्रूराः।
कूटसमुत्था नित्यं भवन्ति गिरिदुर्गवासिनो मनुजाः।।३६।।
कूट योग में उत्पन्न पुरुष झूठ बोलने वाले, पापी, वधिक, धूर्त, क्रूर,
नित्य झूठे व्यापार वाले, पहाड़ और जंगलों में रहने वाले होते हैं।।३६।।
छत्रयोगफलम्-
स्वजनाश्रयो दयावान्नानानृपवल्लभः प्रकृष्टमतिः।
प्रथमेऽन्त्ये वयसि नरः सुखवान्दीर्घायुरातपत्री स्यात्।।३७।।
छत्रयोग में उत्पन्न पुरुष अपने जनों को आश्रय देने वाला, दयावान्,
अनेक राजाओं का प्रिय, उत्तमबुद्धि से युक्त, प्रथम और अंतिम
अवस्था में सुखी, दीर्घायु होता है।।३७।।
नाभसादियोगाध्यायः २०५
चापयोगफलम्-
आनृतिकगुप्तपालाश्चौराः कितवाश्च कानने निरताः।
कार्मुकयोगे जाता भाग्यविहीनाः शुभा वयोमध्ये ॥३८॥
चापयोग में उत्पन्न पुरुष झूठ बोलने वाले, जेलखाने के मालिक, चोर,
धूर्त्त, जंगल के प्रेमी, भाग्यहीन और अवस्था के मध्य में सुखी होते
हैं॥३८॥
अर्धचन्द्रयोगफलम्-
सेनापतयः सर्वे कान्तशरीरा नृपप्रिया बलिनः।
मणिकनकभूषणयुता भवन्ति योगे वार्थचन्द्राख्ये ॥३९॥
अर्धचन्द्रयोग में उत्पन्न होने वाले सभी पुरुष सुंदर शरीर के, सेनापति,
राजा के प्रिय, बली, मणि, सुवर्ण और आभूषणों से युक्त होते हैं॥३९॥
चक्रयोगफलम्-
प्रणताशेषनराधिपकिरीटरत्नप्रभास्फुरितपादः।
भवति नरेन्द्रो मनुजश्चक्रे यो जायते योगे ॥४०॥
चक्र योग में उत्पन्न पुरुष अनेक राजाओं के रत्नजटित मुकुटों से
नमस्कार किये जाने वाला राजा होता है॥४०॥
समुद्रयोगफलम्-
बहुरत्नधनसमृद्धा भोगयुता धनजनप्रियाः ससुताः।
उदधिसमुत्थाः पुरुषाः स्थिरविभवाः साधुशीलाश्च ॥४१॥
समुद्रयोग में उत्पन्न पुरुष अनेक रत्न एवं धन से समृद्ध, भोगयुक्त,
ज़नप्रिय, पुत्रवान्, स्थिर धनवाले और सज्जन होते हैं॥४१॥
वीणायोगफलम्-
प्रियगीतनृत्यवाद्यनिपुणाः सुखिनश्च धनवन्तः।
नेतारो बहुभृत्या वीणायां कीर्त्तिताः पुरुषाः ॥४२॥
वीणा योग में उत्पन्न पुरुष गीत, नाच और बाजा के प्रेमी, निपुण,
सुखी, धनी, नेता, अनेक नौकरों वाले होते हैं॥४२॥
दामिनीयोगफलम्-
दामिन्यामुपकारी नयधनयुक्तो महेश्वरः ख्यातः।
बहुसुतरत्नसमृद्धो धीरो जायेत विद्वांश्च ॥४३॥
२०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
दामिनी योग में उत्पन्न पुरुष नीति और धन से युक्त, प्रभु, प्रसिद्ध, अनेक
पुत्र, रत्न से समृद्ध और धीर तथा पंडित होता है।।४३।।
पाशयोगफलम्-
पाशे बन्धनभाजः कार्ये दक्षाः प्रपञ्चकाराश्च।
बहुभाषिणो विशीला बहुभृत्याः सम्प्रतानाश्च ।।४४।।
पाश योग में उत्पन्न पुरुष बंधन को भोगने वाले, कार्य में चतुर, प्रपंची,
बहुत बोलने वाले, दुःशील और अनेक नौकरों से युक्त तथा परिवार वाले
होते हैं।।४४।।
केदारयोगफलम्-
सुबहूनामुपयोज्याः कृषीवलाः सत्यवादिनः सुखिनः।
केदारे सम्भूताश्चलस्वभावा धनैर्युक्ताः।।४५।।
केदार योग में उत्पन्न पुरुष बहुतों के उपकारी, कृषिकर्त्ता, सत्यवादी,
सुखी, चंचल और धनी होते हैं।।४५।।
शूलयोगफलम्-
तीक्ष्णालसधनहीना हिंस्राः सुबहिष्कृता महाशूराः।
संग्रामे लब्धयशस्काः शूले योगे भवन्ति नराः।।४६।।
शूल योग में उत्पन्न पुरुष बड़े आलसी, निर्धन, हिंसक,
जातिबहिष्कृत, शूरवीर, संग्राम में लब्धकीर्त्ति वाले होते हैं।।४६।।
युगयोगफलम्-
पाखण्डवादिनो वा धनरहिता वा बहिष्कृता लोके।
सुतमातृधर्मरहिता युगयोगे ये नरा जाताः।।४७।।
युग योग में उत्पन्न पुरुष पाखंडी, निर्धन, लोक में बहिष्कृत, पुत्र-
माता के धर्म से हीन होते हैं।।४७।।
गोलयोगफलम्-
बलसंयुक्ता विधना विद्याविज्ञानवर्जिता मलिनाः।
नित्यं दुःखितदीना गोले योगे भवन्ति नराः।।४८।।
गोलयोग में उत्पन्न पुरुष बलवान्, निर्धन, विद्या से हीन, मलिन, हमेशा
दुःखी और दीन होते हैं।।४८।।
सर्वास्वपि दशास्वेते भवेयुः फलदायिनः।
प्रा...मिति विज्ञेयाः प्रवदन्ति तवाग्रजाः।।४९।।
अनेकयोगाध्यायः २०७
इन योगों का फल सभी ग्रहों की दशा में होता है, यह पूर्वजों का निर्णय
है।।४९।।
इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे नाभसयोगाध्यायः चतुर्दशः ।।१४।।
अथानेकयोगाध्यायः
अथ गजकेसरीयोगस्तत्फलं चाह-
