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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
सनक उवाच
भूयः शृणुष्व विप्रेन्द्र माहात्म्यं परमेष्ठिनः । सर्वपापहरं पुण्यं भुवितमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥१॥
अहो हरिकथालोके पापघ्नी पुण्यदायिनी । शृण्वतां वदतां चैव तद्भक्तानां विशेषतः ॥२॥
हरिभक्तिरसास्वादमुदिता ये नरोत्तमाः । नमस्करोम्यहं तेभ्यो यत्संगान्मुक्तिभाङ्नरः ॥३॥
हरिभक्तिपरा ये तु हरिनामपरायणाः । दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥४॥
संसारसागरं तर्तुं य इच्छेन्मुनिपुङ्गव । स भजेद्धरिभक्तानां भक्तांश्चै पापहरिणः ॥५॥
दृष्टः स्मृतः पूजितो वा ध्यातः प्रणमितोऽपि वा । समुद्धरति गोविन्दो दुस्तराद्भवसागरात् ॥६॥
स्वपन्भुञ्जन् व्रजंस्तिष्ठन्नुत्तिष्ठंश्च वदंस्तथा । चिंतयेद्यो हरेर्नाम तस्मै नित्यं नमो नमः ॥७॥
अहो भाग्यमहो भाग्यं विष्णुभक्तिरतात्मनाम् । येषां मुक्तिः करस्थैव योगिनामपि दुर्लभा ॥८॥
अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । वदतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रनाशनम् ॥६॥
आसीत्पुरा महीपालः सोमवंशसमुद्भवः । जयध्वज इति ख्यातो नारायणपरायणः ॥१०॥
विष्णोर्देवालये नित्यं संमार्जनपरायणः । दीपदानरतश्चैव सर्वभूतदयापरः ॥११॥

अध्याय ३६
विष्णु-माहात्म्य-वर्णन
सनक बोले— विप्रेन्द्र ! अब पुनः परमेष्ठी के माहात्म्य को सुनो, जो मनुष्यों के सब पापों को हरने
वाला, पवित्र और भुक्ति मुक्ति दोनों को देने वाला है ॥१॥ इस लोक में हरि-कथा पापों को हरने वाली और
पुण्य प्रदान करने वाली है । इस कथा को श्रवण करने वाले, पाठ करने वाले और इसके भक्तों को विशेष फल
मिलता है ॥२॥ जो नरपुंगव हरि-भक्ति का रसास्वादन कर सर्वदा मुदित रहते हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ,
उनकी संगति मात्र से मनुष्य मुक्ति पा जाता है ॥३॥ जो हरिभक्ति में रत रहने वाले या हरि नाम का स्मरण
करने वाले हैं उनकी भी मैं वन्दना करता हूँ चाहे वे दुराचारी हों या सदाचारी ॥४॥ मुनिपुंगव ! जो इस संसार-
सागर को पार करना चाहते हैं, वे हरि-भक्तों का सम्मान अवश्य करें । क्योंकि भक्त मनुष्यों के सब पापों के
हरने वाले हैं ॥५॥ गोविन्द की पूजा, दर्शन, ध्यान और प्रणाम करने से वे इस दुस्तर भवसागर से अवश्य पार
लगा देते हैं ॥६॥ जो सोते, खाते, चलते, बैठते और बोलते समय हरि-नाम का चिन्तन करते हैं उनको नित्य
नमस्कार है ॥७॥ विष्णु-भक्ति में निष्ठा रखने वाले महापुरुषों के भाग्य की जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी है,
जिनके लिए योगिदुर्लभ मुक्ति भी हस्तामलकवत् है ॥८॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास को उदाहरण
के रूप में प्रस्तुत करता हूँ जिसके श्रवण और पाठ से सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥६॥
प्राचीन काल में जयध्वज नामक सोमवंशीय राजा था, जो विष्णु में अटल भक्ति रखता था
॥१०॥ वह प्रति दिन विष्णु मन्दिर में अपने हाथ से झाडू लगाता, दीप जलाता और सब प्राणियों पर दया भाव

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः २४७
स कदाचिन्महीपालो रेवातीरे मनोरमे । विचित्रकुसुमोपेतं कृतवान्विष्णुमंदिरम् ॥१२॥
स तत्र नृपशार्दूलः सदा संमार्जने रतः । दीपदानपरश्चैव विशेषेण हरिप्रियः ॥१३॥
हरिनामपरो नित्यं हरिसंसक्तमानसः । हरिप्रणामनिरतो हरिभक्तजनप्रियः ॥१४॥
वीतिहोत्र इति ख्यातो ह्यासीत्तस्य पुरोहितः । जयध्वजस्य चरितं दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥१५॥
कदाचिदुपविष्टं तं राजानं विष्णुतत्परम् । अपृच्छद्वीतिहोत्रस्तु वेदवेदांगपारगः ॥१६॥
वीतिहोत्र उवाच
राजनपरमधर्मज्ञ हरिभक्तिपरायण । विष्णुभक्तिमतां पुंसां श्रेष्ठोऽसि भरतर्षभ ॥१७॥
संमार्जनपरो नित्यं दीपदानरतस्तथा । तन्मे वद महाभाग किंत्वया विदितं फलम् ॥१८॥
संपादनेन वर्त्तीनां तैलसंपादनेन च । संयुक्तोऽसि सदा भद्र यद्विष्णोर्गृहमार्जने ॥१९॥
कर्माण्यन्यानि सन्त्येव विष्णोः प्रीतिकराणि च । तथापि किं महाभाग एतयोः सततोद्यतः ॥२०॥
सर्वात्मना महापुण्य नरेश विदितं च यत् । तद् ब्रूहि मे गुह्यतमं प्रीतिर्मयि तवास्ति चेत् ॥२१॥
पुरोधसैवमुक्तस्तु प्रहसन्स जयध्वजः । विनयावनतो भूत्वा प्रोवाचेदं कृतांजलिः ॥२२॥
जयध्वज उवाच
शृणुष्व विप्रशार्दूल मयैवाचरितं पुरा । जातिस्मरत्वान्जानामि श्रोतृणां विस्मयप्रदम् ॥२३॥
आसीत्पुरा कृतयुगे ब्रह्मन्स्वारोचिषेंऽतरे । रैवतो नाम विप्रेन्द्रो वेदवेदांगपारगः ॥२४॥
अयाज्ययाजकश्चैव सदैव ग्रामयाजकः । पिशुनो निष्ठुरश्चैव ह्यपण्यानां च विक्रयी ॥२५॥
रखता था ॥११॥ किसी समय उसने विचित्र फूलों से सुशोभित नर्मदा के मनोहर तट पर एक विष्णु-
मन्दिर बनवाया ॥१२॥ वह हरिभक्त नृपशार्दूल सदा उस देव मन्दिर की सफाई किया करता
और भगवान् को दीपक दिखाया करता था ॥१३॥ इस प्रकार वह अपनी साधना से भगवान् का
परम प्रिय भक्त हो गया । वह नित्य हरि-नाम का जप करता, हरि का ही ध्यान करता और भगवान् की
स्तुति किया करता था ॥१४॥ उस हरिभक्त-प्रेमो राजा का वीतिहोत्र नामक एक पुरोहित था । वह
जयध्वज का चरित्र देखकर आश्चर्यचकित था । एक दिन वेद-वेदांग के पारगामी उस पुरोहित ने विष्णु-
सेवा में लगे हुए उस राजा से पूछा ॥१५-१६॥
वीतिहोत्र बोले-परमधर्म के ज्ञाता, हरि-भक्ति में निष्ठा रखने वाले हे राजन् ! तुम विष्णु-
भक्तों में श्रेष्ठ हो, प्रतिदिन मन्दिर की सफाई में लगे रहते हो और दीपक भी दिखाते हो ॥१७॥ इसलिए
इस दीर्घ साधना से क्या फल मिला, यह मुझे बताओ ॥१७-१८॥ भद्र ! तुम सदा बत्तियां बनाने, तेल जुटाने
और मन्दिर में झाडू लगाने में लगे रहते हो ॥१९॥ महाभाग ! हरि-सेवा तो और प्रकार से भी की जा सकती है
तथापि तुम क्यों इन्हीं कार्यों में सदा लगे रहते हो ॥२०॥ यदि तुम्हारा मेरे प्रति कुछ प्रेम है तो
नरेश ! अपने अब तक के अनुभव से जो कुछ अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्य जान पाये हो उसको कहो ॥२१॥ पुरोहित
की उपर्युक्त बातों को सुनकर जयध्वज हँस पड़ा और हाथ जोड़कर विनम्र भाव से बोला ॥२२॥
जयध्वज बोले- प्राचीन काल में मैंने जो कुछ किया है उसको सुनो । जातिस्मर के कारण मैं पूर्व
जन्म की उन बातों को जानता हूँ जिनको सुनकर पाठकों को आश्चर्य होगा॥२३॥ ब्रह्मन् ! स्वारोचिष
मन्वन्तर में कृतयुग में वेद-वेदांगों का ज्ञाता रैवत नामक एक विप्र था । वह सदा अपात्रों से यज्ञ कराता

२४८ नारदीयपुराणम्
निषिद्धकर्माचरणात्परित्यक्तः स बन्धुभिः । दरिद्रो दुःखितश्चैव शीर्णाङ्गो व्याधितोऽभवत् ॥२६॥
स कदाचिद्धनार्थं तु पृथिव्यां पर्यटन् द्विजः । ममार नर्मदातीरे श्वासकासप्रपीडितः ॥२७॥
तस्मिन्मृते तस्य भार्या नाम्ना बन्धुमती मुने । कामचारपरा सा तु परित्यक्ता च बन्धुभिः ॥२८॥
तस्यां जातोऽस्मि चण्डालो दण्डकेतुरिति श्रुतः । महापापरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषपरायणः ॥२९॥
परदारपरद्रव्यलोलुपो जन्तुहिंसकः । गावश्च विप्रा बहवो निहता मृगपक्षिणः ॥३०॥
मेरुतुल्यसुवर्णानि बहून्यपहृतानि च । मद्यपानरतो नित्यं बहुशो मार्गरोधकृत् ॥३१॥
पशुपक्षिमृगादीनां जन्तूनामन्तकोपमः । कदाचित्कामसंतप्तो गंतुकामो रतिस्त्रियः ॥३२॥
शून्यं विष्णुगृहं दृष्ट्वा प्रविष्टश्च स्त्रिया सह । निशि रामोपभोगार्थं शयितं तत्र कामिना ॥३३॥
ब्रह्मन्स्ववस्त्रप्रांतेन कियद्देशः प्रमाजितः । यावंत्यः पांशुकणिकास्तत्र संमार्जिता द्विज ॥३४॥
तावज्जन्मकृतं पापं तदैव क्षयमागतम् । प्रदीपः स्थापितस्तत्र सुरतार्थं द्विजोत्तम ॥३५॥
तेनापि मम दुष्कर्म निःशेषं क्षयमागतम् । एवं स्थिते विष्णुगृहे ह्यागताः पुरपालकाः ॥३६॥
जारोऽयमिति मां तां च हतवंतः प्रसह्म वै । आवां निहत्य ते सर्वे निवृत्ताः पुररक्षकाः ॥३७॥
यदा तदैव संप्राप्ता विष्णुदूताश्चतुर्भुजाः । किरीटकुंडलधरा वनमालाविभूषिताः ॥३८॥
तैस्तु संप्रेरितावावां विष्णुदूतैरकल्मषैः । दिव्यं विमानमारुह्य सर्वभोगसमन्वितम् ॥३९॥
दिव्यदेहधरौ भूत्वा विष्णूलोकमूपागतौ । तत्र स्थित्वा ब्रह्मकल्पशतं साग्रं द्विजोत्तम ॥४०॥
दिव्यभोगसमायुक्तौ तावत्कालं दिवि स्थितौ । ततश्च भूमिभागेषु देवयोगेषु वै क्रमात् ॥४१॥
निषिद्ध वस्तुओं को बेचता तथा ग्राम याजक का कार्य करता था, वह बहुत बड़ा चुगलखोर और क्रूर था ॥२४-२५॥
निषिद्ध आचरण से उसके भाइयों ने उसको निकाल दिया जिससे थोड़ी ही दिनों में वह दरिद्र, दुःखी और रोगग्रस्त हो
गया । उसकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गईं ॥२६॥ किसी समय वह धन की खोज में इधर-उधर भटकता हुआ नर्मदा तट
पर पहुँचा । वहाँ दमे से पीड़ित होकर मर गया ॥२७॥ मुने ! उसकी मृत्यु के बाद उसकी स्त्री बन्धुमती भी स्वेच्छा-
चारिणी हो गई जिससे तंग आकर परिवार वालों ने उसको भी घर से निकाल दिया ॥२८॥ उसी के गर्भ से चाण्डाल-
कुल में दण्डकेतु नाम से मैं उत्पन्न हुआ । चाण्डाल होकर मैं सदा महापाप करता और ब्राह्मणों से द्वेष करता था
॥२९॥ परायी स्त्रियों और पराये धन का लोलुप रहता और जीवहिंसा करता था । मैंने बहुत से ब्राह्मणों, गायों,
मृगों, और पक्षियों का वध किया । सुमेरु के समान बहुत से स्वर्ण का अपहरण किया । नित्य प्रति मदिरा पीना,
लोगों के मार्ग में अनेक प्रकार से बाधा उपस्थित करना मेरा काम था ॥३०-३१॥ पशु-पक्षी और जीवों
के लिए तो यमराज के समान था । एक दिन काम से सन्तप्त होकर भोग की इच्छा से पुंश्चली स्त्री के
निकट गया ॥३२॥ एक शून्य विष्णु मन्दिर को देखकर स्त्री के साथ उस मन्दिर में घुस गया । रात में कामान्ध
मैं स्त्री से भोग करने के लिए उसी मन्दिर में सोया ॥३३॥ ब्रह्मन् ! अपने वस्त्र के छोर से थोड़ी सी भूमि झाड़
दी । द्विज ! जितने धूलिकण (मैंने झाडू या सफाई करते समय जितने धूलिकण) हटाये उसी समय तत्काल उतने
जन्म के पाप नष्ट हो गए । द्विजवर्य ! रतिकाल में जो सुरत-दीप जलाया उस से भी मेरे शेष पाप भी नष्ट हो
गए ॥३४-३५॥ ऐसा करने के बाद वहाँ नगर-रक्षक घूमते हुए आए । मुझको जार समझ कर उन लोगों ने
मुझको और मेरी जार पत्नी को हठात् मार डाला । हम दोनों को मार कर जब वे पुररक्षक चले गए, तब तत्काल
चार भुजा-वाले, किरीट, कुण्डल और वनमाला से सुशोभित विष्णु के दूत आए ॥३६-३८॥ उन निष्पाप विष्णुदूतों
की प्रेरणा से सब भोग-सामग्रियों से सुसज्जित दिव्य विमान पर चढ़कर हम दोनों देवरूप होकर विष्णु लोक को
गए ॥३९॥ वहाँ पर सौ कल्प तक रह कर दिव्य भोगों को भोगते हुए उतने ही समय तक देवलोक में रहे ।
इसके बाद क्रमशः देवोपयुक्त लोकों में सुख भोगकर उसी पुण्य के प्रभाव से पुनः यदुवंश में जन्म हुआ । उसी पुण्य

