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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 276

एकचत्वारिंशोऽध्यायः २५७
चतुराश्रमयुक्तेन कर्मणा कालयोनिना । अकामफलसंयोगाः प्रयांति परमां गतिम् ॥१२॥
नारायणः कृतयुगे शुक्लवर्णः सुनिर्मलः । त्रेताधर्मांन्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व सुसमाहितः ॥१३॥
धर्मः पांडुरतां याति त्रेतायां मुनिसत्तम । हरिस्तु रक्ततां याति किंचित्क्लेशान्विता जनाः ॥१४॥
क्रियायोगरताः सर्वे यज्ञकर्मसु निष्ठिताः । सत्यव्रता ध्यानपराः सदाध्यानपरायणाः ॥१५॥
द्विपादो वर्तते धर्मो द्वापरे च मुनीश्वर । हरिः पीतत्वमायाति वेदश्चापि विभज्यते ॥१६॥
असत्यनिरताश्चापि केचित्तत्र द्विजोत्तमाः । ब्राह्मणाद्याश्च वर्णाः स्युः केचिद्रागादिदुर्गुणाः ॥१७॥
केचित्स्वर्गापवर्गार्थं विप्रयज्ञान्प्रकुर्वते । केचिद्धनादिकामाश्च केचित्कलुषचेतसः ॥१८॥
धर्माधमौ समौ स्यातां द्वापरे विप्रसत्तम । अधर्मस्य प्रभावेण क्षीयंते च प्रजास्तथा ॥१९॥
अल्पायुषो भविष्यन्ति केचिच्चापि मुनीश्वर । केचित्पुण्यरतान् दृष्ट्वा असूयां विप्रकुर्वते ॥२०॥
कलिस्थितिं प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व समाहितः । धर्मः कलियुगे प्राप्ते पादेनैकेन वर्तते ॥२१॥
तामसं युगमासाद्य हरिः कृष्णत्वमेति च । यः कश्चिदपि धर्मात्मा यज्ञाचारान्करोति च ॥२२॥
यः कश्चिदपि पुण्यात्मा क्रियायोगरतो भवेत् । नरं धर्मरतं दृष्ट्वा सर्वेऽसूयां प्रकुर्वते ॥२३॥
व्रताचाराः प्रणश्यंति ज्ञानयज्ञादयस्तथा । उपद्रवा भविष्यन्ति ह्यधर्मस्य प्रवर्तनात् ॥२४॥
असूयानिरताः सर्वे दंभाचारपरायणाः । प्रजाश्चाल्पायुषः सर्वा भविष्यंति कलौ युगे ॥२५॥
नारद उवाच
युगधर्माः समाख्यातास्त्वया संक्षेपतो मुने । कलिं विस्तरतो ब्रूहि त्वं हि धर्मविदां वरः ॥२६॥
सामयिक चारों आश्रमों के कर्म के पालन से वे अकाम भाव से फल को प्राप्त कर परमगति को प्राप्त करते
थे ॥१२॥ कृत युग में नारायण शुक्ल वर्ण के और निर्मल होते हैं। इसके बाद त्रेता के धर्मों का वर्णन करता
हूँ, उसको ध्यानपूर्वक सुनो ॥१३॥ मुनिश्रेष्ठ ! त्रेता में धर्म पाण्डुर वर्ण का हो जाता है, हरि रक्तवर्ण के
हो जाते हैं और मनुष्य कुछ क्लेश पाने लगते हैं ॥१४॥ सब क्रिया-योग में लगे रहते, यज्ञों का अनुष्ठान करते, सभी
सत्यव्रत, ध्यान-परायण और सदा ईश्वर-चिन्तन में तल्लीन रहा करते हैं ॥१५॥ मुनीश्वर ! द्वापर में धर्म दो
चरणों का ही रह जाता है । हरि भी पीले रंग के हो जाते हैं और वेदों का विभाग हो जाता है ॥१६॥ कुछ द्विजो-
त्तम व्यक्ति भी असत्य व्यवहार करने लगते और ब्राह्मण आदि वर्ण के लोग भी राग आदि दुर्गुणों में फँस जाते
हैं ॥१७॥ कुछ लोग तो स्वर्ग और मुक्ति के लिए यज्ञ करते हैं, कुछ केवल धन के ही इच्छुक होते और कुछ का
तो हृदय ही कल्मष से भरा रहता है ॥१८॥ विप्रवर्य ! द्वापर में धर्म और अधर्म बराबर होते हैं । प्रजा अधर्म
के कारण क्षीण होती जाती है ॥१९॥ मुनीश्वर ! कुछ लोग अल्पायु भी हो जाते हैं । विप्र ! कुछ तो दूसरों को
पुण्य करते देख उसकी निन्दा या उससे ईर्ष्या करने लगते हैं ॥२०॥ अब कलियुग की स्थिति का वर्णन करता
हूँ; उसको ध्यानपूर्वक सुनो । कलियुग के आने पर धर्म का केवल एक चरण शेष रह जाता है ॥२१॥ उस
तामस युग के आ जाने पर हरि भी कृष्ण वर्ण के जाते हैं। जो कोई धर्मात्मा यज्ञ करता है या जो कोई
पुण्यात्मा क्रियायोग का पालन करता है, उस धार्मिक मनुष्य को देख कर सब उससे ईर्ष्या करने लगते
हैं ॥२२-२३॥ सारे व्रताचार और ज्ञान-यज्ञ आदि नष्ट हो जाते हैं, अधर्म के बढ़ जाने से नाना उपद्रव होने लगते
हैं । सब असूया और दम्भाचार में लगे रहते हैं और उस कलियुग में सारी प्रजा अल्पायु हो जाती है ॥२४-२५॥
नारद बोले-मुने ! आपने संक्षेप में युग-धर्मों का वर्णन किया । अब आप कृपा कर कलियुग का विस्तार-
३३ ना० पु०

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