केन्द्रस्थिते देवगुरौ शशाङ्काद्योगस्तदाहुर्गजकेसरीति ।
दृष्टे सितार्येन्दुसुतैः शशाङ्के नीचास्तहीनैर्गजकेसरीति ।।१।।
चन्द्रमा से केन्द्र में गुरु हो तो गजकेसरी योग होता है और चन्द्रमा नीच-
अस्तादि में न गये हुए शुक्र, गुरु और बुध से देखा जाता हो तो
गजकेसरी योग होता है।।१।।
गजकेसरिसञ्जातस्तेजस्वी धनवान् भवेत्।
मेधावी गुणसम्पन्नो राजप्रियकरों भवेत् ।।२।।
इस योग में उत्पन्न पुरुष धनी, मेधावी, गुणी एवं राजा का प्रिय करने
वाला होता है।।२।।
अथामलायोगस्तत्फलं चाह-
लग्नाद्वा चन्द्रलग्नाद्वा दशमे शुभसंयुते ।
योगोऽयममला नाम कीर्त्तिराचन्द्रतारकी ।।३।।
राजपूज्यो महाभोगी दाता बन्धुजनप्रियः।
परोपकारी गुणवानमलायोगसम्भवः ।।४।।
जन्मलग्न से वा चन्द्रमा से दशम स्थान में केवल शुभग्रह हों तो अमला
योग होता हैं। अमला योग में उत्पन्न पुरुष की कीर्त्ति जब तक चन्द्रमा
आकाश में रहेगा तब तक रहती है और वह राजा से पूज्य, महाभोगी,
दाता और बंधुओं का प्रिय होता है ।।३-४।।
अथ शुभाशुभयोगस्तत्फलं चाह-
शुभाशुभाढ्ये यदि जन्मलग्ने शुभाशुभाख्यौ भवतस्तदानीम्।
व्ययस्वगैः पापशुभैर्विलग्नात्पापाख्यसौम्यग्रहकर्त्तरी च ।।५।।
शुभयोगभवो वाग्मी रूपशीलगुणान्वितः।
पापयोगोद्भवः कामी पापकर्मपरार्थयुक् ।।६।।
यदि लग्न में शुभग्रह युत हों तो शुभयोग और पापग्रह युत हों तो अशुभ
योग होता है। १२।२ भाव में पापग्रह हों तो पापकर्त्तरी और शुभग्रह हों
२०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
तो शुभकर्त्तरी होती है। शुभ योग वा शुभ कर्त्तरी हो तो जातक बुद्धिमान्,
रूप, शील, गुण से युक्त होता है। पापग्रह से उत्पन्न योग हो तो जातक कामी,
पापकर्म करने वाला होता है।।५-६।।
अथ पर्वतयोगस्तत्फलं चाह—
सौम्येषु केन्द्रगृहगेषु सप्तनरंध्रे शुद्धेऽथवा शुभयुते यदि पर्वतः स्यात्।
लग्नान्त्यपौ यदि परस्परकेन्द्रयातौ मित्रेक्षितौ भवति पर्वतनामयोगः ।।७।।
भाग्यान्वितः पर्वतयोगजातो विद्याविनोदाभिरतः प्रदाता।
कामो परस्त्रीजनकेलिलोलस्तेजो यशस्वी पुरनायकः स्यात् ।।८।।
यदि सातवें, आठवें भाव में कोई ग्रह न हो अथवा शुभग्रह से युत हो
और केन्द्रों में शुभग्रह हों तो पर्वत योग होता है। लग्नेश और व्ययेश
केन्द्र में हों और मित्रग्रह से देखे जाते हों तो पर्वत योग में उत्पन्न पुरुष
भाग्यवान्, विद्वान् और दाता होता है।।७-८।।
अथ काहलयोगस्तत्फलं चाह—
अन्यो ऽन्यकेन्द्रगृहगौ गुरुबन्धुनाथौ
लग्नाधिपे बलयुते यदि काहलः स्यात् ।
कर्मेश्वरेण सहिते तु विलोकिते वा
स्वोच्चे स्वके सुखपतौ यदि काहलः स्यात् ।।९।।
ओजस्वी साहसी मूर्खश्चतुरङ्गबलैर्युतः।
यत्किञ्चिद् ग्रामनाथस्तु काहले जायते नरः ।।१०।।
गुरु और चतुर्थेश परस्पर केन्द्र में हों और लग्नेश बली हो तो काहल
योग होता है। यदि सुखेश अपने उच्च या अपनी राशि का होकर कर्मेश
से युत हो तो काहल योग होता है। इस योग में उत्पन्न पुरुष तेजस्वी,
साहसी, मूर्ख, सेवा के बल से युक्त, कुछ ग्रामों का स्वामी होता है।।९-
१०।।
अथ चामरयोगस्तत्फलं चाह—
लग्नेश्वरे केन्द्रगते स्वतुंगे जीवेक्षिते चामरनामयोगः।
सौम्यद्वये लग्नगृहे कलत्रे नवास्पदे वा यदि चामरः स्यात् ।।११।।
योगे जातश्चामरे राजपूज्यो विद्वान् वाग्मी पंडितो वा महीपः।
सर्वज्ञः स्याद्वेदशास्त्राधिकारी जीवेल्लोके सप्ततिर्वत्सराणाम् ।।१२।।
अथानेकयोगाध्यायः २०९
लग्नेश अपनी उच्चराशि का होकर केन्द्र में हो और गुरु से देखा
जाता हो तो (चामर) योग होता है। यदि लग्न सप्तम वा नवम वा
दशम में दो शुभग्रह हों तो (चामर) योग होता है। चामरयोग में उत्पन्न
पुरुष राजा से पूज्य, विद्वान्, वक्ता, पंडित वा राजा, सर्वज्ञ, वेद
शास्त्र का अधिकारी, ७० वर्ष तक जीने वाला होता है॥११-१२॥
अथ शङ्खयोगः-
अन्योन्यकेन्द्रगृहगौ सुतशत्रुनाथौ लग्नाधिपे बलयुतेयदुशंखयोगः।
लग्नाधिपेच गगनाधिपतौ चरस्थे भाग्याधिपेबलयुते तु तथावदन्ति।।
शंखे जांतो भोगशीलो दयालुः स्त्रौपुत्रार्थक्षेत्रवान् पुण्यकर्मा।
शास्त्रज्ञानाचारसाधुक्रियावान् जीवेल्लोके वत्सराणामशीतिः ।।१४।।
