बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
द्वादशभावविचाराध्यायः १८३
अथ द्वादशभावाफलम्—
चन्द्रो व्ययाधिपो धर्मलाभमन्त्रेषु संस्थितः।
स्वोच्चस्वर्क्षनिजांशे वा लाभधर्मात्मजांशके।
दिव्यागारादिपर्यङ्को दिव्यगन्धैकभोगवान्।।२३७।।
परार्थ्यं रमणो दिव्यवस्त्रमाल्यादिभूषणः।
परार्थ्यसंयुतो वित्तो दिनानि नवतिः प्रभुः।।२३८।।
चंद्रमा व्ययेश होकर ९।११।५वें भाव में हो वा अपनी उच्चराशि,
अपनी राशि धनभाव के नवांश में हो अथवा लाभ नवम-पंचम
के नवांश में हो तो दिव्य मकान, शय्या, गंध, दूसरे के द्रव्य को भोगने वाला
होता है।।२३७-२३८।।
एवं स्वशत्रुनीचांशेऽष्टमांशे वाष्टमे रिपौ।
संस्थितः कुरुते जातं कान्तासुखविवर्जितम्।।२३९।।
इसी प्रकार अपने शत्रु की नीचराशि के नवांश में अष्टमभाव के नवांश
में, आठवें या छठे भाव में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता
है।।२३९।।
व्ययाधिक्यपरिक्लान्तं दिव्यभोगनिराकृतम्।
स हि केन्द्रत्रिकोणस्थः स्वस्त्रियालङ्कृतः स्वयम्।।२४०।।
और अधिक खर्च से खिन्न होकर दिव्य भोग आदि से रहित होता है।
यदि वह केन्द्र-त्रिकोण में हो तो स्त्रीसुख से युक्त होता है।।२४०।।
लग्नस्य पूर्वार्धगतानभोगाः फलं प्रदद्युस्तु प्रत्य्ते।
परार्धषट्कोपगताः परोक्षं फलं वदन्तीति बुधाः पुराणाः।।२४१।।
लग्न के पूर्वार्ध (१० से ३ भाव तक) मतांतर से (७।८।९।१०।११।१२)
में स्थित ग्रह प्रत्यक्ष में फल देने वाले होते हैं और परार्ध
(४।५।६।७।८।९) भाव में मतांतर से (१।२।३।४।५।६) में स्थित ग्रह
परोक्ष (अप्रत्यक्ष सूर्य) से फल देने वाले होते हैं।।२४१।।
व्ययस्थानगतो राहुर्भौमार्करविसंयुतः।
तदीशेऽप्यर्कसंयुक्ते नरके पतनं भवेत्।।२४२।।
बारहवें भाव में राहु भौम-सूर्य के साथ हो, व्ययेश भी सूर्य से युक्त
हो तो जातक नरक में जाता है।।२४२।।
१८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
व्ययस्थानगते सौम्ये तदीशे स्वोच्चराशिगे।
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे मोक्षः स्यान्नात्र संशयः।।२४३।।
बारहवें भाव में बुध हो, व्ययेश अपनी उच्च राशि में हो, शुभ ग्रह से
युत और दृष्ट हो तो मोक्ष होता है।।२४३।।
व्ययेशे पापसंयुक्ते व्यये पापसमन्विते।
पापग्रहेण सन्दृष्टे देशाद्देशान्तरं गतः।।२४३।।
व्ययेश पापग्रह से युत हो और व्ययभाव में पापग्रह हो और पापग्रह से
देखा जाता हो तो देश-विदेश में जाने वाला होता है।।२४४।।
व्ययेशे शुभराशिस्थे व्ययर्क्षे शुभसंयुते।
शुभग्रहेण सन्दृष्टे स्वदेशात्सञ्चरो भवेत्।।२४५।।
व्ययेश शुभराशि में हो और व्ययभाव में शुभग्रह हो, शुभग्रह से देखा
जाता हो तो अपने देश से अन्य देश को जाने वाला होता है।।२४५।।
व्यये मन्दादिसंयुक्ते भूमिजेन समन्विते।
शुभदृष्टैर्न सम्प्राप्तिः पापमूलाद्धनार्जनम् ।।२४६।।
व्ययभाव शनि-भौम से युत हो, शुभग्रह से न देखा जाता हो तो पाप
करने से धन की हानि होती है।।२४७।।
लग्नेशे व्ययराशिस्थे व्ययेशे लग्नसंयुते।
भृगुपुत्रेण संयुक्ते धर्ममूलाद्धनव्ययम्।।२४७।।
लग्नेश बारहवें भाव में हो और व्ययेश लग्न में हो, शुक्र से युत हो तो
धर्म करने में धन का व्यय होता है।।२४७।।
इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां द्वादशभावविचारो नाम
द्वादशोऽध्यायः।
अथ भावेशफलाध्यायः
अथ लग्नेशभावफलम्-
लग्नेशे लग्नगे पुंसः सुखी भुजपराक्रमी।
मनस्वी चातिचाञ्चल्यो द्विभार्यः परगोऽपि वा।।१।।
लग्नेश लग्न में हो तो जातक सुखी, पराक्रमी, मनस्वी, अत्यंत
चंचल, दो स्त्रियों वाला और परस्त्रीगामी भी होता है।।१।।
लग्नेशे धनगे लाभे सलाभः पण्डितो नरः।
सुशीलो धर्मविन्मानी बहुदारगुणैर्युतः।।२।।
भावेशफलाध्यायः १८५
लग्नेश धनस्थान में या लाभस्थान में हो तो जातक लाभ से युक्त पंडित,
सुशील, धर्मात्मा, ज्ञानी और अनेक स्त्रियों से युक्त होता है।।२।।
लग्नेशे सहजे षष्ठे सिंहतुल्यपराक्रमी।
सर्वसम्पद्युतो मानी द्विभार्यो मतिमान्सुखी ।।३।।
लग्नेश तीसरे या छठे भाव में हो तो जातक सिंह के समान पराक्रमी,
सभी सम्पत्ति से युक्त, मानी, दो स्त्रियों वाला और बुद्धिमान् एवं सुखी
होता है।।३।।
लग्नेशे दशमे तुर्ये पितृमातृसुखन्वितः।
बहुभ्रातृयुतः कामी गुणसौन्दर्यसंयुतः ।।४।।
