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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

६५- भद्रतीर्थ, पतत्रितीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा

* भद्रतीर्थ, पतत्रितीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा *२५५

राजन्! मैं तुम्हारे प्रसादसे भगवान्‌का दर्शन करते ही स्वर्गलोकको चला जाऊँगा।'

पक्षीके यों कहनेपर राजा पवमानने उसे उठा लिया और ले जाकर उसे गौतमी गङ्गा तथा भगवान् गदाधरका दर्शन कराया। चिच्चिकने स्नान करके त्रैलोक्यपावनी गङ्गासे कहा—'माता गौतमी! तुम तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली हो। मनुष्य जबतक तुम्हारा दर्शन नहीं करता, तभीतक इस लोक और परलोकमें पातकी कहलाता है। यद्यपि मैंने सब प्रकारके पाप किये हैं तो भी अब तुम्हारी शरणमें आया हूँ। मेरा उद्धार करो। तुम भगवान् विष्णुके चरणकमलोंसे निकली हो। संसारके प्राणियोंकी तुम्हारे सिवा कहीं कोई भी गति नहीं है।'

पक्षीका अन्तःकरण श्रद्धासे शुद्ध हो गया था। उसने एकमात्र गङ्गाकी शरण ली और 'गङ्गे! मेरी रक्षा करो' इस प्रकार कहते हुए स्नान किया। तदनन्तर भगवान् गदाधरको प्रणाम करके राजा पवमानसे विदा ले पर्वतनिवासियोंके देखते-देखते वह स्वर्गमें चला गया। पवमान भी अपनी सेनाके साथ अपने नगरको लौट गये। तबसे वेदवेत्ता विद्वानोंने उस तीर्थका नाम पावमानतीर्थ, चिच्चिकतीर्थ और गदाधरतीर्थ रख दिया। उस तीर्थमें किया हुआ पुण्यकर्म कोटि-कोटिगुना हो जाता है।

भद्रतीर्थ, पतत्रितीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं— भद्रतीर्थ सब प्रकारके अनिष्टोंका निवारण करनेवाला है। वह समस्त पापोंका नाशक तथा परम शान्तिदायक है। विश्वकर्माकी पुत्री उषा भगवान् सूर्यकी पतिव्रता एवं प्रिया भार्या हैं। छाया भी उनकी ही भार्या हैं। छायाके पुत्र शनैश्चर हैं। शनैश्चरकी बहिन विष्टि हुई। उसकी आकृति भयानक थी। वह पापमयी थी। भगवान् सूर्यने सोचा—'यह कन्या किसको दूँ?' वे जिस-जिसको कन्या देना चाहते, वही-वही उसकी भयंकरताका समाचार सुनकर उसे लेना अस्वीकार कर देता और कहता—'ऐसी भार्या लेकर हम क्या करेंगे।' ऐसी अवस्थामें विष्टिने दुःखी होकर अपने पितासे कहा—'पिताजी! धनवान्, विद्वान्, तरुण, कुलीन, यशस्वी, उदार और सनाथ वरको कन्या देनी चाहिये।^१ जो पिता इसके विपरीत आचरण करता है, वह नरकमें पड़ता है। सूर्यदेव! कन्या विद्वानोंके लिये भी धर्मका साधन है। एक ओर पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वी और दूसरी ओर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत नीरोग कन्या—दोनों एक समान हैं। उस कन्याके दानसे पृथ्वीदानका फल होता है। जो कन्या, अश्व, गौ और तिलकी बिक्री करता है, उसका रौरव आदि नरकोंसे कभी छुटकारा नहीं होता। कन्याके विवाहमें कभी विलम्ब नहीं करना चाहिये। उसमें विलम्ब करनेपर पिताको जो पाप होता है, उसका वर्णन कौन कर सकता है।^२ कन्याके पिता जो उसके लिये दान-पूजन आदि करते हैं, वही सफल


१- श्रीमते विदुषे यूने कुलीनाय यशस्विने। उदाराय सनाथाय कन्या देया वराय वै॥
(१६५।८)
२- एकतः पृथिवी कृत्स्ना सशैलवनकानना।
स्वलंकृतोपाधिहीना सुकन्या चैकतः स्मृता। विक्रीणीते यश्च कन्यामश्वं वा गां तिलान्यपि॥