पंचमेश, षष्ठेश परस्पर केन्द्र में हों, लग्नेश बलवान् हो तो शंख योग
होता है। लग्नेश, कर्मेश दोनों चर राशि में हों, भाग्येश बली हो तो (शंख)
योग होता है। शंख योग में उत्पन्न पुरुष भोगी, दयालु, स्त्री, पुत्र, धन
और क्षेत्र से युक्त पुण्य कार्य करने वाला, पंडित, सज्जन और ८० वर्ष
तक जीने वाला होता है।।१३-१४।।
अथ भेरीयोगमाह-
स्वान्त्योदयास्तभवनेषु वियच्चरेषु कर्माधिपेबलयुते यदि भेरियोगः।
केन्द्रे गते सुरगुरौ सितलग्ननाथौभाग्येश्वरे बलयुतेतु तथैववाच्यम् ।।
दीर्घायुषो विगतरोगभया नरेन्द्रा
बह्वर्थभूमिसुतदारयुताः प्रसिद्धाः।
आचारभूरिसुखशौर्यर्महानुभावा
भेरीप्रजागमनुजा निपुणाः कुलीनाः।।१६।।
यदि २।१२।७ भाव में ग्रह हों और कर्मेश बली हो तो भेरी योग होता
है। भाग्येश बली हो, गुरु, शुक्र, लग्नेश केन्द्र में हों तो भेरी योग
होता है। भेरी योग में उत्पन्न पुरुष दीर्घायु, नीरोगी, निर्भय, राजा, भूमि, धन,
पुत्र, स्त्री से युक्त, प्रसिद्ध, आचारवान्, सुख-पराक्रम से युक्त, निपुण और
कुलीन होते हैं।।१५-१६।।
अथ मृदङ्गयोगमाह-
उच्चग्रहांशकपती यदि कोणकेन्द्रे
तुङ्गस्वकीयभवनोपगते बलाढ्ये।
२१० . बृहत्पराशरहोराशास्त्रम्
लग्नाधिपे बलयुते तु मृदङ्गयोगः
कल्याणरूपनृपतुल्ययशः प्रदः स्यात् ।।१७।।
जन्मकाल में ग्रह उच्चराशि का हो, उसके नवांश का स्वामी यदि केन्द्र,
कोण में अपने उच्च, स्वगृह में हो, बली हो और लग्नेश बली हो तो मृदंग
योग होता है। इस योग में उत्पन्न पुरुष कल्याणकारी, राजा के समान यश
वाला होता है।।१७।।
अथ श्रीनाथयोगमाह-
कामेश्वरे कर्मगते स्वतुंगे कर्माधिपे भाग्यपसंयुते च।
श्रीनाथयोगः शुभदस्तदानीं जातो नरः शक्रसमो नृपालः ।।१८।।
सप्तमेश दशम स्थान में हो, अपनी उच्चराशि में कर्मेश भाग्येश
के साथ हो तो श्रीनाथ योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष इन्द्र के समान
राजा होता है।।१८।।
अथ शारदयोगः-
योगः शारदसंज्ञकः सुतगते कर्माधिपे चन्द्रजे
केन्द्रस्थे दिननायके निजगृहप्राप्तेऽतिवीर्यान्विते।
चन्द्रात्कोणगते पुरन्दरगुरौ सौम्यत्रिकोणे कुजे
लाभे वा यदि देवमन्त्रिणि बुधात्तच्छारदासंज्ञकः ।।१९।।
स्त्रीपुत्रबन्धुसुखरूपगुणानुरक्ता
भूपप्रियां गुरुमहीसुरदेवभक्ताः।
विद्याविनोदरतिशीलतपोबलाढ्या
जाताः स्वधर्मनिरता भुवि शारदाख्ये ।।२०।।
यदि पाँचवें भाव में कर्मेश हो, बुध केन्द्र में हो और सूर्य अपनी राशि
में अत्यंत बली हो अथवा चंद्रमा से ९, ५ भाव में गुरु हो, बुध से
त्रिकोण में भौम हो, बुध से लाभ भाव में गुरु हो तो शारद योग होता है।
शारद योग में उत्पन्न पुरुष विद्या का विनोदी, कामी, शीलवान्, तपस्वी,
अपने धर्म में निरत, स्त्री, पुत्र, बंधु के सुख से युक्त, राजा का प्रिय, गुरु,
ब्राह्मण तथा देवता का भक्त होता है।।१९-२०।।
अथ मत्स्ययोगः-
लग्नधर्मगते पापे पञ्चमे सदसद्युते।
चतुरस्रगते पापे योगोऽयं मत्स्यसंज्ञकः ।।
कालज्ञः करुणासिन्धुर्गुणधीबलरूपवान्।
यशोविद्यातपस्वी च मत्स्ययोगसमुद्भवः ।।२१।।
अथानेकयोगाध्यायः २११
लग्न से नवम भाव में पापग्रह हो, पाँचवें भाव में शुभग्रह, पापग्रह दोनों
हों, चौथे या आठवें भाव में पापग्रह हों तो मत्स्य योग होता है।
मत्स्ययोग में उत्पन्न पुरुष ज्योतिषी, करुणा की मूर्ति, गुणी, विद्वान्, बली,
रूपवान्, यशस्वी वा तपस्वी होता है।।२१।।
अथ कूर्मयोगः-
कलत्रपुत्रारिगृहेषु सौम्याः स्वतुङ्गमित्रांशकराशियाताः।
तृतीयलाभोदयगास्त्वसौम्या मित्रोच्चसंस्था यदि कूर्मयोगः।।२२।।
विख्यातकीर्त्तिर्भुवि राज्यभोगी धर्माधिकः सत्त्वगुणप्रधानः।
धीरः सुखी वागुपकारकर्त्ता कूर्मोद्भवो मानवनायको वा ।।२३।।
अपने उच्च वा मित्रांश वा अपनी राशि में शुभग्रह ७-५-६ भाव में
हो और अपने मित्र वा उच्च की राशि में गये हुए पापग्रह ३-११-
१ भाव में हों तो कूर्मयोग होता है। कूर्मयोग में उत्पन्न पुरुष प्रसिद्ध
कीर्त्तिवाला, राज्यभोग करने वाला, धार्मिक, सात्त्विक, धीर, सुखी,
वाणी से उपकार करनेवाला अथवा राजा होता है।।२२-२३।।
अथ खड्गयोगमाह-
