संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६०- खड्गतीर्थ और आत्रेयतीर्थकी महिमा
२३६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
मधुच्छन्दा बोले— मुक्तिस्वरूप, अमित तेजस्वी भगवान् सूर्यको नमस्कार है। ओंकारके अर्थभूत छन्दोमय देवको नमस्कार है। जो विरूप, सुरूप, त्रिगुण, त्रिमूर्ति, सृष्टि, पालन और संहारके हेतु तथा सबके प्रभु हैं, उन भगवान् सूर्यको नमस्कार है।
इस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने कहा—'कोई वर माँगो।' मधुच्छन्दा बोले—'देवेश्वर! राजाका जीवनदान दीजिये। प्रिय वचन बोलनेवाली मेरी पत्नीको भी जीवित रखिये और मुझे तथा राजाके लिये भी उत्तम पुत्र प्रदान कीजिये।' जगदीश्वर भगवान् सूर्यने रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित राजा शर्यातिको जीवित करके दे दिया, ब्राह्मणकी पत्नीको भी जिलाया तथा और भी श्रेष्ठ एवं कल्याणमय वर प्रदान किये। तदनन्तर राजा प्रसन्न हो पुरोहितके साथ प्रियजनोंसे घिरे हुए सुखपूर्वक अपने देशको गये। उस स्थानपर तीन हजार गुणवान् तीर्थोंका निवास है। मुने! उसी समयसे उस स्थानका नाम भानुतीर्थ, मृतसंजीवनतीर्थ, शर्यातीर्थ और माधुच्छन्दसतीर्थ हो गया। वह स्मरणमात्रसे पापोंको दूर भगाता है। उन तीर्थोंमें किया हुआ स्नान और दान सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाला है।
खड्गतीर्थ और आत्रेयतीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं— गौतमीके उत्तर-तटपर खड्गतीर्थ है, जहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। नारद! मैं वहाँका वृत्तान्त बतलाता हूँ। पैलूष नामसे विख्यात एक ब्राह्मण थे, जो कवषके पुत्र थे। वे कुटुम्बके भारसे विवश हो धनके लिये इधर-उधर दौड़ा करते थे, किंतु उन्हें कहींसे भी कुछ नहीं मिलता था। दैव तो अत्यन्त विमुख था ही, पुरुषार्थ भी निष्फल हो गया। इससे पैलूषको बड़ा वैराग्य हुआ। वे सोचने लगे—'यह तृष्णा मुझे बलपूर्वक पापकी ओर खींचती है। तृष्णे! तूने मेरे अज्ञानवश बड़ा अपकार किया है, किंतु अब तुझे दूरसे ही नमस्कार है।' यह सोचकर बुद्धिमान् पैलूषने मन-ही-मन विचार किया—'इस तृष्णाका नाश करनेके लिये क्या होना चाहिये?' फिर उन्होंने अपने पिता कवषसे पूछा—'तात! मैं ज्ञानरूपी खड्गसे क्रोध और लोभका तथा अत्यन्त दुस्तर संसारका कैसे छेदन करूँ? इसका उपाय बतलाइये।'
कवषने कहा— वैदिक श्रुतिका कथन है कि ईश्वरसे ज्ञानकी इच्छा करे; अतः तुम महादेवजीकी आराधना करो। उससे तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा।
'बहुत अच्छा' कहकर पैलूषने ज्ञान-प्राप्तिके उद्देश्यसे महेश्वरकी अर्चना की। इससे संतुष्ट होकर उन्होंने ब्राह्मणको ज्ञान प्रदान किया। ज्ञान प्राप्त होनेपर परम बुद्धिमान् कवषने इस प्रकार मुक्तिदायिनी गाथाका गान किया—'मनुष्यका पहला शत्रु है क्रोध। उसका फल तो कुछ भी नहीं है, उलटे वह शरीरका नाश करता है; अतः ज्ञानरूपी खड्गसे उसका नाश करके परम आनन्दको प्राप्त करे। नाना प्रकारकी तृष्णा बन्धनमें डालनेवाली माया है, वह पाप कराती है; अतः ज्ञानरूपी खड्गसे उसका नाश कर देनेपर मनुष्य सुखसे रहता है।* आसक्ति देवता आदिके लिये भी बहुत बड़ा अधर्म है। आत्मा असङ्ग है, उसके
* क्रोधस्तु प्रथमं शत्रुुर्निष्फलो देहनाशनः । ज्ञानखड्गेन तं छित्त्वा परं सुखमाप्नुयात् ॥
तृष्णा बहुविधा माया बन्धनी पापकारिणी । छित्त्वैतां ज्ञानखड्गेन सुखं तिष्ठति मानवः ॥
(१३९ । १३-१४)
८२- आत्रेयमुनिके द्वारा इन्द्रके ऐश्वर्यका दर्शन
- खड्गतीर्थ और आत्रेयतीर्थकी महिमा * २३७
लिये भी आसक्ति महान् शत्रु है। ज्ञानरूपी खड्गसे इस आसक्तिका नाश करके शिव-सायुज्य प्राप्त करे। संशय महानाशका कारण है। वह धर्म और अर्थका भी विनाश करनेवाला है। उस संशयका नाश करके जीव अपने परम अभीष्टकी सिद्धि कर सकता है। आशा पिशाचीकी भाँति चित्तमें प्रवेश करती है और सम्पूर्ण सुखोंको भस्म कर डालती है। पूर्ण अहंता (अपरिच्छिन्न आत्मबोध)-रूपी खड्गसे उसका नाश करके जीवन्मुक्ति प्राप्त करनी चाहिये।'