९०- विष्टि और विश्वरूपका विवाह

२५६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


समझना चाहिये। कन्याओंको जो कुछ दिया जाता है, उसका पुण्य अक्षय होता है।'*

कन्याके यों कहनेपर भगवान् सूर्य बोले—'बेटी! मैं क्या करूँ। तुम्हारी आकृति भयंकर है, इसलिये कोई तुम्हें ग्रहण नहीं करता। स्त्री और पुरुषके विवाह-सम्बन्धमें लोग एक-दूसरेके कुल, रूप, वय, धन, विद्या, सदाचार और सुशीलता आदि देखा करते हैं। मेरे यहाँ सब कुछ है, केवल तुममें गुणोंका अभाव है। क्या करूँ, कहाँ तुम्हारा विवाह करूँ? यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि जिस किसीके साथ विवाह कर दिया जाय तो तुम अपनी स्वीकृति दो। मैं आज ही तुम्हारा विवाह किये देता हूँ।' यह सुनकर विष्टिने अपने पितासे कहा—'पति, पुत्र, धन, सुख, आयु, रूप और परस्पर प्रेम—ये पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार प्राप्त होते हैं। जीव पहले जन्ममें जो बुरा-भला कर्म किये रहता है, उसके अनुकूल ही दूसरे जन्ममें उसे फल मिलता है; अतः पिताको तो उचित है कि वह अपने दोषसे मुक्त हो जाय—कन्याका कहीं योग्य वरके साथ विवाह कर दे। फल तो उसे पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार ही मिलेगा। पिता अपने वंशकी मर्यादाके अनुसार कन्याका दान और विवाह-सम्बन्ध करता है। शेष बातें जो प्रारब्धमें होती हैं, वे मिल जाती हैं।'

कन्याका यह कथन सुनकर भगवान् सूर्यने अपनी लोकभयंकारी भीषण कन्या विष्टिका विवाह विश्वकर्माके पुत्र विश्वरूपसे कर दिया। विश्वरूप भी वैसे ही भयंकर आकारवाले थे। उन दोनोंके शील और रूपमें समानता थी, अतः सदा आपसमें प्रेम बना रहता था। उस दम्पतिसे गण्ड, अतिगण्ड, रक्ताक्ष, क्रोधन, व्यय और दुर्मुख नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इन सबसे छोटा एक पुत्र और हुआ, जिसका नाम हर्षण था। वह पुण्यात्मा, सुशील, सुन्दर, शान्त, शुद्धचित्त तथा बाहर-भीतरसे पवित्र था। एक दिन वह अपने मामाको देखनेके लिये यमराजके घर आया। वहाँ उसने बहुत-से ऐसे जीव देखे, जो स्वर्गकी ही भाँति सुखी थे और बहुतेरे दुःखी भी दिखायी दिये। हर्षणने सनातन धर्मस्वरूप अपने मामाको प्रणाम करके पूछा—'तात! ये कौन सुखी हैं और कौन नरकमें कष्ट भोगते हैं?'

उसके इस प्रकार पूछनेपर धर्मराजने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। उन्होंने कर्मोंकी सम्पूर्ण


न तस्य रौरवादिभ्यः कदाचिन्निष्कृतिर्भवेत्। विवाहातिक्रमः कार्यो न कन्यायाः कदाचन॥
तस्मिन् कृते यत्पितुः स्यात्पापं तत्केन कथ्यते॥ (१६५। १०–१३)
* यत्कन्यायाः पिता कुर्याद् दानं पूजनमीक्षणम्॥
यत्कृतं तत्कृतं विद्यात्तासु दत्तं तदक्षयम्। (१६५। १५–१६)

  • भद्रतीर्थ, पतत्रितीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा * २५७

