संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१- मुनियोंका सूतजीसे प्रश्न
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
मुनि बोले— साधुशिरोमणे! आप पुराण, तन्त्र, छहों शास्त्र, इतिहास तथा देवताओं और दैत्योंके जन्म-कर्म एवं चरित्र—सब जानते हैं। वेद, शास्त्र, पुराण, महाभारत तथा मोक्षशास्त्रमें कोई भी बात ऐसी नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो।
महामते! आप सर्वज्ञ हैं, अतः हम आपसे कुछ प्रश्नोंका उत्तर सुनना चाहते हैं; बताइये, यह समस्त जगत् कैसे उत्पन्न हुआ? भविष्यमें इसकी क्या दशा होगी? स्थावर-जङ्ग्मरूप संसार सृष्टिसे पहले कहाँ लीन था और फिर कहाँ लीन होगा?
लोमहर्षणजीने कहा— जो निर्विकार, शुद्ध, नित्य, परमात्मा, सदा एकरूप और सर्वविजयी हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपसे जगत्की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करनेवाले हैं तथा जो भक्तोंको संसार-सागरसे तारनेवाले हैं, उन भगवान्को प्रणाम है। जो एक होकर भी अनेक रूप धारण करते हैं, स्थूल और सूक्ष्म सब जिनके ही स्वरूप हैं, जो अव्यक्त (कारण) और व्यक्त (कार्य)-रूप तथा मोक्षके हेतु हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले हैं, जरा और मृत्यु जिनका स्पर्श नहीं करतीं, जो सबके मूल कारण हैं, उन परमात्मा विष्णुको नमस्कार है। जो इस विश्वके आधार हैं, अत्यन्त सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, सब प्राणियोंके भीतर विराजमान हैं, क्षर और अक्षर पुरुषसे उत्तम तथा अविनाशी हैं, उन भगवान् विष्णुको प्रणाम करता हूँ। जो वास्तवमें अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्थोंके रूपमें प्रतीत हो रहे हैं, जो विश्वकी सृष्टि और पालनमें समर्थ एवं उसका संहार करनेवाले हैं, सर्वज्ञ हैं, जगत्के अधीश्वर हैं, जिनके जन्म और विनाश नहीं होते, जो अव्यय, आदि, अत्यन्त सूक्ष्म तथा विश्वेश्वर हैं, उन श्रीहरिको तथा ब्रह्मा आदि देवताओंको मैं प्रणाम करता हूँ। तत्पश्चात् इतिहास-पुराणोंके ज्ञाता, वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ पराशरनन्दन भगवान् व्यासको, जो मेरे गुरुदेव हैं, प्रणाम करके मैं वेदके तुल्य माननीय पुराणका वर्णन करूँगा। पूर्वकालमें दक्ष आदि श्रेष्ठ मुनियोंके पूछनेपर कमलयोनि भगवान् ब्रह्माजीने जो सुनायी थी, वही पापनाशिनी कथा मैं इस समय कहूँगा। मेरी वह कथा बहुत ही विचित्र और अनेक अर्थोंवाली होगी। उसमें श्रुतियोंके अर्थका विस्तार होगा। जो इस कथाको सदा अपने हृदयमें धारण करेगा अथवा निरन्तर सुनेगा, वह अपनी वंश-परम्पराको कायम रखते हुए स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होगा।
जो नित्य, सदसत्स्वरूप तथा कारणभूत अव्यक्त प्रकृति है, उसीको प्रधान कहते हैं। उसीसे पुरुषने इस विश्वका निर्माण किया है। मुनिवरो! अमिततेजस्वी ब्रह्माजीको ही पुरुष समझो। वे समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले तथा भगवान्
२- शतरूपाकी तपस्या
- नैमिषारण्यमें सूतजीका आगमन, पुराणका आरम्भ तथा सृष्टिका वर्णन * ११
नारायणके आश्रित हैं। प्रकृतिसे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे अहङ्कार तथा अहङ्कारसे सब सूक्ष्म भूत उत्पन्न हुए। भूतोंके जो भेद हैं, वे भी उन सूक्ष्म भूतोंसे ही प्रकट हुए हैं। यह सनातन सर्ग है। तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् नारायणने नाना प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छासे सबसे पहले जलकी ही सृष्टि की। फिर जलमें अपनी शक्तिका आधान किया। जलका दूसरा नाम ‘नार’ है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान् नरसे हुई है। वह जल पूर्वकालमें भगवान्का अयन (निवासस्थान) हुआ, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं। भगवान्ने जो जलमें अपनी शक्तिका आधान किया, उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ। उसीमें स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए—ऐसा सुना जाता है। सुवर्णके समान कान्तिमान् भगवान् ब्रह्माने एक वर्षतक उस अण्डमें निवास करके उसके दो टुकड़े कर दिये। फिर एक टुकड़ेसे द्युलोक बनाया और दूसरेसे भूलोक। उन दोनोंके बीचमें आकाश रखा। जलके ऊपर तैरती हुई पृथ्वीको स्थापित किया। फिर दसों दिशाएँ निश्चित कीं। साथ ही काल, मन, वाणी, काम, क्रोध और रतिकी सृष्टि की। इन भावोंके अनुरूप सृष्टि करनेकी इच्छासे ब्रह्माजीने सात प्रजापतियोंको अपने मनसे उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार हैं—मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वसिष्ठ। पुराणोंमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं।
