बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
चत्वारिंशोऽध्यायः २५३
यामा इति समाख्याता देवाः स्वायंभुवेऽन्तरे । शचीपतिः समाख्यातस्तेषामिंद्रो महामतिः ॥२४॥
पारावताश्च तुषिता देवाः स्वारोचिषेऽन्तरे । विपश्चिन्नाम देवेन्द्रः सर्वसंपत्समन्वितः ॥२५॥
सुधामानस्तथा सत्याः शिवाश्चाथ प्रतर्दनाः । तेषामिंद्रः सुशांतिश्च तृतीये परिकीर्तितः ॥२६॥
सुताः पाराहराश्चैव सुत्याश्चासुधियस्तथा । तेषामिंद्रः शिवः प्रोक्तः शक्रस्तामसरुँऽतरे
विभुनामा देवपतिः पञ्चमः परिकीर्तितः ॥२७॥
अमिताभदयो देवाः षष्ठेऽपि च तथा शृणु । आर्याद्या विबुधाः प्रोक्तास्तेषामिंद्रो मनोजवः ॥२८॥
आदित्यवसुरुद्राद्या देवा वैवस्वतेऽन्तरे । इन्द्रः पुरंदरः प्रोक्तः सर्वकामसमन्वितः ॥२९॥
अप्रमेयाश्च विबुधाः सूतपाद्याः प्रकीर्तिताः । विष्णुपूजाप्रभावेण तेषामिंद्रो बलिः स्मृतः ॥३०॥
पाराद्या नवमे देवा इन्द्रश्चाद्भुत उच्यते । सुवासनाद्या विबुधा दशमे परिकीर्तिताः ॥३१॥
शांतिर्नाम च तत्रेद्रः सर्वभोगसमन्वितः । विहंगमाद्या देवाश्च तेषामिंद्रो वृषः स्मृतः ॥३२॥
एकादशे द्वादशे तु निबोध कथयामि ते । ऋभुनामा च देवेंद्रो हरिनाभास्तथा सुराः ॥३३॥
सुत्रामाद्यास्तथा देवास्त्रयोदशतमेऽन्तरे । दिवस्पतिर्महावीर्यस्तेषामिंद्रः प्रकीर्तितः ॥३४॥
चतुर्दशे चाक्षुषाद्या देवा इन्द्रः शुचिः स्मृतः । एवं ते मनवः प्रोक्ता इंद्रा देवाश्च तत्त्वतः ॥३५॥
एकस्मिन्ब्रह्मदिवसे स्वाधिकारं प्रभूंजते ॥३६॥
लोकेषु सर्वसर्गेषु सृष्टिरेकविधा स्मृता । कर्त्तारो बहवः संति तत्संख्यां वेत्ति कोविदः ॥३७॥
मयि स्थिते ब्रह्मलोके ब्रह्माणो बहवो गताः । तेषां संख्यां न संख्यातुं शक्तोऽस्म्यद्य द्विजोत्तम ॥३८॥
स्वर्गलोकमपि प्राप्य यावत्कालं शृणुष्व मे । चत्वारो मनवोऽतीता मम श्रीश्चातिविस्तरा ॥३९॥
स्थातव्यं च मयात्रैव युगकोटिशतं प्रभो । ततः परं गमिष्यामि कर्मभूमिं शृणुष्व मे ॥४०॥
मन्वन्तर में देवता याम नाम से प्रसिद्ध थे । उनके इन्द्र महामति शचीपति थे ॥२४॥ स्वारोचिष में पारावत
तुषिता देवता थे । उनके इन्द्र सब ऐश्वर्यों के उपभोक्ता विपश्चित् नाम के थे ॥२५॥ तीसरे मन्वन्तर में सुधाम,
सत्य, शिव और प्रतर्दन देवता थे । उनका इन्द्र सुशान्ति था ॥२६॥ तामस मन्वन्तर में सुत, पाराहर, सुत्य और
सुधी नाम के देवता थे । उनके इन्द्र शक्र, शिव हुए । पांचवें विभुनामक देवेन्द्र हुए । देवताओं की संज्ञा अमिताभ
थी । छठे मन्वन्तर का वर्णन कर रहा हूँ, सुनो-आर्या देवताओं का नाम और उनके इन्द्र का नाम मनोजव
था ॥२७-२८॥ वैवस्वत में आदित्य, वसु और रुद्र आदि देवता हैं, सब इष्ट साधनों से सम्पन्न पुरन्दर इन्द्र
हैं ॥२९॥ आठवें मन्वन्तर में अप्रमेय, विबुध, सुतपाद्य देवता और विष्णु पूजा के प्रभाव से बलि इन्द्र हैं ॥३०॥
नवें में पराद्य देवता तथा 'अद्भुत' इन्द्र कहे गए हैं । दसवें मन्वन्तर के सुवामन आदि देवता और सब भोगों के
भोक्ता इन्द्र शान्ति हैं । ग्यारहवें के विहंगम देवता और वृष उनके इन्द्र हैं ॥३१-३२॥ बारहवें के जो देवता हैं
उनको सुनो--ऋभु नामक देवेन्द्र और हरिनाभ नामक देवता हैं ॥३३॥ तेरहवें में सुत्राम आदि देवता तथा महा
पराक्रमी दिवस्पति इन्द्र कहे जाते हैं ॥३४॥ चौदहवें में चाक्षुष आदि देवता और शुचि इन्द्र हैं । इस प्रकार तुमसे
मनु, इन्द्र, देवता आदि के विषय में यथार्थतः कह दिया ॥३५॥ ब्रह्मा के एक दिन में ये सब अपने अपने अधिकार
का उपभोग करते हैं । लोको में तथा सभी सर्गों में सृष्टि एक ही ढंग से होती है । इनके कर्त्ता बहुत से हैं जिनका
ज्ञान केवल विज्ञों को ही है ॥३६-३७॥ जब मैं ब्रह्मलोक में था तो बहुत से ब्रह्माओं का कार्य समाप्त हुआ ।
द्विजोत्तम ! उनकी संख्या की ठीक ठीक गणना करने में मैं तो समर्थ नहीं हूँ ॥३८॥ इस स्वर्गलोक में मैंने जितना
समय बिताया है उसको सुनो-चार मनु तो बीत गये, अभी मेरी श्री उसी प्रकार विस्तृत रूप से फैली है ॥३९॥
प्रभो ! अभी यहाँ सौ करोड़ युगों तक रहना है । इसके अनन्तर कर्म भूमि को जाऊँगा, इसका भी वर्णन मुझ से
सुनो ॥४०॥
२५४ नारदीयपुराणम्
मया कृतं पुरा कर्म वक्ष्यामि तव सुव्रत । वदतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥४१॥
अहमासं पुरा शक्र गृध्रः पापो विशेषतः । स्थितश्च भूमिभागे वै अमेध्यामिषभोजनः ॥४२॥
एकदाहं विष्णोगृहे प्राकारे संस्थितः प्रभो । पतितो व्याधशस्त्रेण सायं विष्णोगृहांगणे ॥४३॥
मयि कंठगतप्राणे श्वगणो मांसलोलुपः । जग्राह मां स्ववक्त्रेण श्वभिरन्यैश्चरन्द्रुतः ॥४४॥
वहन्मां स्वमुखेनैव भीतोऽन्यैर्भषणैस्तथा । गतः प्रदक्षिणाकारं विष्णोस्तन्मंदिरं प्रभो ॥४५॥
तेनैव तुष्टिमापन्नो ह्यापरात्मा जगन्मयः । मम चापि शुनश्चापि दत्तावन्परमं पदम् ॥४६॥
प्रदक्षिणाकारतया गतस्यापीदृशं फलम् । संप्राप्तं विबुधश्रेष्ठ किं पुनः सम्यगर्चनातू ॥४७॥
इत्युक्तो देवराजस्तु सुधर्मेण महात्मना । मनसा प्रीतिमापन्नो हरिपूजारतोऽभवत् ॥४८॥
तथापि निर्जराः सर्वे भारते जन्मलिप्सवः । समर्पयंति देवेशं नारायणमनामयम् ।
तानर्चयन्ति सततं ब्रह्माद्या देवतागणाः ॥४९॥
नारायणानुस्मरणोद्यतानां महात्मनां त्यक्तपरिग्रहाणाम् ।
कथं भवत्युग्रभवस्य बंधस्तत्सङ्गलुब्धा यदि मुक्तिभाजः ॥५०॥
ये मानवाः प्रतिदिनं परिमुक्तसङ्गा नारायणं गरुडवाहनमर्चयन्ति ।
ते सर्वपापनिकरैः परितो विमुक्ता विष्णोः पदं शुभतरं प्रतियान्ति हृष्टाः ॥५१॥
ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरंति ।
ध्यानेन तेन हतकिल्विषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति ॥५२॥
सुव्रत ! मैंने पहले जो कुछ कर्म किये हैं उनको कह रहा हूँ, जिसके श्रवण और पठन से सब पाप नष्ट हो
जाते हैं ॥४१॥ शक्र ! पहले मैं एक विशेष रूप से पाप करने वाला गिद्ध था। सर्वदा पृथ्वी पर रहता और गन्दा
मांस खाता था ॥४२॥ प्रभो ! एक दिन विष्णु मन्दिर की चहारदीवारी पर बैठा था। सायं काल किसी बहेलिये के
वाण से घायल होकर उस मन्दिर के आँगन में गिर पड़ा ॥४३॥ अभी मेरे प्राण कण्ठ में ही थे कि एक मांस लो-
लुप कुत्ता आया और अपने मुंह में मुझको दबा लिया। यह देखकर और भी कुत्ते आगये और उसका पीछा करने
लगे ॥४४॥ प्रभो ! उन कुत्तों के भय से वह मुझको मुंह में दबाये ही मन्दिर के चारों ओर घूमने लगा जिससे कि
मन्दिर की प्रदक्षिणा हो गयी ॥४५॥ केवल इतने से ही जगन्मय परात्मा सन्तुष्ट हो गये और मुझको तथा उस कुत्ते
को भी परमगति दे दी ॥४६॥ जब केवल प्रदक्षिणा करने से इतना फल मिला तब भगवान् की भली-भाँति पूजा
करने से कितना फल मिलेगा ॥४७॥ महात्मा सुधर्म की इतनी बातें सुनकर इन्द्र प्रसन्न हो गये और हरिपूजा करने
लगे ॥४८॥ उस स्वर्ग लोक में रहकर भी सब देवता भारतवर्ष में जन्म पाने की इच्छा से निर्विकार देवेश नारायण
की पूजा करते हैं। ब्रह्मा आदि देवगण उन भक्त देवों की पूजा करते हैं ॥४९॥ नारायण के ध्यान में लोन रहने वाले,
किसी का परिग्रह (दान) न लेने वाले भक्तों को इस संसार का कठोर बन्धन कैसे प्राप्त हो सकता है, जबकि उनकी
संगति में रहने वाले मनुष्य भी मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं ॥५०॥ जो मनुष्य प्रति दिन विषयों में अनासक्त
रहकर गरुड़ध्वज नारायण की पूजा करते हैं, वे सब पाप-समूहों से सर्वथा मुक्त होकर बड़ी प्रसन्नता से विष्णु के
शुभलोक को जाते हैं ॥५१॥ जो ब्रह्मज्ञानी वीतराग होकर सुर-गुरुनारायण का सर्वदा स्मरण करते हैं, वे
अपने ध्यान के प्रभाव से निष्पाप और विमल बुद्धि हो जाते हैं एवं पुनः माता का दूध नहीं पीते अर्थात् जन्म
चत्वारिंशोऽध्यायः २५५
ये मानवा हरिकथाश्रवणास्तदोषाः कृष्णांघ्रिपद्मभजने रतचेतनाश्च ।
ते वै पुनंति च जगंति शरीरसंगात् संभाषणार्द्वापि ततो हरिरेव पूज्यः ॥५३॥
हरिपूजापरा यत्र महांन्तः शुद्धबुद्धयः । तत्रैव सकलं भद्रं यथा निम्ने जलं द्विज ॥५४॥
हरिरेव परो बन्धुर्हरिरेव परा गतिः । हरिरेव ततः पूज्यो यतश्चैतन्यकारणम् ॥५५॥
स्वर्गापवर्गफलदं सदानंदं निरामयम् । पूजयस्व मुनिश्रेष्ठ परं श्रेयो भविष्यति ॥५६॥
पूजयन्ति हरिं ये तु निष्कामाः शुद्धमानसाः । तेषां विष्णुः प्रसन्नात्मा सर्वान्कामान् प्रयच्छति ॥५७॥
यस्त्वेतच्छृणुयाद्वापि पठेद्वा सुसमाहितः । स प्राप्नोत्यश्वमेधस्य फलं मुनिवरोत्तम ॥५८॥
इत्येतत्ते समाख्यातं हरिपूजाफलं द्विज । संकोचविस्तराभ्यां तु किमन्यत्कथयामि ते ॥५९॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्ये चत्वारिंशोध्यायः ॥४०॥
ग्रहण नहीं करते ॥५२॥ जिन मनुष्यों के सारे पाप हरिकथा के सुनने से दूर हो गए हैं, जो सदा कृष्ण के चरण-
कमल के ध्यान में लगे रहते हैं; वे अपने शरीर के स्पर्श और वाणी से समस्त संसार को पवित्र कर देते हैं, इसलिए