Here is the complete text transcribed from the image:

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः २४६
तेन पुण्यप्रभावेण यदूनां वंशसंभवः । तेनैवैतन्मेऽच्युता संपत्तथा राज्यमकंटकम् ॥४२॥
ब्रह्मन्कृत्त्वोपभोगार्थमेव श्रेयो ह्यवाप्तवान् । भक्त्या कुर्वंति ये संतस्तेषां पुण्यं न वेद्म्यहम् ॥४३॥
तस्मात्संमार्जने नित्यं दीपदाने च सत्तम । यतिष्ये परया भक्त्या ह्यहं जातिस्मरो यतः ॥४४॥
यः पूजयेज्जगन्नाथमेकाकी विगतस्पृहः । सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमं पदम् ॥४५॥
अवशेनापि यत्कर्म कृतवेमां श्रियमागतः । भक्तिमद्भिः प्रशांतैश्च किं पुनः सम्यगर्च॑नात् ॥४६॥
इति भूपवचः श्रुत्वा वीतिहोत्रो द्विजोत्तमः । अनंततुष्टिमापन्नो हरिपूजापरोऽभवत् ॥४७॥
तस्माच्छृणुष्व विप्रेन्द्र देवो नारायणोऽव्ययः । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि पुजकानां विमुक्तिदः ॥४८॥
अनित्या बांधवाः सर्वे विभवो नैव शाश्वतः । नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥४९॥
अज्ञो लोको वृथा गर्वं करिष्यति महोद्धतः । कायः संनिहितापायो धनादीनां किमुच्यते ॥५०॥
जन्मकोटिसहस्रेषु पुण्यं यैः समुपार्जितम् । तेषां भक्तिर्भवेच्छुद्धा देवदेवे जनार्दने ॥५१॥
सुलभं जाह्नवीस्नानं तथैवातिथिपूजनम् । सुलभाः सर्वयज्ञाश्च विष्णुभक्तिः सुदुर्लभा ॥५२॥
दुर्लभा तुलसीसेवा दुर्लभः संगमः सताम् । सर्वभूतदया वापि सुलभा यस्य कस्यचित् ॥५३॥
सत्संगस्तुलसीसेवा हरिभक्तिश्च दुर्लभा । दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं न तथा गमयेद् बुधः ॥५४॥
अर्चयेद्धि जगन्नाथं सारमेतद्विजोत्तम ॥५५॥
तत्तुं यदीच्छति जनो दुस्तरं भवसागरम् । हरिभक्तिपरो भूयादेतदेव रसायनम् ॥५६॥

के प्रभाव से मुझे यह सम्पत्ति और निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ ॥४०-४२॥ ब्रह्मन् ! इतनी सुख-सामग्री के साथ
श्रेयःप्राप्ति उसी पुण्य के प्रभाव से हुई है। जो भक्त भक्तिपूर्वक भगवान् की उपासना करते हैं उनके पुण्य को मैं नहीं
जानता ॥४३॥ इसलिए मैं नित्यप्रति मंदिर के संमार्जन और दीप-दर्शन में परम निष्ठा के साथ लगा रहता हूँ
क्योंकि मुझे पूर्वजन्म की बातों का ज्ञान है ॥४४॥ जो एकान्त भाव से निःस्पृह होकर जगन्नाथ की पूजा करता है
वह सब पापों से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त करता है ॥४५॥ जब इच्छा के बिना भी भगवदर्चन करने से इस
प्रकार की श्री प्राप्त होती है तो भक्ति पूर्वक शान्त भाव से भगवान् की अर्चना करने से कितना पुण्य होगा, उसके
विषय में क्या कहा जाय ॥४६॥
राजा की इतनी बातें सुनकर द्विजोत्तम वीतिहोत्र अत्यन्त प्रसन्न हो गया और भगवदाराधना में लग
गया ॥४७॥ विप्रेन्द्र ! सुनो, कहने का सार यह है कि भगवान् नारायण जान-बूझकर या अनजाने किसी प्रकार
से भी पूजा करने पर अपने भक्तों को अवश्य मुक्ति प्रदान करते हैं ॥४८॥ सारे बंधुबांधव अनित्य हैं, ऐश्वर्य
भी नित्य नहीं, तिस पर मृत्यु सदा शिर पर सवार रहती है, ऐसी अवस्था में धर्मसंग्रह अवश्य करना
चाहिए ॥४९॥ व्यर्थ ही मूर्ख लोग मदमत्त होकर गर्व करते हैं। जब शरीर ही क्षण-भंगुर और बाधाओं से पूर्ण
है, तब धन-ऐश्वर्य के विषय में निश्चित रूप से क्या कहा जा सकता है ॥५०॥ जो हजार करोड़ जन्मों तक पुण्य
संचय करते हैं उनकी देव-देव जनार्दन में शुद्ध भक्ति होती है ॥५१॥ गंगास्नान सुलभ है, अतिथि पूजन भी
सुलभ है, सब यज्ञ भी सुलभ हैं, परन्तु हरिभक्ति अत्यन्त दुर्लभ है ॥५२॥ तुलसी की सेवा दुर्लभ है, सत्संगति
भी दुर्लभ ही है और सब प्राणियों पर दया करना भी जिस किसी के लिए सुलभ नहीं है ॥५३॥ जब तुलसी-सेवा,
हरि-भक्ति और सत्संग दुर्लभ है तब विद्वान् का यह कर्त्तव्य है कि दुर्लभ मानव-जीवन को पाकर उसको व्यर्थ न
गँवायें । द्विजोत्तम ! सब का सार यह है कि यदि मनुष्य इस दुस्तर भवसागर को पार करना चाहता है तो वह
अवश्य भगवान् की पूजा करे । मनुष्य हरिभक्तिपरायण हो, यही एक रसायन है ॥५४-५६॥ भाई ! गोविन्द

३२ ना० पु०

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण देवनागरी पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

२५० नारदीयपुराणम्

भ्रातराश्रय गोविन्दं मां विलं वं कुरु प्रिय । आसन्नमेव नगरं कृतांतस्य हि दृश्यते ॥५७॥
नारायणं जगद्योनिं सर्वकारणकारणम् । समर्च्चयस्व विप्रेन्द्र यदि मुक्तिमभीप्ससि ॥५८॥
सर्वाधारं सर्वयोनिं सर्वान्तर्यामिणं विभुम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्ते कृतार्था न संशयः ॥५६॥
ते वंद्यास्ते प्रपूज्याश्च नमस्कार्या विशेषतः । येऽर्चयंति महाविष्णुं प्रणतार्तिप्रणाशनम् ॥६०॥
ये विष्णुभक्ता निष्कामा यजन्ति परमेश्वरम् । त्रिःसप्तकुलसंयुक्तास्ते यांति हरिमंदिरम् ॥६१॥
विष्णुभक्ताय यो दद्यान्निष्कामाय महात्मने । पानीयं वा फलं वापि स एव भगवत्प्रियः ॥६२॥
विष्णुभक्तिपराणां तु शुश्रूषां कुर्वते तु ये । ते यांति विष्णुभुवनं यावदाभूतसंप्लवम् ॥६३॥
ये यजंति स्पृहाशून्या हरिभक्तान् हरिं तथा । त एव भुवनं सर्वं पुनंति स्वांघ्रिपांशुना ॥६४॥
देवपूजापरो यस्य गृहे वसति सर्वदा । तत्रैव सर्वदेवाश्च तिष्ठन्ति श्रीहरिस्तथा ॥६५॥
पूज्यमाना च तुलसी यस्य तिष्ठति वेश्मनि । तत्र सर्वाणि श्रेयांसि वर्द्धन्त्यहरहर्द्विज ॥६६॥
शालग्रामशिलारूपी यत्र तिष्ठति केशवः । न बाधंते ग्रहास्तत्र भूतवेतालकादयः ॥६७॥
शालग्रामशिला यत्र तत्तीर्थं तत्तपोवनम् । यतः संनिहितस्तत्र भगवान्मधुसूदनः ॥६८॥
यद्गृहे नास्ति देवर्षे शालग्रामशिलार्चनम् । श्मशानसदृशं विद्यात्तद् गृहं शुभवजितम् ॥६६॥
पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राणि च द्विज । सांगा वेदास्तथा सर्वे विष्णोरूपं प्रकीर्तितम् ॥७०॥
भक्त्या कुर्वन्ति ये विष्णोः प्रदक्षिणचतुष्टयम् । तेऽपि यांति परं स्थानं सर्वकर्मनिवर्हणम् ॥७१॥
इति बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्यं नाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥३६॥