गतियोंका पूर्णरूपसे निरूपण किया। वे बोले—'जो मनुष्य विहित कर्मका कभी उल्लङ्घन नहीं करते, उन्हें नरक नहीं देखना पड़ता। जो शास्त्र और शास्त्रीय सदाचारको नहीं मानते, बहुश्रुत विद्वानोंका आदर नहीं करते और विहित कर्मोंका उल्लङ्घन करते हैं, वे मनुष्य नरकगामी होते हैं।* धर्मराजका यह वचन सुनकर हर्षणने पुनः कहा—'सुरश्रेष्ठ! मेरे पिता विश्वरूप बड़े भयंकर हैं। मेरी माता विष्टि भी भयानक ही हैं। मेरे महाबली भ्राता भी वैसे ही हैं। जिस उपायसे उन लोगोंकी बुद्धि शान्त हो, वे सुरूप, निर्दोष और मङ्गलदायक हो जायँ, वह मुझे बताइये। मैं उसे करूँगा, अन्यथा मैं उनके पास लौटकर नहीं जाऊँगा।' हर्षणके यों कहनेपर धर्मराजने उस शुद्ध बुद्धिवाले बालकसे कहा—'हर्षण! तुम वास्तवमें हर्षण ही हो। पुत्र तो बहुत-से होते हैं, किंतु वे सभी कुलका विस्तार करनेवाले नहीं होते। एक ही कोई ऐसा पुत्र होता है, जो समूचे कुलको धारण करता है। जो कुलका आधारभूत, पिता-माताका प्रियकारक और पूर्वजोंका उद्धार करनेवाला है, वही वास्तवमें पुत्र है; अन्य जितने हैं, वे रोग हैं। हर्षण! तुमने मेरे मनके अनुकूल बात कही है। यह तुम्हारे नाना भगवान् सूर्यको भी पसंद आयेगी। अतः तुम गौतमी-तटपर जाओ और वहाँ स्नान करके मनको वशमें रखते हुए प्रसन्नचित्तसे जगद्योनि शान्तस्वरूप भगवान् विष्णुकी स्तुति करो। वे यदि प्रसन्न हो जायँ तो तुम्हारे समस्त मनोरथोंको पूर्ण कर देंगे।'

यह सुनकर हर्षण गौतमी-तटपर गया और स्नान आदिसे पवित्र हो देवेश्वर भगवान् विष्णुकी स्तुति करने लगा। इससे प्रसन्न होकर श्रीहरिने हर्षणको वरदान दिया—'तुम्हारे कुलका कल्याण हो। समस्त अभद्रों (अमङ्गलों)-की शान्ति होकर भद्र (मङ्गल)-का विस्तार हो।' 'भद्रम् अस्तु' कहनेसे हर्षणके पिता भद्र कहलाये और माता विष्टिका नाम भद्रा हुआ। तबसे वह स्थान भद्रतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह सब प्रकारसे मङ्गलदायक तथा तीर्थसेवी पुरुषोंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। वहाँ भद्रपतिके नामसे प्रसिद्ध होकर साक्षात् देवाधिदेव भगवान् जनार्दन श्रीहरि निवास करते हैं, जो मङ्गलके एकमात्र भण्डार हैं।

पतत्रितीर्थ रोगों तथा पापोंका नाश करनेवाला है। उसके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। कश्यपके दो पुत्र हुए—अरुण और गरुड़। उनके कुलमें पक्षियोंमें श्रेष्ठ सम्पाति उत्पन्न हुए। सम्पातिके छोटे भाईका नाम जटायु था। वे दोनों अपने बलसे उन्मत्त और एक-दूसरेसे लाग-डाँट रखनेवाले थे। एक दिन वे दोनों भगवान् सूर्यको नमस्कार करनेके लिये आकाशमें गये। ज्यों ही सूर्यके समीप पहुँचे, दोनोंके पंख जल गये और दोनों थककर पर्वतके शिखरपर गिर पड़े। दोनों भाइयोंको निश्चेष्ट एवं अचेत होकर गिरा देख अरुण उनके दुःखसे दुःखी हो गये और भगवान् सूर्यसे बोले—'भगवन्! ये दोनों पक्षी पृथ्वीपर गिर पड़े हैं। इन्हें आश्वासन दें, जिससे इनकी मृत्यु न हो।' 'तथास्तु' कहकर सूर्यने उनको जीवित कर दिया। गरुड़ भी उनकी अवस्था सुनकर भगवान् विष्णुके साथ वहाँ आये और उन्हें सान्त्वना देकर सुख पहुँचाया। तदनन्तर सब लोग अपने संतापका निवारण करनेके लिये गङ्गातटपर गये। जटायु, अरुण, सम्पाति, गरुड़, सूर्य तथा भगवान् विष्णु—सबने उस प्रचुर