भाग्येशे धनभावस्थे धनेशे भाग्यराशिगे।
लग्नेशे केन्द्रकोणस्थे खड्गयोग इतीरितः।।२४।।
वेदार्थशास्त्रनिखिलागमतत्त्वयुक्ति-
बुद्धिप्रतापबलवीर्यसुखानुरक्ताः।
निर्मत्सराश्च निजवीर्यमहानुभावाः
खड्गे भवन्ति पुरुषाः कुशलाः कृतज्ञाः।।२५।।
भाग्येश धनभाव में हो और धनेश भाग्यभाव में हो और लग्नेश केन्द्र-
कोण में हो तो 'खड्गयोग' होता है। खड्गयोग में उत्पन्न पुरुष वेद
के अर्थ को जानने वाले, शास्त्र तथा समस्त आगमशास्त्र के तत्त्व को
जाननेवाले, बुद्धिमान्, प्रतापी, बलवान्, सुखी, मत्सरता से रहित, अपने
पराक्रम से श्रेष्ठ, कुशल और कृतज्ञ होते हैं।।२४-२५।।
अथ लक्ष्मीयोगफलम्-
केन्द्रमूलत्रिकोणस्थे भाग्येशे परमोच्चगे।
लग्नाधिपे बलाढ्ये च लक्ष्मीयोग इतीरितः।।२६।।
गुणाभिरामो बहुदेशनाथो विद्यामहाकीर्त्तिरनङ्गरूपः।
दिगन्तविश्रान्तनृपालवन्द्यो राजाधिराजो बहुदारपुत्रः।।२७।।
२१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
भाग्येश अपने परम उच्च में होकर केन्द्र (१-४-७-१०) वा अपनी मूल
त्रिकोण राशि में हो और लग्नेश बलवान् हो तो 'लक्ष्मी' योग
होता है। लक्ष्मी योग में उत्पन्न पुरुष गुणों से युक्त, अनेक देशों का स्वामी,
विद्या तथा महत्कीर्त्ति से युक्त, कामदेव के समान स्वरूप, दिशाओं
में प्रसिद्ध, राजाओं से पूज्य, राजाओं का राजा और अनेक स्त्री-पुत्रों
से युक्त होता है।।२६-२७।।
अथ कुसुमयोगस्तत्फलं चाह-
स्थिरलग्ने भृगौ केन्द्रे त्रिकोणेन्दौ शुभेतरे।
मानस्थानगते सौरे योगोऽयं कुसुमो भवेत्।।२८।।
दाता महीमण्डलनाथवन्द्यो
भोगी महावंशजराजमुख्यः।
लोके महाकीर्तियुतः प्रतापी
नाथो नराणां कुसुमोद्भवः स्यात्।।२९।।
स्थिरलग्न (२-५-८-११) में जन्म हो और शुक्र केंद्र में हो, चंद्रमा ५वें
भाव में हो और १०वें स्थान में शनि हो तो 'कुसुम' योग होता है।
कुसुम योग में उत्पन्न पुरुष दाता, राजाओं से वंद्य, भोगी, उत्तम कुल
में उत्पन्न, राजाओं में मुख्य, संसार में कीर्तियुक्त, प्रतापी और राजा
होता है।।२८-२९।।
अथ पारिजातयोगस्तत्फलं चाह-
विलग्ननाथस्थितराशिनाथः स्थानेशराशीशतदंशनाथः।
केन्द्रत्रिकोणायगतो यदि स्यात्स्वतुङ्गगो वा यदि पारिजातः।।३०।।
मध्यान्तसौख्यः क्षितिपालवन्द्यो युद्धप्रियो वारणवाजियुक्तः।
स्वकर्मधर्माभिरतो दयालुर्योंगो नृपः स्याद्यदि पारिजातः।।३१।।
लग्नेश जिस राशि में हो, उसका स्वामी जिस राशि में हो, उसका स्वामी
वा उसके नवांश का स्वामी यदि केन्द्र, त्रिकोण, लाभ स्थान में अथवा
अपनी उच्चराशि में हो तो 'पारिजात' योग होता है। पारिजात योग में उत्पन्न
पुरुष मध्य और अंतिम अवस्था में सुखी, राजा से वंदनीय, युद्धप्रिय,
हाथी-घोड़ों से युक्त, अपने धर्म-कर्म में रत, दयालु होता है।।३०-३१।।
अथ कलानिधियोगस्तत्फलं चाह-
द्वितीये पञ्चमे जीवे बुधशुक्रयुतेक्षिते।
क्षेत्रे तयोर्वा सम्प्राप्ते योगः स्यात्स कलानिधिः।।३२।।
अथानेकयोगाध्यायः २१३
कामी कलानिधिभवा सुगुणाभिरामः
संस्तूयमानचरणो नरपालमुख्यैः।
सेनांतुरङ्गमदवारणशङ्खभेरी
वाद्यान्वितो विगतरोगभयारिसङ्घः ।।३३।।
दूसरे या पाँचवें स्थान में गुरु हो, बुध, शुक्र से युत वा दृष्ट हो अथवा
इन्हीं की राशि में हो तो 'कलानिधि' योग होता है। कलानिधि योग में
उत्पन्न पुरुष कामी, सुंदर गुणों से युक्त, राजाओं से पूज्यचरण वाला, सेना,
घोड़ा, मतवाले हाथी, शंख, भेरी आदि बाजाओं से युक्त, रोग, भय
और शत्रु से रहित होता है।।३२-३३।।
अथ पारिजातादियोगफलानि—
सपारिजातद्युचरः सुखानि नीरोगतामुत्तमवर्गयातः।
सगोपुरांशो यदि गोधनानि सिंहासनस्थः कुरुते विभूतिम् ।।३४।।
करोति पारावतभागयुक्तो विद्यायशःश्रीविपुलं नराणाम्।
सदेवलोको बहुयानसेनामैरावतस्थो यदि भूपतित्वम् ।।३५।।
अपने पारिजात भाग (पृ० ५३) में ग्रह हो तो सुख होता है। उत्तम
वर्ग में हो तो नीरोग करता है। गोपुरांश में हो तो गौ और धन
देता है। सिंहासनांश में हो तो विभूति अर्थात् ऐश्वर्य को देता है। पारावत
भाग में हो तो विद्या, यश, विपुल लक्ष्मी को देता है। देवलोकांश
में हो तो अनेक सवारी और सेना से युक्त होता है। ऐरावत अंश में हो तो