हरि की ही पूजा करनी चाहिए ॥५३॥ द्विज! जहाँ हरि-पूजापरायण, शुद्धबुद्धि महात्मा रहते हैं वहाँ सारे कल्याण
उसी प्रकार इकट्ठे हो जाते हैं जिस प्रकार नीची भूमि में जल ॥५४॥ हरि ही सत्य-बन्धु और हरि ही एकमात्र
परम गति हैं। वही सब के पूज्य हैं। क्योंकि चैतन्य कारण वही हैं ॥५५॥ मुनिवर्य ! स्वर्ग और मोक्ष को देने
वाले, सदानन्द, निरामय भगवान् की पूजा करो, तुम्हारा परम कल्याण होगा ॥५६॥ जो शुद्ध हृदय व्यक्ति
निष्काम भाव से हरि की पूजा करते हैं, उन पर भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर सारी कामनाओं को पूर्ण कर देते
हैं ॥५७॥ मुनिवरोत्तम ! जो ध्यान पूर्वक इस अध्याय को पढ़ता या सुनता है उसको अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त
होता है ॥५८॥ द्विज ! इस प्रकार तुमको हरिपूजा का फल संक्षेप और विस्तार से कह सुनाया । अब तुमको
और क्या सुनाऊँ? ॥५९॥
श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक चालीसवां अध्याय समाप्त ॥४०॥
अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः
नारद उवाच
आख्यातं भवता सर्वं मुने तत्त्वार्थकोविद । इदानीं श्रोतुमिच्छामि युगानां स्थितिलक्षणम् ॥१॥
सनक उवाच
साधु साधु महाप्राज्ञ मुने लोकोपकारक । युगधर्मान्प्रवक्ष्यामि सर्वलोकोपकारकान् ॥२॥
धर्मो विवृद्धिमायाति काले कस्मिंश्चिदुत्तम । तथा विनाशमायाति धर्म्म एव महीतले ॥३॥
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम् । दिव्यैर्द्वादशभिर्ज्ञेयं वत्सरेस्तव सत्तम् ॥४॥
संध्यासंध्यांशयुक्तानि युगानि सदृशानि वै । कालतो वेदितव्यानि इत्युक्तं तत्त्वदर्शिभिः ॥५॥
आद्ये कृतयुगं प्राहुस्ततस्त्रेताविधानकम् । ततश्च द्वापरं प्राहुः कलिमंत्यं विदुः क्रमात् ॥६॥
देवदानवगंधर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । नासन्कृतयुगे विप्र सर्वे देवसमाः स्मृताः ॥७॥
सर्वे हृष्टाश्च धर्मिष्ठा न तत्र क्रयविक्रयौ । वेदानां च विभागश्च न युगे कृतसंज्ञके ॥८॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राः स्वाचारतत्पराः । सदा नारायणपरास्तपोध्यानपरायणाः ॥९॥
कामादिदोषनिर्मुक्ताः शमादिगुणतत्पराः । धर्मसाधनचित्ताश्च गतासूया अदंभिकाः ॥१०॥
सत्यवाक्यरताः सर्वे चतुराश्रमधर्मिणः । वेदाध्ययनसंपन्नाः सर्वशास्त्रविचक्षणाः ॥११॥
अध्याय ४१
नारद बोले-मुने ! तत्त्वार्थविज्ञ ! आपने सब कुछ कह दिया, अब युगों की स्थिति और धर्म के विषय में सुनना चाहता हूँ ॥१॥
सनक ने कहा- मुने ! लोकोपकारक ! महाबुद्धिमान् ! धन्य हो, धन्य हो। मैं सब लोक का उपकार करने वाले युग धर्म को कह रहा हूँ ॥२॥ उत्तम ! किसी समय धर्म की वृद्धि होती तो कभी इस पृथ्वी तल पर उसका ह्रास हो जाता है ॥३॥ कृत, त्रेता, द्वापर और कलि ये चार युग हैं । सज्जनश्रेष्ठ ! दिव्य बारह वर्षों तक ये चार युग स्थित रहते हैं ॥४॥ तत्त्वदर्शियों ने कहा है कि चारों युगों में सन्ध्या और सन्ध्यांश काल नियमपूर्वक होते हैं और समय के अनुसार ये जाने जाते हैं। सब से पहले कृतयुग तब त्रेता और इसके बाद द्वापर युग आता है । क्रम में कलि अन्तिम युग है ॥५-६॥ विप्र ! कृतयुग में देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग आदि नहीं थे । सब देव कोटि के ही माने जाते थे । सब प्रसन्न और बलवान् थे । क्रय-विक्रय का व्यवहार न था । उस कृत नामक युग में वेदों का विभाग नहीं हुआ था ॥७-८॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-शूद्र सब अपने आचार-पालन में तत्पर रहते थे । वे सदा नारायण की पूजा करते और तप, ध्यान में लगे रहते थे ॥६॥ वे काम आदि दोषों से मुक्त, शम आदि गुणों में तत्पर, धर्म-साधन के प्रेमी, असूया और दम्भ से सदा दूर रहने वाले होते थे ॥१०॥ सब सत्य बोलने वाले, आश्रम-धर्म का पालन करने वाले, वेदाध्ययनपरायण और सब शास्त्रों के ज्ञाता होते थे ॥११॥
एकचत्वारिंशोऽध्यायः २५७
चतुराश्रमयुक्तेन कर्मणा कालयोनिना । अकामफलसंयोगाः प्रयांति परमां गतिम् ॥१२॥
नारायणः कृतयुगे शुक्लवर्णः सुनिर्मलः । त्रेताधर्मांन्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व सुसमाहितः ॥१३॥
धर्मः पांडुरतां याति त्रेतायां मुनिसत्तम । हरिस्तु रक्ततां याति किंचित्क्लेशान्विता जनाः ॥१४॥
क्रियायोगरताः सर्वे यज्ञकर्मसु निष्ठिताः । सत्यव्रता ध्यानपराः सदाध्यानपरायणाः ॥१५॥
द्विपादो वर्तते धर्मो द्वापरे च मुनीश्वर । हरिः पीतत्वमायाति वेदश्चापि विभज्यते ॥१६॥
असत्यनिरताश्चापि केचित्तत्र द्विजोत्तमाः । ब्राह्मणाद्याश्च वर्णाः स्युः केचिद्रागादिदुर्गुणाः ॥१७॥
केचित्स्वर्गापवर्गार्थं विप्रयज्ञान्प्रकुर्वते । केचिद्धनादिकामाश्च केचित्कलुषचेतसः ॥१८॥
धर्माधमौ समौ स्यातां द्वापरे विप्रसत्तम । अधर्मस्य प्रभावेण क्षीयंते च प्रजास्तथा ॥१९॥
अल्पायुषो भविष्यन्ति केचिच्चापि मुनीश्वर । केचित्पुण्यरतान् दृष्ट्वा असूयां विप्रकुर्वते ॥२०॥
कलिस्थितिं प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व समाहितः । धर्मः कलियुगे प्राप्ते पादेनैकेन वर्तते ॥२१॥
तामसं युगमासाद्य हरिः कृष्णत्वमेति च । यः कश्चिदपि धर्मात्मा यज्ञाचारान्करोति च ॥२२॥
यः कश्चिदपि पुण्यात्मा क्रियायोगरतो भवेत् । नरं धर्मरतं दृष्ट्वा सर्वेऽसूयां प्रकुर्वते ॥२३॥
व्रताचाराः प्रणश्यंति ज्ञानयज्ञादयस्तथा । उपद्रवा भविष्यन्ति ह्यधर्मस्य प्रवर्तनात् ॥२४॥
असूयानिरताः सर्वे दंभाचारपरायणाः । प्रजाश्चाल्पायुषः सर्वा भविष्यंति कलौ युगे ॥२५॥
नारद उवाच
युगधर्माः समाख्यातास्त्वया संक्षेपतो मुने । कलिं विस्तरतो ब्रूहि त्वं हि धर्मविदां वरः ॥२६॥
सामयिक चारों आश्रमों के कर्म के पालन से वे अकाम भाव से फल को प्राप्त कर परमगति को प्राप्त करते
थे ॥१२॥ कृत युग में नारायण शुक्ल वर्ण के और निर्मल होते हैं। इसके बाद त्रेता के धर्मों का वर्णन करता
हूँ, उसको ध्यानपूर्वक सुनो ॥१३॥ मुनिश्रेष्ठ ! त्रेता में धर्म पाण्डुर वर्ण का हो जाता है, हरि रक्तवर्ण के
हो जाते हैं और मनुष्य कुछ क्लेश पाने लगते हैं ॥१४॥ सब क्रिया-योग में लगे रहते, यज्ञों का अनुष्ठान करते, सभी
सत्यव्रत, ध्यान-परायण और सदा ईश्वर-चिन्तन में तल्लीन रहा करते हैं ॥१५॥ मुनीश्वर ! द्वापर में धर्म दो
चरणों का ही रह जाता है । हरि भी पीले रंग के हो जाते हैं और वेदों का विभाग हो जाता है ॥१६॥ कुछ द्विजो-
त्तम व्यक्ति भी असत्य व्यवहार करने लगते और ब्राह्मण आदि वर्ण के लोग भी राग आदि दुर्गुणों में फँस जाते
हैं ॥१७॥ कुछ लोग तो स्वर्ग और मुक्ति के लिए यज्ञ करते हैं, कुछ केवल धन के ही इच्छुक होते और कुछ का
तो हृदय ही कल्मष से भरा रहता है ॥१८॥ विप्रवर्य ! द्वापर में धर्म और अधर्म बराबर होते हैं । प्रजा अधर्म
के कारण क्षीण होती जाती है ॥१९॥ मुनीश्वर ! कुछ लोग अल्पायु भी हो जाते हैं । विप्र ! कुछ तो दूसरों को
पुण्य करते देख उसकी निन्दा या उससे ईर्ष्या करने लगते हैं ॥२०॥ अब कलियुग की स्थिति का वर्णन करता
हूँ; उसको ध्यानपूर्वक सुनो । कलियुग के आने पर धर्म का केवल एक चरण शेष रह जाता है ॥२१॥ उस
तामस युग के आ जाने पर हरि भी कृष्ण वर्ण के जाते हैं। जो कोई धर्मात्मा यज्ञ करता है या जो कोई
पुण्यात्मा क्रियायोग का पालन करता है, उस धार्मिक मनुष्य को देख कर सब उससे ईर्ष्या करने लगते
हैं ॥२२-२३॥ सारे व्रताचार और ज्ञान-यज्ञ आदि नष्ट हो जाते हैं, अधर्म के बढ़ जाने से नाना उपद्रव होने लगते
हैं । सब असूया और दम्भाचार में लगे रहते हैं और उस कलियुग में सारी प्रजा अल्पायु हो जाती है ॥२४-२५॥
नारद बोले-मुने ! आपने संक्षेप में युग-धर्मों का वर्णन किया । अब आप कृपा कर कलियुग का विस्तार-
३३ ना० पु०
२५८ नारदीयपुराणम्
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च मुनिसत्तम । किमाहाराः किमाचाराः भविष्यंति कलौ युगे ॥२७॥
सनक उवाच
शृणुष्व मुनिशार्दूल सर्वलोकोपकारक । कलिधर्मान्प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथम् ॥२८॥
सर्वे धर्मा विनश्यन्ति कृष्णे कृष्णत्वमागते । तस्मात्कलिर्महाघोरः सर्वपातकसंकरः ॥२९॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा धर्मपराङ्मुखाः । घोरे कलियुगे प्राप्ते द्विजा वेदपराङ्मुखाः ॥३०॥
व्याजधर्मरताः सर्वे असूयानिरतास्तथा । वृथाहंकारदुष्टाश्च सत्यहीनाश्च पंडिताः ॥३१॥
अहमेवाधिक इति सर्वेऽपि विवदंति च । अधर्मलोलुपाः सर्वे तथा वैतंडिका नराः ॥३२॥
अतः स्वल्पायुषः सर्वे भविष्यन्ति कलौ युगे । अल्पायुष्यान्मनुष्याणां न विद्याग्रहणं द्विज ॥३३॥
विद्याग्रहणशून्यत्वादधर्मो वर्तते पुनः । व्युत्क्रमेण प्रजाः सर्वा म्रियंते पापसत्पराः ॥३४॥
ब्राह्मणाद्यास्तथा वर्णाः संकीर्यंते परस्परम् । कामक्रोधपरा मूढा वृथासंतापपीडिताः ॥३५॥