तत्पश्चात् ब्रह्माजीने अपने रोषसे रुद्रको प्रकट किया। फिर पूर्वजोंके भी पूर्वज सनत्कुमारजीको उत्पन्न किया। इन्हीं सात महर्षियोंसे समस्त प्रजा तथा ग्यारह रुद्रोंका प्रादुर्भाव हुआ। उक्त सात महर्षियोंके सात बड़े-बड़े दिव्य वंश हैं, देवता भी इन्हींके अन्तर्गत हैं। उक्त सातों वंशोंके लोग कर्मनिष्ठ एवं संतानवान् हैं। उन वंशोंको बड़े-बड़े ऋषियोंने सुशोभित किया है। इसके बाद ब्रह्माजीने विद्युत्, वज्र, मेघ, रोहित, इन्द्रधनुष, पक्षी तथा मेघोंकी सृष्टि की। फिर यज्ञोंकी सिद्धिके लिये उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद प्रकट किये। तदनन्तर साध्य देवताओंकी उत्पत्ति बतायी जाती है। छोटे-बड़े सभी भूत भगवान् ब्रह्माके अङ्गोंसे उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार प्रजाकी सृष्टि करते रहनेपर भी जब प्रजाकी वृद्धि नहीं हुई, तब प्रजापति अपने शरीरके दो भाग करके आधेसे पुरुष और आधेसे स्त्री हो गये। पुरुषका नाम मनु हुआ। उन्हींके नामपर ‘मन्वन्तर’ काल माना गया है। स्त्री अयोनिजा शतरूपा थी, जो मनुको पत्नीरूपमें प्राप्त हुई। उसने दस हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके परम तेजस्वी पुरुषको पतिरूपमें प्राप्त किया। वे ही पुरुष स्वायम्भुव मनु कहे गये हैं (वैराज पुरुष भी उन्हींका नाम है)। उनका ‘मन्वन्तर-काल’ इकहत्तर चतुर्युगीका बताया जाता है।
२- राजा पृथुका चरित्र
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शतरूपाने वैराज पुरुषके अंशसे वीर, प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र उत्पन्न किये। वीरसे काम्या नामक श्रेष्ठ कन्या उत्पन्न हुई जो कर्दम प्रजापतिकी धर्मपत्नी हुई। काम्याके गर्भसे चार पुत्र हुए—सम्राट्, कुक्षि, विराट् और प्रभु। प्रजापति अत्रिने राजा उत्तानपादको गोद ले लिया। प्रजापति उत्तानपादने अपनी पत्नी सूनृताके गर्भसे ध्रुव, कीर्तिमान्, आयुष्मान् तथा वसु—ये चार पुत्र उत्पन्न किये। ध्रुवसे उनकी पत्नी शम्भुने श्लिष्टि और भव्य—इन दो पुत्रोंको जन्म दिया। श्लिष्टिके उसकी पत्नी सुच्छायाके गर्भसे रिपु, रिपुञ्जय, वीर, वृकल और वृकतेजा—ये पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। रिपुसे बृहतीने चक्षुष् नामके तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया। चक्षुष्के उनकी पत्नी पुष्करिणीसे, जो महात्मा प्रजापति वीरणकी कन्या थी, चाक्षुष् मनु उत्पन्न हुए। चाक्षुष मनुसे वैराज प्रजापतिकी कन्या नड्वलाके गर्भसे दस महाबली पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—कुत्स, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, कवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न तथा अभिमन्यु। पुरुसे आग्नेयीने अङ्ग, सुमना, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरा तथा मय—ये छः पुत्र उत्पन्न किये। अङ्गसे सुनीथाने वेन नामक एक पुत्र पैदा किया। वेनके अत्याचारसे ऋषियोंको बड़ा क्रोध हुआ; अतः प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये उन्होंने उसके दाहिने हाथका मन्थन किया, उससे महाराज पृथु प्रकट हुए। उन्हें देखकर मुनियोंने कहा—'ये महातेजस्वी नरेश प्रजाको प्रसन्न रखेंगे तथा महान् यशके भागी होंगे।' वेनकुमार पृथु धनुष और कवच धारण किये अग्निके समान तेजस्वीरूपमें प्रकट हुए थे। उन्होंने इस पृथ्वीका पालन किया। राजसूय-यज्ञके लिये अभिषिक्त होनेवाले राजाओंमें वे सर्वप्रथम थे। उनसे ही स्तुति-गानमें निपुण सूत और मागध प्रकट हुए। उन्होंने इस पृथ्वीसे सब प्रकारके अनाज दुहे थे। प्रजाकी जीविका चले, इसी उद्देश्यसे उन्होंने देवताओं, ऋषियों, पितरों, दानवों, गन्धर्वों तथा अप्सराओं आदिके साथ पृथ्वीका दोहन किया था।
राजा पृथुका चरित्र
मुनियोंने कहा— लोमहर्षणजी! पृथुके जन्मकी कथा विस्तारपूर्वक कहिये। उन महात्माने इस पृथ्वीका किस प्रकार दोहन किया था?
लोमहर्षणजी बोले— द्विजवरो! मैं वेनकुमार पृथुकी कथा विस्तारके साथ सुनाता हूँ। आप लोग एकाग्रचित्त होकर सुनें। ब्राह्मणो! जो पवित्र नहीं रहता, जिसका हृदय खोटा है, जो अपने शासनमें नहीं है, जो व्रतका पालन नहीं करता तथा जो कृतघ्न और अहितकारी है—ऐसे पुरुषको मैं यह प्रसङ्ग नहीं सुना सकता। यह स्वर्ग देनेवाला, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला, परम धन्य, वेदोंके तुल्य, माननीय तथा गूढ़ रहस्य है। ऋषियोंने जैसा कहा है, वह सब मैं ज्यों-का-त्यों सुना रहा हूँ; सुनो। जो प्रतिदिन ब्राह्मणोंको नमस्कार करके वेनकुमार पृथुके चरित्रका विस्तारपूर्वक कीर्तन करता है, उसे 'अमुक कर्म मैंने किया और अमुक नहीं किया'—इस बातका शोक नहीं होता। पूर्वकालकी बात है, अत्रि-कुलमें उत्पन्न प्रजापति अङ्ग बड़े धर्मात्मा और धर्मके रक्षक थे। वे अत्रिके समान ही तेजस्वी थे। उनका पुत्र वेन था, जो धर्मके तत्त्वको बिलकुल नहीं समझता था। उसका जन्म मृत्युकन्या सुनीथाके गर्भसे हुआ था। अपने नानाके स्वभावदोषके कारण वह धर्मको पीछे रखकर काम और लोभमें
३- वेनके द्वारा महर्षियोंका तिरस्कार
* राजा पृथुका चरित्र * १३
प्रवृत्त हो गया। उसने धर्मकी मर्यादा भङ्ग कर दी और वैदिक धर्मोंका उल्लङ्घन करके वह अधर्ममें तत्पर हो गया। विनाशकाल उपस्थित होनेके कारण उसने यह क्रूर प्रतिज्ञा कर ली थी कि 'किसीको यज्ञ और होम नहीं करने दिया जायगा। यजन करने योग्य, यज्ञ करनेवाला तथा यज्ञ भी मैं ही हूँ। मेरे ही लिये यज्ञ करना चाहिये। मेरे ही उद्देश्यसे हवन होना चाहिये।' इस प्रकार मर्यादाका उल्लङ्घन करके सब कुछ ग्रहण करनेवाले अयोग्य वेनसे मरीचि आदि सब महर्षियोंने कहा—'वेन! हम अनेक वर्षोंके लिये यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करनेवाले हैं। तुम अधर्म न करो। यह यज्ञ आदि कार्य सनातन धर्म है।'
महर्षियोंको यों कहते देख खोटी बुद्धिवाले वेनने हँसकर कहा—'अरे! मेरे सिवा दूसरा कौन धर्मका स्रष्टा है। मैं किसकी बात सुनूँ। विद्या, पराक्रम, तपस्या और सत्यके द्वारा मेरी समानता करनेवाला इस भूतलपर कौन है? मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी और विशेषतः सब धर्मोंकी उत्पत्तिका कारण हूँ। तुम सब लोग मूर्ख और अचेत हो, इसलिये मुझे नहीं जानते। यदि मैं चाहूँ तो इस पृथ्वीको भस्म कर दूँ, जलमें बहा दूँ या भूलोक तथा द्युलोकको भी रूँध डालूँ। इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।'