जातक राजा होता है।।३४-३५।।
अथ लग्नाधियोगस्तत्फलं चाह—
लग्नाच्च दाराष्टमगेहसंस्थैः शुभैर्न पापग्रहयोगदृष्टैः।
लग्नाधियोगो हि तथा प्रसिद्धः पापैः सुखस्थानविवर्जितैश्च ।।३६।।
लग्नाधियोगे बहुशास्त्रकर्त्ता विद्याविनीतश्च बलाधिकारी।
मुख्यस्तु निष्कापटिको महात्मा लोके यशोवित्तगुणाधिकः स्यात्।।
लग्न से सातवें, आठवें भाव में शुभग्रह पापग्रह से दृष्ट-युत न हों और
चौथे भाव में पापग्रह न हों तो लग्नाधियोग होता है। लग्नाधियोग में
उत्पन्न जातक अनेक शास्त्रों को बनाने वाला, विद्वान्, नम्र, सेनाधिकारी,
मुख्यतः निष्कपट महात्मा और संसार में यश, धन और गुण से प्रसिद्ध
होता है।।३६-३७।।
२१४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ चन्द्रयोगानाह-
सहस्ररश्मितश्चन्द्रे कण्टकादिगते सति ।
न्यूनमध्यवरिष्ठानि धनधीनैपुणानि च ।।३८।।
स्वांशे वा स्वाधिमित्रांशे स्थिते चेद्दिवसे शशी ।
गुरुणा दृश्यते तत्र जातो वित्तसुखान्वितः ।।३९।।
स्वाधिमित्रांशगश्चन्द्रो दृष्टो दानवमन्त्रिणा ।
निशासु कुरुते लक्ष्मीं छत्रध्वजसमाकुलम् ।
विपर्यस्थे तु शीतांशौ जायन्तेऽल्पधना नराः ।।४०।।
यदि सूर्य से चंद्रमा केन्द्र में हो तो जातक को धन, बुद्धि और निपुणता
अल्प होती है। चंद्रमा पणफर में हो तो धन की निपुणता मध्यम होती है
और चंद्रमा आपोक्लिम में हो तो धन आदि उत्तम होते हैं। यदि दिन में
जन्म हो और चंद्रमा गुरु से देखा जाता हुआ अपने नवांश में वा अधिमित्र
के अंश में हो तो जातक धनी और सुखी होता है। रात्रि का जन्म
हो और चंद्रमा अपने अधिमित्रांश में होकर शुक्र से देखा जाता हो तो लक्ष्मी,
छत्र, ध्वज से युक्त मनुष्य होता है। इसके विपरीत चंद्रमा हो तो अल्पधनी
होता है ।।३८-४०।।
अथ चन्द्राधियोगस्तत्फलं चाह-
शशिनः सौम्याः षष्ठे द्यूने वा निधनसंस्थिते ।
स्यादधियोगो जाताः सौम्यैः सबलैरधराधीशः ।
मध्यबलैर्मन्त्री स्यादधमबलैः सैन्यनायकः ।।४१।।
चन्द्राद्वृद्धिगतैः सौम्यैः धर्मशीलो महाधनी ।
द्वाभ्यां समोऽल्पवसुमानेकेन परिकीर्त्तितः ।
चन्द्रालग्नाद्ग्रहाभावे दरिद्रो दुःखितो भवेत् ।।४२।।
चंद्रमा से शुभग्रह ६-७-८ भाव में हो तो 'अधियोग' होता है। यदि
शुभग्रह बली हों तो अधियोग में उत्पन्न जातक राजा होता है। मध्यम
बली हों तो मंत्री, अधम बली हों तो सेनानायक होता है। चंद्रमा से
(३-६-११) भाव में शुभग्रह हों तो जातक धर्मशील एवं महाधनी होता
है। दो शुभग्रह हों तो समधनी और एकं शुभग्रह हो तो अल्पधनी
होता है। यदि चंद्रमा से वा लग्न से उक्तस्थानों में ग्रह न हों
तो दरिद्र होता है।।४१-४२।।
अथानेकयोगाध्यायः २१५
अथ सुनफाऽनफादियोगानाह-
शीतांशोर्द्रविणस्थितैश्च सुनफायोगोऽनफाऽन्त्यस्थितैः
स्वान्त्यस्थैः खचरैर्भवेद्दुरुधरा पङ्केरुहेशोज्झितैः।
चेद्वित्तव्ययगा भवन्ति न खगा केमद्रुमः स्यात्तदा
प्राचीनैर्मुनिभिः स्मृताः श्रुतिमिता योगाः शशाङ्कोद्भवाः।।४३।।
चंद्रमा से दूसरे भाव में सूर्य को छोड़कर शेष ग्रहों में से कोई हो तो
'सुनफा' योग, बारहवें भाव में हो तो 'अनफा' योग, चक्र से दूसरे बारहवें
भाव में ग्रह हो तो 'दुरुधरा' योग होता है। यदि चक्र से २-१२ भाव में ग्रह
न हों तो 'केमद्रुम' योग होता है। ये ४ प्रकार के चंद्रयोग मुनियों ने कहे
हैं।।४३।।
अथ सुनफायोगफलम्-
भूमीपतेश्च सचिवः सुकृती कृती च
नूनं भवेन्निजभुजार्जितवित्तयुक्तः।
ख्यातः सदाखिलजनेषु विशालकीर्त्या
बुद्ध्याधिकश्च मनुजः सुनफाभिधाने।।४४।।
सुनफा योग में उत्पन्न पुरुष राजमंत्री, सुंदर यशस्वी, अपने बाहुबल से
उपार्जित धन से युक्त, प्रसिद्ध, बड़ी कीर्तिवाला, बुद्धिमान् होता है।।४४।।
अथाऽनफायोगफलम्-
प्रभुर्विनीतः शुभवाग्विलाससच्छीलशाली गुणपूर्त्तियुक्तः।
उदारकीर्त्तिः स्मरतुष्टचित्तो नित्यं नरः स्यादनफाभिधाने।।४५।।
अनफा योग में उत्पन्न पुरुष समर्थ, नम्र, सुंदर वाणी, उदार, कीर्त्तियुक्त
एवं कामी होता है।।४५।।
अथ दुरुधरायोगफलम्-
सद्वित्तसद्धारणवाहधात्रीसौख्याभियुक्तः सततं हतारिः।