की शरण में जाओ, विलम्ब मत करो। प्रिय ! देखो, यमराज का नगर सामने समीप ही दिखाई दे रहा है
(मृत्यु समीप है) ॥५७॥ इसलिए यदि मुक्ति चाहते हो तो जगत् के आदि कारण, सब कारणों के कारण नारायण
की अर्चना करो ॥५८॥ सर्वाधार, सर्वयोनि, सब के अन्तर की बात जानने वाले, विभु की शरण में जो जाते हैं
उनका जन्म सफल है, वे महात्मा हैं इसमें संशय नहीं है ॥५६॥ वे वन्दनीय हैं, पूजनीय हैं और विशेष रूप से
नमस्कार के योग्य हैं। जो भक्त जनों के कष्ट को दूर करने वाले महाविष्णु की पूजा करते हैं, जो विष्णुभक्त
निष्काम भाव से परमेश्वर की सेवा करते हैं वे अपनी इक्कीस कुल परम्परा के साथ विष्णु लोक को जाते
हैं ॥६०-६१॥ जो निष्काम महात्मा विष्णु भक्त को जल और फल देते हैं वे ही भगवान् के प्रिय पात्र हैं ॥६२॥
जो विष्णुभक्ति में लीन रहने वाले भक्तों की शुश्रूषा करते हैं वे कल्पान्त तक विष्णुलोक में निवास करते
हैं ॥६३॥ जो निःस्पृह होकर हरि भक्तों और हरि की सेवा करते हैं वे ही अपनी चरणरेणु से समस्त भुवन को
पवित्र करते हैं ॥६४॥ जिसके घर में एक भी सदा देव-पूजा-परायण व्यक्ति रहता है, उस घर में ही स्वयं भगवान्,
लक्ष्मी और सब देवता सदा निवास करते हैं ॥६५॥ जिसके घर तुलसी की नित्यप्रति पूजा होती है, द्विज, उसके
घर नित्य प्रति सब श्रेय बढ़ते रहते हैं ॥६६॥ जहाँ विष्णु शालग्राम शिला के रूप में रहते हैं, वहाँ ग्रहों से
कोई कष्ट नहीं होता और न तो भूत-वेताल ही कोई बाधा पहुँचा सकते हैं ॥६७॥ जहाँ शालग्रामशिला
रहती है वह स्थान तीर्थ है, तपोवन है, क्योंकि वहाँ भगवान् मधुसूदन सदा सन्निहित रहते हैं ॥६८॥ देवर्षि-
नारद ! जिस घर में शालग्राम का पूजन नहीं होता उस घर को अमंगलमय श्मशान समझना चाहिए ॥६९॥
द्विज ! पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और सब सांगोपांग वेद ये विष्णु के ही रूप हैं ॥७०॥ जो भक्ति
पूर्वक विष्णु की चार बार प्रदक्षिणा करते हैं, वे भी सब कामों से मुक्त करने वाले उत्तम स्थान को
जाते हैं ॥७१॥
श्री नारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३६॥

अथ चत्वारिंशोऽध्यायः
सनक उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि विभूतिं वैष्णवीं मुने । यां शृण्वतां कीर्तयतां सद्यः पापक्षयो भवेत् ॥१॥
वैवस्ततेऽन्तरे पूर्वं शक्रस्य च बृहस्पतेः । संवादः सुमहानासीत्तं वक्ष्यामि निशामय ॥२॥
एकदा सर्वभोगाढ्यो विबुधैः परिवारितः । अप्सरोगणसंकीर्णो बृहस्पतिमभाषत ॥३॥
इन्द्र उवाच
बृहस्पते महाभाग सर्वतत्त्वार्थकोविद । अतीतब्रह्मणः कल्पे सृष्टिः कीदृग्विधा प्रभो ॥४॥
इन्द्रस्तु कीदृशः प्रोक्तो विबुधाः कीदृशाः स्मृताः । तेषां च कीदृशं कर्म यथावद्वक्तुमर्हसि ॥५॥
बृहस्पतिरुवाच
न ज्ञायते मया शक्र पूर्वद्युश्चरितं विधेः । वर्तमानदिनस्यापि दुर्ज्ञेयं प्रतिभाति मे ॥६॥
मनवः समतीताश्च तान्वक्तुमपि न क्षमः । यो विजानाति तं तेऽद्य कथयामि निशामय ॥७॥
सुधर्म इति विख्यातः कश्चिदास्ते पुरे तव । भुञ्जानो दिव्यभोगांश्च ब्रह्मलोकादिहागतः ॥८॥
स वा एतद्विजानाति कथयामि निशामय । एवमुक्तस्तु गुरुणा शक्रस्तेन समन्वितः ॥६॥
देवतागणसंकीर्णः सुधर्मनिलयं ययौ ॥१०॥
अध्याय ४०
विष्णुमाहात्म्य-वर्णन
सनक बोले—मुनिवर ! अब इसके बाद वैष्णवी विभूति का वर्णन कर रहा हूँ, जिसके सुनने और कीर्तन
करने से सद्यः पापक्षय हो जाता है ॥१॥ प्राचीन काल में वैवस्वत मन्वन्तर में इन्द्र और बृहस्पति के बीच जो
महत्त्वपूर्ण वार्तालाप हुआ उसी को दोहरा रहा हूँ, सुनो ॥२॥ एक दिन इन्द्र सब भोग-सामग्री से परिपूर्ण
इन्द्रपुरी में देवताओं के मध्य बैठे हुए थे । अप्सराओं से देवसभा भरी हुई थी । उन्होंने बृहस्पति से पूछा ॥३॥
इन्द्र बोले—बृहस्पते ! महाभाग ! सब तत्त्वों के जानने वाले ! अतीत ब्रह्म कल्प में सृष्टि किस प्रकार की
थी ? इन्द्र कौन और कैसे थे ? देवगण कैसे थे ? और उनके कर्त्तव्य कैसे थे ? इसको भली-भाँति कहिए ॥४-५॥
बृहस्पति बोले—शक्र ! विधि के पूर्वकालीन चरित्र का ज्ञान मुझे नहीं है । यही नहीं, वर्त्तमान कल्प
की बातें भी कठिनता से जानी जा सकती हैं । जो मनु बीत गए उनकी चर्चा करने में मैं समर्थ नहीं हूँ । जो
इस विषय को जानता है, उसे मैं बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो ॥६-७॥
तुम्हारे इसी देवपुर में सुधर्म नामक देवता है । वह ब्रह्मलोक से दिव्य सुखों को भोगने के बाद यहाँ आया
है । वही इन बातों को भली-भाँति जानता है । गुरुदेव की बातों को सुनकर इन्द्र गुरुदेव और देवताओं को साथ

२५२ नारदीयपुराणम्
समागतं देवपतिं बृहस्पतिसमन्वितम् । दृष्ट्वा यथाहं देवर्षे पूजायामास सादरम् ॥११॥
सुधर्मणार्चितः शक्रो दृष्ट्वा तच्छ्रियमूत्तमाम् । मनसा विस्मयाविष्टः प्रोवाच विनयान्वितः ॥१२॥
इन्द्र उवाच
अतीतब्रह्मकल्पस्य वृत्तांतं वेत्सि चेद्बुध । तदाख्याहि सकायात एतत्प्रष्टुं समाजिकः ॥१३॥
गतनिद्रांश्च देवांश्च येन जानासि सुव्रत । तद्वदस्वाधिकः कस्मादस्मद्भभोऽपि दिवि स्थितः ॥१४॥
तेजसा यशसा कीर्त्या ज्ञानेन च परंतप । दानेन वा तपोभिर्वा कथमेतादृशः प्रभो ॥१५॥
इत्युक्तो देवराजेन सुधर्मा प्रहसंस्तदा । प्रोवाच विनयाविष्टः पूर्ववृत्तं यथाविधि ॥१६॥
सुधर्म उवाच
चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते । एकस्मिन् दिवसे शक्र मनवश्च चतुर्दश ॥१७॥
इंद्राश्चतुर्दश प्रोक्ता देवाश्च विविधाः पृथक् । इंद्राणां चैव सर्वेषां मन्वादीनां च वासव ॥१८॥
तुल्यता तेजसा लक्ष्म्या प्रभावेण बलेन च । तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्व सुसमाहितः ॥१९॥
स्वायंभुवो मनुः पूर्वं ततः स्वारोचिषस्तथा । उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥२०॥
वैवस्वतो मनुश्चैव सूर्यसावर्णिराष्टमः । नवमो दक्षसावर्णिः सर्वदेवहिते रतः ॥२१॥
दशमो ब्रह्मसावर्णिर्धर्मसावर्णिकस्ततः । ततस्तु रुद्रसावर्णी रोचमानस्ततः स्मृतः ॥२२॥
भौत्यश्चतुर्दशः प्रोक्त एते हि मनवः स्मृताः । देवानिंद्रांश्च वक्ष्यामि शृणुष्व विबुधर्षभ ॥२३॥
लेकर सुधर्म के घर पर गया ॥८-१०॥ देवर्षि नारद ! इन्द्र को बृहस्पति के साथ अपने घर पर आया हुआ
देखकर उसने आदरपूर्वक यथायोग्य सब की पूजा की ॥११॥ सुधर्म का सम्मान और आतिथ्य ग्रहण करने के
बाद, उसके उत्तम वैभव को देखकर इन्द्र को मन ही मन बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने विनयभाव
से पूछा ॥१२॥
इन्द्र बोले- हे बुद्धिमन् ! यदि तुम अतीत कल्प की बातें जानते हो तो कहो। यही बात पूछने के लिए
मैं गुरु के साथ आया हूँ। सुव्रत ! जिस कारण तुम निद्रा को जीतने वाले देवों को जानते हो उसको कहो। यह
भी बताओ कि कौन ऐसा महान तप है जिसके कारण इस स्वर्ग में रहकर भी तुम हम सबों से श्रेष्ठ समझे
जाते हो ॥१३-१४॥ शत्रुंजय ! तेज, यश, कीर्ति, ज्ञान, दान या तप इनमें से किसके प्रभाव से तुम इस प्रकार श्रेष्ठ
हो गए ॥१५॥ देवराज इन्द्र की कही हुई इन बातों को सुनकर सुधर्मा हँसने लगा। उसने बड़ी विनयता से पूर्व
की बीती हुई घटनाओं को यथाविधि कहना प्रारम्भ किया। १६॥
सुधर्मा ने कहा-सहस्र चतुर्युग ब्रह्मा का एक दिन है। इन्द्र ! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं ॥१७॥
इन्द्र भी चौदह ही हैं। देवता तो पृथक्-पृथक् अनेकों हैं। वासव ! इन्द्र और सब मनु लक्ष्मी, तेज, प्रभाव और बल में
समान ही होते हैं। अब मन्वन्तरों का नाम क्रमशः सुना रहा हूँ, तुम शान्त और एकाग्रभाव से इसको सुनो ॥१८-१९॥
पहले स्वायम्भुव मनु उसके बाद और स्वारोचिष मनु हुए। उसके अनन्तर उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष तथा वैवस्वत
मनु हुए। सूर्यसावर्णि आठवें और नवें दक्षसावर्णि हैं जो सदा सब देवों के हित में लगे रहते हैं। दसवाँ ब्रह्म
सावर्णि, ग्यारहवाँ धर्मसावर्णि, बारहवाँ रुद्रसावर्णि, तेरहवां मनु रोचमान और चौदहवाँ भौत्य मनु हैं। ये
ही चौदह मनु कहे गए हैं। विबुधर्षभ ! अब देवों और इन्द्रों को बतला रहा हूँ, सुनो ॥२०-२३॥ स्वायम्भुव