* न मानयन्ति ये शास्त्रं नाचारं न बहुश्रुतान्। विहितातिक्रमं कुर्युर्ये ते नरकगामिनः॥
(१६५।३६)

९१- राक्षसीका आसन्दिवको गङ्गातटपर संध्योपासनके लिये भेजना

२५८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

पुण्यदायक तीर्थमें प्रवेश किया। तबसे वह तीर्थ पतत्रितीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह विषका नाशक तथा सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। साक्षात् सूर्य तथा विष्णु गरुड़ और अरुणके साथ वहाँ गौतमी-तटपर रहते हैं। भगवान् शिवका भी उस तीर्थमें निवास है। इन तीनों देवताओंकी उपस्थितिसे वह तीर्थ बहुत उत्तम हो गया है। जो वहाँ स्नान करके पवित्र हो उन देवताओंको नमस्कार करता है, वह आधि-व्याधिसे मुक्त हो परम सौख्यका भागी होता है।

गौतमीके तटपर विप्रतीर्थ भी बहुत विख्यात है। उसे नारायणतीर्थ भी कहते हैं। उसका उपाख्यान आश्चर्यमें डालनेवाला है। अन्तर्वेदी (गङ्गा-यमुनाके बीचके भूभाग)-में एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। उनके कई पुत्र हुए, जो बड़े विद्वान्, गुणवान्, रूपवान् और दयालु थे। उनमें जो सबसे छोटे भाई थे, वे अनेक गुणोंसे सम्पन्न, शान्त, सर्वज्ञ और परम बुद्धिमान् थे। उनका नाम आसन्दिव था। आसन्दिवके पिता उनका विवाह करनेके लिये प्रयत्नशील थे। इसी बीचमें एक दिन रातको ब्राह्मण-कुमार आसन्दिव सोये हुए थे। उस दिन उन्होंने भगवान् विष्णुका स्मरण नहीं किया था। वे उत्तर ओर सिरहाना करके सोये थे और उनका चित्त एकाग्र नहीं था; इसलिये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एक क्रूर राक्षसी वहाँ आयी और आसन्दिवको उठाकर तुरंत गौतमीके दक्षिण-तटपर चली गयी। वह उस ब्राह्मणके साथ इच्छानुसार रूप धारण करके गोदावरीके दक्षिण किनारेकी भूमिपर विचरती रहती थे। उसके शरीरमें बुढ़ापा आ गया था। एक दिन उस भयानक राक्षसीने ब्राह्मणसे कहा—'विप्रवर ! ये गङ्गाजी हैं। तुम अन्य ब्राह्मणोंके साथ मिलकर यहाँ संध्योपासन करो। जो ब्राह्मण

समयपर यत्नपूर्वक संध्योपासन नहीं करते, वे ही देवेश्वरोंद्वारा नीच बताये गये हैं। वे चाण्डालोंसे भी बढ़कर हैं। तुम यहाँ सब लोगोंसे मुझको अपनी जन्मदायिनी माता बतलाना, नहीं तो अभी तुम्हारा नाश हो जायगा। द्विजश्रेष्ठ ! यदि मेरी बात मानते रहोगे तो मैं तुम्हें सुख दूँगी और तुम्हारा जो प्रिय कार्य होगा, उसे भी पूर्ण करूँगी। कुछ कालके बाद फिर मैं तुम्हें तुम्हारे देशमें, तुम्हारे घरमें और तुम्हारे गुरुजनोंके पास पहुँचा दूँगी। यह मैं सत्य कहती हूँ।' ब्राह्मणने पूछा—'तुम कौन हो?' कामरूपिणी राक्षसीने कहा—'मेरा नाम कङ्कालिनी है। मैं संसारमें प्रसिद्ध हूँ।' परिचय पाकर मुनिकुमार आसन्दिवका चित्त भयसे व्याकुल हो उठा, परंतु राक्षसीने अनेक प्रकारकी शपथ खाकर उन्हें अपना विश्वास दिलाया। तब ब्राह्मणने कहा—'तुमने जो कुछ कहा है, मैं वैसा ही करूँगा। तुम्हें जो प्रिय लगेगा, वही बात बोलूँगा और वही कार्य करूँगा।'