कान्तासुनेत्राञ्चललालसः स्याद्योगे सदा दौरधरे मनुष्यः।।४६।।
दुरुधरा योग में उत्पन्न पुरुष धन-वाहन सुख से युक्त, विजित शत्रुपक्ष
वाला, स्त्री से संतुष्ट होता है।।४६।।
२१६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
· अथ केमद्रुमयोगफलम्-
सद्दित्तसूनुवनितातत्मजनैर्विहीनः
प्रेष्यो भवेत्तु मनुजो हि विदेशवासी।
नित्यं विरुद्धधिषणो मलिनः कुवेषः
केमद्रुमे च मनुजाधिपतेः सुतोऽपि॥४७॥
केमद्रुम योग में उत्पन्न जातक धन, पुत्र, स्त्री, बंधु से हीन होता
है, दास और परदेशी होता है, नित्य मलिन कुवेषधारी होता है;
चाहे वह राजा का ही लड़का हो तो भी॥४७॥
अथ केमद्रुमभङ्गयोगः-
प्रालेयांशुः सूतिकाले यदा वै सर्वैः खेटैर्वीक्ष्यमाणास्तदा वै।
दीर्घायुष्यं राजयोगं मनुष्यं सत्कोशाढ्यं हन्ति केमद्रुमं च॥४८॥
यदि जन्म समय में चंद्रमा सभी ग्रहों से देखा जाता हो तो जातक के
केमद्रुम योग के दुष्टफल का नाश कर दीर्घायु, धनी और राजा बनाता
है॥४८॥
सर्वे खेटाः केन्द्रकोणेषु संस्था दुष्टो योगश्चापि केमद्रुमोऽयम्।
दुष्टं सर्वं स्वं फलं संविहाय कुर्युः पुंसां सत्फलं वै विचित्रम्॥४९॥
यदि सभी ग्रह केन्द्र-कोण में हों तो यह दुष्ट केमद्रुम योग का नाश
कर उसके दुष्ट फलों का भी नाश कर मनुष्य को शुभफल देते हैं॥४९॥
सर्वेषु चन्द्रयोगेषु चेदं यत्नाद्विचिन्तयेत्।
केमद्रुमादिका योगाः सम्भवेऽस्य लयं ययुः॥५०॥
सभी चक्र योगों में इसका विशेष विचार करना चाहिए। क्योंकि सभी
शुभ योगों के रहते यदि केमद्रुम योग हो तो उसका नाश होता है॥५०॥
· अथ रवियोगानांह-
व्ययधनयुतखेटैर्वोशिवेशी दिनेशा-
दुभयचरिकयोगश्चोभयस्थानसंस्थैः।
निजगृहसुहृदुच्चस्थानयातैश्च जाता
बहुधनसुखयुक्ता राजतुल्या भवन्ति॥५१॥
सूर्य से बारहवें ग्रह हो तो 'वोशि' योग, दूसरे भाव मे हो तो 'वेशि' योग
और २/१२ दोनों भावों में ग्रह हों तो 'उभयचरिक' योग होता
अथानेकयोगाध्यायः २१७
है। योगकर्त्ता ग्रह यदि अपने गृह वा मित्रगृह वा अपने उच्चस्थान में हो तो
जातक बहुत धन-सुख से युक्त राजा के समान होता है।।५१।।
अथ वोशियोगफलम्-
स्यान्मन्ददृष्टिर्बहुकर्मकर्त्ता पश्यत्यधश्चोन्नतपूर्वकायः।
असत्यवादी यदि वोशियोगो प्रसूतिक्राले मनुजस्य यस्य ।।५२।।
वोशि योग में उत्पन्न पुरुष मंददृष्टिवाला, बहुत कार्य करने वाला,
नीचे देखने वाला, ऊँचा शरीर और झूठ बोलने वाला होता है।।५२।।
अथ वेशियोगफलम्-
चत् सम्भवे यस्य च वेशियोगे भवेद्दयालुः पृथुपूर्वकायः।
स्याद्वाग्विलासालसतासमेतस्तिर्यक्प्रचारः खलु तस्य दृष्टे ।।५३।।
वेशि योग मे उत्पन्न जातक दयालु, मोटा शरीर, वाणी बोलने में
चंतुर, आलसी और तिरछी निगाह वाला होता है।।५३।।
अथो-भयचरीयोगफलम्-
सर्वसहः स्थिरतरोऽतितरां समृद्धः
सत्त्वाधिकः समशरीरविराजमानः।
नात्युच्चकः सरलदृक् प्रबलामलश्री-
युक्तः किलोभयचरीप्रभवो नरः स्यात् ।।५४।।
उभयचरी योग में उत्पन्न जातक सबका सहन करने वाला, स्थिर
स्वभाव, अत्यन्त समृद्ध, अधिक बलवान् शरीर वाला, छोटा कद, एक-
सी सीधी दृष्टि और अधिक लक्ष्मी से युक्त होता है।।५४।।
इति योगाध्यायः।
अथ राजयोगादिफलाध्यायः
पराशर उवाच-
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि राजयोगादिकं परम्।
ग्रहाणां स्थानभेदेन राशिदृष्टिवशात्फलम् ।।१।।
पराशर ने कहा—अब मैं राजयोग आदि को कह रहा हूँ, जो कि ग्रहों
के स्थानभेद और राशिदृष्टिवश से फल देने वाले होते हैं।।१।।
तपस्थानाधिपो राजा मन्त्री मन्त्राधिपो भवेत्।
उभावन्वोन्यसंदृष्टौ जातश्चेदिह राज्यभाक् ।।२।।
२१८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
इनमें मुख्य दो ग्रह होते हैं- १. भाग्येश राजा होता है और २. पंचमेश
मंत्री होता है। दोनों का परस्पर दृष्टिसंबंध हो तों जातक राजा होता
है॥२॥
यत्र कुत्रापि संयुक्तौ तौ वापि समसप्तमौ।
राजवंशोद्भवो बालो राजा भवति निश्चितम् ।।३।।
उक्त दोनों ग्रह कहीं पर एक साथ हों अथवा एक दूसरे के सातवें भाव
में हों तो इस योग में राजा का लड़का राजा होता है।।३।।
वाहनेशस्तथा माने मानेशो वाहने स्थितः।