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति सर्वे वर्णा कलौ युगे । उत्तमा नीचतां यांति नीचाश्चोत्तमतां तथा ॥३६॥
राजानो द्रव्यनिरतास्तथा ह्यन्यायवर्त्तिनः । पीडयन्ति प्रजाश्चैव करैरत्यर्थयोजितैः ॥३७॥
शववाहा भविष्यन्ति शूद्राणां च द्विजातयः । धर्मस्त्रीष्वपि गच्छंति पतयो जारधर्मिणः ॥३८॥
द्विषंति पितरं पुत्रा भर्तारं च स्त्रियोऽखिलाः । परस्त्रीनिरता सर्वे परद्रव्यपरायणाः ॥३९॥
मत्स्यामिषेण जीवंति दुहंतश्चाप्यजीविकाम् । घोरे कलियुगे विप्र सर्वे पापरता जनाः ॥४०॥
पूर्वक वर्णन कीजिए, क्योंकि आप धर्मज्ञों में श्रेष्ठ हैं ॥२६॥ मुनिश्रेष्ठ ! कलियुग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और
शूद्रों का आचरण और आहार कैसा होगा, इसको कहिए ॥२७॥
सनक बोले- मुनिश्रेष्ठ ! सर्वलोकोपकारक ! सुनो, अब विस्तारपूर्वक यथार्थ रूप से कलियुग के धर्मों का
वर्णन कर रहा हूँ ॥२८॥ हरि के कृष्ण वर्ण (काला) हो जाने पर सारे धर्म नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है
कि कलि महाघोर युग है। सब पापों का इस युग में नग्न रूप देखने को मिलता है ॥२९॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
और शूद्र धर्म से विमुख हो जाते और घोर कलि के आने पर विप्र भी वेदविमुख हो जाते हैं ॥३०॥ सभी कपट और
असूया में प्रवीण हो जाते हैं और पंडित वृथाहंकार से दूषित तथा सत्यविमुख हो जाते हैं ॥३१॥ सभी अपने को
ही श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए विवाद करते हैं। सब अधर्म करने के लिए लालायित रहते और वितंडावादी होते
हैं ॥३२॥ इसलिए कलियुग में सब अल्पायु होते हैं। अल्पायु होने के कारण विद्योपार्जन करना संभव नहीं होता
॥३३॥ अविद्या के कारण अधर्म बढ़ जाता है। धर्म-व्यतिक्रम के कारण सब प्रजावें पाप कर्म करती और अकाल
मृत्यु को प्राप्त करती हैं ॥३४॥ ब्राह्मण आदि सब वर्ण परस्पर संकरदोष से दूषित हो जाते हैं। सब मूढ़, काम-
क्रोध-परायण और दूसरों को व्यर्थ कष्ट देने में कुशल हो जाते हैं ॥३५॥ कलियुग में सब वर्ण शूद्र के समान
हो जाते हैं, उत्तम तो नीच हो जाते और नीच उत्तम हो जाते हैं ॥३६॥ राजा केवल धनापहरण को ही कर्त्तव्य
समझते, अन्याय व्यवहार करते तथा प्रजा को पीड़ित कर अनेकों कर वसूल करते हैं ॥३७॥ द्विजाति शूद्रों के
मुर्दे ढोते हैं। व्यभिचारी पति धर्मस्त्रियों का सतीत्व नष्ट कर देते हैं ॥३८। सब पुत्र अपने पिता से द्वेष करने
लगते हैं। स्त्रियाँ अपने भर्त्ता को शत्रु समझने लगती हैं। सब परस्त्री और परद्रव्य के अपहरण में ही लगे रहते
हैं ॥३९॥ मछली, मांस खाकर ही जीते हैं और अनुचित जीविका को भी अपनाने में हिचकते नहीं। इस प्रकार
विप्र ! घोर कलियुग में सब लोग पाप कर्म करने लगते हैं ॥४०॥ सज्जनों की निन्दा और उनका उपहास
एकचत्वारिंशोऽध्यायः २५६
सतामसूयानिरतां उपहासं प्रकुर्वंते । सरित्तीरेषु कुद्दालैर्वपिष्यन्ति चौषधीः ॥४१॥
पृथ्वी निष्फलतां याति बीजं पुष्पं विनश्यति । वेश्यालावण्यशीलेषु स्पृहां कुर्वंति योषितः ॥४२॥
धर्मविक्रयिणो विप्राः स्त्रियश्च भगविक्रयाः । वेदविक्रयकाश्चान्ये शूद्राचाररता द्विजाः ॥४३॥
साधूनां विधवानां च वित्तान्यपहरंति च । न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा द्रव्यलोलुपाः ॥४४॥
धर्माचारं परित्यज्य वृथावादैर्विषज्जिताः । द्विजाः कुर्वन्ति दंभार्थं पितृश्राद्धादिकाः क्रियाः ॥४५॥
आपात्रेष्वेव दानानि प्रयच्छन्ति नराधमाः । दुग्धलोभनिमित्तेन गोषु प्रीतिं च कुर्वंते ॥४६॥
न कुर्वंति तथा विप्राः स्नानशौचादिकाः क्रियाः । अकाले कर्मनिरता भविष्यंति द्विजाधमाः ॥४७॥
साधुनिंदापराश्चैव विप्रनिंदापरास्तथा । न कस्यापि मनो विप्र विष्णुभक्तिपरं भवेत् ॥४८॥
यज्विनश्च द्विजानैव धनार्थं राजकिंकराः । ताडयंति द्विजान्दुष्टाः कृष्णे कृष्णत्वमागते ॥४९॥
दानहीना नराः सर्वे घोरे कलियुगे मुने । प्रतिग्रहं प्रकुर्वंति पतितानामपि द्विजाः ॥५०॥
कलेः प्रथमपादेऽपि विनिंदंति हरिं नराः । युगान्ते च हरेर्नाम नैव कश्चिद्वदिष्यति ॥५१॥
शूद्रस्त्रीसंगनिरता विधवाशंगलोलुपाः । शूद्रान्नभोगनिरता भविष्यंति कलौ द्विजाः ॥५२॥
विहाय वेदसन्मार्गं कुपथाचारसंगताः । पाषंडाश्च भविष्यन्ति चतुराश्रमनिंदकाः ॥५३॥
न च द्विजातिशुश्रूषां कुर्वंति चरणोद्भवाः । द्विजातिधर्मान्गृह्णन्ति पाखण्डलिङ्गिनोऽधमाः ॥५४॥
काषायपरिवीताश्च जटिला भस्मधूलिताः । शूद्रा धर्मान्प्रवक्ष्यंति कूटयुक्तिपरायणाः ॥५५॥
द्विजाःस्वाचारमुत्सृज्य परपाकान्नभोजिनः । भविष्यंति दुरात्मानः शूद्राः प्रव्रजितास्तथा ॥५६॥
सब करते हैं। नदी तट को फावड़े से खोदकर अन्न बो दिया जाता है ॥४१॥ इस युग में पृथ्वी में अन्न पैदा करने
की शक्ति नहीं रह जाती। स्त्रियां सुन्दर वेश्याओं का सौन्दर्य और सजावट देखकर उनका ही अनुकरण करने
लगती हैं ॥४२॥ ब्राह्मण धर्म बेचते और स्त्रियां अपना सतीत्व बेंचती हैं। दूसरे विप्र वेद-विक्रय करते और शूद्रों
के समान आचरण करते हैं ॥४३॥ ब्राह्मण इतने अधिक धनलोलुप हो जाते हैं कि व्रत आदि का पालन तो करते
नहीं, उलटे साधुओं और विधवाओं की संपत्ति ठग लेते हैं ॥४४॥ द्विज धर्माचार को छोड़कर व्यर्थ के बकवाद में
लगे रहते हैं। द्विज केवल दंभ की दृष्टि से ही पितृ श्राद्ध आदि क्रियाओं को करते हैं ॥४५॥ दुष्ट लोग केवल
अपात्रों को ही दान देते हैं। गौओं का पालन अथवा उससे प्रेम केवल दूध के लोभ से ही लोग करते हैं, धर्म दृष्टि
से नहीं ॥४६॥ विप्रगण स्नान, शौच आदि कर्म शास्त्र और समय के अनुसार नहीं करते हैं और अधम ब्राह्मण
अकाल में ही कर्म करते हैं ॥४७॥ विप्र ! साधु ब्राह्मणों की निन्दा सब करते हैं। किसी का भी विष्णु भक्ति में
मन नहीं लगता ॥४८॥
कोई ब्राह्मण यज्ञ करने वाले नहीं रह जाते, सब धन के लोभ में पड़कर राजसेवक बन जाते हैं। कृष्ण
के कृष्ण वर्ण हो जाने पर दुष्टजन ब्राह्मणों को मारते हैं ॥४९॥ मुने ! घोर कलियुग के आ जाने पर मनुष्य दान
देना नहीं चाहते हैं। द्विज इतने पतित हो जाते हैं कि वे पतितों से भी दान लेते हैं ॥५०॥ कलि के प्रथम चरण
में ही मनुष्य हरि की निन्दा करने लगते हैं। युग के अन्त में कोई भगवान् का नाम भी नहीं लेता ॥५१॥ शूद्र-स्त्री
के साथ रमण करने लगते और विधवा की संगति के विशेष इच्छुक हो जाते हैं। कलि में द्विज शूद्रान्न भक्षण
करेंगे ॥५२॥ अधम पाखंडी लोग ब्राह्मणवेश बनाकर धर्म के नाम पर पाखंड करेंगे। काषाय वस्त्र पहनकर
भस्म लेप कर मुण्डी बनकर लोग वेद सम्मत मार्ग छोड़कर कुपथ की ओर लगेंगे। चारों आश्रमों की निन्दा
करने वाले पाखंडी होंगे। शूद्र द्विजाति की सेवा नहीं करेंगे। कूट और कपट कुशल शूद्र धर्म का प्रवचन करेंगे
॥५३-५५॥ ब्राह्मण अपने कुलाचार को छोड़कर दूसरे के बनाये अन्न को ही खायेंगे। दुष्ट शूद्र ही संन्यासी
२६० नारदीयपुराणम्
उत्कोचजीविनस्तत्र भविष्यन्ति कलौ मुने । धर्महीनास्तु पाखंडाः कापाला भिक्षवोऽधमाः ॥५७॥
धर्मविध्वंसशीलानां द्विजानां द्विजसत्तम । शूद्रा धर्मान्प्रवक्ष्यन्तिह्याधिरुह्योत्तमासनम् ॥५८॥
एते चान्ये च बहवः नग्नरक्तपटादिकाः । पाषंडाः प्रचरिष्यंति प्रायो वेदविदूषकाः ॥५९॥
गीतवादित्रकुशलाः क्षुद्रधर्मसमाश्रयाः । भविष्यंति कलौ प्रायो धर्मविध्वंसका नराः ॥६०॥
अल्पद्रव्या वृथालिंगा वृथाहंकारदूषिताः । हर्तारः परवित्तानां भवितारो नराधमाः ॥६१॥
प्रतिग्रहपरा नित्यं जगदुन्मार्गशीलिनः । आत्मस्तुतिपराः सर्वे परनिंदापरास्तथा ॥६२॥
विश्वस्तघातिनः क्रूरा दयाधर्मविवर्जिताः । भविष्यंति नरा विप्र कलौ चाधर्मबांधवाः ॥६३॥
परमायुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश । घोरे कलियुगे विप्र पंचवर्षा प्रसूयते ॥६४॥
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च युवानोऽतः परे जरा । स्वकर्मत्यागिनः सर्वे कृतघ्ना भिन्नवृत्तयः ॥६५॥
याचकाश्च द्विजा नित्यं भविष्यन्ति कलौ युगे । परावमाननिरताःप्रहृष्टाः परवेश्मनि ॥६६॥
तत्रैव निंदानिरता वृथाविश्रमिणो जनाः । निंदां कुर्वन्ति सततं पितृमातृसुतेषु च ॥६७॥
वदंति वाचा धर्मांश्च चेतसा पापलोलुपाः । धनविद्यावयोमत्ताः सर्वदुःखपरायणाः ॥६८॥
व्याधितस्करदुर्भिक्षैः पीडिता अतिमायिनः । प्रपुष्यंति वृथैवामी न विचार्य च दुष्कृतम् ॥६९॥
धर्ममार्गप्रणेतारं तिरस्कुर्वंति पापिनः । धर्मकार्ये रतं चैव वृथाविश्रंभिणो जनाः ॥७०॥
भविष्यन्ति कलौ प्राप्ते राजानो म्लेच्छजातयः । शूद्रा भैक्ष्यरताश्चैव तेषां शुश्रूषणे द्विजाः ॥७१॥
न शिष्यो न गुरुः कश्चिन्न पुत्रो न पिता तथा । न भार्या न पतिश्चैव भवितारोऽत्र संकरे ॥७२॥
बनेंगे और उपदेश द्वारा जीविका निर्वाह करेंगे ॥५६॥ हे मुने ! कलियुग में लोग खूब रिश्वत लेंगे । द्विजश्रेष्ठ !
