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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 277

२५८ नारदीयपुराणम्
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च मुनिसत्तम । किमाहाराः किमाचाराः भविष्यंति कलौ युगे ॥२७॥
सनक उवाच
शृणुष्व मुनिशार्दूल सर्वलोकोपकारक । कलिधर्मान्प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथम् ॥२८॥
सर्वे धर्मा विनश्यन्ति कृष्णे कृष्णत्वमागते । तस्मात्कलिर्महाघोरः सर्वपातकसंकरः ॥२९॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा धर्मपराङ्मुखाः । घोरे कलियुगे प्राप्ते द्विजा वेदपराङ्मुखाः ॥३०॥
व्याजधर्मरताः सर्वे असूयानिरतास्तथा । वृथाहंकारदुष्टाश्च सत्यहीनाश्च पंडिताः ॥३१॥
अहमेवाधिक इति सर्वेऽपि विवदंति च । अधर्मलोलुपाः सर्वे तथा वैतंडिका नराः ॥३२॥
अतः स्वल्पायुषः सर्वे भविष्यन्ति कलौ युगे । अल्पायुष्यान्मनुष्याणां न विद्याग्रहणं द्विज ॥३३॥
विद्याग्रहणशून्यत्वादधर्मो वर्तते पुनः । व्युत्क्रमेण प्रजाः सर्वा म्रियंते पापसत्पराः ॥३४॥
ब्राह्मणाद्यास्तथा वर्णाः संकीर्यंते परस्परम् । कामक्रोधपरा मूढा वृथासंतापपीडिताः ॥३५॥
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति सर्वे वर्णा कलौ युगे । उत्तमा नीचतां यांति नीचाश्चोत्तमतां तथा ॥३६॥
राजानो द्रव्यनिरतास्तथा ह्यन्यायवर्त्तिनः । पीडयन्ति प्रजाश्चैव करैरत्यर्थयोजितैः ॥३७॥
शववाहा भविष्यन्ति शूद्राणां च द्विजातयः । धर्मस्त्रीष्वपि गच्छंति पतयो जारधर्मिणः ॥३८॥
द्विषंति पितरं पुत्रा भर्तारं च स्त्रियोऽखिलाः । परस्त्रीनिरता सर्वे परद्रव्यपरायणाः ॥३९॥
मत्स्यामिषेण जीवंति दुहंतश्चाप्यजीविकाम् । घोरे कलियुगे विप्र सर्वे पापरता जनाः ॥४०॥
पूर्वक वर्णन कीजिए, क्योंकि आप धर्मज्ञों में श्रेष्ठ हैं ॥२६॥ मुनिश्रेष्ठ ! कलियुग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और
शूद्रों का आचरण और आहार कैसा होगा, इसको कहिए ॥२७॥
सनक बोले- मुनिश्रेष्ठ ! सर्वलोकोपकारक ! सुनो, अब विस्तारपूर्वक यथार्थ रूप से कलियुग के धर्मों का
वर्णन कर रहा हूँ ॥२८॥ हरि के कृष्ण वर्ण (काला) हो जाने पर सारे धर्म नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है
कि कलि महाघोर युग है। सब पापों का इस युग में नग्न रूप देखने को मिलता है ॥२९॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
और शूद्र धर्म से विमुख हो जाते और घोर कलि के आने पर विप्र भी वेदविमुख हो जाते हैं ॥३०॥ सभी कपट और
असूया में प्रवीण हो जाते हैं और पंडित वृथाहंकार से दूषित तथा सत्यविमुख हो जाते हैं ॥३१॥ सभी अपने को
ही श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए विवाद करते हैं। सब अधर्म करने के लिए लालायित रहते और वितंडावादी होते
हैं ॥३२॥ इसलिए कलियुग में सब अल्पायु होते हैं। अल्पायु होने के कारण विद्योपार्जन करना संभव नहीं होता
॥३३॥ अविद्या के कारण अधर्म बढ़ जाता है। धर्म-व्यतिक्रम के कारण सब प्रजावें पाप कर्म करती और अकाल
मृत्यु को प्राप्त करती हैं ॥३४॥ ब्राह्मण आदि सब वर्ण परस्पर संकरदोष से दूषित हो जाते हैं। सब मूढ़, काम-
क्रोध-परायण और दूसरों को व्यर्थ कष्ट देने में कुशल हो जाते हैं ॥३५॥ कलियुग में सब वर्ण शूद्र के समान
हो जाते हैं, उत्तम तो नीच हो जाते और नीच उत्तम हो जाते हैं ॥३६॥ राजा केवल धनापहरण को ही कर्त्तव्य
समझते, अन्याय व्यवहार करते तथा प्रजा को पीड़ित कर अनेकों कर वसूल करते हैं ॥३७॥ द्विजाति शूद्रों के
मुर्दे ढोते हैं। व्यभिचारी पति धर्मस्त्रियों का सतीत्व नष्ट कर देते हैं ॥३८। सब पुत्र अपने पिता से द्वेष करने
लगते हैं। स्त्रियाँ अपने भर्त्ता को शत्रु समझने लगती हैं। सब परस्त्री और परद्रव्य के अपहरण में ही लगे रहते
हैं ॥३९॥ मछली, मांस खाकर ही जीते हैं और अनुचित जीविका को भी अपनाने में हिचकते नहीं। इस प्रकार
विप्र ! घोर कलियुग में सब लोग पाप कर्म करने लगते हैं ॥४०॥ सज्जनों की निन्दा और उनका उपहास