चत्वारिंशोऽध्यायः २५३
यामा इति समाख्याता देवाः स्वायंभुवेऽन्तरे । शचीपतिः समाख्यातस्तेषामिंद्रो महामतिः ॥२४॥
पारावताश्च तुषिता देवाः स्वारोचिषेऽन्तरे । विपश्चिन्नाम देवेन्द्रः सर्वसंपत्समन्वितः ॥२५॥
सुधामानस्तथा सत्याः शिवाश्चाथ प्रतर्दनाः । तेषामिंद्रः सुशांतिश्च तृतीये परिकीर्तितः ॥२६॥
सुताः पाराहराश्चैव सुत्याश्चासुधियस्तथा । तेषामिंद्रः शिवः प्रोक्तः शक्रस्तामसरुँऽतरे
विभुनामा देवपतिः पञ्चमः परिकीर्तितः ॥२७॥
अमिताभदयो देवाः षष्ठेऽपि च तथा शृणु । आर्याद्या विबुधाः प्रोक्तास्तेषामिंद्रो मनोजवः ॥२८॥
आदित्यवसुरुद्राद्या देवा वैवस्वतेऽन्तरे । इन्द्रः पुरंदरः प्रोक्तः सर्वकामसमन्वितः ॥२९॥
अप्रमेयाश्च विबुधाः सूतपाद्याः प्रकीर्तिताः । विष्णुपूजाप्रभावेण तेषामिंद्रो बलिः स्मृतः ॥३०॥
पाराद्या नवमे देवा इन्द्रश्चाद्भुत उच्यते । सुवासनाद्या विबुधा दशमे परिकीर्तिताः ॥३१॥
शांतिर्नाम च तत्रेद्रः सर्वभोगसमन्वितः । विहंगमाद्या देवाश्च तेषामिंद्रो वृषः स्मृतः ॥३२॥
एकादशे द्वादशे तु निबोध कथयामि ते । ऋभुनामा च देवेंद्रो हरिनाभास्तथा सुराः ॥३३॥
सुत्रामाद्यास्तथा देवास्त्रयोदशतमेऽन्तरे । दिवस्पतिर्महावीर्यस्तेषामिंद्रः प्रकीर्तितः ॥३४॥
चतुर्दशे चाक्षुषाद्या देवा इन्द्रः शुचिः स्मृतः । एवं ते मनवः प्रोक्ता इंद्रा देवाश्च तत्त्वतः ॥३५॥
एकस्मिन्ब्रह्मदिवसे स्वाधिकारं प्रभूंजते ॥३६॥
लोकेषु सर्वसर्गेषु सृष्टिरेकविधा स्मृता । कर्त्तारो बहवः संति तत्संख्यां वेत्ति कोविदः ॥३७॥
मयि स्थिते ब्रह्मलोके ब्रह्माणो बहवो गताः । तेषां संख्यां न संख्यातुं शक्तोऽस्म्यद्य द्विजोत्तम ॥३८॥
स्वर्गलोकमपि प्राप्य यावत्कालं शृणुष्व मे । चत्वारो मनवोऽतीता मम श्रीश्चातिविस्तरा ॥३९॥
स्थातव्यं च मयात्रैव युगकोटिशतं प्रभो । ततः परं गमिष्यामि कर्मभूमिं शृणुष्व मे ॥४०॥
मन्वन्तर में देवता याम नाम से प्रसिद्ध थे । उनके इन्द्र महामति शचीपति थे ॥२४॥ स्वारोचिष में पारावत
तुषिता देवता थे । उनके इन्द्र सब ऐश्वर्यों के उपभोक्ता विपश्चित् नाम के थे ॥२५॥ तीसरे मन्वन्तर में सुधाम,
सत्य, शिव और प्रतर्दन देवता थे । उनका इन्द्र सुशान्ति था ॥२६॥ तामस मन्वन्तर में सुत, पाराहर, सुत्य और
सुधी नाम के देवता थे । उनके इन्द्र शक्र, शिव हुए । पांचवें विभुनामक देवेन्द्र हुए । देवताओं की संज्ञा अमिताभ
थी । छठे मन्वन्तर का वर्णन कर रहा हूँ, सुनो-आर्या देवताओं का नाम और उनके इन्द्र का नाम मनोजव
था ॥२७-२८॥ वैवस्वत में आदित्य, वसु और रुद्र आदि देवता हैं, सब इष्ट साधनों से सम्पन्न पुरन्दर इन्द्र
हैं ॥२९॥ आठवें मन्वन्तर में अप्रमेय, विबुध, सुतपाद्य देवता और विष्णु पूजा के प्रभाव से बलि इन्द्र हैं ॥३०॥
नवें में पराद्य देवता तथा 'अद्भुत' इन्द्र कहे गए हैं । दसवें मन्वन्तर के सुवामन आदि देवता और सब भोगों के
भोक्ता इन्द्र शान्ति हैं । ग्यारहवें के विहंगम देवता और वृष उनके इन्द्र हैं ॥३१-३२॥ बारहवें के जो देवता हैं
उनको सुनो--ऋभु नामक देवेन्द्र और हरिनाभ नामक देवता हैं ॥३३॥ तेरहवें में सुत्राम आदि देवता तथा महा
पराक्रमी दिवस्पति इन्द्र कहे जाते हैं ॥३४॥ चौदहवें में चाक्षुष आदि देवता और शुचि इन्द्र हैं । इस प्रकार तुमसे
मनु, इन्द्र, देवता आदि के विषय में यथार्थतः कह दिया ॥३५॥ ब्रह्मा के एक दिन में ये सब अपने अपने अधिकार
का उपभोग करते हैं । लोको में तथा सभी सर्गों में सृष्टि एक ही ढंग से होती है । इनके कर्त्ता बहुत से हैं जिनका
ज्ञान केवल विज्ञों को ही है ॥३६-३७॥ जब मैं ब्रह्मलोक में था तो बहुत से ब्रह्माओं का कार्य समाप्त हुआ ।
द्विजोत्तम ! उनकी संख्या की ठीक ठीक गणना करने में मैं तो समर्थ नहीं हूँ ॥३८॥ इस स्वर्गलोक में मैंने जितना
समय बिताया है उसको सुनो-चार मनु तो बीत गये, अभी मेरी श्री उसी प्रकार विस्तृत रूप से फैली है ॥३९॥
प्रभो ! अभी यहाँ सौ करोड़ युगों तक रहना है । इसके अनन्तर कर्म भूमि को जाऊँगा, इसका भी वर्णन मुझ से
सुनो ॥४०॥

२५४ नारदीयपुराणम्
मया कृतं पुरा कर्म वक्ष्यामि तव सुव्रत । वदतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥४१॥
अहमासं पुरा शक्र गृध्रः पापो विशेषतः । स्थितश्च भूमिभागे वै अमेध्यामिषभोजनः ॥४२॥
एकदाहं विष्णोगृहे प्राकारे संस्थितः प्रभो । पतितो व्याधशस्त्रेण सायं विष्णोगृहांगणे ॥४३॥
मयि कंठगतप्राणे श्वगणो मांसलोलुपः । जग्राह मां स्ववक्त्रेण श्वभिरन्यैश्चरन्द्रुतः ॥४४॥
वहन्मां स्वमुखेनैव भीतोऽन्यैर्भषणैस्तथा । गतः प्रदक्षिणाकारं विष्णोस्तन्मंदिरं प्रभो ॥४५॥
तेनैव तुष्टिमापन्नो ह्यापरात्मा जगन्मयः । मम चापि शुनश्चापि दत्तावन्परमं पदम् ॥४६॥
प्रदक्षिणाकारतया गतस्यापीदृशं फलम् । संप्राप्तं विबुधश्रेष्ठ किं पुनः सम्यगर्चनातू ॥४७॥
इत्युक्तो देवराजस्तु सुधर्मेण महात्मना । मनसा प्रीतिमापन्नो हरिपूजारतोऽभवत् ॥४८॥
तथापि निर्जराः सर्वे भारते जन्मलिप्सवः । समर्पयंति देवेशं नारायणमनामयम् ।
तानर्चयन्ति सततं ब्रह्माद्या देवतागणाः ॥४९॥
नारायणानुस्मरणोद्यतानां महात्मनां त्यक्तपरिग्रहाणाम् ।
कथं भवत्युग्रभवस्य बंधस्तत्सङ्गलुब्धा यदि मुक्तिभाजः ॥५०॥
ये मानवाः प्रतिदिनं परिमुक्तसङ्गा नारायणं गरुडवाहनमर्चयन्ति ।
ते सर्वपापनिकरैः परितो विमुक्ता विष्णोः पदं शुभतरं प्रतियान्ति हृष्टाः ॥५१॥
ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरंति ।
ध्यानेन तेन हतकिल्विषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति ॥५२॥
सुव्रत ! मैंने पहले जो कुछ कर्म किये हैं उनको कह रहा हूँ, जिसके श्रवण और पठन से सब पाप नष्ट हो
जाते हैं ॥४१॥ शक्र ! पहले मैं एक विशेष रूप से पाप करने वाला गिद्ध था। सर्वदा पृथ्वी पर रहता और गन्दा
मांस खाता था ॥४२॥ प्रभो ! एक दिन विष्णु मन्दिर की चहारदीवारी पर बैठा था। सायं काल किसी बहेलिये के
वाण से घायल होकर उस मन्दिर के आँगन में गिर पड़ा ॥४३॥ अभी मेरे प्राण कण्ठ में ही थे कि एक मांस लो-
लुप कुत्ता आया और अपने मुंह में मुझको दबा लिया। यह देखकर और भी कुत्ते आगये और उसका पीछा करने
लगे ॥४४॥ प्रभो ! उन कुत्तों के भय से वह मुझको मुंह में दबाये ही मन्दिर के चारों ओर घूमने लगा जिससे कि
मन्दिर की प्रदक्षिणा हो गयी ॥४५॥ केवल इतने से ही जगन्मय परात्मा सन्तुष्ट हो गये और मुझको तथा उस कुत्ते
को भी परमगति दे दी ॥४६॥ जब केवल प्रदक्षिणा करने से इतना फल मिला तब भगवान् की भली-भाँति पूजा
करने से कितना फल मिलेगा ॥४७॥ महात्मा सुधर्म की इतनी बातें सुनकर इन्द्र प्रसन्न हो गये और हरिपूजा करने
लगे ॥४८॥ उस स्वर्ग लोक में रहकर भी सब देवता भारतवर्ष में जन्म पाने की इच्छा से निर्विकार देवेश नारायण
की पूजा करते हैं। ब्रह्मा आदि देवगण उन भक्त देवों की पूजा करते हैं ॥४९॥ नारायण के ध्यान में लोन रहने वाले,
किसी का परिग्रह (दान) न लेने वाले भक्तों को इस संसार का कठोर बन्धन कैसे प्राप्त हो सकता है, जबकि उनकी
संगति में रहने वाले मनुष्य भी मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं ॥५०॥ जो मनुष्य प्रति दिन विषयों में अनासक्त
रहकर गरुड़ध्वज नारायण की पूजा करते हैं, वे सब पाप-समूहों से सर्वथा मुक्त होकर बड़ी प्रसन्नता से विष्णु के
शुभलोक को जाते हैं ॥५१॥ जो ब्रह्मज्ञानी वीतराग होकर सुर-गुरुनारायण का सर्वदा स्मरण करते हैं, वे
अपने ध्यान के प्रभाव से निष्पाप और विमल बुद्धि हो जाते हैं एवं पुनः माता का दूध नहीं पीते अर्थात् जन्म

चत्वारिंशोऽध्यायः २५५
ये मानवा हरिकथाश्रवणास्तदोषाः कृष्णांघ्रिपद्मभजने रतचेतनाश्च ।
ते वै पुनंति च जगंति शरीरसंगात् संभाषणार्द्वापि ततो हरिरेव पूज्यः ॥५३॥
हरिपूजापरा यत्र महांन्तः शुद्धबुद्धयः । तत्रैव सकलं भद्रं यथा निम्ने जलं द्विज ॥५४॥
हरिरेव परो बन्धुर्हरिरेव परा गतिः । हरिरेव ततः पूज्यो यतश्चैतन्यकारणम् ॥५५॥
स्वर्गापवर्गफलदं सदानंदं निरामयम् । पूजयस्व मुनिश्रेष्ठ परं श्रेयो भविष्यति ॥५६॥
पूजयन्ति हरिं ये तु निष्कामाः शुद्धमानसाः । तेषां विष्णुः प्रसन्नात्मा सर्वान्कामान् प्रयच्छति ॥५७॥
यस्त्वेतच्छृणुयाद्वापि पठेद्वा सुसमाहितः । स प्राप्नोत्यश्वमेधस्य फलं मुनिवरोत्तम ॥५८॥
इत्येतत्ते समाख्यातं हरिपूजाफलं द्विज । संकोचविस्तराभ्यां तु किमन्यत्कथयामि ते ॥५९॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे विष्णुमाहात्म्ये चत्वारिंशोध्यायः ॥४०॥


ग्रहण नहीं करते ॥५२॥ जिन मनुष्यों के सारे पाप हरिकथा के सुनने से दूर हो गए हैं, जो सदा कृष्ण के चरण-
कमल के ध्यान में लगे रहते हैं; वे अपने शरीर के स्पर्श और वाणी से समस्त संसार को पवित्र कर देते हैं, इसलिए
हरि की ही पूजा करनी चाहिए ॥५३॥ द्विज! जहाँ हरि-पूजापरायण, शुद्धबुद्धि महात्मा रहते हैं वहाँ सारे कल्याण
उसी प्रकार इकट्ठे हो जाते हैं जिस प्रकार नीची भूमि में जल ॥५४॥ हरि ही सत्य-बन्धु और हरि ही एकमात्र
परम गति हैं। वही सब के पूज्य हैं। क्योंकि चैतन्य कारण वही हैं ॥५५॥ मुनिवर्य ! स्वर्ग और मोक्ष को देने
वाले, सदानन्द, निरामय भगवान् की पूजा करो, तुम्हारा परम कल्याण होगा ॥५६॥ जो शुद्ध हृदय व्यक्ति
निष्काम भाव से हरि की पूजा करते हैं, उन पर भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर सारी कामनाओं को पूर्ण कर देते
हैं ॥५७॥ मुनिवरोत्तम ! जो ध्यान पूर्वक इस अध्याय को पढ़ता या सुनता है उसको अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त
होता है ॥५८॥ द्विज ! इस प्रकार तुमको हरिपूजा का फल संक्षेप और विस्तार से कह सुनाया । अब तुमको
और क्या सुनाऊँ? ॥५९॥
श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णुमाहात्म्यवर्णन नामक चालीसवां अध्याय समाप्त ॥४०॥

अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः
नारद उवाच
आख्यातं भवता सर्वं मुने तत्त्वार्थकोविद । इदानीं श्रोतुमिच्छामि युगानां स्थितिलक्षणम् ॥१॥
सनक उवाच
साधु साधु महाप्राज्ञ मुने लोकोपकारक । युगधर्मान्प्रवक्ष्यामि सर्वलोकोपकारकान् ॥२॥
धर्मो विवृद्धिमायाति काले कस्मिंश्चिदुत्तम । तथा विनाशमायाति धर्म्म एव महीतले ॥३॥
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम् । दिव्यैर्द्वादशभिर्ज्ञेयं वत्सरेस्तव सत्तम् ॥४॥
संध्यासंध्यांशयुक्तानि युगानि सदृशानि वै । कालतो वेदितव्यानि इत्युक्तं तत्त्वदर्शिभिः ॥५॥
आद्ये कृतयुगं प्राहुस्ततस्त्रेताविधानकम् । ततश्च द्वापरं प्राहुः कलिमंत्यं विदुः क्रमात् ॥६॥
देवदानवगंधर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । नासन्कृतयुगे विप्र सर्वे देवसमाः स्मृताः ॥७॥
सर्वे हृष्टाश्च धर्मिष्ठा न तत्र क्रयविक्रयौ । वेदानां च विभागश्च न युगे कृतसंज्ञके ॥८॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राः स्वाचारतत्पराः । सदा नारायणपरास्तपोध्यानपरायणाः ॥९॥
कामादिदोषनिर्मुक्ताः शमादिगुणतत्पराः । धर्मसाधनचित्ताश्च गतासूया अदंभिकाः ॥१०॥
सत्यवाक्यरताः सर्वे चतुराश्रमधर्मिणः । वेदाध्ययनसंपन्नाः सर्वशास्त्रविचक्षणाः ॥११॥
अध्याय ४१
नारद बोले-मुने ! तत्त्वार्थविज्ञ ! आपने सब कुछ कह दिया, अब युगों की स्थिति और धर्म के विषय में सुनना चाहता हूँ ॥१॥
सनक ने कहा- मुने ! लोकोपकारक ! महाबुद्धिमान् ! धन्य हो, धन्य हो। मैं सब लोक का उपकार करने वाले युग धर्म को कह रहा हूँ ॥२॥ उत्तम ! किसी समय धर्म की वृद्धि होती तो कभी इस पृथ्वी तल पर उसका ह्रास हो जाता है ॥३॥ कृत, त्रेता, द्वापर और कलि ये चार युग हैं । सज्जनश्रेष्ठ ! दिव्य बारह वर्षों तक ये चार युग स्थित रहते हैं ॥४॥ तत्त्वदर्शियों ने कहा है कि चारों युगों में सन्ध्या और सन्ध्यांश काल नियमपूर्वक होते हैं और समय के अनुसार ये जाने जाते हैं। सब से पहले कृतयुग तब त्रेता और इसके बाद द्वापर युग आता है । क्रम में कलि अन्तिम युग है ॥५-६॥ विप्र ! कृतयुग में देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग आदि नहीं थे । सब देव कोटि के ही माने जाते थे । सब प्रसन्न और बलवान् थे । क्रय-विक्रय का व्यवहार न था । उस कृत नामक युग में वेदों का विभाग नहीं हुआ था ॥७-८॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-शूद्र सब अपने आचार-पालन में तत्पर रहते थे । वे सदा नारायण की पूजा करते और तप, ध्यान में लगे रहते थे ॥६॥ वे काम आदि दोषों से मुक्त, शम आदि गुणों में तत्पर, धर्म-साधन के प्रेमी, असूया और दम्भ से सदा दूर रहने वाले होते थे ॥१०॥ सब सत्य बोलने वाले, आश्रम-धर्म का पालन करने वाले, वेदाध्ययनपरायण और सब शास्त्रों के ज्ञाता होते थे ॥११॥

एकचत्वारिंशोऽध्यायः २५७
चतुराश्रमयुक्तेन कर्मणा कालयोनिना । अकामफलसंयोगाः प्रयांति परमां गतिम् ॥१२॥
नारायणः कृतयुगे शुक्लवर्णः सुनिर्मलः । त्रेताधर्मांन्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व सुसमाहितः ॥१३॥
धर्मः पांडुरतां याति त्रेतायां मुनिसत्तम । हरिस्तु रक्ततां याति किंचित्क्लेशान्विता जनाः ॥१४॥
क्रियायोगरताः सर्वे यज्ञकर्मसु निष्ठिताः । सत्यव्रता ध्यानपराः सदाध्यानपरायणाः ॥१५॥
द्विपादो वर्तते धर्मो द्वापरे च मुनीश्वर । हरिः पीतत्वमायाति वेदश्चापि विभज्यते ॥१६॥
असत्यनिरताश्चापि केचित्तत्र द्विजोत्तमाः । ब्राह्मणाद्याश्च वर्णाः स्युः केचिद्रागादिदुर्गुणाः ॥१७॥
केचित्स्वर्गापवर्गार्थं विप्रयज्ञान्प्रकुर्वते । केचिद्धनादिकामाश्च केचित्कलुषचेतसः ॥१८॥
धर्माधमौ समौ स्यातां द्वापरे विप्रसत्तम । अधर्मस्य प्रभावेण क्षीयंते च प्रजास्तथा ॥१९॥
अल्पायुषो भविष्यन्ति केचिच्चापि मुनीश्वर । केचित्पुण्यरतान् दृष्ट्वा असूयां विप्रकुर्वते ॥२०॥
कलिस्थितिं प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व समाहितः । धर्मः कलियुगे प्राप्ते पादेनैकेन वर्तते ॥२१॥
तामसं युगमासाद्य हरिः कृष्णत्वमेति च । यः कश्चिदपि धर्मात्मा यज्ञाचारान्करोति च ॥२२॥
यः कश्चिदपि पुण्यात्मा क्रियायोगरतो भवेत् । नरं धर्मरतं दृष्ट्वा सर्वेऽसूयां प्रकुर्वते ॥२३॥
व्रताचाराः प्रणश्यंति ज्ञानयज्ञादयस्तथा । उपद्रवा भविष्यन्ति ह्यधर्मस्य प्रवर्तनात् ॥२४॥
असूयानिरताः सर्वे दंभाचारपरायणाः । प्रजाश्चाल्पायुषः सर्वा भविष्यंति कलौ युगे ॥२५॥
नारद उवाच
युगधर्माः समाख्यातास्त्वया संक्षेपतो मुने । कलिं विस्तरतो ब्रूहि त्वं हि धर्मविदां वरः ॥२६॥
सामयिक चारों आश्रमों के कर्म के पालन से वे अकाम भाव से फल को प्राप्त कर परमगति को प्राप्त करते
थे ॥१२॥ कृत युग में नारायण शुक्ल वर्ण के और निर्मल होते हैं। इसके बाद त्रेता के धर्मों का वर्णन करता
हूँ, उसको ध्यानपूर्वक सुनो ॥१३॥ मुनिश्रेष्ठ ! त्रेता में धर्म पाण्डुर वर्ण का हो जाता है, हरि रक्तवर्ण के
हो जाते हैं और मनुष्य कुछ क्लेश पाने लगते हैं ॥१४॥ सब क्रिया-योग में लगे रहते, यज्ञों का अनुष्ठान करते, सभी
सत्यव्रत, ध्यान-परायण और सदा ईश्वर-चिन्तन में तल्लीन रहा करते हैं ॥१५॥ मुनीश्वर ! द्वापर में धर्म दो
चरणों का ही रह जाता है । हरि भी पीले रंग के हो जाते हैं और वेदों का विभाग हो जाता है ॥१६॥ कुछ द्विजो-
त्तम व्यक्ति भी असत्य व्यवहार करने लगते और ब्राह्मण आदि वर्ण के लोग भी राग आदि दुर्गुणों में फँस जाते
हैं ॥१७॥ कुछ लोग तो स्वर्ग और मुक्ति के लिए यज्ञ करते हैं, कुछ केवल धन के ही इच्छुक होते और कुछ का
तो हृदय ही कल्मष से भरा रहता है ॥१८॥ विप्रवर्य ! द्वापर में धर्म और अधर्म बराबर होते हैं । प्रजा अधर्म
के कारण क्षीण होती जाती है ॥१९॥ मुनीश्वर ! कुछ लोग अल्पायु भी हो जाते हैं । विप्र ! कुछ तो दूसरों को
पुण्य करते देख उसकी निन्दा या उससे ईर्ष्या करने लगते हैं ॥२०॥ अब कलियुग की स्थिति का वर्णन करता
हूँ; उसको ध्यानपूर्वक सुनो । कलियुग के आने पर धर्म का केवल एक चरण शेष रह जाता है ॥२१॥ उस
तामस युग के आ जाने पर हरि भी कृष्ण वर्ण के जाते हैं। जो कोई धर्मात्मा यज्ञ करता है या जो कोई
पुण्यात्मा क्रियायोग का पालन करता है, उस धार्मिक मनुष्य को देख कर सब उससे ईर्ष्या करने लगते
हैं ॥२२-२३॥ सारे व्रताचार और ज्ञान-यज्ञ आदि नष्ट हो जाते हैं, अधर्म के बढ़ जाने से नाना उपद्रव होने लगते
हैं । सब असूया और दम्भाचार में लगे रहते हैं और उस कलियुग में सारी प्रजा अल्पायु हो जाती है ॥२४-२५॥
नारद बोले-मुने ! आपने संक्षेप में युग-धर्मों का वर्णन किया । अब आप कृपा कर कलियुग का विस्तार-
३३ ना० पु०

२५८ नारदीयपुराणम्
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च मुनिसत्तम । किमाहाराः किमाचाराः भविष्यंति कलौ युगे ॥२७॥
सनक उवाच
शृणुष्व मुनिशार्दूल सर्वलोकोपकारक । कलिधर्मान्प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथम् ॥२८॥
सर्वे धर्मा विनश्यन्ति कृष्णे कृष्णत्वमागते । तस्मात्कलिर्महाघोरः सर्वपातकसंकरः ॥२९॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा धर्मपराङ्मुखाः । घोरे कलियुगे प्राप्ते द्विजा वेदपराङ्मुखाः ॥३०॥
व्याजधर्मरताः सर्वे असूयानिरतास्तथा । वृथाहंकारदुष्टाश्च सत्यहीनाश्च पंडिताः ॥३१॥
अहमेवाधिक इति सर्वेऽपि विवदंति च । अधर्मलोलुपाः सर्वे तथा वैतंडिका नराः ॥३२॥
अतः स्वल्पायुषः सर्वे भविष्यन्ति कलौ युगे । अल्पायुष्यान्मनुष्याणां न विद्याग्रहणं द्विज ॥३३॥
विद्याग्रहणशून्यत्वादधर्मो वर्तते पुनः । व्युत्क्रमेण प्रजाः सर्वा म्रियंते पापसत्पराः ॥३४॥
ब्राह्मणाद्यास्तथा वर्णाः संकीर्यंते परस्परम् । कामक्रोधपरा मूढा वृथासंतापपीडिताः ॥३५॥
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति सर्वे वर्णा कलौ युगे । उत्तमा नीचतां यांति नीचाश्चोत्तमतां तथा ॥३६॥
राजानो द्रव्यनिरतास्तथा ह्यन्यायवर्त्तिनः । पीडयन्ति प्रजाश्चैव करैरत्यर्थयोजितैः ॥३७॥
शववाहा भविष्यन्ति शूद्राणां च द्विजातयः । धर्मस्त्रीष्वपि गच्छंति पतयो जारधर्मिणः ॥३८॥
द्विषंति पितरं पुत्रा भर्तारं च स्त्रियोऽखिलाः । परस्त्रीनिरता सर्वे परद्रव्यपरायणाः ॥३९॥
मत्स्यामिषेण जीवंति दुहंतश्चाप्यजीविकाम् । घोरे कलियुगे विप्र सर्वे पापरता जनाः ॥४०॥
पूर्वक वर्णन कीजिए, क्योंकि आप धर्मज्ञों में श्रेष्ठ हैं ॥२६॥ मुनिश्रेष्ठ ! कलियुग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और
शूद्रों का आचरण और आहार कैसा होगा, इसको कहिए ॥२७॥
सनक बोले- मुनिश्रेष्ठ ! सर्वलोकोपकारक ! सुनो, अब विस्तारपूर्वक यथार्थ रूप से कलियुग के धर्मों का
वर्णन कर रहा हूँ ॥२८॥ हरि के कृष्ण वर्ण (काला) हो जाने पर सारे धर्म नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है
कि कलि महाघोर युग है। सब पापों का इस युग में नग्न रूप देखने को मिलता है ॥२९॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
और शूद्र धर्म से विमुख हो जाते और घोर कलि के आने पर विप्र भी वेदविमुख हो जाते हैं ॥३०॥ सभी कपट और
असूया में प्रवीण हो जाते हैं और पंडित वृथाहंकार से दूषित तथा सत्यविमुख हो जाते हैं ॥३१॥ सभी अपने को
ही श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए विवाद करते हैं। सब अधर्म करने के लिए लालायित रहते और वितंडावादी होते
हैं ॥३२॥ इसलिए कलियुग में सब अल्पायु होते हैं। अल्पायु होने के कारण विद्योपार्जन करना संभव नहीं होता
॥३३॥ अविद्या के कारण अधर्म बढ़ जाता है। धर्म-व्यतिक्रम के कारण सब प्रजावें पाप कर्म करती और अकाल
मृत्यु को प्राप्त करती हैं ॥३४॥ ब्राह्मण आदि सब वर्ण परस्पर संकरदोष से दूषित हो जाते हैं। सब मूढ़, काम-
क्रोध-परायण और दूसरों को व्यर्थ कष्ट देने में कुशल हो जाते हैं ॥३५॥ कलियुग में सब वर्ण शूद्र के समान
हो जाते हैं, उत्तम तो नीच हो जाते और नीच उत्तम हो जाते हैं ॥३६॥ राजा केवल धनापहरण को ही कर्त्तव्य
समझते, अन्याय व्यवहार करते तथा प्रजा को पीड़ित कर अनेकों कर वसूल करते हैं ॥३७॥ द्विजाति शूद्रों के
मुर्दे ढोते हैं। व्यभिचारी पति धर्मस्त्रियों का सतीत्व नष्ट कर देते हैं ॥३८। सब पुत्र अपने पिता से द्वेष करने
लगते हैं। स्त्रियाँ अपने भर्त्ता को शत्रु समझने लगती हैं। सब परस्त्री और परद्रव्य के अपहरण में ही लगे रहते
हैं ॥३९॥ मछली, मांस खाकर ही जीते हैं और अनुचित जीविका को भी अपनाने में हिचकते नहीं। इस प्रकार
विप्र ! घोर कलियुग में सब लोग पाप कर्म करने लगते हैं ॥४०॥ सज्जनों की निन्दा और उनका उपहास

