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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 800 में से

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पृष्ठ 210

२१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
भाग्येश अपने परम उच्च में होकर केन्द्र (१-४-७-१०) वा अपनी मूल
त्रिकोण राशि में हो और लग्नेश बलवान् हो तो 'लक्ष्मी' योग
होता है। लक्ष्मी योग में उत्पन्न पुरुष गुणों से युक्त, अनेक देशों का स्वामी,
विद्या तथा महत्कीर्त्ति से युक्त, कामदेव के समान स्वरूप, दिशाओं
में प्रसिद्ध, राजाओं से पूज्य, राजाओं का राजा और अनेक स्त्री-पुत्रों
से युक्त होता है।।२६-२७।।
अथ कुसुमयोगस्तत्फलं चाह-
स्थिरलग्ने भृगौ केन्द्रे त्रिकोणेन्दौ शुभेतरे।
मानस्थानगते सौरे योगोऽयं कुसुमो भवेत्।।२८।।
दाता महीमण्डलनाथवन्द्यो
भोगी महावंशजराजमुख्यः।
लोके महाकीर्तियुतः प्रतापी
नाथो नराणां कुसुमोद्भवः स्यात्।।२९।।
स्थिरलग्न (२-५-८-११) में जन्म हो और शुक्र केंद्र में हो, चंद्रमा ५वें
भाव में हो और १०वें स्थान में शनि हो तो 'कुसुम' योग होता है।
कुसुम योग में उत्पन्न पुरुष दाता, राजाओं से वंद्य, भोगी, उत्तम कुल
में उत्पन्न, राजाओं में मुख्य, संसार में कीर्तियुक्त, प्रतापी और राजा
होता है।।२८-२९।।
अथ पारिजातयोगस्तत्फलं चाह-
विलग्ननाथस्थितराशिनाथः स्थानेशराशीशतदंशनाथः।
केन्द्रत्रिकोणायगतो यदि स्यात्स्वतुङ्गगो वा यदि पारिजातः।।३०।।
मध्यान्तसौख्यः क्षितिपालवन्द्यो युद्धप्रियो वारणवाजियुक्तः।
स्वकर्मधर्माभिरतो दयालुर्योंगो नृपः स्याद्यदि पारिजातः।।३१।।
लग्नेश जिस राशि में हो, उसका स्वामी जिस राशि में हो, उसका स्वामी
वा उसके नवांश का स्वामी यदि केन्द्र, त्रिकोण, लाभ स्थान में अथवा
अपनी उच्चराशि में हो तो 'पारिजात' योग होता है। पारिजात योग में उत्पन्न
पुरुष मध्य और अंतिम अवस्था में सुखी, राजा से वंदनीय, युद्धप्रिय,
हाथी-घोड़ों से युक्त, अपने धर्म-कर्म में रत, दयालु होता है।।३०-३१।।
अथ कलानिधियोगस्तत्फलं चाह-
द्वितीये पञ्चमे जीवे बुधशुक्रयुतेक्षिते।
क्षेत्रे तयोर्वा सम्प्राप्ते योगः स्यात्स कलानिधिः।।३२।।