जब महर्षिगण वेनको मोह और अहङ्कारसे किसी तरह हटा न सके, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। उन महात्माओंने महाबली वेनको पकड़कर बाँध लिया। उस समय वह बहुत उछल-कूद मचा रहा था। महर्षि कुपित तो थे ही, वेनकी बायीं जङ्घाका मन्थन करने लगे। इससे एक काले रंगका पुरुष उत्पन्न हुआ, जो बहुत ही नाटा था। वह भयभीत हो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसे व्याकुल देख अत्रिने कहा—'निषीद (बैठ जा)।' इससे वह निषादवंशका प्रवर्तक हुआ और वेनके पापसे उत्पन्न हुए धीवरोंकी सृष्टि करने लगा। तत्पश्चात् महात्माओंने पुनः अरणीकी भाँति वेनकी दाहिनी भुजाका मन्थन किया। उससे अग्निके
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समान तेजस्वी पृथुका प्रादुर्भाव हुआ। वे भयानक टंकार करनेवाले आजगव नामक धनुष, दिव्य बाण तथा रक्षार्थ कवच धारण किये प्रकट हुए थे। उनके उत्पन्न होनेपर समस्त प्राणी बड़े प्रसन्न हुए और सब ओरसे वहाँ एकत्रित होने लगे। वेन स्वर्गगामी हुआ।
महात्मा पृथु-जैसे सत्पुत्रने उत्पन्न होकर वेनको ‘पुम्’ नामक नरकसे छुड़ा दिया। उनका अभिषेक करनेके लिये समुद्र और सभी नदियाँ रत्न एवं जल लेकर स्वयं ही उपस्थित हुईं। आङ्गिरस देवताओंके साथ भगवान् ब्रह्माजी तथा समस्त चराचर भूतोंने वहाँ आकर राजा पृथुका राज्याभिषेक किया। उन महाराजने सभी प्रजाका मनोरञ्जन किया। उनके पिताने प्रजाको बहुत दुःखी किया था, किन्तु पृथुने उन सबको प्रसन्न कर लिया; प्रजाका मनोरञ्जन करनेके कारण ही उनका नाम राजा हुआ। वे जब समुद्रकी यात्रा करते, तब उसका जल स्थिर हो जाता था। पर्वत उन्हें जानेके लिये मार्ग दे देते थे और उनके रथकी ध्वजा कभी भङ्ग नहीं हुई। उनके राज्यमें पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी। राजाका चिन्तन करनेमात्रसे अन्न सिद्ध हो जाता था। सभी गौएँ कामधेनु बन गयी थीं और पत्तोंके दोने-दोनेमें मधु भरा रहता था। उसी समय पृथुने पैतामह (ब्रह्माजीसे सम्बन्ध रखनेवाला)—यज्ञ किया। उसमें सोमाभिषवके दिन सूति (सोमरस निकालनेकी भूमि)—से परम बुद्धिमान् सूतकी उत्पत्ति हुई। उसी महायज्ञमें विद्वान् मागधका भी प्रादुर्भाव हुआ। उन दोनोंको महर्षियोंने पृथुकी स्तुति करनेके लिये बुलाया और कहा—‘तुमलोग इन महाराजकी स्तुति करो। यह कार्य तुम्हारे अनुरूप है और ये महाराज भी इसके योग्य पात्र हैं।’ यह सुनकर सूत और मागधने उन महर्षियोंसे कहा—‘हम अपने कर्मोंसे देवताओं तथा ऋषियोंको प्रसन्न करते हैं। इन महाराजका नाम, कर्म, लक्षण और यश—कुछ भी हमें ज्ञात नहीं है, जिससे इन तेजस्वी नरेशकी हम स्तुति कर सकें। तब ऋषियोंने कहा—‘भविष्यमें होनेवाले गुणोंका उल्लेख करते हुए स्तुति करो।’ उन्होंने वैसा ही किया। उन्होंने जो-जो कर्म बताये, उन्हींको महाबली पृथुने पीछेसे पूर्ण किया। तभीसे लोकमें सूत, मागध और वन्दीजनोंके द्वारा आशीर्वाद दिलानेकी परिपाटी चल पड़ी। वे दोनों जब स्तुति कर चुके, तब महाराज पृथुने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनूप देशका राज्य सूतको और मगधका मागधको दिया। पृथुको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई प्रजासे महर्षियोंने कहा—‘ये महाराज तुम्हें जीविका प्रदान करनेवाले होंगे।’ यह सुनकर सारी प्रजा महात्मा राजा पृथुकी ओर दौड़ी और बोली—‘आप हमारे लिये जीविकाका प्रबन्ध कर दें।’ जब प्रजाओंने उन्हें इस प्रकार घेरा, तब वे उनका हित करनेकी इच्छासे धनुष-बाण हाथमें ले पृथ्वीकी ओर दौड़े। पृथ्वी उनके भयसे थर्रा उठी और गौका रूप धारण करके भागी। तब पृथुने धनुष लेकर भागती हुई पृथ्वीका पीछा किया। पृथ्वी उनके भयसे ब्रह्मलोक आदि अनेक लोकोंमें गयी, किन्तु सब जगह उसने धनुष लिये हुए पृथुको अपने आगे ही देखा। अग्निके समान प्रज्वलित तीखे बाणोंके कारण उनका तेज और भी उद्दीप्त दिखायी देता था। वे महान् योगी महात्मा देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष प्रतीत होते थे। जब और कहीं रक्षा न हो सकी, तब तीनों लोकोंकी पूजनीया पृथ्वी हाथ जोड़कर फिर महाराज पृथुकी ही शरणमें आयी और इस प्रकार बोली—‘राजन्! सब लोक मेरे ही ऊपर स्थित हैं। मैं ही इस जगत्को धारण करती हूँ। यदि
५- गोरूपधारिणी पृथ्वी और राजा पृथुका वार्तालाप
* राजा पृथुका चरित्र * १५
मेरा नाश हो जाय तो समस्त प्रजा नष्ट हो जायगी। इस बातको अच्छी तरह समझ लेना। भूपाल! यदि तुम प्रजाका कल्याण चाहते हो तो मेरा वध न करो। मैं जो बात कहती हूँ, उसे सुनो; ठीक उपायसे आरम्भ किये हुए सब कार्य सिद्ध होते हैं। तुम उस उपायपर ही दृष्टिपात करो, जिससे इस प्रजाको जीवित रख सकोगे। मेरी हत्या करके भी तुम प्रजाके पालन-पोषणमें समर्थ न होगे। महामते! तुम क्रोध त्याग दो, मैं तुम्हारे अनुकूल हो जाऊँगी। तिर्यग्योनिमें भी स्त्रीको अवध्य बताया गया है; यदि यह बात सत्य है तो तुम्हें धर्मका त्याग नहीं करना चाहिये।'