धर्महीन, पाखंडी, कापालिक तथा अधम शूद्र भिक्षु धर्मविमुख द्विजों को उत्तम धर्मासन पर बैठकर धर्मोपदेश
करेंगे ॥५७-५८॥ ऐसे पाखण्डपरायण और दूसरे बहुत से, नंगे तथा लाल वस्त्र पहनने वाले कापालिक प्रायः वेद
विरुद्ध प्रचार करेंगे ॥५९॥ कलियुग में प्रायः लोग नाचने-गाने में प्रवीण और क्षुद्र धर्म के ही मानने वाले
होंगे । उस युग में मनुष्य धर्म-विध्वंसक, दरिद्र, कपट वेष धारण करने वाले और व्यर्थ अहंकार करने वाले
होंगे । अधम मानव पर-धन को चुराने वाले होंगे ॥६०-६१॥ प्रतिग्रह लेने वाले और सर्वदा कुपथगामी होंगे ।
सब आत्मस्तुति करने वाले, पर-निन्दा-परायण, विश्वासघाती, क्रूर, दया धर्म से शून्य और पाप के ही प्रेमी
होंगे ॥६२-६३॥ घोर कलियुग आने पर लोगों की परमायु सोलह वर्ष की होगी और पाँच वर्ष की कन्यायें पुत्र
प्रसव करेंगी ॥६४॥ सात, आठ वर्ष तक ही युवावस्था रहेगी इसके बाद बुढ़ापा आ जायगा सब ब्राह्मण कुलाचार
त्यागी, कृतघ्न, कुल-प्रतिकूल व्यवहार करने वाले और केवल भिखमंगे होंगे । दूसरों को अपमानित करने में लगे
रहने वाले दूसरों के घर से ही प्रसन्न रहेंगे ॥६५-६६॥ वहां दूसरों की निन्दा करेंगे और सदा अपनी धाक
जमाने का प्रयत्न करेंगे । पिता, माता और पुत्र की निन्दा करेंगे ॥६७॥ और मुंह से तो धर्म की बातें करेंगे
परन्तु हृदय से पाप करने के ही लिए उत्सुक रहेंगे । सब लोग धन, विद्या और युवावस्था के मद से मतवाले,
पर-पीड़ा-परायण, अतिमायावी और सर्वदा रोग, चोर और दुर्भिक्ष से पीड़ित रहेंगे । अपने दुष्कर्मों पर कुछ भी
विचार न कर उसका ही समर्थन करेंगे ॥६८-६९॥ पापी लोग धर्म मार्ग का उपदेश करने वाले धर्माचार्यों
का तिरस्कार करेंगे । धर्मकार्य की ओर रुचि रखने वाले की व्यर्थ आडम्बर जमाने वाले निन्दा करेंगे ॥७०॥
राजा म्लेच्छ जाति के ही होंगे । शूद्र भिक्षावृत्ति (साधु बन कर भीख मांगना) अपनायेंगे और द्विज उनकी
सेवा करेंगे ॥७१॥ न किसी का कोई गुरु होगा न शिष्य । न कोई अपने पिता की अपेक्षा करेगा, न पिता पुत्र
एकचत्वारिंशोऽध्यायः २६१
कलौ गते भविष्यन्ति धनाढ्या अपि याचकाः । रसविक्रयिणश्चापि भविष्यन्ति द्विजातयः ॥७३॥
धर्मकंचुकसंवीता मुनिवेषधरा द्विजाः । अपण्यविक्रयरता अगम्यागामिनस्तथा ॥७४॥
वेदनिंदापराश्चैव धर्मशास्त्रविनिंदकाः । शूद्रवृत्त्यैव जीवंति नरकार्हा द्विजा मुने ॥७५॥
अनावृष्टिभयं प्राप्ता गगनासक्तदृष्टयः । भविष्यन्ति कलौ मर्त्याः सर्वे क्षुद्भयकातराः ॥७६॥
कंदपर्णफलाहारास्तापसा इव मानवाः । आत्मानं तारयिष्यंति अनावृष्ट्यातिदुःखिताः ॥७७॥
कामार्ता ह्रस्वदेहाश्च लुब्धाश्चाधर्मतत्पराः । कलौ सर्वे भविष्यंति स्वल्पभाग्या बहुप्रजाः ॥७८॥
स्त्रियः स्वपोषणपरा वेश्या लावण्यशीलिकाः । पतिवाक्यमनादृत्य सदान्यगृहत्पराः ॥७६॥
दुःशीला दुष्टशीलेषु करिष्यन्ति सदा स्पृहाम् । असद्वृत्ता भविष्यंति पुरुषेषु कुलांगनाः ॥८०॥
चौरादिभयभीताश्च काष्ठयंत्राणि कुर्वते । दुर्भिक्षकरपीडाभिरतीवोपद्रुता जनाः ॥८१॥
गोधूमान्नयवान्नाढ्ये देशे यास्यंति दुःखिताः । निधाय हृद्यकर्माणि प्रेरयंति वचः शुभम् ॥८२॥
स्वकार्यसिद्धिपर्यंतं बंधुतां कुर्वते जनाः । भिक्षवश्चापि मित्रादिस्नेहसंबंधयन्विताः ॥८३॥
अन्नोपाधिनिमित्तेन शिष्यान्गृह्णन्ति भिक्षवः ॥८४॥
उभाभ्यामथ पाणिभ्यां शिरःकंडूयनं स्त्रियः । कुर्वंत्यो गुरुभर्तॄणामाज्ञामुल्लंघयंति च ॥८५॥
पाषण्डालापनिरता पाषण्डजनसंगिनः । यदा द्विजा भविष्यंति तदा वृद्धिं कलिर्व्रजेत् ॥८६॥
यदा प्रजा न यक्ष्यंति न होष्यंति द्विजातयः । तदैव तु कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः ॥८७॥
की । भार्या और पति की मर्यादा सर्वथा लुप्त हो जायगी । कलि के अन्तिमचरण में धनी भी भिखमंगे होंगे ।
द्विजाति रसविक्रयी होंगे ॥७२-७३॥
द्विज धर्म की ओट में अधर्म आचरण और ऋषि मुनि का वेष धारण कर प्रवंचना करेंगे ।
प्रायः मनुष्य निषिद्ध वस्तुओं का विक्रय करेंगे । अगम्यागमन, वेदनिन्दा और धर्मशास्त्रों की कटु आलोचना
नित्य प्रति का कार्य होगा । मुने ! नरक के अधिकारी द्विज शूद्रवृत्ति से ही जीविका निर्वाह करेंगे ॥७४-७५॥
सब अनावृष्टि के भय से दुःखी होकर आकाश की ओर ही आँख लगाए रहेंगे । सब मनुष्य भूख और भय से व्याकुल
हो तपस्वी की भांति केवल कंद, पत्तियां और फल खाकर रहेंगे । अनावृष्टि के कारण अति दुःखित होकर लोग
किसी प्रकार जीवनयापन करेंगे ॥७६-७७॥ सब कामी, लघुकाय, हत्यारे, अधर्म करने वाले होंगे । इस युग में
प्रायः सब दरिद्र परन्तु अधिक सन्तान वाले होंगे ॥७८॥ स्त्रियां केवल उदर-पोषण को ही अपना ध्येय समझेंगी
और सुन्दरी स्त्रियां वेश्यावृत्ति को ही अपनायेंगी । वे पति के कथन को तुच्छ समझ कर सदा दूसरे के घर में तत्पर
रहेंगी और ये दुःशील स्त्रियां दुष्टों को ही अधिक चाहेंगी । कुलांगनायें भी पुरुषों के प्रति असद् व्यवहार ही
करेंगी ॥७६-८०॥ लोग चोरों के डर से सदा काठ के यन्त्र किवाड़ और ताला आदि आत्मरक्षा के लिए बना-
येंगे । लोग दुर्भिक्ष और राजकर से पीड़ित होकर गेहूँ और जौ से समृद्ध देशों में भाग जायेंगे । हृदय में
अकर्म की योजना रखकर शुभ वाणी मुंह से कहेंगे, परन्तु उनकी वह बन्धुता केवल काम बनने तक ही रहेगी ।
भिक्षु (संन्यासी) भी मित्र, बन्धु आदि को ममता में फंसे रहेंगे ॥८१-८३॥ वे अन्न और सम्मान के लिए अपने
लोगों को शिष्य बनायेंगे ॥८४॥ स्त्रियां दोनों हाथों से शिर खुजलाती हुई गुरुजनों एवं पति की आज्ञा का
उल्लंघन करेंगी ॥८५॥ जब द्विज पाखण्ड प्रदर्शन करने लगेंगे सदा धूर्तों की संगति में रहेंगे तब कलियुग की
घोरता का अनुमान लग जायगा ॥८६॥ जब प्रजा यज्ञ करना और द्विज लोग हवन करना छोड़ देंगे तब बुद्धि-
२६२ नारदीयपुराणम्
अधर्मवृद्धिर्भविता बालमृत्युपि द्विज । सर्वधर्मेषु नष्टेषु याति निःश्रीकतां जगत् ॥८७॥
एवं कलेः स्वरूपं ते कथितं विप्र सत्तम । हरिभक्तिपरानेष न कलिर्बाधते क्वचित् ॥८८॥
ततः परं कृतयुगे त्रेतायां ध्यानमेव च । द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥८९॥
यत्कृते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां शरदा च यत् । द्वापरे यच्च मासेन ह्यहोरात्रेण तत्कलौ ॥९०॥
ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥९१॥
अहोरात्रं हरेर्नाम कीर्तयंति च ये नराः । कुर्वंति हरिपुजां वा न कलिर्बाधते च तान् ॥९२॥
नमो नारायणायेति कीर्तयंति च ये नराः । निष्कामा वा सकामा वा न कलिर्बाधते च तान् ॥९३॥
हरिनामपरा ये तु घोरे कलियुगे द्विज । त एव कृतकृत्याश्च न कलिर्बाधते हि तान् ॥९४॥
हरिपुजापरा ये च हरिनामपरायणाः । त एव शिवतुल्याश्च नात्र कार्या विचारणा ॥९५॥
समस्तजगदाधारं परमार्थस्वरूपिणम् । घोरे कलियुगे प्राप्ते विष्णुं ध्यायन्न सीदति ॥९६॥
अहो अति सुभाग्यास्ते सकृद्वै केशवार्चकाः । घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वधर्मविवर्जिते ॥९७॥
न्यूनातिरिक्तदोषाणां कलौ वेदोक्तकर्मणाम् । हरिस्मरणमेवात्र संपूर्णत्वविधायकम् ॥९८॥
हरे केशव गोविंद वासुदेव जगन्मय । इतीरयंति ये नित्यं नहि तान्बाधते कलिः ॥१००॥
शिव शंकर रुद्रेश नीलकंठ त्रिलोचन । इति जलपंन्ति ये वापि कलिस्तान्नपि बाधते ॥१०१॥
महादेव विरूपाक्ष गंगाधर मृडाव्यय । इत्थं वदंति ये विप्र ते कृतार्था न संशयः ॥१०२॥
मानों को समझ लेना चाहिए कि अब घोर कलियुग आ गया ॥८७॥ द्विज ! उस समय अधर्म बढ़ जायगा ।
बालकों की मृत्यु होगी । सब धर्मों के नष्ट हो जाने पर सारा संसार श्रीहीन हो जायगा ॥८८॥
विप्रश्रेष्ठ, इस भाँति तुमको कलियुग का स्वरूप बता दिया, परन्तु हरिभक्ति के प्रभाव से यह कलियुग
भक्तों का कुछ भी न बिगाड़ सकेगा ॥८९॥ इसके अतिरिक्त कृतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में कृष्णा-
र्चन और कलियुग में दान ही कलि के प्रभाव को नष्ट करते हैं ॥६०॥ कृतयुग में दश वर्ष तक, त्रेता में एक वर्ष
तक और द्वापर में एक मास तक कार्य करने से जो फल मिलता है वही कलि में एक रात और दिन के शुभ
कर्म से मिल जाता है ॥९१॥ कृतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में हरि-पूजा से जो फल मिलता है वही
कलियुग में केवल केशव नाम के कीर्तन से प्राप्त हो जाता है ॥९२॥ जो मनुष्य दिन रात हरिनाम कीर्तन और हरि
पूजा करते हैं उनपर कलियुग का प्रभाव नहीं पड़ता ॥९३॥ जो निष्काम या सकाम भाव से 'नमो नारायणाय' इस
मन्त्र का जप करते हैं उनको कलियुग पीड़ा नहीं पहुँचा सकता ॥९४॥ द्विज, घोर कलियुग में जो हरिनाम के
प्रेमी हैं उनका ही जन्म सफल है और उन पर कलि का प्रभाव नहीं पड़ता ॥९५॥ जो हरिनाम के उपासक हैं,
