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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 291

२७२ नारदीयपुराणम्

एवं षोडशविस्तारो ज्योतिरूपगुणः स्मृतः । तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् ॥८८॥
तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तारं विविधात्मकम् । षड्जो ऋषभगांधारौ मध्यम धैवतस्तथा ॥८९॥
पंचमश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादवान् । एष सप्तविधः प्रोक्तो गुण आकाशसंभवः ॥९०॥
ऐश्वर्येण तु सर्वत्र स्थितोऽपि पटहादिषु । मृदंगभेरीशंखानां स्तनयित्नो रथस्य च ॥९१॥
एवं बहुविधाकारः शब्द आकाशसंभवः । वायव्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः ॥९२॥
उष्णः शीतः सुखं दुःखं स्निग्धो विशद एव च । तथा खरो मृदुः श्लक्ष्णो लघुर्गुरुतरोऽपि च ॥९३॥
शब्दस्पर्शौ तु विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरित्युत । एवमेकादशविधो वायव्यो गुण उच्यते ॥९४॥
आकाशजं शब्दमाहुरेभिर्वायुगुणैः सह । अव्याहतैश्चेतयते नवेति विषमा गतिः ॥९५॥
आप्यायन्ते च ते नित्यं धातवस्तैस्तु धातुभिः । आपोऽग्निर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रति देहिषु ॥९७॥
मूलमेते शरीरस्य व्याप्य प्राणानिह स्थिताः । पार्थिवं धातुमासाद्य यथा चेष्टयते बली ॥९८॥
श्रितो मूर्द्धानमग्निस्तु शरीरं परिपालयेत् । प्राणो मूर्द्धनि वाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥९६॥
स जंतुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि विषयश्च सः ॥१००॥
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणैस्तु परिपाल्यते । पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥१०१॥
वस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः । वहन्मूत्रं पुरीषं वाप्यानः परिवर्तते ॥१०२॥
प्रयत्ने कर्मनियमे य एकत्रित्रिषु वर्तते । उदान इति तं प्राहुरध्यात्मज्ञानकोविदाः ॥१०३॥
संधिष्वपि च सर्वेषु संनिविष्टस्तथानिलः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥१०४॥


इस प्रकार ज्योतिर्ग्राह्य रूप के षोडश गुण हैं। इन महाभूतों में आकाश का एक गुण होता है जिसको 'शब्द'
कहते हैं ॥८८-८९॥ उस शब्द के विविध रूपों का विस्तार के साथ वर्णन कर रहा हूँ। षड्ज, ऋषभ, गान्धार,
मध्यम, धैवत, पंचम और निषाद ये सात प्रकार के आकाश-संभव गुण कहे जाते हैं ॥९०-९१॥ आकाशोत्पन्न
शब्द पटह आदि में सर्वत्र गरिमा के साथ स्थित होने पर भी मृदंग, भेरी, शंख, बादल और रथ के भेद से अनेक
प्रकार का हो जाता है ॥९२ १/२॥
वायु का गुण स्पर्श ही माना गया है। उष्ण, शीत, सुख, दुःख, स्निग्ध, विशद, खर, मृदु, श्लक्ष्ण, लघु
और गुरुतर, ये स्पर्श के भेद हैं ॥९३-९४॥ अथवा वायु के शब्द और स्पर्श ये दो गुण समझने चाहिए। इस प्रकार
वायु के गुण ग्यारह होते हैं ॥९५॥ शब्द को आकाशज कहा गया है। वह उन वायुगुणों के साथ अबाध रूप से
चेतना प्रदान करता है कि नहीं, यह एक विचारणीय विषय है ॥९६॥ वे धातु अन्य धातुओं के संसर्ग से आप्या-
यित होते हैं। प्राणियों में जल, अग्नि और वायु सर्वदा जाग्रत रहते हैं ॥९७॥ ये शरीर के मूल-तत्त्व हैं और प्राणों
में व्याप्त होकर रहते हैं। जैसे बलवान् वायु पार्थिव धातु को प्राप्त कर क्रियाएँ उत्पन्न करता है उसी तरह
अग्नि मस्तक का आश्रय लेकर शरीर का पालन करता है। प्राण मूर्द्धा अथवा अग्नि से संयुक्त होकर गतिमान्
होता है ॥९८-९९॥ वह जीव सब भूत का आत्मा, सनातन पुरुष, मन, बुद्धि, अहंकार, प्राणी और विषय भी
है ॥१००॥ इस प्रकार वह इस शरीर में सब प्रकार से प्राणों द्वारा परिपालित होता है। पीछे की ओर वह समान
वायु के साथ अपनी गति को प्राप्त करता है ॥१०१॥ वस्तिमूल, गुदा और शरीराग्नि से संपृक्त होकर अपान
वायु मूत्र और मल को शरीर से बाहर निकालता है ॥१०२॥ जो वायु शारीरिक प्रयत्न और कर्मनियम (कर्म-
संगठन) में प्रवृत्त रहता है उसको अध्यात्मज्ञान के पंडितों ने उदान वायु कहा है ॥१०३॥ मनुष्यों के शरीर की
प्रत्येक संधियों में रहने वाला वायु उदान कहा जाता है ॥१०४॥ अग्नि बाँहों में समान के द्वारा प्रेरित होकर