पृथुने कहा—भद्रे! जो अपने या पराये किसी एकके लिये बहुत-से प्राणियोंका वध करता है, उसे अनन्त पातक लगता है; परन्तु जिस अशुभ व्यक्तिका वध करनेपर बहुत-से लोग सुखी हों, उसको मारनेसे पातक या उपपातक कुछ नहीं लगता। अतः वसुन्धरे! मैं प्रजाका कल्याण करनेके लिये तुम्हारा वध करूँगा। यदि मेरे कहनेसे आज संसारका कल्याण नहीं करोगी तो अपने बाणसे तुम्हारा नाश कर दूँगा और अपनेको ही पृथ्वीरूपमें प्रकट करके स्वयं ही प्रजाको धारण करूँगा; इसलिये तुम मेरी आज्ञा मानकर समस्त प्रजाकी जीवन-रक्षा करो; क्योंकि तुम सबके धारणमें समर्थ हो। इस समय मेरी पुत्री बन जाओ; तभी मैं इस भयङ्कर बाणको, जो तुम्हारे वधके लिये लिये उद्यत है, रोकूँगा।
पृथ्वी बोली—वीर! निःसंदेह मैं यह सब कुछ करूँगी। मेरे लिये कोई बछड़ा देखो, जिसके प्रति स्नेहयुक्त होकर मैं दूध दे सकूँ। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भूपाल! तुम मुझे सब ओर बराबर कर दो,
जिससे मेरा दूध सब ओर बह सके।
तब राजा पृथुने अपने धनुषकी नोकसे लाखों पर्वतोंको उखाड़ा और उन्हें एक स्थानपर एकत्रित किया। इससे पर्वत बढ़ गये। इससे पहलेकी सृष्टिमें भूमि समतल न होनेके कारण पुरों अथवा ग्रामोंका कोई सीमाबद्ध विभाग नहीं हो सका था। उस समय अन्न, गोरक्षा, खेती और व्यापार भी नहीं होते थे। यह सब तो वेन-कुमार पृथुके समयसे ही आरम्भ हुआ है। भूमिका जो-जो भाग समतल था, वहीं-वहींपर समस्त प्रजाने निवास करना पसंद किया। उस समयतक प्रजाका आहार केवल फल-मूल ही था और वह भी बड़ी कठिनाईसे मिलता था। राजा पृथुने स्वायम्भुव मनुको बछड़ा बनाकर अपने हाथमें ही पृथ्वीको दुहा। उन प्रतापी नरेशने पृथ्वीसे सब प्रकारके अन्नोंका दोहन किया। उसी अन्नसे आज भी सब प्रजा जीवन धारण करती है। उस समय ऋषि, देवता, पितर, नाग, दैत्य, यक्ष, पुण्यजन, गन्धर्व, पर्वत और वृक्ष—सबने पृथ्वीको
६- पृथुके राज्यमें शस्य-श्यामला पृथ्वी
१६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
दुहा। उनके दूध, बछड़ा, पात्र और दुहनेवाला— ये सभी पृथक्-पृथक् थे। ऋषियोंके चन्द्रमा बछड़ा बने, बृहस्पतिने दुहनेका काम किया, तपोमय ब्रह्म उनका दूध था और वेद ही उनके पात्र थे। देवताओंने सुवर्णमय पात्र लेकर पुष्टिकारक दूध दुहा। उनके लिये इन्द्र बछड़ा बने और भगवान् सूर्यने दुहनेका काम किया। पितरोंका चाँदीका पात्र था। प्रतापी यम बछड़ा बने, अन्तकने दूध दुहा। उनके दूधको 'स्वधा' नाम दिया गया है। नागोंने तक्षकको बछड़ा बनाया। तुम्बीका पात्र रखा। ऐरावत नागसे दुहनेका काम लिया और विषरूपी दुग्धका दोहन किया। असुरोंमें मधु दुहनेवाला बना। उसने मायामय दूध दुहा। उस समय विरोचन बछड़ा बना था और लोहेके पात्रमें दूध दुहा गया था। यक्षोंका कच्चा पात्र था। कुबेर बछड़ा बने थे। रजतनाभ यक्ष दुहनेवाला था और अन्तर्धान होनेकी विद्या ही उनका दूध था। राक्षसेन्द्रोंमें सुमाली नामका राक्षस बछड़ा बना। रजतनाभ दुहनेवाला था। उसने कपालरूपी पात्रमें शोणितरूपी दूधका दोहन किया। गन्धर्वोंमें चित्ररथने बछड़ेका काम पूरा किया। कमल ही उनका पात्र था। सुरुचि दुहनेवाला था और पवित्र सुगन्ध ही उनका दूध था। पर्वतोंमें महागिरि मेरुने हिमवान्को बछड़ा बनाया और स्वयं दुहनेवाला बनकर शिलामय पात्रमें रत्नों एवं ओषधियोंको दूधके रूपमें दुहा। वृक्षोंमें प्लक्ष (पाकड़) बछड़ा था। खिले हुए शालके वृक्षने दुहनेका काम किया। पलाशका पात्र था और जलने तथा कटनेपर पुनः अङ्कुरित हो जाना ही उनका दूध था।
इस प्रकार सबका धारण-पोषण करनेवाली यह पावन वसुन्धरा समस्त चराचर जगत्की आधारभूता तथा उत्पत्तिस्थान है। यह सब कामनाओंको देनेवाली तथा सब प्रकारके अन्नोंको अङ्कुरित करनेवाली है। गोरूपा पृथ्वी मेदिनीके नामसे विख्यात है। यह समुद्रतक पृथुके ही अधिकारमें थी। मधु और कैटभके मेदसे व्याप्त होनेके कारण यह मेदिनी कहलाती है। फिर राजा पृथुकी आज्ञाके अनुसार भूदेवी उनकी पुत्री बन गयी, इसलिये इसे पृथ्वी भी कहते हैं। पृथुने इस पृथ्वीका विभाग और शोधन किया, जिससे यह अन्नकी खान और समृद्धिशालिनी बन गयी। गाँवों और नगरोंके कारण इसकी बड़ी शोभा होने लगी। वेन-कुमार महाराज पृथुका ऐसा ही प्रभाव था। इसमें संदेह नहीं कि वे समस्त प्राणियोंके पूजनीय और वन्दनीय हैं। वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणोंको भी महाराज पृथुकी ही वन्दना करनी चाहिये, क्योंकि वे सनातन ब्रह्मयोनि हैं। राज्यकी इच्छा रखनेवाले राजाओंके लिये भी परम प्रतापी महाराज पृथु ही वन्दनीय हैं। युद्धमें विजयकी कामना करनेवाले पराक्रमी योद्धाओंको भी उन्हें मस्तक झुकाना चाहिये। क्योंकि योद्धाओंमें
३- चौदह मन्वन्तरों तथा विवस्वान्की संततिका वर्णन
* चौदह मन्वन्तरों तथा विवस्वान्की संततिका वर्णन * १७
वे अग्रगण्य थे। जो सैनिक राजा पृथुका नाम लेकर संग्राममें जाता है, वह भयङ्कर संग्रामसे भी सकुशल लौटता है और यशस्वी होता है। वैश्यवृत्ति करनेवाले धनी वैश्योंको भी चाहिये कि वे महाराज पृथुको नमस्कार करें, क्योंकि राजा पृथु सबके वृत्तिदाता और परम यशस्वी थे।
इस संसारमें परमकल्याणकी इच्छा रखनेवाले तथा तीनों वर्णोंकी सेवामें लगे रहनेवाले पवित्र शूद्रोंके लिये भी राजा पृथु ही वन्दनीय हैं। इस प्रकार जहाँ पृथ्वीको दुहनेके लिये जो विशेष-विशेष बछड़े, दुहनेवाले, दूध तथा पात्र कल्पित किये गये थे, उन सबका मैंने वर्णन किया।
चौदह मन्वन्तरों तथा विवस्वान्की संततिका वर्णन
ऋषि बोले— महामते सूतजी! अब समस्त मन्वन्तरोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये तथा उनकी प्राथमिक सृष्टि भी बतलाइये।