जो हरिपूजा के प्रेमी हैं वे ही शिव के समान हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥९६॥ घोर कलि में समस्त जगत् के आधार
परमार्थस्वरूप विष्णु का ध्यान करने से कलि कष्ट नहीं दे पाता ॥९७॥ उस घोर कलि में जबकि कहीं किसी
प्रकार के धर्म का पता नहीं चलता जो एक बार भी केशव की पूजा कर देते हैं वे अतीव भाग्यशाली हैं ॥९८॥
इस युग में वेदोक्त कर्मों का न्यूनाधिक दोष केवल हरि स्मरण मात्र से दूर होकर पूर्ण हो जाता है ॥९९॥ जो
हरि, केशव, गोविन्द, वासुदेव, जगन्मय आदि नामों का उच्चारण नित्य प्रति करते हैं उन पर कलि का कुछ भी
प्रभाव नहीं पड़ता ॥१००॥ जो शिव, शंकर, रुद्रेश, त्रिलोचन इन नामों का भी उच्चारण करते हैं उनको भी कलि
पीड़ा नहीं पहुँचा पाता ॥१०१॥ विप्र ! जो महादेव, विरूपाक्ष, गंगाधर, मृड, अव्यय आदि नामों को जपते
हैं वे निस्सन्दहेह कृतार्थ हो जाते हैं ॥१०२॥जी जनार्दन, जगन्नाथ, पीताम्बर, अच्युत आदि भगवन्नामों का उच्चारण
एकचत्वारिंशोऽध्यायः २६३
जनार्दन जगन्नाथ पीतांबरधराच्युत । इति वाग्युच्चरंतीह न च तेषां कलेर्भयम् ॥१०३॥
संसारे सुलभाः पुंसां पुत्रदारधनादयः । घोरे कलियुगे विप्र हरिभक्तिस्तु दुर्लभा ॥१०४॥
कर्मश्रद्धाविहीना ये पाखंडा वेदनिंदकाः । अधर्मनिरता नैव नरकार्द्धा हरिस्मृतेः ॥१०५॥
वेदमार्गबहिष्ठानां जनानां पापकर्मणाम् । मनः शुद्धिविहीनानां हरिनाम्रैव निष्कृतिः ॥१०६॥
दैवाधीनं जगत्सर्वमिदं स्थावरजंगमम् । यथाप्रेरितमेतेन तथैव कुरुते द्विज ॥१०७॥
शक्तितः सर्वकर्माणि वेदोक्तानि विधाय च । समर्पयेन्महाविष्णौ नारायणपरायणः ॥१०८॥
समर्पितानि कर्माणि महाविष्णौ परात्मनि । संपूर्णतां प्रयांत्येव हरिस्मरणमात्रतः ॥१०८॥
हरिभक्तिरतानां च पापबंधो न जायते । अतोऽतिदुर्लभा लोके हरिभक्तिर्दुरात्मनाम् ॥११०॥
अहो हरिपरा ये तु कलौ घोरे भयंकरे । ते सुभाग्या महात्मानः सत्संगरहिता अपि ॥१११॥
हरिस्मरणनिष्ठानां शिवनामरतात्मनाम् । सत्यं समस्तकर्माणि यांति संपूर्णतां द्विज ॥११२॥
अहो भाग्यमहो भाग्यं हरिनामरतात्मनाम् । त्रिदशैरपि ते पूज्याः किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥११३॥
तस्मात्समस्तलोकानां हितमेव मयोच्यते । हरिनामपरान्मर्त्यान्न कलिर्बाधते क्वचित् ॥११४॥
हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥११५॥
सूत उवाच
एवं स नारदो विप्राः सनकेन प्रबोधितः । परां निवृतिमापन्नः पुनरेतदुवाच ह ॥११६॥
करते हैं उनको किसी प्रकार का कलि से भय नहीं होता ॥१०३॥ संसार में पुत्र, स्त्री और धन आदि पाना
सुलभ है परन्तु विप्र ! इस घोर कलियुग में हरिभक्ति दुर्लभ वस्तु है ॥१०४॥ जो कर्म और श्रद्धा से हीन हैं,
अधार्मिक, पाखण्डी और वेद-निन्दक हैं, वे भी हरि-स्मरण के कारण नरक से बच जाते हैं ॥१०५॥ वेदमार्ग-
विरोधी, पाप करने वाले और कलुषित हृदय वाले मनुष्य का भी हरिनाम के द्वारा प्रायश्चित्त हो जाता है
॥१०६॥ यह सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् दैव के अधीन है और जैसी उसकी प्रेरणा होती है वैसा कार्य मनुष्य
करता है ॥१०७॥ इसलिए शक्ति के अनुसार वेदोक्त विधि से सब कार्यों को करके नारायणपरायण होकर
महाविष्णु को समर्पण कर देना चाहिए ॥१०८॥ इस विधि से महाविष्णु को समर्पण करने पर केवल हरि-
स्मरण मात्र से सारी न्यूनतायें पूरी हो जाती हैं ॥१०९॥ हरिभक्ति में लीन रहने वाले लोगों को पाप का बन्धन
नहीं लगता । अतएव दुष्टों के लिए इस संसार में हरि-भक्ति अत्यन्त दुर्भभ है ॥११०॥ घोर भयंकर कलियुग में
जो व्यक्ति हरि-सेवा-परायण रहते हैं वे महात्मा सौभाग्यशाली हैं चाहे उनको सत्संगति प्राप्त हो या न हो
॥१११॥ द्विज ! हरिस्मरण में लगे रहने वाले और शिवनाम का जप करने वाले मनुष्यों के समस्त कर्म अवश्य
पूर्ण हो जाते हैं ॥११२॥
हरिनाम में रत रहने वाले सज्जनों के भाग्य की कितनी सराहना की जाय, वे जब देवों के भी पूज्य
हैं तब इस विषय में अधिक क्या कहा जाय ॥११३॥ इसलिए मैं सब के हित को ही बात कह रहा हूँ कि हरिनाम
प्रेमियों को कलि की बाधा कभी भी नहीं सता सकती ॥११४॥ मेरा तो हरिनाम ही जीवन है, हरिनाम ही
सर्वस्व और एक मात्र आधार है, कलि में इसके अतिरिक्त दूसरी कोई गति (आधार) नहीं, यह ध्रुव सत्य है
॥११५॥
सूत बोले- विप्रगण ! सनकजी ने इस प्रकार नारद को उपदेश दिया जिससे वे परमानन्दमग्न हो गए
और फिर बोले-॥११६॥
२६४ नारदीयपुराणम्
नारद उवाच
भगवन्सर्वशास्त्रज्ञ त्वयातिकरुणात्मना । प्रकाशितं जगज्ज्योतिः परं ब्रह्म सनातनम् ॥११७॥
एतदेव परं पुण्यमेतदेव परं तपः। यः स्मरेत्पुंडरीकाक्षं सर्वपापविनाशनम् ॥११८॥
ब्रह्मन्नानाजगच्चैतदेकचित्संप्रकाशितम् । त्वयोक्तं तत्प्रतीयेऽहं कथं दृष्टांतमंतरा ॥११९॥
तस्माद्येन यथा ब्रह्म प्रतीत बोधितेन तु । तदाख्याहि यथाचित्तं सीदत्स्थितिमवाप्नुयात् ॥१२०॥
एतच्छ्रुत्वा वचो विप्रा नारदस्य महात्मनः । सनकः प्रत्युवाचेदं स्मरन्नारायणं परम् ॥१२१॥
सनक उवाच
ब्रह्मन्नहं ध्यानपरो भवेयं सनंदनं पृच्छ यथाभिलाषम् । ॥१२२॥
वेदांतशास्त्रे कुशलस्तवायं निवर्त्तयेद्वा परमार्थवंद्यः ॥१२३॥
इतोरितं समाकर्ण्य सनकस्य स नारद। सनंदनं मोक्षधर्मान्प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥१२३॥
श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे नाममाहात्म्यन्नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१॥
नारद बोले- भगवन् ! सर्वशास्त्रज्ञ ! आपने करुणा से द्रवित होकर पर ब्रह्म सनातन ज्योति प्रकाशित
कर दी ॥११७॥ जो सब पापों को दूर करने वाले पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करता है। यही परम पुण्य है और
यही परमतप है ॥११८॥ ब्रह्मन् ! यह नानारूप में प्रतिभासित होने वाला जगत् केवल एक परम ज्योति से ही
प्रकाशित होता है इस तथ्य को बिना उदाहरण के मैं कैसे हृदयंगम कर सकता हूँ ॥११९॥ इसलिए जिस ज्ञानी
ने जिस रूप से ब्रह्म का साक्षात्कार किया उसको कहिए जिससे कि मेरा भ्रान्त चित्त शान्ति प्राप्त करे ॥१२०॥
विप्रो ! महात्मा नारद की इन बातों को सुनकर सनक ने परम नारायण का स्मरण करते हुए बोले-
॥१२१॥
सनक बोले--ब्रह्मन् ! इस समय मैं ध्यानस्थ हो रहा हूँ, तुम सनन्दन से अपनी इच्छा के अनुसार पूछो।
यह वेदान्तशास्त्र में कुशल और वन्दनीय है, यह निश्चित ही तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति कर देगा। वे नारद जी
सनक की इन बातों को सुनकर सनन्दन से मोक्ष धर्म पूछने के लिए प्रस्तुत हुए ॥१२२-१२३॥
श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णु-नाम-माहात्म्य-वर्णन नामक
इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४१॥
अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीनारद उवाच
कुतः सृष्टमिदं ब्रह्मञ्जगत्स्थावरजंगमम् । प्रलये च कमभ्येति तन्मे ब्रूहि सनन्दन ॥१॥
ससागरः सगगनः सशैलः सबलाहकः । सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽयं केन निर्मितः ॥२॥
कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तयः । शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मविधिः कथम् ॥३॥
कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छंति ये मृताः । अस्माल्लोकादमुं लोकं सर्वं शंसतु मे भवान् ॥४॥
सनंदन उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि चेतिहासं पुरातनम् । भृगुणाभिहितं शास्त्रं भरद्वाजाय पृच्छते ॥५॥
कैलासशिखरे दृष्ट्वा दीप्यमानं महौजसम् । भृगुं महर्षिमासीनं भरद्वाजोऽन्वपृच्छत ॥६॥
भरद्वाज उवाच
कथं जीवो विचरति नानायोनिषु संततम् । कथं मुक्तिश्च संसाराज्जायते तस्य मानद ॥७॥
यश्च नारायणः स्रष्टा स्वयंभूर्भगवान्स्वयम् । सेव्यसेवकभावेन वर्तेते इति तौ सदा ॥८॥
प्रविशंति लये सर्वे यमीशं सचराचराः । लोकानां रमणः सोऽयं निर्गुणश्च निरंजनः ॥६॥
अनिर्देश्योऽप्रतर्क्यश्च कथं ज्ञायेत कैर्मुने । कथमेनं परात्मानं कालशक्तिदुरत्ययम् ॥१०॥
अध्याय ४२
सृष्टि-वर्णन
श्रीनारद बोले- ब्रह्मन् ! इस स्थावर जंगममय जगत् की उत्पत्ति किससे हुई और प्रलय में फिर किस
में इसका लय होगा, इसको हे सनन्दन ! कृपाकर कहिए ॥१॥ सागर, आकाश, पर्वत, मेघ, पृथ्वी, अग्नि और
वायु सहित इस विश्व की रचना किसने की ॥२॥ प्राणियों की सृष्टि कैसे हुई, वर्णव्यवस्था कैसे हुई, उनमें धर्म-
अधर्म शौचाशौच की विधियां कैसे प्रचलित हुई ॥३॥ जीवित जीवों के प्राण का स्वरूप क्या है, इन सब बातों
को पूर्ण रूप से आप मुझसे कहिए ॥४॥
