बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पारिजाते सुताधीशो विद्या चैव कुलोचिता ।
उत्तमे चोत्तमा विद्या गोपुरे भवनाऽङ्किता ॥१५॥
पंचमेश पारिजातांश में हो तो कुलानुसार विद्या होती है। उत्तमांश में
हो तो उत्तम विद्या, गोपुरांश में हो तो कुलानुसार होती है।।१५।।
सिंहासने तथा वाच्या साचिव्येन युता तथा।
पारावते तथा वाच्यं ब्रह्मविद्यासमन्वितम् ॥१६॥
सिंहासन में मंत्रित्व-योग्य विद्या और पारावत में ब्रह्मविद्या युक्त विद्या
होती है।।१६।।
सुतेशे देवलोकस्थे कर्मयोगान्वितो भवेत्।
उपासना द्वितीये स्याद्भक्तिस्त्वैरावते भवेत् ॥१७॥
पंचमेश देवलोकांश में हो तो जातक कर्मयोगी, दूसरे में उपासक,
ऐरावत में भक्तियुक्त होता है।।१७।।
धर्मेशे पारिजातस्थे तीर्थकृत्तत्र जन्मनि।
पूर्वेऽपि मनुजो जातो ह्युत्तमे चोत्तमो भवेत् ॥१८॥
धर्मेश पारिजातांश में हो तो इस जन्म और पूर्वजन्म दोनों
में तीर्थयात्री होता है, उत्तमांश में उत्तम।।१८।।
गोपुरे मखकर्त्ता च परे चैवात्र जन्मनि।
सिंहासने भवेद्धीरः सत्यवादी जितेन्द्रियः॥१९॥
गोपुरांश में हो तो इस जन्म और दूसरे जन्म में यज्ञकर्त्ता होता है।
सिंहासनांश में हो तो धीर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय होता है।।१९।।
सर्वधर्मपरित्यागी धर्मैकपदमाश्रितः।
पारावते परे चैव हंसश्चैवात्र जन्मनि॥२०॥
सभी धर्मों को त्यागकर एक धर्म का व्यवस्थापक होता है। पारावतांश
में इस जन्म और परजन्म में जातीय पुरुष होता है।।२०।।
लगुडी पितृदण्डी स्याद्देवलोके न संशयः।
द्वितीये चेन्द्रपदं गच्छेत्कृत्वा वै हयमेधकम् ॥२१॥
देवलोकांश में हो तो दंडधारी संन्यासी और दूसरे में अश्वमेध यज्ञ
करके इन्द्रपद को पाता है।।२१।।
ऐरावते तु धर्मात्मा स्वयं धर्मो भविष्यति।
श्रीरामः कुन्तिपुत्रो वा द्वितीयो न भविष्यति ॥२२॥