बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचत्वारिंशोऽध्यायः २५३
यामा इति समाख्याता देवाः स्वायंभुवेऽन्तरे । शचीपतिः समाख्यातस्तेषामिंद्रो महामतिः ॥२४॥
पारावताश्च तुषिता देवाः स्वारोचिषेऽन्तरे । विपश्चिन्नाम देवेन्द्रः सर्वसंपत्समन्वितः ॥२५॥
सुधामानस्तथा सत्याः शिवाश्चाथ प्रतर्दनाः । तेषामिंद्रः सुशांतिश्च तृतीये परिकीर्तितः ॥२६॥
सुताः पाराहराश्चैव सुत्याश्चासुधियस्तथा । तेषामिंद्रः शिवः प्रोक्तः शक्रस्तामसरुँऽतरे
विभुनामा देवपतिः पञ्चमः परिकीर्तितः ॥२७॥
अमिताभदयो देवाः षष्ठेऽपि च तथा शृणु । आर्याद्या विबुधाः प्रोक्तास्तेषामिंद्रो मनोजवः ॥२८॥
आदित्यवसुरुद्राद्या देवा वैवस्वतेऽन्तरे । इन्द्रः पुरंदरः प्रोक्तः सर्वकामसमन्वितः ॥२९॥
अप्रमेयाश्च विबुधाः सूतपाद्याः प्रकीर्तिताः । विष्णुपूजाप्रभावेण तेषामिंद्रो बलिः स्मृतः ॥३०॥
पाराद्या नवमे देवा इन्द्रश्चाद्भुत उच्यते । सुवासनाद्या विबुधा दशमे परिकीर्तिताः ॥३१॥
शांतिर्नाम च तत्रेद्रः सर्वभोगसमन्वितः । विहंगमाद्या देवाश्च तेषामिंद्रो वृषः स्मृतः ॥३२॥
एकादशे द्वादशे तु निबोध कथयामि ते । ऋभुनामा च देवेंद्रो हरिनाभास्तथा सुराः ॥३३॥
सुत्रामाद्यास्तथा देवास्त्रयोदशतमेऽन्तरे । दिवस्पतिर्महावीर्यस्तेषामिंद्रः प्रकीर्तितः ॥३४॥
चतुर्दशे चाक्षुषाद्या देवा इन्द्रः शुचिः स्मृतः । एवं ते मनवः प्रोक्ता इंद्रा देवाश्च तत्त्वतः ॥३५॥
एकस्मिन्ब्रह्मदिवसे स्वाधिकारं प्रभूंजते ॥३६॥
लोकेषु सर्वसर्गेषु सृष्टिरेकविधा स्मृता । कर्त्तारो बहवः संति तत्संख्यां वेत्ति कोविदः ॥३७॥
मयि स्थिते ब्रह्मलोके ब्रह्माणो बहवो गताः । तेषां संख्यां न संख्यातुं शक्तोऽस्म्यद्य द्विजोत्तम ॥३८॥
स्वर्गलोकमपि प्राप्य यावत्कालं शृणुष्व मे । चत्वारो मनवोऽतीता मम श्रीश्चातिविस्तरा ॥३९॥
स्थातव्यं च मयात्रैव युगकोटिशतं प्रभो । ततः परं गमिष्यामि कर्मभूमिं शृणुष्व मे ॥४०॥
मन्वन्तर में देवता याम नाम से प्रसिद्ध थे । उनके इन्द्र महामति शचीपति थे ॥२४॥ स्वारोचिष में पारावत
तुषिता देवता थे । उनके इन्द्र सब ऐश्वर्यों के उपभोक्ता विपश्चित् नाम के थे ॥२५॥ तीसरे मन्वन्तर में सुधाम,
सत्य, शिव और प्रतर्दन देवता थे । उनका इन्द्र सुशान्ति था ॥२६॥ तामस मन्वन्तर में सुत, पाराहर, सुत्य और
सुधी नाम के देवता थे । उनके इन्द्र शक्र, शिव हुए । पांचवें विभुनामक देवेन्द्र हुए । देवताओं की संज्ञा अमिताभ
थी । छठे मन्वन्तर का वर्णन कर रहा हूँ, सुनो-आर्या देवताओं का नाम और उनके इन्द्र का नाम मनोजव
था ॥२७-२८॥ वैवस्वत में आदित्य, वसु और रुद्र आदि देवता हैं, सब इष्ट साधनों से सम्पन्न पुरन्दर इन्द्र
हैं ॥२९॥ आठवें मन्वन्तर में अप्रमेय, विबुध, सुतपाद्य देवता और विष्णु पूजा के प्रभाव से बलि इन्द्र हैं ॥३०॥
नवें में पराद्य देवता तथा 'अद्भुत' इन्द्र कहे गए हैं । दसवें मन्वन्तर के सुवामन आदि देवता और सब भोगों के
भोक्ता इन्द्र शान्ति हैं । ग्यारहवें के विहंगम देवता और वृष उनके इन्द्र हैं ॥३१-३२॥ बारहवें के जो देवता हैं
उनको सुनो--ऋभु नामक देवेन्द्र और हरिनाभ नामक देवता हैं ॥३३॥ तेरहवें में सुत्राम आदि देवता तथा महा
पराक्रमी दिवस्पति इन्द्र कहे जाते हैं ॥३४॥ चौदहवें में चाक्षुष आदि देवता और शुचि इन्द्र हैं । इस प्रकार तुमसे
मनु, इन्द्र, देवता आदि के विषय में यथार्थतः कह दिया ॥३५॥ ब्रह्मा के एक दिन में ये सब अपने अपने अधिकार
का उपभोग करते हैं । लोको में तथा सभी सर्गों में सृष्टि एक ही ढंग से होती है । इनके कर्त्ता बहुत से हैं जिनका
ज्ञान केवल विज्ञों को ही है ॥३६-३७॥ जब मैं ब्रह्मलोक में था तो बहुत से ब्रह्माओं का कार्य समाप्त हुआ ।
द्विजोत्तम ! उनकी संख्या की ठीक ठीक गणना करने में मैं तो समर्थ नहीं हूँ ॥३८॥ इस स्वर्गलोक में मैंने जितना
समय बिताया है उसको सुनो-चार मनु तो बीत गये, अभी मेरी श्री उसी प्रकार विस्तृत रूप से फैली है ॥३९॥
प्रभो ! अभी यहाँ सौ करोड़ युगों तक रहना है । इसके अनन्तर कर्म भूमि को जाऊँगा, इसका भी वर्णन मुझ से
सुनो ॥४०॥