सनन्दन बोले-नारद ! सुनो, इस विषय में एक पुरातन इतिहास को कह रहा हूँ, जिसको भरद्वाज के
पूछने पर भृगु ने कहा था ॥५॥ कैलास शिखर पर महातेजस्वी ज्योति के समान जगमगाते हुये भृगु मुनि को
बैठे देखकर भरद्वाज ने पूछा ॥६॥
भरद्वाज बोले- मानद ! जीव किस प्रकार और क्यों सदा नाना योनियों में चक्कर लगाता है, इस
संसार से उसकी मुक्ति कैसे होती है ? ॥७॥ जो नारायण और स्रष्टा भगवान् स्वयंभू हैं वे और जीव सर्वदा
सेव्य-सेवक भाव से विराजमान रहते हैं। जिनमें समस्त चर-अचर प्रलयकाल में प्रवेश कर जाते हैं, जो स्वयं
लोक में रमण करने वाले, निर्गुण और निरंजन हैं, जो अनिर्देश्य और तर्क से अगम्य हैं, उनको कोई कैसे जान
सकता है ? ॥८-९३॥ महान् आत्मा, और शक्ति से परे, अगम्य चरित भगवान् की स्तुति वेद कैसे आदरपूर्वक करते
३४-ना० पु०
२६६ | नारदीयपुराणम्
अतर्क्यचरितं वेदाः स्तुवन्ति कथमादरात् । जीवो जीवत्वमुल्लंघ्य कथं ब्रह्म समन्वयात् ॥११॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे ब्रूहि कृपानिधे । एवं स भगवान्पृष्टो भरद्वाजेन संशयम् ॥१२॥
महर्षिर्ब्रह्मसंकाशः सर्वं तस्मै ततोऽब्रवीत् ।
भृगुरुवाच ॥१३॥
मानसो नाम यः पूर्वो विश्रुतो वै महर्षिभिः
अनादिनिधनो देवस्तथा तेभ्योऽजरामरः । अव्यक्त इति विख्यातः शाश्वतोऽथाक्षयोऽव्ययः ॥१४॥
यतः सृष्टानि भूतानि जायन्ते च म्रियंति च । सोऽसृजत्प्रथमं देवो महान्तं नाम नामतः ॥१५॥
आकाशमिति विख्यातं सर्वभूतधरः प्रभुः । आकाशादभवद्वारि सलिलादग्निमारुतौ ॥१६॥
अग्निमारुतसंयोगातत्तः समभवन्मही । ततस्तेजोमयं दिव्यं पद्मं सृष्टं स्वयंभुवा ॥१७॥
तस्मात्पद्मात्समभवद्ब्रह्मा वेदमयो विधिः । अहंकार इति ख्यातः सर्वभूतात्मभूतकृत् ॥१८॥
ब्रह्मा वै स महातेजा य एते पंच धातवः । शैलास्तस्यास्थिसंघास्तु मेदो मांसं च मेदिनी ॥१९॥
समुद्रास्तस्य रुधिरमाकाशमुदरं तथा । पवनश्चैव निश्वासस्तेजोऽग्निर्निम्नगाः शिराः ॥२०॥
अग्नीषोमौ च चन्द्राकौं नयने तस्य विश्रुते । नभश्चोर्ध्वशिरस्तस्य क्षितिः पादौ भुजौ दिशः ॥२१॥
दुर्विज्ञेयो ह्यचिन्त्यात्मा सिद्धैरपि न संशयः । स एष भगवान्विष्णुरनन्त इति विश्रुतः ॥२२॥
सर्वभूतात्मभूतस्थो दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः । अहंकारस्य यःस्रष्टा सर्वभूतभवाय वै
ततः समभवद्विश्वं पृष्टोऽहं यदिह त्वया ॥२३॥
हैं । जीव अपने जीव भाव को छोड़कर किस प्रकार ब्रह्म पद को प्राप्त करता है ? ॥१०-११॥ कृपानिधान ! इन
सब बातों को मैं सुनना चाहता हूँ । कृपाकर मुझको समझाइये ! भरद्वाज ने इस प्रकार भृगु से अपनी शंकाओं
को पूछा । ब्रह्मा के समान उस महर्षि ने इन प्रश्नों को सुनकर सारी बातें भरद्वाज को बता दीं ॥१२॥
भृगु बोले—मानस नामक जिस देव के विषय में महर्षियों ने पहले ही कहा है जो अनादि, अनन्त, अजर,
अमर, अव्यक्त, शाश्वत, अक्षय और अव्ययनाम से विख्यात है ॥१३-१४॥ जिससे समस्त भूत उत्पन्न हुए हैं और
जिससे सारे प्राणी नष्ट भी होते हैं उस देव ने सर्वप्रथम नाम (शब्द) से महान् नामक तत्त्व को उत्पन्न किया
॥१५॥ वह समस्त भूतों को धारण करने वाला समर्थ ‘आकाश’ नाम से प्रसिद्ध है । आकाश से जल, जल से
अग्नि और अग्नि से वायु उत्पन्न हुए ॥१६॥ तदनन्तर अग्नि और वायु के संयोग से पृथ्वी उत्पन्न हुई । स्वयम्भू
ने पुनः एक तेजोमय दिव्य कमल को उत्पन्न किया ॥१७॥ उस पद्म से वेदमय ब्रह्मा उत्पन्न हुए । समस्त भूतों
का उत्पादक ‘अहंकार’ भी उसका नाम है ॥१८॥ वे महातेजस्वी ब्रह्मा और पंच धातु सब उसके ही रूप हैं ।
सब पर्वत उस विराट् की हड्डियाँ हैं, मेदिनी मज्जा और मांस है ॥१९॥ समुद्र उसका रक्त और आकाश उदर
है । पवन और तेज उस देव का निःश्वास है, नदियाँ उसकी शिरायें (नाड़ियाँ), अग्नि तथा सोम, चन्द्र तथा सूर्य उसके
नेत्र हैं, आकाश उसका कपाल, पृथ्वी चरण और दिशायें उसको भुजायें हैं ॥२०-२१॥ उस अचिन्त्य आत्मा को
सिद्ध भी कठिनाई से ही जान सकते हैं । वही भगवान् विष्णु अनन्त नाम से प्रसिद्ध है ॥२२॥ सब भूतों में
व्याप्त रहने वाले इस परमात्मा को अविवेकी कभी नहीं जान सकते हैं । वह अहंकार तत्त्व का स्रष्टा और समस्त
भूतों का एक मात्र आदि कारण है । उससे ही विश्व उत्पन्न हुआ है । तुमने जो कुछ पूछा उसका सारभूत उत्तर
यही है ॥२३॥
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २६७
भरद्वाज उवाच
गगनस्य दिशां चैव भूतलस्यानिलस्य च । कान्यत्र परिमाणानि संशयं छिन्धि तत्त्वतः ॥२४॥
भृगुरुवाच
अनंतमेतदाकाशं सिद्धदैवतसेवितम् । रम्यं नानाश्रयाकीर्णं यस्यांतो नाधिगम्यते ॥२५॥
ऊर्ध्वं गतेरधस्तात्तु चंद्रादित्यौ न पश्यतः । तत्र देवाः स्वयंदीप्ता भास्कराभाग्निवर्चसः ॥२६॥
ते चाप्यन्तं न पश्यन्ति नभसः प्रथितौजसः । दुर्गमत्वादनंतत्वादिति मे वद मानद ॥२७॥
उपरिष्टोपरिष्टात्तु प्रज्वलद्भिः स्वयंप्रभैः । निरुद्धमेतदाकाशं ह्यप्रमेयं सुरैरपि ॥२८॥
पृथिव्यंते समुद्रास्तु समुद्रांते तमः स्मृतम् । तमसोऽते जलं प्राहुर्जलस्यांतेऽग्निरेव च ॥२९॥
रसातलांते सलिलं जलांते पन्नगाधिपाः । तदंते पुनराकाशमाकाशांते पुनर्जलम् ॥३०॥
एवमंतं भगवतः प्रमाणं सलिलस्य च । अग्निमारुततोयेभ्यो दुर्ज्ञेयं दैवतैरपि ॥३१॥
अग्निमारुततोयानां वर्णाः क्षितितलस्य च । आकाशसदृशा ह्येते भिद्यंते तत्त्वदर्शनात् ॥३२॥
पठंति चैव मुनयः शास्त्रेषु विविधेषु च । त्रैलोक्ये सागरे चैव प्रमाणं विहितं यथा ॥३३॥
अदृश्यो यस्त्वगम्यो यः कः प्रमाणमुदीरयेत् । सिद्धानां देवतानां च परिमीता यदा गतिः ॥३४॥
तवागण्यमनंतस्य नामांतेति विश्रुतम् । नामधेयानुरूपस्य मानसस्य महात्मनः ॥३५॥
भरद्वाज बोले-आकाश, दिशा, पृथ्वी और वायु का परिमाण क्या है, यह मेरा संशय दूर
कीजिए ॥२४॥
भृगु बोले-यह सिद्ध और देवताओं से सेवित आकाश अनन्त है, अनेक रमणीय आश्रय-स्थानों से व्याप्त
इस आकाश का अन्त नहीं जाना जा सकता ॥२५॥ गति के ऊपर चले जाने पर जहां से नीचे की ओर देखने से
चन्द्रमा और सूर्य नहीं दिखाई देते हैं, वहां रहने वाले अपनी देहकान्ति से सूर्य और अग्नि के समान प्रकाशमान
देव भी प्रसिद्ध तेजस्वी आकाश का अन्त नहीं जान पाते हैं ॥२६३॥ आकाश के दुर्गम और अनन्त होने के कारण
जब देवताओं से भी वह अगम्य और अजेय है तब हे मानद ! तुम्हीं कहो दूसरा कौन उसका परिमाण बता सकता
है ? उत्तरोत्तर अपने तेज से दीप्त देवताओं से घिरे हुए इस आकाश के परिमाण को देवता भी नहीं जान सकते
हैं ॥२७-२८॥ पृथ्वी के अन्त में समुद्र हैं, समुद्र के अन्त में अन्धकार और अन्धकार के अन्त में जल है, जल के
पश्चात् अग्नि वर्तमान है ॥२९॥ इसी प्रकार रसातल के अन्त में सलिल और उसके बाद नागपति शेषनाग है ।
तत्पश्चात् फिर आकाश और आकाश के बाद पुनः जल है ॥३०॥ इस प्रकार अनन्त शक्तिशाली आकाश और
जल का प्रमाण अग्नि, वायु और जल भी नहीं बता सकते, देवताओं की तो कोई गणना ही नहीं ॥३१॥ अग्नि,
वायु, जल और पृथ्वी के वर्णों में कोई प्रत्यक्ष अन्तर नहीं है। वे आकाश के समान हैं, केवल सूक्ष्म रूप से तत्त्वतः
देखने पर ही भिन्नता जानी जाती है ॥३२॥ मुनियों ने विविध शास्त्रों में तीनों लोकों और समुद्रों का विस्तार
प्रमाण बताया है परन्तु जो अदृश्य है, अगम्य है, उसका प्रमाण कौन बता सकता है । सिद्धो और देवों की गति परि-
मित है उनसे भी अज्ञेय होने के कारण आकाश का अनन्त नाम प्रसिद्ध है ॥३३-३४॥ नाम के अनुरूप महात्मा
मानस की भी यही दशा है । जब उस देव का दिव्य रूप बढ़ता और घटता है तो उसके समान जो अपर देव हैं
२६८ नारदीयपुराणम्
यदा तु दिव्यं यद्रूपं हसते वर्द्धते पुनः । कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्यो योऽपि स्यात्तद्विधोऽपरः ॥३६॥
ततः पुष्करतः सृष्टः सर्वज्ञो मूर्तिमान्प्रभुः । ब्रह्मा धर्ममयः पूर्वः प्रजापतिरनुत्तमः ॥३७॥
भरद्वाज उवाच
पुष्करो यदि संभूतो ज्येष्ठं भवति पुष्करम् । ब्रह्माणं पूर्वजं चाह भवान्संदेह एव मे ॥३८॥
भृगुरुवाच
मानसस्येह या मूर्तिर्ब्रह्मत्वं समुपागता । तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते ॥३६॥
कर्णिका तस्य पद्मस्य मेरुर्गगनमुच्छ्रितः । तस्य मध्ये स्थितो लोकान्सृजत्येष जगद्विधिः ॥४०॥
भरद्वाज उवाच
प्रजाविसर्गं विविधं कथं स सृजति प्रभुः । मेरुमध्ये स्थितो ब्रह्मा तद्ब्रूहिद्विजसत्तम ॥४१॥
भृगुरुवाच
प्रजाविसर्गं विविधं मानसो मनसाऽसृजत् । संरक्षणाय भूतानां सृष्टं प्रथमतोलम् ॥४२॥
यत्प्राणाः सर्वभूतानां सृष्टं प्रथमतोलम् । यत्प्राणाः सर्वभूतानां वर्द्धते येन च प्रजाः ॥४३॥
परित्यक्ताश्च नश्यंति तेनेदं सर्वमावृतम् । पृथिवी पर्वता मेघा मूर्तिमंतश्च ये परे