लोमहर्षण (सूत)-ने कहा— विप्रगण! समस्त मन्वन्तरोंका विस्तृत वर्णन तो सौ वर्षोंमें भी नहीं हो सकता, अतः संक्षेपमें ही सुनो। प्रथम स्वायम्भुव मनु हैं, दूसरे स्वारोचिष, तीसरे उत्तम, चौथे तामस, पाँचवें रैवत, छठे चाक्षुष तथा सातवें वैवस्वत मनु कहलाते हैं। वैवस्वत मनु ही वर्तमान कल्पके मनु हैं। इनके बाद सावर्णि, भौत्य, रौच्य तथा चार मेरुसावर्ण्य नामके मनु होंगे। ये भूत, वर्तमान और भविष्यके सब मिलकर चौदह मनु हैं। मैंने जैसा सुना है, उसके अनुसार सब मनुओंके नाम बताये। अब इनके समयमें होनेवाले ऋषियों, मनु-पुत्रों तथा देवताओंका वर्णन करूँगा। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य तथा वसिष्ठ—ये सात ब्रह्माजीके पुत्र उत्तर दिशामें स्थित हैं, जो स्वायम्भुव मन्वन्तरके सप्तर्षि हैं। आग्नीध्र, अग्निबाहु, मेध्य, मेधातिथि, वसु, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हव्य, सबल और पुत्र—ये दस स्वायम्भुव मनुके महाबली पुत्र थे। विप्रगण! यह प्रथम मन्वन्तर बतलाया गया। स्वारोचिष मन्वन्तरमें प्राण, बृहस्पति, दत्तात्रेय, अत्रि, च्यवन, वायुप्रोक्त तथा महाव्रत—ये सात सप्तर्षि थे। तुषित नामवाले देवता थे और हविर्ध्र, सुकृति, ज्योति, आप, मूर्ति, प्रतीत, नभस्य, नभ तथा ऊर्ज—ये महात्मा स्वारोचिष मनुके पुत्र बताये गये हैं, जो महान् बलवान् और पराक्रमी थे। यह द्वितीय मन्वन्तरका वर्णन हुआ; अब तीसरा मन्वन्तर बतलाया जाता है, सुनो। वसिष्ठके सात पुत्र वासिष्ठ तथा हिरण्यगर्भके तेजस्वी पुत्र ऊर्ज—ये ही उत्तम मन्वन्तरके ऋषि थे। इष, ऊर्ज, तनूर्ज, मधु, माधव, शुचि, शुक्र, सह, नभस्य तथा नभ—ये उत्तम मनुके पराक्रमी पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें भानु नामवाले देवता थे। इस प्रकार तीसरा मन्वन्तर बताया गया। अब चौथेका वर्णन करता हूँ। काव्य, पृथु, अग्नि, जहु, धाता, कपीवान् और अकपीवान्—ये सात उस समयके सप्तर्षि थे। सत्य नामवाले देवता थे। द्युति, तपस्य, सुतपा, तपोभूत, सनातन, तपोरति, अकल्माष, तन्वी, धन्वी और परंतप—ये दस तामस मनुके पुत्र कहे गये हैं। यह चौथे मन्वन्तरका वर्णन हुआ। पाँचवाँ रैवत मन्वन्तर है। उसमें देवबाहु, यदुध्र, वेदशिरा, हिरण्यरोमा, पर्जन्य, सोमनन्दन ऊर्ध्वबाहु तथा अत्रिकुमार सत्यनेत्र—ये सप्तर्षि थे। अभूतरजा और प्रकृति नामवाले देवता थे। धृतिमान्, अव्यय, युक्त, तत्त्वदर्शी, निरुत्सुक, आरण्य, प्रकाश, निर्मोह, सत्यवाक् और कृती—ये रैवत मनुके पुत्र थे। यह पाँचवाँ मन्वन्तर बताया गया। अब छठे चाक्षुष
| १८ | * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण * |
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मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ, सुनो। उसमें भृगु, नभ, विवस्वान्, सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु—ये ही सप्तर्षि थे। लेख नामवाले पाँच देवता थे। नाड्वलेय नामसे प्रसिद्ध रुरु आदि चाक्षुष मनुके दस पुत्र बतलाये जाते हैं। यहाँतक छठे मन्वन्तरका वर्णन हुआ। अब सातवें वैवस्वत मन्वन्तरका वर्णन सुनो। अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र तथा जमदग्नि—ये इस वर्तमान मन्वन्तरमें सप्तर्षि होकर आकाशमें विराजमान हैं। साध्य, रुद्र, विश्वेदेव, वसु, मरुद्गण, आदित्य और अश्विनीकुमार—ये इस वर्तमान मन्वन्तरके देवता माने गये हैं। वैवस्वत मनुके इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हुए। ऊपर जिन महातेजस्वी महर्षियोंके नाम बताये गये हैं, उन्हींके पुत्र और पौत्र आदि सम्पूर्ण दिशाओंमें फैले हुए हैं। प्रत्येक मन्वन्तरमें धर्मकी व्यवस्था तथा लोकरक्षाके लिये जो सात सप्तर्षि रहते हैं, मन्वन्तर बीतनेके बाद उनमें चार महर्षि अपना कार्य पूरा करके रोग-शोकसे रहित ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। तत्पश्चात् दूसरे चार तपस्वी आकर उनके स्थानकी पूर्ति करते हैं। भूत और वर्तमान कालके सप्तर्षिगण इसी क्रमसे होते आये हैं। सावर्णि मन्वन्तरमें होनेवाले सप्तर्षि ये हैं—परशुराम, व्यास, आत्रेय, भरद्वाजकुलमें उत्पन्न द्रोणकुमार अश्वत्थामा, गौतमवंशी शरद्वान्, कौशिककुलमें उत्पन्न गालव तथा कश्यपनन्दन और्व। वैरी, अध्वरीवान्, शमन, धृतिमान्, वसु, अरिष्ट, अधृष्ट, वाजी तथा सुमति—ये भविष्यमें सावर्णिक मनुके पुत्र होंगे। प्रातःकाल उठकर इनका नाम लेनेसे मनुष्य सुखी, यशस्वी तथा दीर्घायु होता है।
भविष्यमें होनेवाले अन्य मन्वन्तरोंका संक्षेपसे वर्णन किया जाता है, सुनो। सावर्ण नामके पाँच मनु होंगे; उनमेंसे एक तो सूर्यके पुत्र हैं और शेष चार प्रजापतिके। ये चारों मेरुगिरिके शिखरपर भारी तपस्या करनेके कारण 'मेरु सावर्ण्य' के नामसे विख्यात होंगे। ये दक्षके धेवते और प्रियाके पुत्र हैं। इन पाँच मनुओंके अतिरिक्त भविष्यमें रौच्य और भौत्य नामके दो मनु और होंगे। प्रजापति रुचिके पुत्र ही 'रौच्य' कहे गये हैं। रुचिके दूसरे पुत्र, जो भूतिके गर्भसे उत्पन्न होंगे 'भौत्य मनु' कहलायेंगे। इस कल्पमें होनेवाले ये सात भावी मनु हैं। इन सबके द्वारा द्वीपों और नगरोंसहित सम्पूर्ण पृथिवीका एक सहस्र युगोंतक पालन होगा। सत्ययुग, त्रेता आदि चारों युग इकहत्तर बार बीतकर जब कुछ अधिक काल हो जाय, तब वह एक मन्वन्तर कहलाता है। इस प्रकार ये चौदह मनु बतलाये गये। ये यशकी वृद्धि करनेवाले हैं। समस्त वेदों और पुराणोंमें भी इनका प्रभुत्व वर्णित है। ये प्रजाओंके पालक हैं। इनके यशका कीर्तन श्रेयस्कर है। मन्वन्तरोंमें कितने ही संहार होते हैं और संहारके बाद कितनी ही सृष्टियाँ होती रहती हैं; इन सबका पूरा-पूरा वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं हो सकता। मन्वन्तरोंके बाद जो संहार होता है, उसमें तपस्या, ब्रह्मचर्य और शास्त्रज्ञानसे सम्पन्न कुछ देवता और सप्तर्षि शेष रह जाते हैं। एक हजार चतुर्युग पूर्ण होनेपर कल्प समास हो जाता है। उस समय सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे समस्त प्राणी दग्ध हो जाते हैं। तब सब देवता आदित्यगणोंके साथ ब्रह्माजीको आगे करके सुरश्रेष्ठ भगवान् नारायणमें लीन हो जाते हैं। वे भगवान् ही कल्पके अन्तमें पुनः सब भूतोंकी सृष्टि करते हैं। वे अव्यक्त सनातन देवता हैं। यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींका है।