एकचत्वारिंशोऽध्यायः २५६
सतामसूयानिरतां उपहासं प्रकुर्वंते । सरित्तीरेषु कुद्दालैर्वपिष्यन्ति चौषधीः ॥४१॥
पृथ्वी निष्फलतां याति बीजं पुष्पं विनश्यति । वेश्यालावण्यशीलेषु स्पृहां कुर्वंति योषितः ॥४२॥
धर्मविक्रयिणो विप्राः स्त्रियश्च भगविक्रयाः । वेदविक्रयकाश्चान्ये शूद्राचाररता द्विजाः ॥४३॥
साधूनां विधवानां च वित्तान्यपहरंति च । न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा द्रव्यलोलुपाः ॥४४॥
धर्माचारं परित्यज्य वृथावादैर्विषज्जिताः । द्विजाः कुर्वन्ति दंभार्थं पितृश्राद्धादिकाः क्रियाः ॥४५॥
आपात्रेष्वेव दानानि प्रयच्छन्ति नराधमाः । दुग्धलोभनिमित्तेन गोषु प्रीतिं च कुर्वंते ॥४६॥
न कुर्वंति तथा विप्राः स्नानशौचादिकाः क्रियाः । अकाले कर्मनिरता भविष्यंति द्विजाधमाः ॥४७॥
साधुनिंदापराश्चैव विप्रनिंदापरास्तथा । न कस्यापि मनो विप्र विष्णुभक्तिपरं भवेत् ॥४८॥
यज्विनश्च द्विजानैव धनार्थं राजकिंकराः । ताडयंति द्विजान्दुष्टाः कृष्णे कृष्णत्वमागते ॥४९॥
दानहीना नराः सर्वे घोरे कलियुगे मुने । प्रतिग्रहं प्रकुर्वंति पतितानामपि द्विजाः ॥५०॥
कलेः प्रथमपादेऽपि विनिंदंति हरिं नराः । युगान्ते च हरेर्नाम नैव कश्चिद्वदिष्यति ॥५१॥
शूद्रस्त्रीसंगनिरता विधवाशंगलोलुपाः । शूद्रान्नभोगनिरता भविष्यंति कलौ द्विजाः ॥५२॥
विहाय वेदसन्मार्गं कुपथाचारसंगताः । पाषंडाश्च भविष्यन्ति चतुराश्रमनिंदकाः ॥५३॥
न च द्विजातिशुश्रूषां कुर्वंति चरणोद्भवाः । द्विजातिधर्मान्गृह्णन्ति पाखण्डलिङ्गिनोऽधमाः ॥५४॥
काषायपरिवीताश्च जटिला भस्मधूलिताः । शूद्रा धर्मान्प्रवक्ष्यंति कूटयुक्तिपरायणाः ॥५५॥
द्विजाःस्वाचारमुत्सृज्य परपाकान्नभोजिनः । भविष्यंति दुरात्मानः शूद्राः प्रव्रजितास्तथा ॥५६॥
सब करते हैं। नदी तट को फावड़े से खोदकर अन्न बो दिया जाता है ॥४१॥ इस युग में पृथ्वी में अन्न पैदा करने
की शक्ति नहीं रह जाती। स्त्रियां सुन्दर वेश्याओं का सौन्दर्य और सजावट देखकर उनका ही अनुकरण करने
लगती हैं ॥४२॥ ब्राह्मण धर्म बेचते और स्त्रियां अपना सतीत्व बेंचती हैं। दूसरे विप्र वेद-विक्रय करते और शूद्रों
के समान आचरण करते हैं ॥४३॥ ब्राह्मण इतने अधिक धनलोलुप हो जाते हैं कि व्रत आदि का पालन तो करते
नहीं, उलटे साधुओं और विधवाओं की संपत्ति ठग लेते हैं ॥४४॥ द्विज धर्माचार को छोड़कर व्यर्थ के बकवाद में
लगे रहते हैं। द्विज केवल दंभ की दृष्टि से ही पितृ श्राद्ध आदि क्रियाओं को करते हैं ॥४५॥ दुष्ट लोग केवल
अपात्रों को ही दान देते हैं। गौओं का पालन अथवा उससे प्रेम केवल दूध के लोभ से ही लोग करते हैं, धर्म दृष्टि
से नहीं ॥४६॥ विप्रगण स्नान, शौच आदि कर्म शास्त्र और समय के अनुसार नहीं करते हैं और अधम ब्राह्मण
अकाल में ही कर्म करते हैं ॥४७॥ विप्र ! साधु ब्राह्मणों की निन्दा सब करते हैं। किसी का भी विष्णु भक्ति में
मन नहीं लगता ॥४८॥
कोई ब्राह्मण यज्ञ करने वाले नहीं रह जाते, सब धन के लोभ में पड़कर राजसेवक बन जाते हैं। कृष्ण
के कृष्ण वर्ण हो जाने पर दुष्टजन ब्राह्मणों को मारते हैं ॥४९॥ मुने ! घोर कलियुग के आ जाने पर मनुष्य दान
देना नहीं चाहते हैं। द्विज इतने पतित हो जाते हैं कि वे पतितों से भी दान लेते हैं ॥५०॥ कलि के प्रथम चरण
में ही मनुष्य हरि की निन्दा करने लगते हैं। युग के अन्त में कोई भगवान् का नाम भी नहीं लेता ॥५१॥ शूद्र-स्त्री
के साथ रमण करने लगते और विधवा की संगति के विशेष इच्छुक हो जाते हैं। कलि में द्विज शूद्रान्न भक्षण
करेंगे ॥५२॥ अधम पाखंडी लोग ब्राह्मणवेश बनाकर धर्म के नाम पर पाखंड करेंगे। काषाय वस्त्र पहनकर
भस्म लेप कर मुण्डी बनकर लोग वेद सम्मत मार्ग छोड़कर कुपथ की ओर लगेंगे। चारों आश्रमों की निन्दा
करने वाले पाखंडी होंगे। शूद्र द्विजाति की सेवा नहीं करेंगे। कूट और कपट कुशल शूद्र धर्म का प्रवचन करेंगे
॥५३-५५॥ ब्राह्मण अपने कुलाचार को छोड़कर दूसरे के बनाये अन्न को ही खायेंगे। दुष्ट शूद्र ही संन्यासी

२६० नारदीयपुराणम्
उत्कोचजीविनस्तत्र भविष्यन्ति कलौ मुने । धर्महीनास्तु पाखंडाः कापाला भिक्षवोऽधमाः ॥५७॥
धर्मविध्वंसशीलानां द्विजानां द्विजसत्तम । शूद्रा धर्मान्प्रवक्ष्यन्तिह्याधिरुह्योत्तमासनम् ॥५८॥
एते चान्ये च बहवः नग्नरक्तपटादिकाः । पाषंडाः प्रचरिष्यंति प्रायो वेदविदूषकाः ॥५९॥
गीतवादित्रकुशलाः क्षुद्रधर्मसमाश्रयाः । भविष्यंति कलौ प्रायो धर्मविध्वंसका नराः ॥६०॥
अल्पद्रव्या वृथालिंगा वृथाहंकारदूषिताः । हर्तारः परवित्तानां भवितारो नराधमाः ॥६१॥
प्रतिग्रहपरा नित्यं जगदुन्मार्गशीलिनः । आत्मस्तुतिपराः सर्वे परनिंदापरास्तथा ॥६२॥
विश्वस्तघातिनः क्रूरा दयाधर्मविवर्जिताः । भविष्यंति नरा विप्र कलौ चाधर्मबांधवाः ॥६३॥
परमायुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश । घोरे कलियुगे विप्र पंचवर्षा प्रसूयते ॥६४॥
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च युवानोऽतः परे जरा । स्वकर्मत्यागिनः सर्वे कृतघ्ना भिन्नवृत्तयः ॥६५॥
याचकाश्च द्विजा नित्यं भविष्यन्ति कलौ युगे । परावमाननिरताःप्रहृष्टाः परवेश्मनि ॥६६॥
तत्रैव निंदानिरता वृथाविश्रमिणो जनाः । निंदां कुर्वन्ति सततं पितृमातृसुतेषु च ॥६७॥
वदंति वाचा धर्मांश्च चेतसा पापलोलुपाः । धनविद्यावयोमत्ताः सर्वदुःखपरायणाः ॥६८॥
व्याधितस्करदुर्भिक्षैः पीडिता अतिमायिनः । प्रपुष्यंति वृथैवामी न विचार्य च दुष्कृतम् ॥६९॥
धर्ममार्गप्रणेतारं तिरस्कुर्वंति पापिनः । धर्मकार्ये रतं चैव वृथाविश्रंभिणो जनाः ॥७०॥
भविष्यन्ति कलौ प्राप्ते राजानो म्लेच्छजातयः । शूद्रा भैक्ष्यरताश्चैव तेषां शुश्रूषणे द्विजाः ॥७१॥
न शिष्यो न गुरुः कश्चिन्न पुत्रो न पिता तथा । न भार्या न पतिश्चैव भवितारोऽत्र संकरे ॥७२॥
बनेंगे और उपदेश द्वारा जीविका निर्वाह करेंगे ॥५६॥ हे मुने ! कलियुग में लोग खूब रिश्वत लेंगे । द्विजश्रेष्ठ !
धर्महीन, पाखंडी, कापालिक तथा अधम शूद्र भिक्षु धर्मविमुख द्विजों को उत्तम धर्मासन पर बैठकर धर्मोपदेश
करेंगे ॥५७-५८॥ ऐसे पाखण्डपरायण और दूसरे बहुत से, नंगे तथा लाल वस्त्र पहनने वाले कापालिक प्रायः वेद
विरुद्ध प्रचार करेंगे ॥५९॥ कलियुग में प्रायः लोग नाचने-गाने में प्रवीण और क्षुद्र धर्म के ही मानने वाले
होंगे । उस युग में मनुष्य धर्म-विध्वंसक, दरिद्र, कपट वेष धारण करने वाले और व्यर्थ अहंकार करने वाले
होंगे । अधम मानव पर-धन को चुराने वाले होंगे ॥६०-६१॥ प्रतिग्रह लेने वाले और सर्वदा कुपथगामी होंगे ।
सब आत्मस्तुति करने वाले, पर-निन्दा-परायण, विश्वासघाती, क्रूर, दया धर्म से शून्य और पाप के ही प्रेमी
होंगे ॥६२-६३॥ घोर कलियुग आने पर लोगों की परमायु सोलह वर्ष की होगी और पाँच वर्ष की कन्यायें पुत्र
प्रसव करेंगी ॥६४॥ सात, आठ वर्ष तक ही युवावस्था रहेगी इसके बाद बुढ़ापा आ जायगा सब ब्राह्मण कुलाचार
त्यागी, कृतघ्न, कुल-प्रतिकूल व्यवहार करने वाले और केवल भिखमंगे होंगे । दूसरों को अपमानित करने में लगे
रहने वाले दूसरों के घर से ही प्रसन्न रहेंगे ॥६५-६६॥ वहां दूसरों की निन्दा करेंगे और सदा अपनी धाक
जमाने का प्रयत्न करेंगे । पिता, माता और पुत्र की निन्दा करेंगे ॥६७॥ और मुंह से तो धर्म की बातें करेंगे
परन्तु हृदय से पाप करने के ही लिए उत्सुक रहेंगे । सब लोग धन, विद्या और युवावस्था के मद से मतवाले,
पर-पीड़ा-परायण, अतिमायावी और सर्वदा रोग, चोर और दुर्भिक्ष से पीड़ित रहेंगे । अपने दुष्कर्मों पर कुछ भी
विचार न कर उसका ही समर्थन करेंगे ॥६८-६९॥ पापी लोग धर्म मार्ग का उपदेश करने वाले धर्माचार्यों
का तिरस्कार करेंगे । धर्मकार्य की ओर रुचि रखने वाले की व्यर्थ आडम्बर जमाने वाले निन्दा करेंगे ॥७०॥
राजा म्लेच्छ जाति के ही होंगे । शूद्र भिक्षावृत्ति (साधु बन कर भीख मांगना) अपनायेंगे और द्विज उनकी
सेवा करेंगे ॥७१॥ न किसी का कोई गुरु होगा न शिष्य । न कोई अपने पिता की अपेक्षा करेगा, न पिता पुत्र