लग्नेश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो पिता-माता के सुख से युक्त,
अनेक भाइयों वाला, कामी, गुण-सौंदर्य से युक्त होता है।।४।।
लग्नेशे पञ्चमे दानी सुतसौख्यं च मध्यमम्।
प्रथमापत्यनाशः स्यात्क्रोधी लोभी नृपप्रियः।।५।।
लग्नेश पाँचवें भाव में हो तो जातक दानी, मध्यम संतान सुखवाला,
प्रथम संतान से हीन, क्रोधी, लोभी और राज़प्रिय होता है।।५।।
लग्नेशे सप्तमे यस्य भार्या तस्य न जीवति।
विरक्तो वा प्रवासी वा दरिद्रो वा नृपोऽपि वा ।।६।।
लग्नेश सातवें भाव में हो तो स्त्री का विनाश होता है। वह व्यक्ति
विरक्त हो या परदेशी हो, वा दरिद्र हो या राजा होता है।।६।।
लग्नेशे व्ययगेऽष्टस्थे सिद्धविद्याविशारदः।
द्यूती चौरो महाक्रोधी परनार्यतिभोगकृत् ।।७।।
लग्नेश १२वें या ८वें भाव में हो तो जातक जूआ खेलने वाला, चोर,
क्रोधी और परस्त्रीगामी होता है।।८।।
लग्नेशे नवमे पुंसो भाग्यवान् जनवल्लभः।
विष्णुभक्तः पटुर्वाग्मी पुत्रदारधनैर्युतः ।।८।।
लग्नेश नवम भाव में हो तो पुरुष भाग्यवान्, जनप्रिय, विष्णुभक्त,
पंडित, वक्ता और पुत्र-स्त्री से युक्त होता है।।८।।
अथ धनेशभावफलम्–
धनेशे च तनौ पुत्री स्वकुटुम्बस्य कण्टकः।
धनवान्निष्ठुरः कामी परकार्येषु तत्परः।।९।।
१८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
धनेश लग्न में हो तो जातक पुत्रवान्, अपने कुटुम्ब का कंटक, धनी,
निष्ठुर, कामी और दूसरे के कार्य में तत्पर होता है॥९॥
धनेशे धनगे मर्त्यः धनवान् गर्वसंयुतः।
भार्याद्वयं त्रयं वापि पुत्रहीनः प्रजायते ॥१०॥
धनेश धनभाव में हो जातक धनी, धर्म से युक्त होता है। उसे २ या ३
स्त्रियाँ होती है और पुत्रहीन होता है॥१०॥
धनेशे सहजे तुर्ये विक्रमी मतिमान् गुणी।
परदाराभिमानी च लोभी वा देवनिन्दकः ॥११॥
धनेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक पराक्रमी, बुद्धिमान्, गुणी,
परायी स्त्री का अभिमान करने वाला, लोभी या देवनिंदक होता है।॥११।।
धनेशे सुतभावस्थे पुत्रतो धनवान् भवेत्।
कृपणो दुःखभाग्जातो यशस्वी पुत्रवान् भवेत् ॥१२॥
धनेश पाँचवें भाव में हो तो पुत्र से धनी, कृपण, दुःख भोगने वाला,
यशस्वी और पुत्रवान् होता है॥१२॥
धनेशे शत्रुगे शत्रोर्धनं प्राप्नोति निश्चितम्।
शत्रुतो वित्तनाशः स्याज्जंघोर्वोर्भवेच्च रुक् ॥१३॥
धनेश छठे भाव में हो तो शत्रु से धन प्राप्त करने वाला, पुत्र
द्वारा धन नाश वाला और जंघा तथा उरु प्रदेश में रोग युक्त होता है॥११॥
धनेशे सप्तमे वैद्यः परजायाभिगामिनः।
जाया तस्य भवेद्वेश्या माता च व्यभिचारिणी ॥१४॥
धनेश सातवें भाव में हो तो जातक वैद्य होता है, परस्त्रीगामी होता है।
उसकी स्त्री वेश्या और माता व्यभिचारिणी होती है॥१४॥
धनेशे मृत्युगेहस्थे भूमिद्रव्यं लभेद् ध्रुवम्।
जायासौख्यं भवेत्स्वल्पं ज्येष्ठभ्रातृसुखं न हि ॥१५॥
धनेश आठवें भाव में हो तो जातक को भूमिगत द्रव्य का लाभ, स्त्री
का सुख अल्प और ज्येष्ठ भाई का सुख नहीं होता है॥१५॥
धनेशे नवमे लाभे धनवानुद्यमी पटुः।
बाल्ये रोगी सुखी पश्चाद्यावदायुः समाप्यते ॥१६॥
भावेशफलाध्यायः १८७
धनेश नवम भाव वा लाभभाव में हो तो जातक धनी, उद्यमी, विद्वान्
होता है। बाल्य अवस्था में रोगी और पीछे आयु पर्यन्त सुखी होता है॥१९६।।
धनेशो दशमे यस्य कामी मानी च पण्डितः।
बहुदारधनैर्युक्तः सुतहीनो प्रजायते ॥१९७।।
धनेश दशम भाव में हो तो जातक कामी, मानी, पंडित, अनेक स्त्री
तथा धन से युक्त और पुत्रहीन होता है॥१९७।।
धनेशे व्ययगे ज्ञानी साहसी धनवर्जितः।
जीविका नृपगेहाच्च ज्येष्ठपुत्रसुखं न हि।।१९८।।
धनेश बारहवें भाव में हो तो जातक ज्ञानी, साहसी, धनहीन,
राजगृह से जीविकावाला और ज्येष्ठ पुत्र के सुख से हीन होता है।।१९८।।
अथ सहजेशभावफलम्—
तृतीयेशे तनौ लाभे स्वभुजार्जितवित्तवान्।
मूर्खः कृशो महारोगी साहसी परसेवकः।।१९९।।
तृतीयेश लग्न या लाभ भाव में हो तो जातक अपनी कमाई से धनी,
मूर्ख, कृश, महारोगी अपितु साहसी, दूसरे का सेवक होता है।।१९९।।
गुदाभञ्जनिकः स्थूलः परभार्याधने रुचिः।
स्वल्पारम्भी सुखी न स्यात्तृतीयेशे धनं गते ।।२००।।
तृतीयेश दूसरे भाव में हो तो जातक स्त्री के स्वभाव का, स्थूल, परस्त्री
के धन से कार्य आरम्भ करने वाला और सुखी नहीं होता है।।२००।।