मुनिवरो! अब मैं इस समय वर्तमान महातेजस्वी वैवस्वत मनुकी सृष्टिका वर्णन करूँगा। महर्षि कश्यपसे उनकी भार्या दक्षकन्या अदितिके गर्भसे विवस्वान् (सूर्य)-का जन्म हुआ। विश्वकर्माकी
४- वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन
* वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन * १९
पुत्री संज्ञा विवस्वान्की पत्नी हुई। उसके गर्भसे सूर्यने तीन संतानें उत्पन्न कीं, जिनमें एक कन्या और दो पुत्र थे। सबसे पहले प्रजापति श्राद्धदेव, जिन्हें वैवस्वत मनु कहते हैं, उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् यम और यमुना—ये जुड़वीं संतानें हुईं। भगवान् सूर्यके तेजस्वी स्वरूपको देखकर संज्ञा उसे सह न सकी। उसने अपने ही समान वर्णवाली अपनी छाया प्रकट की। वह छाया संज्ञा अथवा सवर्णा नामसे विख्यात हुई। उसको भी संज्ञा ही समझकर सूर्यने उसके गर्भसे अपने ही समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न किया। वह अपने बड़े भाई मनुके ही समान था, इसलिये सावर्ण मनुके नामसे प्रसिद्ध हुआ। छाया-संज्ञासे जो दूसरा पुत्र हुआ, उसकी शनैश्चरके नामसे प्रसिद्धि हुई। यम धर्मराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए और उन्होंने समस्त प्रजाको धर्मसे संतुष्ट किया। इस शुभकर्मके कारण उन्हें पितरोंका आधिपत्य और लोकपालका पद प्राप्त हुआ। सावर्ण मनु प्रजापति हुए। आनेवाले सावर्णिक मन्वन्तरके वे ही स्वामी होंगे। वे आज भी मेरुगिरिके शिखरपर नित्य तपस्या करते हैं। उनके भाई शनैश्चरने ग्रहकी पदवी पायी।
वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन
**लोमहर्षणजी कहते हैं—**वैवस्वत मनुके नौ पुत्र उन्हींके समान हुए; उनके नाम इस प्रकार हैं—इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, अरिष्ट, करूष तथा पृषध्र। एक समयकी बात है, प्रजापति मनु पुत्रकी इच्छासे मैत्रावरुण-याग कर रहे थे। उस समयतक उन्हें कोई पुत्र नहीं हुआ था। उस यज्ञमें मनुने मित्रावरुणके अंशकी आहुति डाली। उसमेंसे दिव्य वस्त्र एवं दिव्य आभूषणोंसे विभूषित दिव्य रूपवाली इला नामकी कन्या उत्पन्न हुई। महाराज मनुने उसे ‘इला’ कहकर सम्बोधित किया और कहा—‘कल्याणी! तुम मेरे पास आओ।’ तब इलाने पुत्रकी इच्छा रखनेवाले प्रजापति मनुसे यह धर्मयुक्त वचन कहा—‘महाराज! मैं मित्रावरुणके अंशसे उत्पन्न हुई हूँ, अतः पहले उन्हींके पास जाऊँगी। आप मेरे धर्ममें बाधा न डालिये।’ यों कहकर वह सुन्दरी कन्या मित्रावरुणके समीप गयी और हाथ जोड़कर बोली—‘भगवन्! मैं आप दोनोंके अंशसे उत्पन्न हुई हूँ। आपलोगोंकी किस आज्ञाका पालन करूँ? मनुने मुझे अपने पास बुलाया है।’
**मित्रावरुण बोले—**सुन्दरी! तुम्हारे इस धर्म, विनय, इन्द्रियसंयम और सत्यसे हमलोग प्रसन्न हैं। महाभागे! तुम हम दोनोंकी कन्याके रूपमें प्रसिद्ध होगी तथा तुम्हीं मनुके वंशका विस्तार करनेवाला पुत्र हो जाओगी। उस समय तीनों
८- रैवतका बलदेवजीको अपनी कन्या रेवतीका दान
२०
- संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
लोकोंमें सुद्युम्नके नामसे तुम्हारी ख्याति होगी।
यह सुनकर वह पिताके समीपसे लौट पड़ी। मार्गमें उसकी बुधसे भेंट हो गयी। बुधने उसे मैथुनके लिये आमन्त्रित किया। उनके वीर्यसे उसने पुरूरवाको जन्म दिया। तत्पश्चात् वह सुद्युम्नके रूपमें परिणत हो गयी। सुद्युम्नके तीन बड़े धर्मात्मा पुत्र हुए—उत्कल, गय और विनताश्व। उत्कलकी राजधानी उत्कला (उड़ीसा) हुई। विनताश्वको पश्चिम दिशाका राज्य मिला तथा गय पूर्व दिशाके राजा हुए। उनकी राजधानी गयाके नामसे प्रसिद्ध हुई। जब मनु भगवान् सूर्यके तेजमें प्रवेश करने लगे, तब उन्होंने अपने राज्यको दस भागोंमें बाँट दिया। सुद्युम्नके बाद उनके पुत्रोंमें इक्ष्वाकु सबसे बड़े थे, इसलिये उन्हें मध्यदेशका राज्य मिला। सुद्युम्न कन्याके रूपमें उत्पन्न हुए थे, इसलिये उन्हें राज्यका भाग नहीं मिला। फिर वसिष्ठजीके कहनेसे प्रतिष्ठानपुरमें उनकी स्थिति हुई। प्रतिष्ठानपुरका राज्य पाकर महायशस्वी सुद्युम्नने उसे पुरूरवाको दे दिया। मनुकुमार सुद्युम्न क्रमशः स्त्री और पुरुष दोनोंके लक्षणोंसे युक्त हुए, इसलिये इला और सुद्युम्न दोनों नामोंसे उनकी प्रसिद्धि हुई। नरिष्यन्तके पुत्र शक हुए। नाभागके राजा अम्बरीष हुए। धृष्टसे धार्ष्टक नामवाले क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई, जो युद्धमें उन्मत्त होकर लड़ते थे। करूषके पुत्र कारूष नामसे विख्यात हुए। वे भी रणोन्मत्त थे। प्रांशुके एक ही पुत्र थे, जो प्रजापतिके नामसे प्रकट हुए। शर्यातिके दो जुड़वीं संतानें हुईं। उनमें अनर्त नामसे प्रसिद्ध पुत्र