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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 270

अथ चत्वारिंशोऽध्यायः
सनक उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि विभूतिं वैष्णवीं मुने । यां शृण्वतां कीर्तयतां सद्यः पापक्षयो भवेत् ॥१॥
वैवस्ततेऽन्तरे पूर्वं शक्रस्य च बृहस्पतेः । संवादः सुमहानासीत्तं वक्ष्यामि निशामय ॥२॥
एकदा सर्वभोगाढ्यो विबुधैः परिवारितः । अप्सरोगणसंकीर्णो बृहस्पतिमभाषत ॥३॥
इन्द्र उवाच
बृहस्पते महाभाग सर्वतत्त्वार्थकोविद । अतीतब्रह्मणः कल्पे सृष्टिः कीदृग्विधा प्रभो ॥४॥
इन्द्रस्तु कीदृशः प्रोक्तो विबुधाः कीदृशाः स्मृताः । तेषां च कीदृशं कर्म यथावद्वक्तुमर्हसि ॥५॥
बृहस्पतिरुवाच
न ज्ञायते मया शक्र पूर्वद्युश्चरितं विधेः । वर्तमानदिनस्यापि दुर्ज्ञेयं प्रतिभाति मे ॥६॥
मनवः समतीताश्च तान्वक्तुमपि न क्षमः । यो विजानाति तं तेऽद्य कथयामि निशामय ॥७॥
सुधर्म इति विख्यातः कश्चिदास्ते पुरे तव । भुञ्जानो दिव्यभोगांश्च ब्रह्मलोकादिहागतः ॥८॥
स वा एतद्विजानाति कथयामि निशामय । एवमुक्तस्तु गुरुणा शक्रस्तेन समन्वितः ॥६॥
देवतागणसंकीर्णः सुधर्मनिलयं ययौ ॥१०॥
अध्याय ४०
विष्णुमाहात्म्य-वर्णन
सनक बोले—मुनिवर ! अब इसके बाद वैष्णवी विभूति का वर्णन कर रहा हूँ, जिसके सुनने और कीर्तन
करने से सद्यः पापक्षय हो जाता है ॥१॥ प्राचीन काल में वैवस्वत मन्वन्तर में इन्द्र और बृहस्पति के बीच जो
महत्त्वपूर्ण वार्तालाप हुआ उसी को दोहरा रहा हूँ, सुनो ॥२॥ एक दिन इन्द्र सब भोग-सामग्री से परिपूर्ण
इन्द्रपुरी में देवताओं के मध्य बैठे हुए थे । अप्सराओं से देवसभा भरी हुई थी । उन्होंने बृहस्पति से पूछा ॥३॥
इन्द्र बोले—बृहस्पते ! महाभाग ! सब तत्त्वों के जानने वाले ! अतीत ब्रह्म कल्प में सृष्टि किस प्रकार की
थी ? इन्द्र कौन और कैसे थे ? देवगण कैसे थे ? और उनके कर्त्तव्य कैसे थे ? इसको भली-भाँति कहिए ॥४-५॥
बृहस्पति बोले—शक्र ! विधि के पूर्वकालीन चरित्र का ज्ञान मुझे नहीं है । यही नहीं, वर्त्तमान कल्प
की बातें भी कठिनता से जानी जा सकती हैं । जो मनु बीत गए उनकी चर्चा करने में मैं समर्थ नहीं हूँ । जो
इस विषय को जानता है, उसे मैं बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो ॥६-७॥
तुम्हारे इसी देवपुर में सुधर्म नामक देवता है । वह ब्रह्मलोक से दिव्य सुखों को भोगने के बाद यहाँ आया
है । वही इन बातों को भली-भाँति जानता है । गुरुदेव की बातों को सुनकर इन्द्र गुरुदेव और देवताओं को साथ