बुद्धिधर्माधिपाभ्यां तु दृष्टश्चेदिह राज्यभाक् ।।४।।
सुखेश दशम स्थान में और कर्मेश सुख स्थान में और पंचमेश नवमेश
से देखा जाता हो तो राजयोग होता है।।४।।
सुतेशकर्मेशसुखेशलग्ननाथा यदा धर्मपसंयुताश्चेत्।
नृपोत्तमश्चेदिह वारणाढ्यः स्वतेजसा व्याप्तदिगन्तरालः ।।५।।
पंचमेश, कर्मेश, सुखेश, लग्नेश यदि धर्मेश से युत हों तो हाथी, घोड़े
आदि से युक्त अपने तेज से दिशाओं में प्रसिद्ध उत्तम राजा होता है।।५।।
सुखकर्माधिपौ चैव मन्त्रिनाथेन संयुतौ।
धर्मेशेनाऽथ वा युक्तौ जातश्चेदिह राज्यभाक् ।।६।।
सुखेश, कर्मेश यदि पंचमेश धर्मेश से युत हों तो जातक राज्य का
अधिकारी होता है।।६।।
सुतेश्वरो धर्मपसंयुतश्चे-
ल्लग्नेश्वरेणापि युतो विलग्ने।
सुखेऽथवा मानगृहेऽथ वा स्याद्
राज्याभिषिक्तो यदि राजवंश्यः ।।७।।
पंचमेश, धर्मेश लग्नेश से युत होकर लग्न में हों वा चतुर्थ वा दशम
स्थान में हों तो यदि राजा का लड़का हो तो वह राजा होता है।।७।।
धर्मस्थाने गुरुक्षेत्रे स्वगृहे भृगुसंयुते।
पञ्चमाधिपसंयुक्ते जातश्चेदिह राज्यभाक् ।।८।।
नवम स्थान में गुरु की राशि हो और अपने स्थान में शुक्र हो तथा
पंचमेश से युत हो तो राजा होता है।।८।।
अथ राजयोगादिफलाध्यायः २१९
निशार्धाच्च दिनार्धाच्च परं सार्धद्विनाडिका।
शुभो तदुद्भवो राजा धनी वा तत्समोऽपि वा ।।१९।।
आधी रात के बाद और दोपहर के बाद अढ़ाई घटी २½ शुभवेला होती
है। इस समय में उत्पन्न बालक धनी के समान होता है।।१९।।
चन्द्रः कविं कविश्चन्द्रं पश्यति लाभतृतीयगः।
शुक्राच्चन्द्रे ततः शुक्रे तृतीये वाहनार्थवान् ।।२०।।
चन्द्रमा शुक्र को और शुक्र चन्द्रमा को एकादश, तीसरे भाव में होकर
परस्पर देखते हों तो वाहन और धन से पूर्ण होता है। इसमें चाहे जो तीसरे
भाव में हो।।२०।।
अथ चतुर्विधसम्बन्धमाह-
प्रथमः स्थानसम्बन्धो दृष्टिस्तु द्वितीयकः।
तृतीयस्त्वेकतो दृष्टिः स्थित्येकत्र चतुर्थकः।।२१।।
योगकर्त्ता ग्रह परस्पर एक-दूसरे की राशि में हों अथवा परस्पर देखते
हों, अपने-अपने स्थान में होकर देखते हों वा एक ही राशि में हों;
ये चार प्रकार के संबंध ग्रहों के होते हैं।।२१।।
अथ पारिजातादियोगफलम्-
तन्वीशः पारिजातस्थस्तदा दाता भवेन्न हि।
उत्तमे चोत्तमो दाता गोपुरे पुरुषत्वयुक् ।।२२।।
यदि लग्नेश पारिजात अंश में हो तो जातक दाता नहीं होता है। उत्तमांश
में हो तो उत्तम दाता होता है। गोपुर में हो तो पुरुषत्व से युक्त होता है।।२२।।
सिंहासने भवेन्मान्यः शूरः पारावतांशके।
सभासदो देवलोके द्वितीये च मुनिर्मतः ।।२३।।
सिंहासनांश में सर्वजनमान्य, पारावतांश में हो तो शूरवीर,
देवलोकांश में हो तो सभासद् और दूसरे में हो तो मुनि-समान होता
है।।२३।।
ऐरावते गजे दुष्टो दिग्योगो न भवेद् ध्रुवम्।
सुखेशो वापि जायेशो राज्येशोऽप्येवमेव हि।।२४।।
ऐरावत में दुष्ट होता है, इसी प्रकार सुखेश, सप्तमेश और कर्मेश
के फल को जानना चाहिए।।२४।।
२२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पारिजाते सुताधीशो विद्या चैव कुलोचिता ।
उत्तमे चोत्तमा विद्या गोपुरे भवनाऽङ्किता ॥१५॥
पंचमेश पारिजातांश में हो तो कुलानुसार विद्या होती है। उत्तमांश में
हो तो उत्तम विद्या, गोपुरांश में हो तो कुलानुसार होती है।।१५।।
सिंहासने तथा वाच्या साचिव्येन युता तथा।
पारावते तथा वाच्यं ब्रह्मविद्यासमन्वितम् ॥१६॥
सिंहासन में मंत्रित्व-योग्य विद्या और पारावत में ब्रह्मविद्या युक्त विद्या
होती है।।१६।।
सुतेशे देवलोकस्थे कर्मयोगान्वितो भवेत्।
उपासना द्वितीये स्याद्भक्तिस्त्वैरावते भवेत् ॥१७॥
पंचमेश देवलोकांश में हो तो जातक कर्मयोगी, दूसरे में उपासक,
ऐरावत में भक्तियुक्त होता है।।१७।।
धर्मेशे पारिजातस्थे तीर्थकृत्तत्र जन्मनि।
पूर्वेऽपि मनुजो जातो ह्युत्तमे चोत्तमो भवेत् ॥१८॥
धर्मेश पारिजातांश में हो तो इस जन्म और पूर्वजन्म दोनों
में तीर्थयात्री होता है, उत्तमांश में उत्तम।।१८।।
गोपुरे मखकर्त्ता च परे चैवात्र जन्मनि।
सिंहासने भवेद्धीरः सत्यवादी जितेन्द्रियः॥१९॥
गोपुरांश में हो तो इस जन्म और दूसरे जन्म में यज्ञकर्त्ता होता है।