तृतीयेशे तृतीयस्थे विक्रमी सुतसंयुतः।
धनयुक्तो महाहृष्टो भुनक्ति सुखमद्भुतम्।।१२१.।।
तृतीयेश तीसरे भाव में हो तो जातक पराक्रमी, पुत्रवान्, धनी; प्रसन्न
और अद्भुत सुख को भोगने वाला होता है।।१२१।।
तृतीयेशे सुखे कर्मे पञ्चमे वा सुखी सदा।
अतिक्रूरा भवेद्भार्या धनाढ्यो मतिमान् भवेत्।।१२२।।
तृतीयेश चौथे, दसवें और पाँचवें भाव में हो तो जातक सदा सुखी,
अतिक्रूर स्त्री से युक्त, धनी और बुद्धिमान् होता है।।१२२।।
१८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
तृतीये शो रिपौ यस्य भ्राता शत्रुर्महाधनी।
मातुलानां सुखं न स्यान्मातुल्या भोगमिच्छति॥२३॥
तृतीयेश छठे भाव में हो तो जातक का भाई शत्रु होता है। जातक
स्वयं महाधनी, मामा के सुख से हीन और मामी से संभोग की इच्छावाला
होता है॥२३॥
तृतीयेऽष्टमे द्यूने राजद्वारे मृतिर्भवेत्।
चोरो वा परगामी वा बाल्ये कष्टं दिने दिने॥२४॥
तृतीयेश आठवें या सातवें भाव में हो तो जातक की मृत्यु राजद्वार में
होती है, चोर, परस्त्रीगामी और बाल्य समय में कष्ट भोगने वाला होता
है॥२४॥
तृतीये शे व्यये भाग्ये स्त्रीभिर्भाग्योदयो भवेत्।
पिता तस्य महाचोरः सुखेऽपि दुःखदर्शकः॥२५॥
तृतीयेश बारहवें या भाग्यभाव में हो तो जातक का भाग्योदय स्त्री के
द्वारा होता है और उसका पिता बड़ा चोर होता है॥२५॥
अथ सुख
भावेशफलाध्यायः १८९
सुखेश सुख भाव में हो तो मंत्री सभी प्रकार की संपत्ति से युक्त,
चतुर, शीलवान्, मानी, धनी और स्त्रीप्रिय तथा सुखी होता है।।२९।।
तुर्येशे पञ्चमे भाग्ये सुखी सर्वजनप्रियः।
विष्णुभक्तिरतो मानी स्वभुजार्जितवित्तवान् ।।३०।।
सुखेश पाँचवें वा नवम भाव में हो तो जातक सुखी, सर्वजनप्रिय,
विष्णुभक्त, मानी और अपने पराक्रम से द्रव्य पैदा करने वाला होता
है।।३०।।
सुखेशे शत्रुगेहस्थे सदा स्याद्बहुयातुकः।
क्रोधी चौरोऽभिचारी च दुष्टचित्तो मनस्वपि ।।३१।।
सुखेश छठे भाव में हो तो जातक हर समय परदेश में रहनेवाला, क्रोधी,
चोर, घात करने वाला, दुष्ट और मनस्वी होता है।।३१।।
सुखेशे सप्तमे लग्ने बहुविद्यासमन्वितः।
पित्रार्जितधनत्यागी सभायां मूकवद्भवेत् ।।३२।।
सुखेश सातवें भाव में हो तो जातक अनेक विद्याओं से युक्त, पिता
के धन को त्यागने वाला, सभा में मूक होता है।।३२।।
सुखेशे व्ययरन्ध्रस्थे सुखहीनो भवेन्नरः।
पितृसौख्यं भवेदल्पं क्लीबो वा जारजोऽपि वा ।।३३।।
सुखेश बारहवें या ८वें स्थान में हो तो जातक सुखहीन होता है और
उसे पिता का अल्पसुख नपुंसक अथवा जार से उत्पन्न हुआ होता है।।३३।।
सुखेशे कर्मगेहस्थे राजमान्यो भवेन्नरः।
रसायनी महाहृष्टो भुनक्ति सुखमद्भुतम् ।।३४।।
सुखेश कर्मभाव में हो तो जातक राजमान्य, रसायन क्रिया को जानने
वाला, प्रसन्न और सुख को भोगने वाला होता है।।३४।।
अथ सुतेशभावफलम्—
सुतेशे लग्नसहजे मायावी पिशुनो महान्।
लोष्ठं दत्त्वात्रैव काचिद्द्रव्यस्य का कथा ।।३५।।
पंचमेश लग्न और तीसरे भाव में हो तो जातक मायावी और कृपण
होता है।।३५।।
१९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सुतेशे चायुधि धने बहुपुत्री न संशयः।
कासश्वाससुखी न स्यात्क्रोधयुक्तो धनान्वितः।।३६।।
पंचमेश ८वें वा रसरे भाव में हो तो जातक अनेक पुत्रों से युक्त,
कांस-श्वास रोगी, क्रोधी और धनी होता है।।३६।।
सुतेशे मातृभवने चिरं मातृसुखं भवेत्।
लक्ष्मीयुक्तः सुबुद्धिश्च सचिवोऽप्यथवा गुरुः ।।३७।।
सुतेश ४ भाव में हो तो जातक को माता का सुख अधिक, लक्ष्मीयुक्त,
बुद्धिमान्, मंत्री वा गुरु होता है। मुंहूर्त्त को जानने वाला, टेढ़ा बोलने
वाला, धनी और बुद्धिमान् होता है।।३७।।
सुतेशे पञ्चमे यस्य तस्य पुत्रो न जीवति।
क्षणिकः क्रूरभाषी च धनिको मतिमान्भवेत् ।।३८।।
सुतेश ५वें भाव में हो तो जातक का पुत्र नहीं जीता है।।३८।।
सुतेशे षष्ठरिःफस्थे पुत्रः शत्रुत्वमाप्नुयात्।
मृतापत्यो दत्तपुत्रो धनपुत्रोऽथवा भवेत् ।।३९।।
सुतेश छठे, बारहवें भाव में हो तो जातक को पुत्र से शत्रुता होती है
और उसके पुत्र मर जाते हैं। उसे दत्तक पुत्र या क्रीत पुत्र होता है।।३९।।
सुतेशे कामगे मानी सर्वधर्मसमन्वितः।
तुंगबष्टिस्तनुस्वामी भंक्तियुक्तैकचेतसा ।।४०।।
सुतेश ७वें भाव में हों तो जातक मानी, सभी धर्मों से युक्त, ऊँचे नाक