सर्वं तद्धारुणं ज्ञेयमापस्तस्तंभिरे पुनः ॥४४॥
भरद्वाज उवाच
कथं सलिलमुत्पन्नं कथं चैवाग्निमारुतौ । कथं वा मेदिनी सृष्टेत्यत्र मे संशयो महान् ॥४५॥
वे भी किस प्रकार उसकी यथार्थ स्थिति को जान सकते हैं ॥३५-३६॥ सर्वज्ञ प्रभु ने पुष्कर (कमल) से पहले
मूर्तिमान् धर्ममय अनुपम प्रजापति ब्रह्मा को उत्पन्न किया ॥३७॥
भरद्वाज बोले-यदि पहले पुष्कर उत्पन्न हुआ तब तो पुष्कर ही ज्येष्ठ है परन्तु आपने तो ब्रह्मा को
पूर्वज कहा है, इस विषय में सन्देह हो रहा है ॥३८॥
भृगु बोले-मानस की जो मूर्ति ब्रह्मा के रूप में प्रकट हुई उसी के आसन के लिए पृथ्वी पद्म कही
गई है ॥३६॥ उस पद्म की कर्णिका मेरु है जो आकाश को छूमता रहता है । ब्रह्मा उसके मध्य में स्थित होकर
लोकों की सृष्टि करता है ॥४०॥
भरद्वाज बोले-द्विजवर्य ! ब्रह्मा मेरु के मध्य रहकर, बाहर किस प्रकार विविध प्रजाओं की सृष्टि करता
है ? ॥४१॥
भृगु बोले-मानस ने विविध प्रजासृष्टि को पहले अपने मन से बना डाला । सब प्राणियों की रक्षा के
लिए पहले जल उत्पन्न किया गया ॥४२॥ सब प्राणी जिसके सहारे जीते हैं, जिसके द्वारा सब प्राणी बढ़ते हैं और
जिसके बिना सब प्राणी नष्ट हो जाते हैं, उससे यह सम्पूर्ण विश्व आवृत है । पृथिवी, पर्वत, मेघ अथवा जितने
मूर्तिमान् पदार्थ हैं ये सब जल के ही विभिन्न रूप हैं, जो घनीभूत होकर इस रूप में हो गए हैं ॥४३-४४॥
भरद्वाज बोले-जल कैसे उत्पन्न हुआ, अग्नि, वायु और पृथ्वी कैसे उत्पन्न हुई, इसको कृपाकर बत-
लाइए । मुझे महान् सन्देह हो रहा है ॥४५॥
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २६६
भृगुरुवाच
ब्रह्मकल्पे पुरा ब्रह्मन् ब्रह्मर्षीणां समागमे। लोकसंभवसंदेहः समुत्पन्नो महात्मनाम् ॥४६॥
तेऽतिष्ठन् ध्यानमालम्ब्य मौनमास्थाय निश्चलाः। त्यक्ताहाराः स्पर्द्धमाना दिव्यं वर्षशतं द्विजाः ॥४७॥
तेषां ब्रह्ममयी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागमत्। दिव्या सरस्वती तत्र संबभूव नभस्तलात् ॥४८॥
पुरास्तिमितमाकाशमनंतमचलोपमम्। नष्टचंद्रार्कपवनं प्रसुप्तमिव संबभौ ॥४६॥
ततः सलिलमुत्पन्नं तमसीव तमः परम्। तस्माच्च सलिलोत्पीडादुदतिष्ठत मारुतः ॥५०॥
यथाभवनमच्छिद्रं निःशब्दमिव लक्ष्यते। तच्चांभसा पूर्यमाणं सशब्दं कुरुतेऽनिलः ॥५१॥
तथा सलिलसंरुद्धे नभसोंऽतं निरंतरम्। भित्त्वार्णवतलं वायुः समुत्पतति घोषवान् ॥५२॥
एषु वै चरते वायुरर्णवोत्पीडसंभवः। आकाशस्थानमासाद्य प्रशांतिं नाधिगच्छति ॥५३॥
तस्मिन्वाय्वम्बुसंघर्षे दीप्ततेजा महाबलः। प्रादुरासीदूर्ध्वशिखः कृत्वा निस्तिमिरं तमः ॥५४॥
अग्निः पवनसंयुक्तः खं समाक्षिपते जलम्। तदग्निवायुसंपर्काद्घनत्वमुपपद्यते ॥५५॥
तस्याकाशं निपतितः स्नेहात्तिष्ठति योऽपरः। स संघातत्वमापन्नो भूमितवमनुगच्छति ॥५६॥
रसानां सर्वगंधानां स्नेहानां प्राणिनां तथा। भूमियोंनिरियं ज्ञेया यस्याः सर्वं प्रसूयते ॥५७॥
भरद्वाज उवाच
य एते धातवः पंच रक्ष्या यानसृजत्प्रभुः। आवृता यैरिमे लोका महाभूताभिसंज्ञितैः ॥५८॥
भृगु बोले-पहले ब्रह्म-कल्प में ब्रह्मर्षिगण एक दिन इकट्ठे हुए। उन महात्माओं के मन में इसी प्रकार
लोक-सृष्टि के विषय में सन्देह हुआ। वे मौन होकर निश्चल भाव से ध्यानस्थ हो गए। इस रहस्य की जानने की
उत्सुकता में उन लोगों ने भोजन तक छोड़ दिया ॥४६-४७॥ इस प्रकार उन महर्षियों ने सौ दिव्य वर्ष बिता
दिये ॥४८॥ निदान उनको ब्रह्ममयी वाणी सुनाई दी और आकाश से दिव्य सरस्वती प्रकट हुई ॥४८॥ उसके
प्रकट होते ही आकाश शान्त, निःशब्द और अचल के समान हो गया। चन्द्र, सूर्य और पवन के बिना उस समय
आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो सो गया हो ॥४६॥ तदनन्तर जल उत्पन्न हुआ, जैसे अन्धकार से ही अन्ध-
कार की उत्पत्ति हुई हो उस जल के संघर्ष या दबाव से वायु उत्पन्न हुआ ॥५०॥ जिस प्रकार छिद्ररहित भवन
निःशब्द-सा लगता है और उसे जल से भरे जाने पर, वायु शब्द के सहित कर देता है। उसी प्रकार जल से
संरुद्ध आकाश में समुद्र तल का भेदन कर शब्दवान् वायु ऊपर उठता है। इस प्रकार वह वायु समुद्र की हलचल
से उत्पन्न होकर गतिमान् होता है। वह आकाश में जाकर शान्त नहीं होता ॥५१-५३॥ उस वायु और जल के
संघर्ष से महाशक्तिशाली तेजस्वी अग्नि उत्पन्न हुआ, जिसकी लपटें ऊपर को उठ रही थीं और जिसको प्रभा
से सारा आकाश तमोहीन हो गया था ॥५४॥ अग्नि वायु की सहायता से आकाश में जल उछालता है, उस समय
अग्नि और वायु के संयोग से जल धीरे-धीरे जमने लगता है और ठोस होकर बादल के रूप में परिणत हो
जाता है ॥५५॥ वह जब आकाश में ऊपर उड़ता और जलीय भाग को बरसा देता है तो उसका दूसरा स्नेह-
भाग रुक जाता है और वही एक में मिलते-मिलते भूमि के रूप में परिणत हो जाता है। रस, सब प्रकार के गन्ध
स्नेह और प्राणियों का उत्पत्ति-स्थान यही भूमि है जिससे यह पदार्थ उत्पन्न होते हैं ॥५६-५७॥
भरद्वाज बोले--जो ये पाँच रक्षणीय धातु हैं जिनकी रचना प्रभु ने की है, जो महाभूत नाम से प्रसिद्ध
२७० नारदीयपुराणम्
यदाऽसृजत्सहस्राणि भूतानां स महामतिः । पश्चात्तेष्वेव भूतत्वं कथं समुपपद्यते ॥५९॥
भृगुरुवाच
अमितानि महाष्टानि यांति भूतानि संभवम् । अतस्तेषां महाभूतशब्दोऽयमुपपद्यते ॥६०॥
चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः । पृथिवी चात्र संघातः शरीरं पांचभौतिकम् ॥६१॥
इत्यतः पंचभिर्युक्तैर्युक्तं स्थावरजंगमम् । श्रोत्रे घ्राणो रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेंद्रियसंज्ञिताः ॥६२॥
भरद्वाज उवाच
पंचभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजंगमाः । स्थावराणां न दृश्यंते शरीरे पंच धातवः ॥६३॥
अनूष्मणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः । वृक्षाणां नोपलभ्यन्ते शरीरे पंच धातवः ॥६४॥
न शृण्वंति न पश्यंति न गंधरसवेदिनः । न च स्पर्शं हि जानंति ते कथं पंच धातवः ॥६५॥
अद्रवत्वादह्नित्वाद् भूमित्वादवायुतः । आकाशस्याप्रमेयत्वाद्वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ॥६६॥
भृगुरुवाच
घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशयः । तेषां पुष्पफलव्यक्तिर्नित्यं समुपपद्यते ॥६७॥
ऊष्मतो म्लायते पर्णं त्वक्फलं पुष्पमेव च । म्लायते शीर्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥६८॥
वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः फलं पुष्पं विशीर्यते । श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वंति पादपाः ॥६९॥
वल्ली वेष्टयते वृक्षान्सर्वतश्चैव गच्छति । नह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात्पश्यंति पादपाः ॥७०॥
पुण्यापुण्यैस्तथा गंधैर्धूपैश्च विविधैरपि । अरोगाः पुष्पिताः संति तस्माज्जिघ्रंति पादपाः ॥७१॥
हैं और जिनसे सारे लोक ढके हैं जब उस महामति ने सहस्रों भूत (प्राणी) बनाये तो क्यों उन पांचों को ही भूत
की उपाधि मिली और उन्हीं में भूतत्त्व कैसे संगत हुआ ? ॥५८-५९॥
भृगु बोले—इन्हीं पाँचों पदार्थों से असीम महान् अष्ट भूत उत्पन्न होते हैं, अतएव उनकी महाभूत संज्ञा
युक्तियुक्त है। प्राणियों की चेष्टा वायु है, शरीर के स्थान आकाश, ऊष्मा-अग्नि इसके द्रव पदार्थ रक्त आदि जल
और ठोस पदार्थ पृथ्वी है। इस प्रकार इन पाँचों महाभूतों का मिलित रूप ही पाञ्चभौतिक शरीर है ॥६०-६१॥
इन पाँचों से ही सारे स्थावर-जंगम बने हुए हैं। श्रोत्र, नासिका, रसना, स्पर्श (त्वक्) और दृष्टि (नेत्र) इन्द्रियाँ
कहलाती हैं ॥६२॥
भरद्वाज बोले—यदि सारे स्थावर-जंगम पंच महाभूतों से युक्त रहते हैं तो स्थावर पदार्थों के शरीर में
ये पाँच धातु क्यों नहीं दिखाई देते ? ॥६३॥ चेष्टा और ऊष्मा से शून्य वृक्षों के शरीर में तो तत्त्वतः पंच धातु
नहीं पाये जाते ॥६४॥ वे न तो सुनते हैं, न देखते हैं। उन्हें न तो गन्ध और रस का ज्ञान रहता है और न स्पर्श
का ही। तब उनमें पंच धातु का सम्मिश्रण कैसे माना जाय ॥६५॥ अतएव उनमें द्रवत्व, अग्नित्व, वायुत्व और
भूमित्व न होने के कारण और आकाश के अप्रमेय होने के कारण वे भौतिक नहीं हैं ॥६६॥
भृगु बोले—अत्यन्त घने (ठोस) वृक्षों में भी आकाश है इसमें सन्देह नहीं। उनमें फूल-फल सर्वदा निक-
लते हैं, गर्मी लगने से उनकी पत्तियाँ, वल्कल (छाल), फल और पुष्प मुरझा जाते हैं, मलिन हो जाते हैं, सूख कर
गिर जाते हैं तो क्या उनमें स्पर्श ज्ञान नहीं है ? ॥६७-६८॥ वायु, अग्नि और बिजली की कड़कड़ाहट के शब्द से
उनके फल और फूल टूटकर गिर जाते हैं कान से शब्द सुना जाता है; अतः वृक्ष भी सुनते हैं ॥६९॥ लतायें