सिंहासनांश में हो तो धीर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय होता है।।१९।।
सर्वधर्मपरित्यागी धर्मैकपदमाश्रितः।
पारावते परे चैव हंसश्चैवात्र जन्मनि॥२०॥
सभी धर्मों को त्यागकर एक धर्म का व्यवस्थापक होता है। पारावतांश
में इस जन्म और परजन्म में जातीय पुरुष होता है।।२०।।
लगुडी पितृदण्डी स्याद्देवलोके न संशयः।
द्वितीये चेन्द्रपदं गच्छेत्कृत्वा वै हयमेधकम् ॥२१॥
देवलोकांश में हो तो दंडधारी संन्यासी और दूसरे में अश्वमेध यज्ञ
करके इन्द्रपद को पाता है।।२१।।
ऐरावते तु धर्मात्मा स्वयं धर्मो भविष्यति।
श्रीरामः कुन्तिपुत्रो वा द्वितीयो न भविष्यति ॥२२॥
अथ राजयोगादिफलाध्यायः २२१
ऐरावतांश में हो तो स्वयं धर्माचार्य होता है, चाहे श्रीराम हों वा
युधिष्ठिर होता है।।२२।।
अथ विशेषयोगफलम्—
अथ योगफलं ब्रूमो ज्ञातव्यं च विशेषतः।
पारिजातादिकानां च फलमेवैकसंस्थितम् ।।२३।।
अब विशेषकर योगफल को कह रहा हूँ, पारिजातादि योगों से भिन्न
इनका फल होता है।।२३।।
लक्ष्मीस्थानं त्रिकोणं च विष्णुस्थानं च केन्द्रकम्।
तयोः सम्बन्धमात्रेण राजयोगादिकं भवेत् ।।२४।।
त्रिकोण (९।५) लक्ष्मी का स्थान और केन्द्र (१।४।७।१०) विष्णु
का स्थान है। इन दोनों के संबंध मात्र से राजयोग होता है।।२४।।
केन्द्रपुत्रेशयोर्योगे योगोऽमात्याभिधो भवेत्।
पारिजातादिके तौ च तदा स प्रबलो भवेत् ।।२५।।
केन्द्रेश और पंचमेश के योग से 'अमात्य' नाम का योग होता है।
यदि योगकारक पारिजातादि वर्ग में हो तो प्रबल राजयोग होता है।।२५।।
लग्नेशेन धनेशाद्यात्रैव योगः प्रकीर्त्तितः।
मन्त्रेशोऽमात्यतां याति सप्तमाधीशयोगतः ।।२६।।
लग्नेश के साथ धनेश आदि के संबंध से योग नहीं होता है। पंचमेश
सप्तमेश से योग होता हो तो अमात्य योग होता है।।२६।।
कर्मेशस्य तु योगेन राजा साचिव्यतामियात्।
केन्द्रधर्मेशयोर्योगे राजा वै राजवन्दितः।।२७।।
इसी में कर्मेश योग करता हो तो राजा या मंत्री होता है। केन्द्रेश और
नवमेश का योग हो तो राजा से वंदित राजा होता है।।२७।।
धर्मकर्माधिपौ चैव व्यत्यये तावुभौ स्थितौ।
युक्तश्चेद्द्वौ तदा वाच्यः सर्वसौख्यसमन्वितः ।।२८।।
धर्मेश, कर्मेश व्यत्यय से अर्थात् धर्मेश कर्म में और कर्मेश धर्म भाव
में अथवा एकत्र युक्त हों तो सभी सुखों से युक्त होता है।।२८।।
पारिजाते स्थितौ तौ तु दण्डे लोकानुशिक्षकः।
उत्तमे चोत्तमो भूयो गजवाजिरथादिमान् ।।२९।।
२२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
यदि धर्मेश कर्मेश पारिजात में हों तो राजा दंड का शिक्षक होता है।
उत्तमांश में हो तो हाथी-घोड़े से युक्त उत्तम राजा होता है।।२९।।
गोपुरे नृपशार्दूलो पूजितांघ्रिर्नृपैर्भवेत्।
सिंहासने चक्रवर्त्ती सर्वक्षोणीशपालकः।।३०।।
गोपुरांश में हों तो राजाओं में सिंह, राजाओं से पूज्यचरण वाला
राजा होता है। सिंहासनांश में हों तो सभी राजाओं का पालन
करने वाला चक्रवर्ती राजा होता है।।३०।।
इति राजयोगादिविचारकथनम्।
अथ राजयोगाध्यायः
पराशर उवाच-
अथातः संप्रवक्ष्यामि राजयोगां द्विजोत्तम।
येषां विज्ञानमात्रेण नृपपूज्यो जनो भवेत्।।१।।
पराशर ने कहा-हे विप्र ! अब मैं राजयोगों को कहता हूँ, जिनके
जानने से मनुष्य राजा से पूज्य होता है।।१।।
ये ये योगाः पुरा शम्भुभाषिताः शैलजाग्रतः।
तेषां सारमहं वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन।।२।।
पहले शंकरजी ने पार्वतीजी से जिन-जिन योगों को कहा था मैं उनके
सार को तुमसे कह रहा हूँ।।२।।
चिन्तयेत्कारके लग्ने जनुर्लग्नेऽथवा द्विज।
राजयोगप्रदातारौ लग्नौ द्वौ प्रथमोदितौ।।३।।
आत्मकारकांश लग्न और जन्मलग्न यही दो लग्न मुख्यतः राजयोग-
कारक होते हैं।।३।।
आत्मकारकपुत्राभ्यां राजयोगं प्रकल्पयेत्।
तनुपञ्चमनाथाभ्यां तथैव द्विजसत्तम।।४।।
आत्मकारक और पंचमेश से राजयोग को देखना चाहिए। इसी प्रकार
जन्मलग्न और उससे पंचमाधिपति द्वारा राजयोग देखना चाहिए।।४।।
विलग्नात्पञ्चमाधीशः पुत्रात्माकारको द्वयः।
विप्रसम्बन्धयोगेन ज्ञेयाः वीर्यबलान्विताः।।५।।