वाला और भक्ति युक्त होता है।।४०।।
सुतेशे नवमे कर्मे पुत्रो भूपसमो भवेत्।
अथवा ग्रन्थकर्ता च विख्यातः कुलदीपकः।।४१।।
सुतेश ९वें या १०वें भाव में हो तो जातक का पुत्र राजा के समान
होता है अथवा प्रसिद्ध ग्रंथकर्त्ता होता है।।४१।।
सुतेशे लाभभवने पण्डिंतो जनवल्लभः।
ग्रन्थकर्त्ता महादक्षो बहुपुत्रधनान्वितः।।४२।।
सुतेश लाभभाव में हो तो जातक पंडित, लोकप्रिय, ग्रंथकर्त्ता, दक्ष, अनेक
पुत्र और धन से युक्त होता है।।४२।।
भावैशफलाध्यायः १९१
अथ षष्ठेशभावफलम्-
षष्ठेशे सप्तमे लाभे लग्ने वा कीर्त्तिमान् भवेत्।
धनवान् गुणवान् मानी साहसी पुत्रवर्जितः ।।४३।।
षष्ठेश सातवें, ग्यारहवें या लग्न में हो तो जातक कीर्त्तिमान्, धनवान्,
गुणी, मानी, साहसी और पुत्रहीन होता है।।४३।।
षष्ठेशे कर्मवित्तस्थे साहसी कुलविश्रुतः।
परदेशे सुखी वक्ता स्वकर्मै चैकनिष्ठिकः ।।४४।।
षष्ठेश दशम वा दूसरे भाव में हो तो जातक साहसी, कुल में विख्यात,
परदेशी, वक्ता और अपने कर्म में निष्णात होता है।।४४।।
षष्ठेशे सहजे तुर्ये क्रोधेनारक्तलोचनः।
मनस्वी पिशुनो द्वेषी चलचित्तोऽतिवित्तवान् ।।४५।।
षष्ठेश तीसरे या चौथे भाव में हो जातक का नेत्र क्रोध से रक्तवर्ण
का, मनस्वी, कृपण, द्वेष करने वाला, अस्थिरचित्त और अत्यंत धनी होता
है।।४५।।
षष्ठेशे पञ्चमे यस्य चलमित्रधनादिकम्।
दयायुक्तः सुखी सौम्यः स्वकार्ये चतुरो महान् ।।४६।।
पाँचवें भाव में हो तो जातक के मित्र तथा धन चंचल होते हैं।
दयावान्, सुखी, सौम्यमूर्त्ति और अपने कार्य में अत्यंत चतुर होता
है।।४६।।
षष्ठेशे रिपुभावस्थे स्वज्ञातिः शत्रुवद्भवेत्।
परजातिर्भवेन्मित्रं भूमौ न चलति ध्रुवम् ।।४७।।
षष्ठेश छठे भाव में हो जातक के जातिवाले ही उसके शत्रु होते हैं,
परजाति के लोग मित्र होते हैं और हमेशा सवारी से चलता है।।४७।।
षष्ठेशेऽष्टमरिःफस्थे रोगी शत्रुर्मनीषिणाम्।
परजायाभिगामी च जीवहिंसासु तत्परः ।।४८।।
षष्ठेश ८वें या १२वें भाव में हो तो जातक रोगी और अच्छे लोगों
का शत्रु, परस्त्रीगामी और हिंसक होता है।।४८।।
षष्ठेशो नवमे यस्य काष्ठपाषाणविक्रयी।
व्यवहारे क्वचिद्धानिः क्वचिद्वृद्धिर्भवेत्किल ।।४९।।
१९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
षष्ठेश नवम स्थान में हो तो जातक लकड़ी, पत्थर आदि बेचने वाला,
व्यापार में कभी हानि और कभी वृद्धिवाला होता है।।४९।।
अथ सप्तमेशभावफलम्-
सप्तमेशे तनौ चास्ते परजायासु लम्पटः।
दुष्टो विचक्षणो धीरो वातरुक् स्थीयते हृदि ।।५०।।
सप्तमेश लग्न या सप्तम में हो तो जातक परस्त्री में आसक्त, दुष्ट,
पंडित, वातरोगी होता है।।५०।।
द्यूनेशे नवमे वित्ते नानास्त्रीभिः समागमः।
आरम्भी दीर्घसूत्री च स्त्रीषु चित्तं हि केवलम् ।।५१।।
सप्तमेश नवम और दूसरे भाव में हो तो अनेक स्त्रियों में आसक्त, कार्य
को आरंभ करने वाला, दीर्घसूत्री और केवल स्त्री में चित्त को लगाने वाला
होता है।।५१।।
द्यूनेशे सहजे लाभे मृतपुत्रः प्रजायते।
कदाचिज्जीवति सुता यत्नात्पुत्रोऽपि जायते ।।५२।।
सप्तमेश ३रे या ११वें भाव में हो तो जातक के संतान नहीं जीते हैं।
कदाचित् कन्या जीती है; यत्न करने से पुत्र भी जीता है।।५२।।
द्यूनेशे दशमे तुर्ये नास्य जाया पतिव्रता।
धर्मात्मा सत्यसंयुक्तः केवलं दन्तरोगवान् ।।५३।।
सप्तमेश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक की स्त्री पतिव्रता नहीं
होती है। जातक सर्वगुणसम्पन्न, मानी और सर्व सम्पत्तिमान् होता
है।।५३।।
सर्वगुणयुतो मानी भवेत्सर्वधनाधिपः।
सदैव हर्षसंयुक्तः सप्तमेशे सुते स्थिते ।।५४।।
सप्तमेश पाँचवें भाव में हो तो जातक सभी गुणों से युक्त, मानी, सभी
प्रकार के धनों से युक्त, सदैव प्रसन्न रहने वाला होता है।।५४।।
जायेशे चाष्टमे षष्ठे रोगिणी कामिनी लभेत्।
क्रोधयुक्तो भवेद्वापि न सुखं लभते क्वचित् ।।५५।।
सप्तमेश ६ या ८ भाव में हो तो जातक की स्त्री रोगिणी होती है।
जातक क्रोधी होता है और सुखी नहीं रहता है।।५५।।
भावेशफलाध्यायः १९३
द्वादशस्थे सप्तमेशे दरिद्रः कृपणो महान्।
चारुकन्या भवेद्भार्या वस्त्राज्जीवी च निर्धनी ।।५६।।
सप्तमेश १२वें भाव में हो तो जातक दरिद्र, अत्यंत कृपण, स्त्री सुंदरी,
और वस्त्र से जीविका करने वाला निर्धन होता है।।५६।।