वृक्षों से लिपट जाती हैं, इधर-उधर फैलती भी हैं। बिना नेत्र के मार्ग कैसे दिखाई दे सकता है ? अतः वृक्ष भी
देखते हैं ॥७०॥ पुण्य-अपुण्य, विविध गंध और धूप (किरणों) से ये वृक्ष नीरोग रहते और फूलते हैं। इससे जान
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २७१
सुखदुःखयोर्ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात् । जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥७२॥
तेन तज्जलमादत्ते जरयत्यग्निमारुतौ । आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जायते ॥७३॥
जंगमानां च सर्वेषां शरीरे पंच धातवः । प्रत्येकशः प्रभिद्यंते यैः शरीरं विचेष्टते ॥७४॥
त्वक् च मांसं तथास्थीनि मज्जा स्नायुश्च पंचमः । इत्येतदिह संघातं शरीरे पृथिवीमये ॥७५॥
तेजो ह्यग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च । अग्निर्जनयते यच्च पंचाग्नेयाः शरीरिणः ॥७६॥
श्रोत्रं घ्राणं तथास्यं च हृदयं कोष्ठमेव च । आकाशात्प्राणिनामेते शरीरे पंच धातवः ॥७७॥
श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च । इत्यापः पंचधा देहे भवंति प्राणिनां सदा ॥७८॥
प्राणात्प्रीयते प्राणी व्यानाद्व्यायच्छते तथा । गच्छत्यपानोऽधश्चैव समानो हृद्यवस्थितः ॥७९॥
उदानादुच्छ्वसितीति पञ्च (प्रति) भेदाच्च भाषते । इत्येते वायवः पंच वेष्टयंतीह देहिनम् ॥८०॥
भूमेर्गंधगुणान्वेत्ति रसं चाद्भ्यः शरीरवान् । तस्य गंधस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान्गुणान् ॥८१॥
इष्टश्चानिष्टगंधश्च मधुरः कटुरेव च । निर्हारी संहतः स्निग्धो रुक्षो विशद एव च ॥८२॥
एवं नवविधो ज्ञेयः पार्थिवो गंधविस्तरः । ज्योतिः पश्यति चक्षुर्भ्यः स्पर्शं वेत्ति च वायुना ॥८३॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि गुणाः स्मृताः । रसज्ञानं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥८४॥
रसो बहुविधः प्रोक्त ऋषिभिः प्रथितात्मभिः । मधुरो लवणस्तिक्तः कषायोऽम्लः कटुस्तथा ॥८५॥
एष षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः । शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ॥८६॥
ज्योतिः पश्यति रूपाणि रूपं च बहुधा स्मृतम् । ह्रस्वो दीर्घस्तथा स्थूलश्चतुरस्रोऽणुवृत्तवान् ॥८७॥
शुक्लः कृष्णस्तथा रक्तो नीलः पीतोऽरुणस्तथा । कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो मृदु दारुणः ॥८८॥
पड़ता है कि वृक्ष सूंघते हैं ॥७१॥ पेड़ों को सुख-दुःख का अनुभव होता है, काटे जाने पर वे बढ़ते भी हैं। अतः उनमें
जीव है और चेतनता भी ॥७२॥ इसीलिए वे जल पीते हैं, अग्नि और वायु के प्रभाव से वृद्ध भी होते हैं। आहार
के अनुसार उनमें रस उत्पन्न होता और वे बढ़ते भी हैं ॥७३॥ और सब जंगमों के शरीर में पांच धातुयें हैं। भिन्न-
भिन्न प्रकार की शारीरिक चेष्टाओं द्वारा प्रत्येक धातुओं की अभिव्यक्ति होती है ॥७४॥ इस पृथिवीमय शरीर में
त्वक्, मांस, अस्थि, मज्जा और पांचवें स्नायु का संयोग है ॥७५॥ तेज, अग्नि, क्रोध, चक्षु और ऊष्मा इनको
अग्नि उत्पन्न करता है। अतः ये पाँचों देह के आग्नेय तत्त्व हैं ॥७६॥ कान, नासिका, मुख, हृदय और कोष्ठ ये
शरीर में आकाश से उत्पन्न होते हैं ॥७७॥ प्राणियों के शरीर में कफ, पित्त, स्वेद, वसा (चर्बी) और रक्त ये
जल के पाँच रूप हैं ॥७८॥ प्राण वायु से प्राणी तृप्त होता, व्यान से अंग प्रसारण करता, अपान शरीर के
अधो भाग से बाहर निकलता है, समान हृदय में रहता और उदान से मनुष्य उच्छ्वास छोड़ता है। इस प्रकार वायु
के पाँच भेद हैं। ये पाँच वायु देही को घेरे रहते हैं ॥७९-८०॥ शरीर भूमितत्त्व के कारण गन्ध ग्रहण करता और
जल से रस का आस्वादन करता है। उस गन्ध के गुणों को विस्तार के साथ कह रहा हूँ ॥८१॥ इष्ट, अनिष्ट,
मधुर, कटु, निर्हारी, संहत, स्निग्ध, रूक्ष और विशद ये नव पार्थिव गन्ध के भेद हैं ॥८२॥ नेत्र से ज्योति देखी
जाती है, वायु से स्पर्श का ज्ञान होता है। शब्द, स्पर्श, रूप और रस ये गुण हैं। अब मैं रस का ज्ञान बता रहा
हूँ, उसको मुझसे सुनो ॥८३-८४॥
प्रसिद्ध ज्ञानी ऋषियों ने रस के बहुत से भेद कहे हैं। मधुर, लवण, तिक्त, कषाय, अम्ल, कटु ये रस के
छह भेद हैं जो जल के ही विकृत रूप हैं ॥८५॥ शब्द, स्पर्श और रूप ये तीनों गुण ज्योति कहे गये हैं।
ज्योति से ही रूप का दर्शन होता है। रूप विविध प्रकार के हैं। ह्रस्व, दीर्घ, स्थूल, चौकोर, अणु,
शुक्ल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, कठिन, चिकना, कोमल, पिच्छिल (फिसलने योग्य), मृदु, दारुण (कठोर)
२७२ नारदीयपुराणम्
एवं षोडशविस्तारो ज्योतिरूपगुणः स्मृतः । तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् ॥८८॥
तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तारं विविधात्मकम् । षड्जो ऋषभगांधारौ मध्यम धैवतस्तथा ॥८९॥
पंचमश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादवान् । एष सप्तविधः प्रोक्तो गुण आकाशसंभवः ॥९०॥
ऐश्वर्येण तु सर्वत्र स्थितोऽपि पटहादिषु । मृदंगभेरीशंखानां स्तनयित्नो रथस्य च ॥९१॥
एवं बहुविधाकारः शब्द आकाशसंभवः । वायव्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः ॥९२॥
उष्णः शीतः सुखं दुःखं स्निग्धो विशद एव च । तथा खरो मृदुः श्लक्ष्णो लघुर्गुरुतरोऽपि च ॥९३॥
शब्दस्पर्शौ तु विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरित्युत । एवमेकादशविधो वायव्यो गुण उच्यते ॥९४॥
आकाशजं शब्दमाहुरेभिर्वायुगुणैः सह । अव्याहतैश्चेतयते नवेति विषमा गतिः ॥९५॥
आप्यायन्ते च ते नित्यं धातवस्तैस्तु धातुभिः । आपोऽग्निर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रति देहिषु ॥९७॥
मूलमेते शरीरस्य व्याप्य प्राणानिह स्थिताः । पार्थिवं धातुमासाद्य यथा चेष्टयते बली ॥९८॥
श्रितो मूर्द्धानमग्निस्तु शरीरं परिपालयेत् । प्राणो मूर्द्धनि वाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥९६॥
स जंतुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि विषयश्च सः ॥१००॥
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणैस्तु परिपाल्यते । पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥१०१॥
वस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः । वहन्मूत्रं पुरीषं वाप्यानः परिवर्तते ॥१०२॥
प्रयत्ने कर्मनियमे य एकत्रित्रिषु वर्तते । उदान इति तं प्राहुरध्यात्मज्ञानकोविदाः ॥१०३॥
संधिष्वपि च सर्वेषु संनिविष्टस्तथानिलः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥१०४॥
इस प्रकार ज्योतिर्ग्राह्य रूप के षोडश गुण हैं। इन महाभूतों में आकाश का एक गुण होता है जिसको 'शब्द'
कहते हैं ॥८८-८९॥ उस शब्द के विविध रूपों का विस्तार के साथ वर्णन कर रहा हूँ। षड्ज, ऋषभ, गान्धार,
मध्यम, धैवत, पंचम और निषाद ये सात प्रकार के आकाश-संभव गुण कहे जाते हैं ॥९०-९१॥ आकाशोत्पन्न
शब्द पटह आदि में सर्वत्र गरिमा के साथ स्थित होने पर भी मृदंग, भेरी, शंख, बादल और रथ के भेद से अनेक
प्रकार का हो जाता है ॥९२ १/२॥
वायु का गुण स्पर्श ही माना गया है। उष्ण, शीत, सुख, दुःख, स्निग्ध, विशद, खर, मृदु, श्लक्ष्ण, लघु
और गुरुतर, ये स्पर्श के भेद हैं ॥९३-९४॥ अथवा वायु के शब्द और स्पर्श ये दो गुण समझने चाहिए। इस प्रकार
वायु के गुण ग्यारह होते हैं ॥९५॥ शब्द को आकाशज कहा गया है। वह उन वायुगुणों के साथ अबाध रूप से
चेतना प्रदान करता है कि नहीं, यह एक विचारणीय विषय है ॥९६॥ वे धातु अन्य धातुओं के संसर्ग से आप्या-
यित होते हैं। प्राणियों में जल, अग्नि और वायु सर्वदा जाग्रत रहते हैं ॥९७॥ ये शरीर के मूल-तत्त्व हैं और प्राणों
में व्याप्त होकर रहते हैं। जैसे बलवान् वायु पार्थिव धातु को प्राप्त कर क्रियाएँ उत्पन्न करता है उसी तरह
अग्नि मस्तक का आश्रय लेकर शरीर का पालन करता है। प्राण मूर्द्धा अथवा अग्नि से संयुक्त होकर गतिमान्
होता है ॥९८-९९॥ वह जीव सब भूत का आत्मा, सनातन पुरुष, मन, बुद्धि, अहंकार, प्राणी और विषय भी
है ॥१००॥ इस प्रकार वह इस शरीर में सब प्रकार से प्राणों द्वारा परिपालित होता है। पीछे की ओर वह समान
वायु के साथ अपनी गति को प्राप्त करता है ॥१०१॥ वस्तिमूल, गुदा और शरीराग्नि से संपृक्त होकर अपान
वायु मूत्र और मल को शरीर से बाहर निकालता है ॥१०२॥ जो वायु शारीरिक प्रयत्न और कर्मनियम (कर्म-
संगठन) में प्रवृत्त रहता है उसको अध्यात्मज्ञान के पंडितों ने उदान वायु कहा है ॥१०३॥ मनुष्यों के शरीर की
प्रत्येक संधियों में रहने वाला वायु उदान कहा जाता है ॥१०४॥ अग्नि बाँहों में समान के द्वारा प्रेरित होकर