एकचत्वारिंशोऽध्यायः २६१
कलौ गते भविष्यन्ति धनाढ्या अपि याचकाः । रसविक्रयिणश्चापि भविष्यन्ति द्विजातयः ॥७३॥
धर्मकंचुकसंवीता मुनिवेषधरा द्विजाः । अपण्यविक्रयरता अगम्यागामिनस्तथा ॥७४॥
वेदनिंदापराश्चैव धर्मशास्त्रविनिंदकाः । शूद्रवृत्त्यैव जीवंति नरकार्हा द्विजा मुने ॥७५॥
अनावृष्टिभयं प्राप्ता गगनासक्तदृष्टयः । भविष्यन्ति कलौ मर्त्याः सर्वे क्षुद्भयकातराः ॥७६॥
कंदपर्णफलाहारास्तापसा इव मानवाः । आत्मानं तारयिष्यंति अनावृष्ट्यातिदुःखिताः ॥७७॥
कामार्ता ह्रस्वदेहाश्च लुब्धाश्चाधर्मतत्पराः । कलौ सर्वे भविष्यंति स्वल्पभाग्या बहुप्रजाः ॥७८॥
स्त्रियः स्वपोषणपरा वेश्या लावण्यशीलिकाः । पतिवाक्यमनादृत्य सदान्यगृहत्पराः ॥७६॥
दुःशीला दुष्टशीलेषु करिष्यन्ति सदा स्पृहाम् । असद्वृत्ता भविष्यंति पुरुषेषु कुलांगनाः ॥८०॥
चौरादिभयभीताश्च काष्ठयंत्राणि कुर्वते । दुर्भिक्षकरपीडाभिरतीवोपद्रुता जनाः ॥८१॥
गोधूमान्नयवान्नाढ्ये देशे यास्यंति दुःखिताः । निधाय हृद्यकर्माणि प्रेरयंति वचः शुभम् ॥८२॥
स्वकार्यसिद्धिपर्यंतं बंधुतां कुर्वते जनाः । भिक्षवश्चापि मित्रादिस्नेहसंबंधयन्विताः ॥८३॥
अन्नोपाधिनिमित्तेन शिष्यान्गृह्णन्ति भिक्षवः ॥८४॥
उभाभ्यामथ पाणिभ्यां शिरःकंडूयनं स्त्रियः । कुर्वंत्यो गुरुभर्तॄणामाज्ञामुल्लंघयंति च ॥८५॥
पाषण्डालापनिरता पाषण्डजनसंगिनः । यदा द्विजा भविष्यंति तदा वृद्धिं कलिर्व्रजेत् ॥८६॥
यदा प्रजा न यक्ष्यंति न होष्यंति द्विजातयः । तदैव तु कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः ॥८७॥

की । भार्या और पति की मर्यादा सर्वथा लुप्त हो जायगी । कलि के अन्तिमचरण में धनी भी भिखमंगे होंगे ।
द्विजाति रसविक्रयी होंगे ॥७२-७३॥
द्विज धर्म की ओट में अधर्म आचरण और ऋषि मुनि का वेष धारण कर प्रवंचना करेंगे ।
प्रायः मनुष्य निषिद्ध वस्तुओं का विक्रय करेंगे । अगम्यागमन, वेदनिन्दा और धर्मशास्त्रों की कटु आलोचना
नित्य प्रति का कार्य होगा । मुने ! नरक के अधिकारी द्विज शूद्रवृत्ति से ही जीविका निर्वाह करेंगे ॥७४-७५॥
सब अनावृष्टि के भय से दुःखी होकर आकाश की ओर ही आँख लगाए रहेंगे । सब मनुष्य भूख और भय से व्याकुल
हो तपस्वी की भांति केवल कंद, पत्तियां और फल खाकर रहेंगे । अनावृष्टि के कारण अति दुःखित होकर लोग
किसी प्रकार जीवनयापन करेंगे ॥७६-७७॥ सब कामी, लघुकाय, हत्यारे, अधर्म करने वाले होंगे । इस युग में
प्रायः सब दरिद्र परन्तु अधिक सन्तान वाले होंगे ॥७८॥ स्त्रियां केवल उदर-पोषण को ही अपना ध्येय समझेंगी
और सुन्दरी स्त्रियां वेश्यावृत्ति को ही अपनायेंगी । वे पति के कथन को तुच्छ समझ कर सदा दूसरे के घर में तत्पर
रहेंगी और ये दुःशील स्त्रियां दुष्टों को ही अधिक चाहेंगी । कुलांगनायें भी पुरुषों के प्रति असद् व्यवहार ही
करेंगी ॥७६-८०॥ लोग चोरों के डर से सदा काठ के यन्त्र किवाड़ और ताला आदि आत्मरक्षा के लिए बना-
येंगे । लोग दुर्भिक्ष और राजकर से पीड़ित होकर गेहूँ और जौ से समृद्ध देशों में भाग जायेंगे । हृदय में
अकर्म की योजना रखकर शुभ वाणी मुंह से कहेंगे, परन्तु उनकी वह बन्धुता केवल काम बनने तक ही रहेगी ।
भिक्षु (संन्यासी) भी मित्र, बन्धु आदि को ममता में फंसे रहेंगे ॥८१-८३॥ वे अन्न और सम्मान के लिए अपने
लोगों को शिष्य बनायेंगे ॥८४॥ स्त्रियां दोनों हाथों से शिर खुजलाती हुई गुरुजनों एवं पति की आज्ञा का
उल्लंघन करेंगी ॥८५॥ जब द्विज पाखण्ड प्रदर्शन करने लगेंगे सदा धूर्तों की संगति में रहेंगे तब कलियुग की
घोरता का अनुमान लग जायगा ॥८६॥ जब प्रजा यज्ञ करना और द्विज लोग हवन करना छोड़ देंगे तब बुद्धि-

२६२ नारदीयपुराणम्
अधर्मवृद्धिर्भविता बालमृत्युपि द्विज । सर्वधर्मेषु नष्टेषु याति निःश्रीकतां जगत् ॥८७॥
एवं कलेः स्वरूपं ते कथितं विप्र सत्तम । हरिभक्तिपरानेष न कलिर्बाधते क्वचित् ॥८८॥
ततः परं कृतयुगे त्रेतायां ध्यानमेव च । द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥८९॥
यत्कृते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां शरदा च यत् । द्वापरे यच्च मासेन ह्यहोरात्रेण तत्कलौ ॥९०॥
ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥९१॥
अहोरात्रं हरेर्नाम कीर्तयंति च ये नराः । कुर्वंति हरिपुजां वा न कलिर्बाधते च तान् ॥९२॥
नमो नारायणायेति कीर्तयंति च ये नराः । निष्कामा वा सकामा वा न कलिर्बाधते च तान् ॥९३॥
हरिनामपरा ये तु घोरे कलियुगे द्विज । त एव कृतकृत्याश्च न कलिर्बाधते हि तान् ॥९४॥
हरिपुजापरा ये च हरिनामपरायणाः । त एव शिवतुल्याश्च नात्र कार्या विचारणा ॥९५॥
समस्तजगदाधारं परमार्थस्वरूपिणम् । घोरे कलियुगे प्राप्ते विष्णुं ध्यायन्न सीदति ॥९६॥
अहो अति सुभाग्यास्ते सकृद्वै केशवार्चकाः । घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वधर्मविवर्जिते ॥९७॥
न्यूनातिरिक्तदोषाणां कलौ वेदोक्तकर्मणाम् । हरिस्मरणमेवात्र संपूर्णत्वविधायकम् ॥९८॥
हरे केशव गोविंद वासुदेव जगन्मय । इतीरयंति ये नित्यं नहि तान्बाधते कलिः ॥१००॥
शिव शंकर रुद्रेश नीलकंठ त्रिलोचन । इति जलपंन्ति ये वापि कलिस्तान्नपि बाधते ॥१०१॥
महादेव विरूपाक्ष गंगाधर मृडाव्यय । इत्थं वदंति ये विप्र ते कृतार्था न संशयः ॥१०२॥
मानों को समझ लेना चाहिए कि अब घोर कलियुग आ गया ॥८७॥ द्विज ! उस समय अधर्म बढ़ जायगा ।
बालकों की मृत्यु होगी । सब धर्मों के नष्ट हो जाने पर सारा संसार श्रीहीन हो जायगा ॥८८॥
विप्रश्रेष्ठ, इस भाँति तुमको कलियुग का स्वरूप बता दिया, परन्तु हरिभक्ति के प्रभाव से यह कलियुग
भक्तों का कुछ भी न बिगाड़ सकेगा ॥८९॥ इसके अतिरिक्त कृतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में कृष्णा-
र्चन और कलियुग में दान ही कलि के प्रभाव को नष्ट करते हैं ॥६०॥ कृतयुग में दश वर्ष तक, त्रेता में एक वर्ष
तक और द्वापर में एक मास तक कार्य करने से जो फल मिलता है वही कलि में एक रात और दिन के शुभ
कर्म से मिल जाता है ॥९१॥ कृतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में हरि-पूजा से जो फल मिलता है वही
कलियुग में केवल केशव नाम के कीर्तन से प्राप्त हो जाता है ॥९२॥ जो मनुष्य दिन रात हरिनाम कीर्तन और हरि
पूजा करते हैं उनपर कलियुग का प्रभाव नहीं पड़ता ॥९३॥ जो निष्काम या सकाम भाव से 'नमो नारायणाय' इस
मन्त्र का जप करते हैं उनको कलियुग पीड़ा नहीं पहुँचा सकता ॥९४॥ द्विज, घोर कलियुग में जो हरिनाम के
प्रेमी हैं उनका ही जन्म सफल है और उन पर कलि का प्रभाव नहीं पड़ता ॥९५॥ जो हरिनाम के उपासक हैं,
जो हरिपूजा के प्रेमी हैं वे ही शिव के समान हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥९६॥ घोर कलि में समस्त जगत् के आधार
परमार्थस्वरूप विष्णु का ध्यान करने से कलि कष्ट नहीं दे पाता ॥९७॥ उस घोर कलि में जबकि कहीं किसी
प्रकार के धर्म का पता नहीं चलता जो एक बार भी केशव की पूजा कर देते हैं वे अतीव भाग्यशाली हैं ॥९८॥
इस युग में वेदोक्त कर्मों का न्यूनाधिक दोष केवल हरि स्मरण मात्र से दूर होकर पूर्ण हो जाता है ॥९९॥ जो
हरि, केशव, गोविन्द, वासुदेव, जगन्मय आदि नामों का उच्चारण नित्य प्रति करते हैं उन पर कलि का कुछ भी
प्रभाव नहीं पड़ता ॥१००॥ जो शिव, शंकर, रुद्रेश, त्रिलोचन इन नामों का भी उच्चारण करते हैं उनको भी कलि
पीड़ा नहीं पहुँचा पाता ॥१०१॥ विप्र ! जो महादेव, विरूपाक्ष, गंगाधर, मृड, अव्यय आदि नामों को जपते
हैं वे निस्सन्दहेह कृतार्थ हो जाते हैं ॥१०२॥जी जनार्दन, जगन्नाथ, पीताम्बर, अच्युत आदि भगवन्नामों का उच्चारण