अथाष्टमेशभावफलम्-
अष्टमेशे तनौ कामे भार्यायुग्मं समादिशेत्।
विष्णुद्रोहरतो नित्यं व्रणरोगी प्रजायते ।।५७।।
अष्टमेश लग्न या सातवें भाव में हो तो जातक की दो स्त्रियाँ होती
हैं। सदा विष्णु का द्रोह करने वाला और व्रणरोगी होता है।।५७।।
धनं तस्य भवेत्स्वल्पं गतं वित्तं न लभ्यते।
अष्टमेशे धने बाहुबलहीनः प्रजायते ।।५८।।
अष्टमेश धनस्थान में हो तो जातक अल्प धन वाला, बाहुबल से हीन
और नष्ट हुए द्रव्य को. न पाने वाला होता है।।५८।।
अष्टमेशे तृतीये चेत् भ्रातृहीनो भवेन्नरः।
बन्धुद्वेषी सुहृद्द्वेषी व्यङ्गो दुर्बलदेहभाक् ।।५९।।
अष्टमेश तीसरे भाव में हो तो जातक भ्रातृहीन, बंधुओं से द्वेष करने
वाला, अंगहीन और दुर्बल शरीर का होता है।।५९।।
अष्टमेशे सुखे कर्मपिशुनो बन्धुवर्जितः।
मातापित्रोर्भवेन्मृत्युः स्वल्पकालेन भीतियुक् ।।६०।।
अष्टमेश चौथे भाव में हो तो जातक कर्महीन, बंधुहीन और थोड़ी
अवस्था में ही मातृ-पितृविहीन होता है।।६०।।
अष्टमेशे सुते लाभे तस्य वृद्धिर्न जायते।
द्रव्यं न स्थीयते गेहे स्थिरबुद्धिर्भवेज्जनः।।६१।।
अष्टमेश पाँचवें या ग्यारहवें भाव में हो तो जातक बुद्धिहीन, द्रव्यहीन
और मूर्ख होता है।।६१।।
अष्टमेशे व्यये षष्ठे नित्यं रोगी प्रजायते।
जलसर्पादिकाद्घातो भवेत्तस्य च शैशवे ।।६२।।
अष्टमेश छठे या बारहवें भाव में हो तो जातक सदा रोगी, शैशव
अवस्था में जल या सर्प भय से पीड़ित होता है।।६२।।
१९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
द्यूती चौरोऽन्यथावादी गुरुनिन्दासु तत्परः।
अष्टमेशेऽष्टमस्थाने भार्या पररता भवेत् ।।६३।।
अष्टमेश अष्टम भाव में हो तो जातक की स्त्री दूसरे में आसक्त
होती है और वह जुआड़ी, चोर, असत्य बोलने वाला और गुरु की निंदा
करने वाला होता है।।६३।।
अष्टमेशे तपः स्थाने महापापी च नास्तिकः।
सुतहा ह्यथवा वन्ध्या परभार्याधने रुचिः ।।६४।।
अष्टमेश नवम भाव में हो तो जातक महापापी, नास्तिक, पुत्रनाशक,
वा वंध्या और परस्त्री एवं परधनलोलुप होता है।।६४।।
अष्टमेशे स्थिते माने नीचकर्मप्रवृत्तिवान्।
प्रेष्यो च जारजो क्रूरो मातृहीनो भवेन्नरः ।।६५।।
अष्टमेश दशमभाव में हो तो जातक नीच कर्म में रत, दासकर्म करने
वाला, जार से उत्पन्न, क्रूर और मातृसुख से हीन होता है।।६५।।
अथ भाग्येशभावफलम्-
भाग्येशे च मदे कल्पे गुणवान्कीर्त्तिमान्भवेत् ।
कदाचिन्न भवेत्सिद्धं यत्कार्यं कर्त्तुमिच्छति ।।६६ ।।
भाग्येश लग्न या सप्तम भाव में हो तो जातक गुणी, कीर्त्तियुक्त होता
है। उसे जिस कार्य की इच्छा होती है वह कभी सिद्ध नहीं होता है।।६६।।
भाग्येशे सहजे वित्ते सदा भाग्यानुचिन्तकः।
धनवान् गुणवान्कामी पण्डितो जनवल्लभः ।।६७।।
भाग्येश तीसरे या दूसरे भाव में हो तो जातक सदा भाग्यवान्, धनी,
गुणी, कामी, पंडित और जनवल्लभ होता है।।६७।।
भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत् ।
पुण्यवान्सुयशो वाग्मी साहसी क्रोधवर्जितः ।।६८।।
भाग्येश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक मंत्री वा सेनापति,
पुण्यवान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, साहसी और क्रोध रहित होता है।।६८।।
भाग्येशे पञ्चमे लाभे भाग्यवान् जनवल्लभः।
गुरुभक्तिरतो मानी धीरो धीरगुणैर्युतः ।।६९।।
on the top of the vertical bar of 'थ'!
So it is simply: द + र्थ = "दर्थ"!
With पश्चा: "पश्चादर्थवृद्धिर्दिने दिने"!
That is 100% standard, beautiful Devanagari for "पश्चादर्थवृद्धिर्दिने दिने".
Now let's check line 17 again:
"दश:पेशे" vs "दशमेशे":
Let's look at line 17 very carefully.
Wait! Look at the first letter:
'द'
Then 'श'
Wait, look at the mark after 'श':
Is it a colon?
Wait, look at the letter 'म' in "कर्मेश" in line 11, line 15, line 19, line 23, line 25:
Wait, in line 17:
"द" "श" ":" "पे" "शे"
Wait, why is there a ':'?
Could it be 'दशमेशे' where the letter 'म' is smudged/broken?
Wait, look at the top of the ':' - is there an anusvara?
Wait, could it be 'दशमे' where 'म' broke?
Look at 'पे': it has a 'प' shape with 'े'.
Wait, why would 'म' look like 'पे'?
Could the word actually be "दश:पेशे"?