९२- भगवान् विष्णुके द्वारा आसन्दिव और उनकी पत्नीकी रक्षा

* भद्रतीर्थ, पतत्रीतीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा * २५९

ब्राह्मणकी बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसीने बुड्डी होनेपर भी मनोहर रूप धारण किया और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो ब्राह्मणको अपने साथ ले इधर-उधर घूमने लगी। वह सर्वत्र यही कहती कि 'यह मेरा पुत्र गुणाकर है।' ब्राह्मणकुमार रूप, सौभाग्य, वय और विद्यासे विभूषित थे और यह वृद्धा भी गुणवती दिखायी देती थी; अतः सब लोग उसे ब्राह्मणकी माता ही समझते थे। वहाँ किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणने वस्त्राभूषणोंसे विभूषित अपनी सुन्दरी कन्या उस राक्षसीको आगे करके आसन्दिवको ब्याह दी। ऐसे सुयोग्य पतिको पाकर कन्याने अपनेको कृतार्थ माना। किंतु वे ब्राह्मण अपनी गुणवती पत्नीको देखकर बहुत दुःखी हुए। उन्होंने मन-ही-मन सोचा—'यह पापिनी राक्षसी एक दिन मुझे खा ही जायगी। क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? अथवा किससे यह बात कहूँ? मैं भारी संकटमें पड़ा हूँ। कौन यहाँ मेरी रक्षा करेगा? मेरी यह कल्याणमयी पत्नी गुणवती, रूपवती और नयी अवस्थाकी है। इसे भी वह राक्षसी अकस्मात् अपना आहार बना लेगी।'

इसी बीचमें वह बुढ़िया कहीं चली गयी। उस समय अपने पतिको दुःखित जानकर ब्राह्मणकी पतिव्रता पत्नीने एकान्तमें विनीत भावसे पूछा—'नाथ! आप क्यों कष्टमें पड़े हैं? ठीक-ठीक बताइये।' 'ब्राह्मणने सब बातें विस्तारके साथ बता दीं। प्रिय मित्र और कुलीन पत्नीसे कौन-सी बात अकथनीय है। पतिकी बात सुनकर स्त्रीने कहा—'प्राणनाथ! जिसका मन अपने वशमें नहीं है, उसको तो सब ओर भय है। वह घरमें भी निर्भय नहीं है। परंतु जिन्होंने अपने आत्मापर अधिकार प्राप्त कर लिया है, उन्हें किससे भय है? वह भी गौतमी-तटपर, जहाँ कितने ही वैष्णव, विरक्त और विवेकी पुरुष निवास करते हैं। यहाँ स्नान करके पवित्र हो भगवान् नारायणकी स्तुति कीजिये।' यह सुनकर ब्राह्मणने गङ्गामें स्नान किया और गौतमीके तटपर भगवान् नारायणका स्तवन आरम्भ किया—'नाथ ! आप इस जगत्‌के अन्तरात्मा हैं। मुकुन्द! आप ही इसकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। अनाथबन्धु नृसिंह! आप ही सबके पालक हैं। मुझ दीनकी रक्षा क्यों नहीं करते?' यह प्रार्थना सुनकर संसारका शोक दूर करनेवाले भगवान् नारायणने सहस्र अरोंवाले तेजोमय सुदर्शनचक्रसे उस पापिनी राक्षसीको मार डाला और उस ब्राह्मणको अभीष्ट वरदान दे उसे माता-पिताके पास पहुँचा दिया। तबसे वह स्थान विप्रतीर्थ और नारायणतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ स्नान, दान और पूजा आदि करनेसे मनोवाञ्छित फलकी सिद्धि होती है।