एकचत्वारिंशोऽध्यायः २६३
जनार्दन जगन्नाथ पीतांबरधराच्युत । इति वाग्युच्चरंतीह न च तेषां कलेर्भयम् ॥१०३॥
संसारे सुलभाः पुंसां पुत्रदारधनादयः । घोरे कलियुगे विप्र हरिभक्तिस्तु दुर्लभा ॥१०४॥
कर्मश्रद्धाविहीना ये पाखंडा वेदनिंदकाः । अधर्मनिरता नैव नरकार्द्धा हरिस्मृतेः ॥१०५॥
वेदमार्गबहिष्ठानां जनानां पापकर्मणाम् । मनः शुद्धिविहीनानां हरिनाम्रैव निष्कृतिः ॥१०६॥
दैवाधीनं जगत्सर्वमिदं स्थावरजंगमम् । यथाप्रेरितमेतेन तथैव कुरुते द्विज ॥१०७॥
शक्तितः सर्वकर्माणि वेदोक्तानि विधाय च । समर्पयेन्महाविष्णौ नारायणपरायणः ॥१०८॥
समर्पितानि कर्माणि महाविष्णौ परात्मनि । संपूर्णतां प्रयांत्येव हरिस्मरणमात्रतः ॥१०८॥
हरिभक्तिरतानां च पापबंधो न जायते । अतोऽतिदुर्लभा लोके हरिभक्तिर्दुरात्मनाम् ॥११०॥
अहो हरिपरा ये तु कलौ घोरे भयंकरे । ते सुभाग्या महात्मानः सत्संगरहिता अपि ॥१११॥
हरिस्मरणनिष्ठानां शिवनामरतात्मनाम् । सत्यं समस्तकर्माणि यांति संपूर्णतां द्विज ॥११२॥
अहो भाग्यमहो भाग्यं हरिनामरतात्मनाम् । त्रिदशैरपि ते पूज्याः किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥११३॥
तस्मात्समस्तलोकानां हितमेव मयोच्यते । हरिनामपरान्मर्त्यान्न कलिर्बाधते क्वचित् ॥११४॥
हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥११५॥
सूत उवाच
एवं स नारदो विप्राः सनकेन प्रबोधितः । परां निवृतिमापन्नः पुनरेतदुवाच ह ॥११६॥
करते हैं उनको किसी प्रकार का कलि से भय नहीं होता ॥१०३॥ संसार में पुत्र, स्त्री और धन आदि पाना
सुलभ है परन्तु विप्र ! इस घोर कलियुग में हरिभक्ति दुर्लभ वस्तु है ॥१०४॥ जो कर्म और श्रद्धा से हीन हैं,
अधार्मिक, पाखण्डी और वेद-निन्दक हैं, वे भी हरि-स्मरण के कारण नरक से बच जाते हैं ॥१०५॥ वेदमार्ग-
विरोधी, पाप करने वाले और कलुषित हृदय वाले मनुष्य का भी हरिनाम के द्वारा प्रायश्चित्त हो जाता है
॥१०६॥ यह सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् दैव के अधीन है और जैसी उसकी प्रेरणा होती है वैसा कार्य मनुष्य
करता है ॥१०७॥ इसलिए शक्ति के अनुसार वेदोक्त विधि से सब कार्यों को करके नारायणपरायण होकर
महाविष्णु को समर्पण कर देना चाहिए ॥१०८॥ इस विधि से महाविष्णु को समर्पण करने पर केवल हरि-
स्मरण मात्र से सारी न्यूनतायें पूरी हो जाती हैं ॥१०९॥ हरिभक्ति में लीन रहने वाले लोगों को पाप का बन्धन
नहीं लगता । अतएव दुष्टों के लिए इस संसार में हरि-भक्ति अत्यन्त दुर्भभ है ॥११०॥ घोर भयंकर कलियुग में
जो व्यक्ति हरि-सेवा-परायण रहते हैं वे महात्मा सौभाग्यशाली हैं चाहे उनको सत्संगति प्राप्त हो या न हो
॥१११॥ द्विज ! हरिस्मरण में लगे रहने वाले और शिवनाम का जप करने वाले मनुष्यों के समस्त कर्म अवश्य
पूर्ण हो जाते हैं ॥११२॥
हरिनाम में रत रहने वाले सज्जनों के भाग्य की कितनी सराहना की जाय, वे जब देवों के भी पूज्य
हैं तब इस विषय में अधिक क्या कहा जाय ॥११३॥ इसलिए मैं सब के हित को ही बात कह रहा हूँ कि हरिनाम
प्रेमियों को कलि की बाधा कभी भी नहीं सता सकती ॥११४॥ मेरा तो हरिनाम ही जीवन है, हरिनाम ही
सर्वस्व और एक मात्र आधार है, कलि में इसके अतिरिक्त दूसरी कोई गति (आधार) नहीं, यह ध्रुव सत्य है
॥११५॥
सूत बोले- विप्रगण ! सनकजी ने इस प्रकार नारद को उपदेश दिया जिससे वे परमानन्दमग्न हो गए
और फिर बोले-॥११६॥

२६४ नारदीयपुराणम्
नारद उवाच
भगवन्सर्वशास्त्रज्ञ त्वयातिकरुणात्मना । प्रकाशितं जगज्ज्योतिः परं ब्रह्म सनातनम् ॥११७॥
एतदेव परं पुण्यमेतदेव परं तपः। यः स्मरेत्पुंडरीकाक्षं सर्वपापविनाशनम् ॥११८॥
ब्रह्मन्नानाजगच्चैतदेकचित्संप्रकाशितम् । त्वयोक्तं तत्प्रतीयेऽहं कथं दृष्टांतमंतरा ॥११९॥
तस्माद्येन यथा ब्रह्म प्रतीत बोधितेन तु । तदाख्याहि यथाचित्तं सीदत्स्थितिमवाप्नुयात् ॥१२०॥
एतच्छ्रुत्वा वचो विप्रा नारदस्य महात्मनः । सनकः प्रत्युवाचेदं स्मरन्नारायणं परम् ॥१२१॥
सनक उवाच
ब्रह्मन्नहं ध्यानपरो भवेयं सनंदनं पृच्छ यथाभिलाषम् । ॥१२२॥
वेदांतशास्त्रे कुशलस्तवायं निवर्त्तयेद्वा परमार्थवंद्यः ॥१२३॥
इतोरितं समाकर्ण्य सनकस्य स नारद। सनंदनं मोक्षधर्मान्प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥१२३॥
श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे नाममाहात्म्यन्नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१॥
नारद बोले- भगवन् ! सर्वशास्त्रज्ञ ! आपने करुणा से द्रवित होकर पर ब्रह्म सनातन ज्योति प्रकाशित
कर दी ॥११७॥ जो सब पापों को दूर करने वाले पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करता है। यही परम पुण्य है और
यही परमतप है ॥११८॥ ब्रह्मन् ! यह नानारूप में प्रतिभासित होने वाला जगत् केवल एक परम ज्योति से ही
प्रकाशित होता है इस तथ्य को बिना उदाहरण के मैं कैसे हृदयंगम कर सकता हूँ ॥११९॥ इसलिए जिस ज्ञानी
ने जिस रूप से ब्रह्म का साक्षात्कार किया उसको कहिए जिससे कि मेरा भ्रान्त चित्त शान्ति प्राप्त करे ॥१२०॥
विप्रो ! महात्मा नारद की इन बातों को सुनकर सनक ने परम नारायण का स्मरण करते हुए बोले-
॥१२१॥
सनक बोले--ब्रह्मन् ! इस समय मैं ध्यानस्थ हो रहा हूँ, तुम सनन्दन से अपनी इच्छा के अनुसार पूछो।
यह वेदान्तशास्त्र में कुशल और वन्दनीय है, यह निश्चित ही तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति कर देगा। वे नारद जी
सनक की इन बातों को सुनकर सनन्दन से मोक्ष धर्म पूछने के लिए प्रस्तुत हुए ॥१२२-१२३॥
श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णु-नाम-माहात्म्य-वर्णन नामक
इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४१॥

अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीनारद उवाच
कुतः सृष्टमिदं ब्रह्मञ्जगत्स्थावरजंगमम् । प्रलये च कमभ्येति तन्मे ब्रूहि सनन्दन ॥१॥
ससागरः सगगनः सशैलः सबलाहकः । सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽयं केन निर्मितः ॥२॥
कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तयः । शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मविधिः कथम् ॥३॥
कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छंति ये मृताः । अस्माल्लोकादमुं लोकं सर्वं शंसतु मे भवान् ॥४॥
सनंदन उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि चेतिहासं पुरातनम् । भृगुणाभिहितं शास्त्रं भरद्वाजाय पृच्छते ॥५॥
कैलासशिखरे दृष्ट्वा दीप्यमानं महौजसम् । भृगुं महर्षिमासीनं भरद्वाजोऽन्वपृच्छत ॥६॥
भरद्वाज उवाच
कथं जीवो विचरति नानायोनिषु संततम् । कथं मुक्तिश्च संसाराज्जायते तस्य मानद ॥७॥
यश्च नारायणः स्रष्टा स्वयंभूर्भगवान्स्वयम् । सेव्यसेवकभावेन वर्तेते इति तौ सदा ॥८॥
प्रविशंति लये सर्वे यमीशं सचराचराः । लोकानां रमणः सोऽयं निर्गुणश्च निरंजनः ॥६॥
अनिर्देश्योऽप्रतर्क्यश्च कथं ज्ञायेत कैर्मुने । कथमेनं परात्मानं कालशक्तिदुरत्ययम् ॥१०॥
अध्याय ४२
सृष्टि-वर्णन
श्रीनारद बोले- ब्रह्मन् ! इस स्थावर जंगममय जगत् की उत्पत्ति किससे हुई और प्रलय में फिर किस
में इसका लय होगा, इसको हे सनन्दन ! कृपाकर कहिए ॥१॥ सागर, आकाश, पर्वत, मेघ, पृथ्वी, अग्नि और
वायु सहित इस विश्व की रचना किसने की ॥२॥ प्राणियों की सृष्टि कैसे हुई, वर्णव्यवस्था कैसे हुई, उनमें धर्म-
अधर्म शौचाशौच की विधियां कैसे प्रचलित हुई ॥३॥ जीवित जीवों के प्राण का स्वरूप क्या है, इन सब बातों
को पूर्ण रूप से आप मुझसे कहिए ॥४॥
सनन्दन बोले-नारद ! सुनो, इस विषय में एक पुरातन इतिहास को कह रहा हूँ, जिसको भरद्वाज के
पूछने पर भृगु ने कहा था ॥५॥ कैलास शिखर पर महातेजस्वी ज्योति के समान जगमगाते हुये भृगु मुनि को
बैठे देखकर भरद्वाज ने पूछा ॥६॥
भरद्वाज बोले- मानद ! जीव किस प्रकार और क्यों सदा नाना योनियों में चक्कर लगाता है, इस
संसार से उसकी मुक्ति कैसे होती है ? ॥७॥ जो नारायण और स्रष्टा भगवान् स्वयंभू हैं वे और जीव सर्वदा
सेव्य-सेवक भाव से विराजमान रहते हैं। जिनमें समस्त चर-अचर प्रलयकाल में प्रवेश कर जाते हैं, जो स्वयं
लोक में रमण करने वाले, निर्गुण और निरंजन हैं, जो अनिर्देश्य और तर्क से अगम्य हैं, उनको कोई कैसे जान
सकता है ? ॥८-९३॥ महान् आत्मा, और शक्ति से परे, अगम्य चरित भगवान् की स्तुति वेद कैसे आदरपूर्वक करते
३४-ना० पु०