Wait, why would
१९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कर्मेशो नवमे यस्य स भवेत्कुलपालकः।
सद्बन्धुमित्रसंयुक्तः मातृभक्तोऽथ पूजकः।।७७।।
कर्मेश नवम भाव में हो तो जातक कुलपालक श्रेष्ठ, बन्धु-मित्र से
युक्त और मातृभक्त होता है।।७७।।
अथ लाभेशभावफलम्-
लाभेशे संस्थिते लग्ने धनवान्सात्त्विको महान्।
समदृष्टिर्महान्वक्ता कौतुको च भवेत्सदा ।।७८।।
लाभेश लग्न में हो तो जातक धनी, सात्त्विक, समदृष्टि, वक्ता और
कौतुकी होता है।।७८।।
लाभेशे च धने पुत्रे नानासुखसमन्वितः।
पुत्रवान्धार्मिकश्चैव सर्वसिद्धियुतः पुमान् ।।७९।।
लाभेश दूसरे या पाँचवें भाव में हो तो जातक अनेक सुखों
से युक्त, पुत्रवान्, धार्मिक और सभी पदार्थों से युक्त होता है।।७९।।
लाभेशे सहजे तुर्ये तीर्थेषु तत्परो महान्।
कुशलः सर्वकार्येषु केवलं शूलरोगवान् ।।८०।।
लाभेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक तीर्थयात्रा में तत्पर,
सभी कार्यों में कुशल और शूलरोग से युक्त होता है।।८०।।
लाभेशे षष्ठभवने नानारोगसमन्वितः।
सर्वं सुखं भवेत्तस्य प्रवासी परसेवकः ।।८१।।
लाभेश छठे भाव में हो तो जातक अनेक रोगों से युक्त, प्रवासी
और दूसरे का नौकर होता है।।८१।।
लाभेशे सप्तमे रन्ध्रे भार्या तस्य न जीवति।
उदारो गुणवान्कर्मी मूर्खो भवति निश्चितम् ।।८२।।
लाभेश सातवें या आठवें भाव में हो तो जातक की स्त्री नहीं होती है।
वह गुणी, उदार और मूर्ख होता है।।८२।।
लाभेशे गगने धर्मे राजपूज्यो धनाधिपः।
चतुरः सत्यवादी च निजधर्मसमन्वितः ।।८३।।
लाभेश दशम या नवम भाव में हो तो जातक राजा से पूज्य, धनी, चतुर,
सत्यवक्ता और अपने धर्म से युत होता है।।८३।।
भावेशफलाध्यायः १९७
लाभेशे संस्थिते लाभे स वाग्मी भवति ध्रुवम् ।
पाण्डित्यं कविता चैव वर्धते च दिने दिने ॥८४॥
लाभेश लाभ भाव में हो तो जातक बुद्धिमान्, पंडित और कवि होता
है ॥८४॥
प्राप्तिस्थानाधिपे रिःफे म्लेच्छसंसर्गकारकः ।
कामुको बहुकान्तश्च क्षणिको लम्पटः सदा ॥८५॥
लाभेश बारहवें भाव में हो तो जातक नीचों से संसर्ग करने वाला, कामी,
अनेक स्त्रियों वाला और लम्पट होता है ॥८५॥
अथ व्ययेशभावफलम्-
व्ययेशे मदने लग्ने जायासौख्यं भवेन्न हि ।
दुर्बलः कफरोगी च धनविद्याविवर्जितः ॥८६॥
व्ययेश सातवें या लग्न में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता
है। जातक दुर्बल, कफरोगी और धन-विद्या से हीन होता है ॥८६॥
व्ययेशे च धने रन्ध्रे विष्णुभक्तिसमन्वितः ।
धार्मिकः प्रियवादी च सम्पूर्णगुणसंयुतः ॥८७॥
व्ययेश दूसरे या आठवें भाव में हो तो जातक विष्णुभक्त, धार्मिक,
प्रियभाषी, गुणी होता है ॥८७॥
भार्याद्वेषी प्रियद्वेषी गुरुद्वेषी भवेन्नरः ।
व्ययेशे सहजे धर्मे स्वशरीरस्य पोषकः ॥८८॥
व्ययेश तीसरे या नवम भाव में हो तो जातक अपने शरीर का पोषक,
स्त्रीद्वेषी, मित्रद्रोही और गुरुद्रोही होता है ॥८८॥
पुत्रहीनो महादुःखी तीर्थाटनपरो भवेत् ।
कृपणो रोगयुक्तश्च व्ययेशे च सुते सुखे ॥८९॥
व्ययेश पाँचवें या चौथे भाव में हो तो जातक पुत्र रहित, महादुःखी,
तीर्थाटन करने वाला, कृपण और रोगी होता है ॥८९॥
व्ययेशेऽरिव्यये पापी मातृमृत्युविचिन्तकः ।
क्रोधी सन्तानदुःखी च परजायासु लम्पटः ॥९०॥
व्ययेश छठें या बारहवें भाव में हो तो जातक पापी, माता के मृत्यु का
कारण, क्रोधी, संतान से कष्ट और परस्त्रीगामी होता है ॥९०॥
१९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
व्ययेशे दशमे लाभे पुत्रसौख्यं भवेन्न हि।
मणिमाणिक्यमुक्तादि धत्ते किञ्चित्समालभेत् ।।९१।।
व्ययेश दशम या एकादश भाव में हो तो जातक पुत्रसुख से हीन, मणि-
माणिक्य आदि के होते हुए भी सुखहीन होता है।।९१।।
एतत्ते कथितं विप्र भावेशानां तु यत् फलम्।
बलाबलविवेकेन सर्वेषां फलमादिशेत् ।।९२।।
जो भावेशों के फल कहे गये हैं वे ग्रहों के बल-अबल के अनुसार ही
होते हैं।।९२।।
ग्रहे पूर्णबले प्राप्ते फलं पूर्ण समादिशेत् ।
अर्धमर्धबले प्राप्ते हीने पादं समादिशेत् ।।९३।।
भावानां द्वादशानां च सर्वेषां फलमादिशेत् ।
उक्तं भावस्थितानां च भावेशानां फलं मया ।।९४।।