तथा सुकन्या नामवाली कन्या थी। यही सुकन्या महर्षि च्यवनकी पत्नी हुई। अनर्तके पुत्रका नाम रैव था। उन्हें अनर्त देशका राज्य मिला। उनकी राजधानी कुशस्थली (द्वारका) हुई। रैवके पुत्र रैवत हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। उनका दूसरा नाम ककुद्मी भी था। अपने पिताके ज्येष्ठ पुत्र होनेके कारण उन्हें कुशस्थलीका राज्य मिला। एक बार वे अपनी कन्याको साथ ले ब्रह्माजीके पास गये और वहाँ गन्धर्वोंके गीत सुनते हुए दो घड़ी ठहरे रहे। इतने ही समयमें मानवलोकमें अनेक युग बीत गये। रैवत जब वहाँसे लौटे, तब अपनी राजधानी कुशस्थलीमें आये; परन्तु अब वहाँ यादवोंका अधिकार हो गया था। यदुवंशियोंने उसका नाम बदलकर द्वारवती रख दिया था। उसमें बहुत-से द्वार बने थे। वह पुरी बड़ी मनोहर दिखायी देती थी। भोज, वृष्णि और अन्धक वंशके वसुदेव आदि यादव उसकी रक्षा करते थे। रैवतने वहाँका सब वृत्तान्त ठीक-ठीक जानकर अपनी रेवती नामकी कन्या बलदेवजीको ब्याह दी और स्वयं मेरुपर्वतके शिखरपर जाकर वे तपस्यामें लग गये। धर्मात्मा बलरामजी रेवतीके साथ सुखपूर्वक विहार करने लगे।
९- महर्षि उत्तङ्कका राजा बृहदश्वसे धुन्धुको मारनेका अनुरोध
- वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन * २१
पृषध्रने अपने गुरुकी गायका वध किया था, इसलिये वे शापसे शूद्र हो गये। इस प्रकार ये वैवस्वत मनुके नौ पुत्र बताये गये हैं। मनु जब छींक रहे थे, उस समय इक्ष्वाकुकी उत्पत्ति हुई थी। इक्ष्वाकुके सौ पुत्र हुए। उनमें विकुक्षि सबसे बड़े थे। वे अपने पराक्रमके कारण अयोध्य नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्हें अयोध्याका राज्य प्राप्त हुआ। उनके शकुनि आदि पाँच सौ पुत्र हुए, जो अत्यन्त बलवान् और उत्तर-भारतके रक्षक थे। उनमेंसे वशाति आदि अट्ठावन राजपुत्र दक्षिण दिशाके पालक हुए। विकुक्षिका दूसरा नाम शशाद था। इक्ष्वाकुके मरनेपर वे ही राजा हुए। शशादके पुत्र ककुत्स्थ, ककुत्स्थके अनेना, अनेनाके पृथु, पृथुके विष्टराश्व, विष्टराश्वके आर्द्र, आर्द्रके युवनाश्व और युवनाश्वके पुत्र श्रावस्त हुए। उन्होंने ही श्रावस्तीपुरी बसायी थी। श्रावस्तके पुत्र बृहदश्व और उनके पुत्र कुवलाश्व हुए। ये बड़े धर्मात्मा राजा थे। इन्होंने धुन्धु नामक दैत्यका वध करनेके कारण धुन्धुमार नामसे प्रसिद्धि प्राप्त की।
मुनि बोले— महाप्राज्ञ सूतजी! हम धुन्धुवधका वृत्तान्त ठीक-ठीक सुनना चाहते हैं, जिससे कुवलाश्वका नाम धुन्धुमार हो गया।
लोमहर्षणजीने कहा— कुवलाश्वके सौ पुत्र थे। वे सभी अच्छे धनुर्धर, विद्याओंमें प्रवीण, बलवान् और दुर्धर्ष थे। सबकी धर्ममें निष्ठा थी। सभी यज्ञकर्ता तथा प्रचुर दक्षिणा देनेवाले थे। राजा बृहदश्वने कुवलाश्वको राजपद्पर अभिषिक्त किया और स्वयं वनमें तपस्या करनेके लिये जाने लगे। उन्हें जाते देख ब्रह्मर्षि उत्तङ्कने रोका और इस प्रकार कहा—'राजन्! आपका कर्तव्य है प्रजाकी रक्षा, अतः वही कीजिये। मेरे आश्रमके समीप मधु नामक राक्षसका पुत्र महान् असुर धुन्धु रहता है। वह सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेके लिये कठोर तपस्या करता और बालूके भीतर सोता है। वर्षभरमें एक बार वह बड़े जोरसे साँस छोड़ता है। उस समय वहाँकी पृथ्वी डोलने लगती है। उसके श्वासकी हवासे बड़े जोरकी धूल उड़ती है और सूर्यका मार्ग ढँक लेती है। लगातार सात दिनोंतक भूकम्प होता रहता है। इसलिये अब मैं अपने उस आश्रममें रह नहीं सकता। आप समस्त लोकोंके हितकी इच्छासे उस विशालकाय दैत्यको मार डालिये। उसके मारे जानेपर सब सुखी हो जायेंगे।'
बृहदश्व बोले— भगवन्! मैंने तो अब अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग कर दिया। यह मेरा पुत्र है। यही धुन्धु दैत्यका वध करेगा।
राजर्षि बृहदश्व अपने पुत्र कुवलाश्वको धुन्धुके वधकी आज्ञा दे स्वयं पर्वतके समीप चले गये। कुवलाश्व अपने सब पुत्रोंको साथ ले धुन्धुको मारने चले। साथमें महर्षि उत्तङ्क भी थे। उत्तङ्कके
१०- कुवलाश्वका युद्धके लिये प्रस्थान
२२
* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
अनुरोधसे सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये साक्षात् भगवान् विष्णुने कुवलाश्वके शरीरमें अपना तेज प्रविष्ट किया। दुर्धर्ष वीर कुवलाश्व जब युद्धके लिये प्रस्थित हुए, तब देवताओंका यह महान् शब्द गूँज उठा—'ये श्रीमान् नरेश अवध्य हैं। इनके हाथसे आज धुन्धु अवश्य मारा जायगा।'
पुत्रोंके साथ वहाँ जाकर वीरवर कुवलाश्वने समुद्रको खुदवाया। खोदनेवाले राजकुमारोंने बालूके भीतर धुन्धुका पता लगा लिया। वह पश्चिम दिशाको घेरकर पड़ा था। वह अपने मुखकी आगसे सम्पूर्ण लोकोंका संहार-सा करता हुआ जलका स्रोत बहाने लगा। जैसे चन्द्रमाके उदयकालमें समुद्रमें ज्वार आता है, उसकी उत्ताल तरङ्गें बढ़ने लगती हैं, उसी प्रकार वहाँ जलका वेग बढ़ने लगा। कुवलाश्वके पुत्रोंमेंसे तीनको छोड़कर शेष सभी धुन्धुकी मुखाग्निसे जलकर भस्म हो गये। तदनन्तर महातेजस्वी राजा कुवलाश्वने उस महाबली धुन्धुपर आक्रमण किया। वे योगी थे; इसलिये उन्होंने योगशक्तिके द्वारा वेगसे प्रवाहित होनेवाले जलको
पी लिया और आगको भी बुझा दिया। फिर बलपूर्वक उस महाकाय जलचर राक्षसको मारकर महर्षि उत्तङ्कका दर्शन किया। उत्तङ्कने उन महात्मा राजाको वर दिया कि 'तुम्हारा धन अक्षय होगा और शत्रु तुम्हें पराजित न कर सकेंगे। धर्ममें सदा तुम्हारा प्रेम बना रहेगा तथा अन्तमें तुम्हें स्वर्गलोकका अक्षय निवास प्राप्त होगा। युद्धमें तुम्हारे जो पुत्र