ग्रह पूर्णबली हो तो पूर्णबल, मध्यबली हो तो आधाबल और
हीनबली हो तो चतुर्थांश फल देता है।।९४।।
इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां भावेशफलाध्यायः त्रयोदशः ।।१३।।
अथ नाभसादियोगाध्यायः
अधुना नाभसा योगाः कथयामि सविस्तरः।
अष्टादशशतगुणितास्तेषां भेदाः समासतः ।।१।।
अब मैं नाभस योगों को विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, जिनके भेद
१८०० होते हैं।।१।।
आश्रयाख्यास्त्रयो योगा दशयोगद्वयं ततः।
आकृतिर्विंशतिः संख्या योगानां सप्तकं स्मृतम् ।।२।।
जिसमें आश्रय योग ३, दल योग २, आकृति योग २० और संख्या
योग ७ मुख्य हैं।।२।।
तेषां नामानि-
रज्जुयोगो मूसलश्च नलो मालाभुजङ्गमौ।
गदायोगश्च शकटः शृङ्गाटकविहङ्गमौ ।।३।।
नाभसादियोगाध्यायः १९९
हलवज्रयवाश्चैव कमलो वापि यूपकौ।
शरशक्तिदण्डनौकाकूटछत्रधनूंषि च ॥४॥
अर्धेन्दुयोगश्चक्राख्यः समुद्रश्चेति विंशतिः।
वीणादामनिकायोगः पाशकेदारशूलकाः॥५॥
युगगोलो ततः प्रोक्तौ योगा द्वात्रिंशका इमे।
तेषां च लक्षणं वक्ष्ये यथाबुद्धिविवेकतः॥६॥
रज्जु, मुशल, नल ये आश्रययोग हैं और मालासर्प ये दलयोग हैं। गदा,
शकट, शृंगाटक, पक्षी, हल, वज्र, यव, कमल, वापी, यूप, शरशक्ति,
दंड, नौका, कूट, छत्र, धनुष, अर्धचक्र, चक्र, समुद्र-ये २० आकृतियोग हैं।
वीणा, दाम, पारा, केदार, शूल, युग, गोल ये ७ संख्या योग हैं। ये
सभी मिलकर ३२ नाभस योग कहे जाते हैं। अब इनके लक्षण कह रहा
हूँ॥३-६॥
अथाऽऽश्रययोगलक्षणम्-
सर्वे चरस्था अपि वा स्थिरस्था द्विदेहसंस्था यदि वा भवन्ति।
क्रमेण रज्जुर्मुशलं नलश्च योगत्रयं स्यादिदमाश्रयाख्यम्॥७॥
यदि सभी ग्रह चर राशि में हों तो रज्जुयोग, सभी स्थिर राशि में हों
तो मुशल योग और सभी ग्रह द्विस्वभाव राशि में हों तो नलयोग
होता है। ये तीन आश्रय योग हैं॥७॥
अथ दलयोगद्वयमाह-
केन्द्रत्रये सौम्यखगैस्तु माला खलग्रहैर्व्यालसमाह्वयः स्यात्।
इदं तु योगद्वितयं दलाख्यं मुनीश्वरेण प्रतिपादितं हि॥८॥
यदि किसी भी तीन केंद्रों में शुभग्रह हों तो माला योग होता है। यदि
पापग्रह हों तो व्याल योग होता है। ये दोनों दल योग हैं॥८॥
अथ विंशत्याकृतियोगमाह-
आसन्नकेन्द्रद्वयगैर्गदाख्यो लग्नास्तसंस्थैः शकटः समस्तैः।
खबन्धुयातैर्विहगः प्रदिष्टः शृङ्गाटकं लग्ननवात्मजस्थैः॥९॥
यदि सभी ग्रह समीप के दो केंद्रों में हों तो 'गदा' योग होता है। सभी
ग्रह केवल लग्न और सप्तम में हों तो शकट योग होता है। यदि सभी ग्रह
दशम और चतुर्थ में हों तो 'विहग' योग होता है। सभी ग्रह लग्न
नवम और पाँचवें भाव में हों तो 'शृंगाटक' योग होता है॥९॥
२०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
धनादिखस्थैस्त्रिमदायगैर्वा चतुर्थरन्ध्रव्ययसंस्थितैर्वा।
नभस्तलस्थैर्हलनाम योगः किलोदितोऽयं निखिलागमज्ञैः ॥१०॥
सभी ग्रह २, ६, १०, ३, ७, ११, ४, ८, १२ हों तो 'हल' नाम का
योग होता है॥१०॥
लग्नस्मरस्थानगतैः शुभाख्यैः पापैश्च मेषूरणबन्धुयातैः ।
वज्राभिधस्तैर्विपरीतसंस्थैर्यवश्च मिश्रैः कमलाभिधानः ॥११॥
शुभग्रह लग्न और सप्तम भाव में हों और पापग्रह दशम और चतुर्थ
भाव में हों तो 'वज्र' योग होता है। इसके विपरीत यानि १, ७ भाव
में पापग्रह और ४, १० भाव में शुभग्रह हों तो 'यव' योग होता है। यदि
सभी केंद्रों में मिश्रित शुभ-पाप ग्रह बैठे हों तो 'कमल' योग होता है ॥११॥
त्यक्त्वा केन्द्राणि चेत्खेटाः शेषस्थानेषु संस्थिताः ।
वापीयोगो भवेदेवं गदितः पूर्वसूरिभिः ॥१२॥
यदि केंद्र से भिन्न स्थान (पणफर) में सभी ग्रह हों तो (वापी) योग होता
है॥१२॥
लग्नाच्चतुर्थात्स्मरतः खमध्याच्चतुर्गृहस्थैर्गगनेचरेन्द्रैः ।
क्रमेण यूपश्च शरश्च शक्तिर्दण्डः प्रदिष्टः खलु जातकज्ञैः ॥१३॥
सभी ग्रह लग्न से चौथे भाव के अंदर ही हों तो 'यूप' योग होता है।
सभी ग्रह लग्न से चौथे से सप्तम के अन्दर हों तो 'शर' योग होता है।
सभी ग्रह सप्तम से दशम के अंदर हों तो 'शक्ति' योग होता है। सभी ग्रह
दशम से लग्न के अंदर हों तो 'दंड' योग होता है ॥१३॥
लग्नाच्चतुर्थात्स्मरतः खमध्यात्सप्तर्क्षगैर्नौरथकूटसंज्ञः ।
छत्रं धनुश्चान्यगृहप्रवृत्तैर्नोपूर्व कैर्योग इहार्थचन्द्रः ॥१४॥