राक्षसद्वारा मारे गये हैं, उन्हें भी स्वर्गमें अक्षयलोक प्राप्त होंगे।'
धुन्धुमारके जो तीन पुत्र युद्धसे जीवित बच गये थे, उनमें दृढाश्व सबसे ज्येष्ठ थे और चन्द्राश्व तथा कपिलाश्व उनके छोटे भाई थे। दृढाश्वके पुत्रका नाम हर्यश्व था। हर्यश्वका पुत्र निकुम्भ हुआ, जो सदा क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहता था। निकुम्भका युद्धविशारद पुत्र संहताश्व था। संहताश्वके दो पुत्र हुए—अकृशाश्व और कृशाश्व। उसके हेमवती नामकी एक कन्या भी हुई, जो आगे चलकर दृषद्वतीके नामसे प्रसिद्ध हुई। उसका पुत्र प्रसेनजित् हुआ, जो तीनों लोकोंमें विख्यात था।
१२- राजा त्रय्यारुणके द्वारा अपने कुपुत्रका त्याग
* वैवस्वत मनुके वंशजोंका वर्णन *
२३
प्रसेनजित्ने गौरी नामवाली पतिव्रता स्त्रीसे ब्याह किया था, जो बादमें पतिके शापसे बाहुदा नामकी नदी हो गयी। प्रसेनजित्के पुत्र राजा युवनाश्व हुए। युवनाश्वके पुत्र मान्धाता हुए। वे त्रिभुवनविजयी थे। शशबिन्दु की सुशीला कन्या चैत्ररथी, जिसका दूसरा नाम बिन्दुमती भी था, मान्धाताकी पत्नी हुई। इस भूतलपर उसके समान रूपवती स्त्री दूसरी नहीं थी। बिन्दुमती बड़ी पतिव्रता थी। वह दस हजार भाइयोंकी ज्येष्ठ भगिनी थी। मान्धाताने उसके गर्भसे धर्मज्ञ पुरुकुत्स और राजा मुचुकुन्द—ये दो पुत्र उत्पन्न किये। पुरुकुत्सके उनकी स्त्री नर्मदाके गर्भसे राजा त्रसदस्यु उत्पन्न हुए, उनसे सम्भूतका जन्म हुआ। सम्भूतके पुत्र शत्रुदमन त्रिधन्वा हुए। राजा त्रिधन्वासे विद्वान् त्रय्यारुण हुए। उनका पुत्र महाबली सत्यव्रत हुआ। उसकी बुद्धि बड़ी खोटी थी। उसने वैवाहिक मन्त्रोंमें विघ्न डालकर दूसरेकी पत्नीका अपहरण कर लिया। बालस्वभाव, कामासक्ति, मोह, साहस और चञ्चलतावश उसने ऐसा कुकर्म किया था। जिसका अपहरण हुआ था, वह उसके किसी पुरवासीकी ही कन्या थी। इस अधर्मरूपी शङ्कु (काँटे)-के कारण कुपित होकर त्रय्यारुणने अपने उस पुत्रको त्याग दिया। उस समय उसने पूछा—‘पिताजी! आपके त्याग देनेपर मैं कहाँ जाऊँ?’ पिताने कहा—‘ओ कुलकलङ्क! जा, चाण्डालोंके साथ रह। मुझे तेरे-जैसे पुत्रकी आवश्यकता नहीं है।’ यह सुनकर वह पिताके कथनानुसार नगरसे बाहर निकल गया। उस समय महर्षि वसिष्ठने उसे मना नहीं किया। वह सत्यव्रत चाण्डालके घरके पास रहने लगा। उसके पिता भी वनमें चले गये। तदनन्तर उसी अधर्मके कारण इन्द्रने उस राज्यमें वर्षा बंद कर
दी। महातपस्वी विश्वामित्र उसी राज्यमें अपनी पत्नीको रखकर स्वयं समुद्रके निकट भारी तपस्या कर रहे थे। उनकी पत्नीने अकालग्रस्त हो अपने मझले औरस पुत्रके गलेमें रस्सी डाल दी और शेष परिवारके भरण-पोषणके लिये सौ गायें लेकर उसे बेच दिया। राजकुमार सत्यव्रतने देखा
५- राजा सगरका चरित्र तथा इक्ष्वाकुवंशके मुख्य-मुख्य राजाओंका परिचय
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
कि विक्रयके लिये इसके गलेमें रस्सी बँधी हुई है; तब उस धर्मात्माने दया करके महर्षि विश्वामित्रके उस पुत्रको छुड़ा लिया और स्वयं ही उसका भरण-पोषण किया। ऐसा करनेमें उसका उद्देश्य था महर्षि विश्वामित्रको संतुष्ट करके उनकी कृपा प्राप्त करना। महर्षिका वह पुत्र गलेमें बन्धन पड़नेके कारण महातपस्वी गालवके नामसे प्रसिद्ध हुआ।
राजा सगरका चरित्र तथा इक्ष्वाकुवंशके मुख्य-मुख्य राजाओंका परिचय
लोमहर्षणजी कहते हैं—राजकुमार सत्यव्रत भक्ति, दया और प्रतिज्ञावश विनयपूर्वक विश्वामित्रजीकी स्त्रीका पालन करने लगा। इससे मुनि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने सत्यव्रतसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा। राजकुमार बोला—'मैं इस शरीरके साथ ही स्वर्गलोकमें चला जाऊँ।' जब अनावृष्टिका भय दूर हो गया, तब विश्वामित्रने उसे पिताके राज्यपर अभिषिक्त करके उसके द्वारा यज्ञ कराया। वे महातपस्वी थे, उन्होंने देवताओं तथा वसिष्ठके देखते-देखते सत्यव्रतको शरीरसहित स्वर्गलोकमें भेज दिया। उसकी पत्नीका नाम सत्यरथा
था। वह केकयकुलकी कन्या थी। उसने हरिश्चन्द्र नामक निष्पाप पुत्रको जन्म दिया। राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके वे सम्राट् कहलाये। हरिश्चन्द्रके पुत्रका नाम रोहित था। रोहितके हरित और हरितके पुत्र चञ्चु हुए। चञ्चुके पुत्रका नाम विजय था। वे सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेके कारण विजय कहलाये। विजयके पुत्र राजा रुरुक हुए, जो धर्म और अर्थके ज्ञाता थे। रुरुकके वृक, वृकके बाहु और बाहुके सगर हुए। वे गर अर्थात् विषके साथ प्रकट हुए थे, इसलिये उनका नाम सगर हुआ। उन्होंने भृगुवंशी और्वमुनिसे आग्नेय अस्त्र प्राप्तकर तालजङ्घ और हैहय नामक क्षत्रियोंको युद्धमें हराया और समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त की। फिर शक, पह्लव तथा पारदोंके धर्मका निराकरण किया।
**मुनियोंने पूछा—**सगरकी उत्पत्ति गरके साथ कैसे हुई? उन्होंने क्रोधमें आकर शक आदि महातेजस्वी क्षत्रियोंके कुलोचित धर्मोंका निराकरण क्यों किया? यह सब विस्तारपूर्वक सुनाइये।
**लोमहर्षणजीने कहा—**राजा बाहु व्यसनी थे, अतः पहले हैहय नामक क्षत्रियोंने तालजङ्घों और शकोंकी सहायतासे उनका राज्य छीन लिया। यवन, पारद, काम्बोज तथा पह्लव नामके गणोंने भी हैहयोंके लिये पराक्रम दिखाया। राज्य छिन जानेपर राजा बाहु दुःखी हो पत्नीके साथ वनमें चले गये। वहीं उन्होंने अपने प्राण त्याग