तनोर्धनाद्यैकगृहान्तरेण स्युः स्थानषट्के गगनेचरेन्द्राः ।
चक्राभिधानश्च समुद्रनामा योगा इतीहाकृतिजाश्च विंशत् ।।१५।।
सभी ग्रह लग्न से सातवें भाव के अंदर हों तो 'नौका' योग होता है।
सभी ग्रह चतुर्थ से दशम भाव के अंदर सात घरों में हो तो 'कूट' योग
होता है। सभी ग्रह सप्तम से लग्न पर्यत सात भावों में हो तो 'छल' योग
होता है। सभी ग्रह दशम से चतुर्थ भाव के अंदर सात भावों में हों तो 'चाप'
योग होता है। इससे अतिरिक्त भावों में ग्रह हों तो 'अर्धचंद्र' योग होता
है।।१४-१५।।
नाभसादियोगाध्यायः २०१
ये योगाः कथिताः पुरा बहुतरास्तेषामभावे भवेद्
गोलश्चैकगतैर्युगं द्विगृहगैः शूलस्त्रिगेहोपगैः।
केदारश्च चतुर्गृहगतैर्ग्रहैः पाशस्तु पञ्चस्थितैः
षट्स्थैर्दामनिका च सप्तगृहगैर्वीणेति संख्या इमे ।।१६।।
पूर्वोक्त योगों के अभाव में निम्नलिखित योग होते हैं। यदि सभी ग्रह
एक ही राशि में हों तो 'गोल' योग, दो भावों में हों तो 'युग', तीन गृहों
में हों तो 'शूल' योग, चार भावों में हों तो 'केदार' योग, पाँच राशियों
में सभी ग्रह हों तो 'पाश' योग, ६ राशियों में हों तो 'दामिनी' योग और
सभी ग्रह ७ राशियों में हों तो 'वीणा' नामक योग होता है।।१६।।
रज्जुयोगफलम्-
अटनप्रियाः सुरूपाः परदेशस्वास्थ्यभागिनो मनुजाः ।
क्रूरा खलस्वभावा रज्जुप्रभवाः सदा कथिताः ।।१७।।
रज्जु योग में उत्पन्न पुरुष भ्रमणशील, स्वरूपवान्, परदेश में स्वस्थ
रहनेवाला, क्रूर और खल स्वभाव का होता है।।१७।।
मुसलयोगफलम्-
मानज्ञानधनैश्वर्यैर्युक्ता नृपप्रियाः ख्याताः ।
बहुपुत्राः स्थिरचित्ता मुसलसमुत्था भवन्ति नराः ।।१८।।
मुसल योग में उत्पन्न पुरुष मान, ज्ञान, धन, ऐश्वर्य से युक्त, राजा का
प्रिय, प्रसिद्ध, अनेक पुत्रों वाला और स्थिरचित्त होता है।।१८।।
नलयोगफलम्-
न्यूनातिरिक्तदेहा धनसञ्चयभागिनोऽतिनिपुणाश्च ।
बन्धुहिताश्च सुरूपा नलयोगे सम्प्रसूयन्ते ।।१९।।
नलयोग में उत्पन्न पुरुष हीन और अधिक अंगों वाला, धनसंचय
करने वाला, अत्यंत चतुर, बंधुओं का हितैषी और सुरूप होता है।।१९।।
मालायोगफलम्-
नित्यं सुखप्रधाना वाहनवस्त्रान्नभोगसम्पन्नाः ।
कान्ताः सुबहुस्त्रीका मालायां सम्प्रसूताः स्युः ।।२०।।
माला योग में उत्पन्न पुरुष नित्य सुखी, वाहन, वस्त्र-अन्नभोग से संपन्न,
सुंदर शरीर, अनेक स्त्रियों से युक्त होता है।।२०।।
२०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सर्पयोगफलम्-
विषमाः क्रूरा निःस्वा नित्यं दुःखार्दिताः सुदीनाश्च।
परभक्षपानविरताः सर्पप्रभवा भवन्ति नराः॥२१॥
सर्प योग में उत्पन्न पुरुष कुटिल, क्रूर, निर्धन, नित्य दुःखी, दीन और
दूसरे भक्ष्य भोज्य से विरत रहने वाला होता है।।२१।।
गदायोगफलम्-
सततोद्युक्तार्थवंशा यज्वानः शास्त्रगेयकुशलाश्च।
धनकनकरत्नसम्पत्संयुक्ता मानवा गदायां तु।।२२।।
गदा योग में उत्पन्न पुरुष निरंतर धन के लिए उद्योगी, यज्ञ करने वाले,
शास्त्र और संगीत में कुशल, धन, सुवर्ण, रत्न से युक्त होते हैं।।२२।।
शकटयोगफलम्-
रोगार्ताः कुनखा मूर्खाः शकटानुजीविनो निःस्वाः।
मित्रस्वजनविहीनाः शकटे जाता भवन्ति नराः॥२३॥
शकट योग में उत्पन्न पुरुष रोगी, कुनखी, मूर्ख, गाड़ी से जीविका
चलाने वाले और मित्र तथा स्वजनों से हीन होते हैं।।२३।।
विहगयोगफलम्-
भ्रमणरुचयो विकृष्टा दूताः सुरतानुजीविनो धृष्टाः।
कलहप्रियाश्च नित्यं विहगे योगे सदा जाताः ।।२४।।
विहग 'पक्षी' योग में उत्पन्न पुरुष भ्रमणशील, परतंत्र, दूत, सुरत से
जीविका वाले, ढीठ और झगड़ालू होते हैं।।२४।।
शृङ्गाटकयोगफलम्-
प्रियकलहाः समरसहाः सुखिनो नृपतेः प्रियाः शुभकलत्राः।
आढ्या युवतिद्वेष्याः शृङ्गाटकसम्भवा मनुजाः ।।२५।।
शृंगाटक योग में उत्पन्न पुरुष कलहप्रिय, झगड़ालू, सुखी, राजा के प्रिय,
सुंदर स्त्रियों से युक्त और स्त्री के द्वेषी होते हैं।।२५।।
हलयोगफलम्-
बह्वाशिनो दरिद्राः कृषीवला दुःखिताश्च सोद्वेगाः।
बन्धुसुहृद्भिः सक्ताः प्रेष्या हलसंज्ञके सदा पुरुषाः ।।२६।।
हल योग में उत्पन्न पुरुष बहुभोजी, दरिद्र, कृषि करने वाले, दुःखी, उद्वेग
से युक्त, बंधु तथा मित्रों में आसक्त और दास होते हैं।।२६।।