तदनन्तर पैलूष ज्ञान प्राप्त करके गङ्गा-तटपर रहने लगे। ज्ञानरूपी खड्गसे उनका मोह नष्ट हो गया था, अतः उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। तबसे वह स्थान खड्गतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। ज्ञानतीर्थ, कवषतीर्थ, पैलूषतीर्थ और सर्वकामदतीर्थ आदि छः हजार तीर्थ वहाँ वास करते हैं, जो पापराशिके नाशक और अभीष्ट वस्तुओंके दाता हैं।
उसके बाद आत्रेयतीर्थ है। उसीको अन्विन्द्रतीर्थ भी कहते हैं। वह बहुत ही उत्तम है। वह खोये हुए राज्यकी प्राप्ति करानेवाला है। उसका माहात्म्य बतलाता हूँ, सुनो। एक बार गौतमीके उत्तर-तटपर आत्रेय ऋषिने अनेकों ऋत्विज मुनियोंके साथ सत्र आरम्भ किया। उसमें हव्यवाहन अग्नि ही होता थे। इस प्रकार सत्र पूरा होनेपर महर्षिने माहेश्वरी इष्टिका अनुष्ठान किया। इससे अणिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई तथा उनमें सर्वत्र आने-जानेकी शक्ति हो गयी। वे परम मनोहर इन्द्रभवन, स्वर्गलोक तथा रसातलमें अपनी तपस्याके प्रभावसे आने-जाने लगे। एक समय वे इन्द्रलोकमें गये। वहाँ उन्होंने देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रको देखा, जो अप्सराओंका उत्तम नृत्य देख रहे थे। सिद्ध और साध्यगण उनकी स्तुति कर रहे थे। वह सब देखकर पुनः अपने आश्रमपर लौट आये। कहाँ पवित्र गुणोंवाले रत्नोंसे भरी हुई अत्यन्त रमणीय इन्द्रपुरी और कहाँ श्रीहीन, सुवर्णरहित अपना आश्रम! यह देखकर ब्राह्मणको अपने आश्रमसे वैराग्य-सा हो गया। उनके मनमें शीघ्र ही देवताओंका राज्य प्राप्त करनेकी अभिलाषा हुई। तब उन्होंने अपनी प्रियासे कहा—'देवि! अब मैं उत्तम-से-उत्तम फल-मूल भी, चाहे वे कितने ही अच्छे ढंगसे क्यों न बने हों, नहीं खा सकता। मुझे तो स्वर्गलोकके अमृत, परम पवित्र भक्ष्य-भोजन, श्रेष्ठ आसन, स्तुति, दान, सुन्दर सभा, अस्त्र-शस्त्र, मनोहर वस्त्र, अमरावतीपुरी और नन्दनवनकी याद आती है।' यों कहकर महात्मा आत्रेयने तपस्याके प्रभावसे विश्वकर्माको बुलाया और इस प्रकार कहा—'महात्मन्! मैं इन्द्रका पद चाहता हूँ। आप शीघ्र ही यहाँ इन्द्रपुरीका निर्माण कीजिये। इसके विपरीत यदि आपने कोई बात मुँहसे निकाली तो मैं निश्चय ही आपको भस्म कर डालूँगा।'
८३- अपने मोहके कारण आत्रेयमुनिका लज्जित होना
२३८
* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
आत्रेयके यों कहनेपर प्रजापति विश्वकर्माने तत्काल ही वहाँ मेरुपर्वत, देवपुरी, कल्पवृक्ष, कल्पलता, कामधेनु, वज्र आदि मणियोंसे विभूषित, सुन्दर तथा अत्यन्त चित्रकारी किये हुए गृह बनाये। इतना ही नहीं, उन्होंने सर्वाङ्गसुन्दरी शचीकी भी आकृति बनायी, जो कामदेवकी विहारशाला-सी प्रतीत होती थी। क्षणभरमें सुधर्मा सभा, मनोहारिणी अप्सराएँ, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, वज्र आदि अस्त्र और सम्पूर्ण देवताओंका निर्माण हो गया। अपनी पत्नीके मना करनेपर भी आत्रेयने शचीके समान रूपवाली उस स्त्रीको अपनी भार्या बना लिया। वज्र आदि अस्त्रोंको भी धारण किया। नृत्य और संगीत आदि सब कुछ वहाँ उसी तरहसे होने लगा, जिस प्रकार वह इन्द्रपुरीमें देखा गया था। स्वर्गलोकका सम्पूर्ण सुख पाकर मुनिवर आत्रेयका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। आपातरमणीय विषयोंकी भी भला, किस पुरुषको अपेक्षा नहीं होती। दैत्यों और दानवोंने जब स्वर्गका वैभव पृथ्वीपर उतरा हुआ सुना, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे परस्पर कहने लगे—‘क्या कारण है कि इन्द्र स्वर्गलोकको छोड़कर पृथ्वीपर सुख भोगनेके लिये आया है? हमलोग अभी वृत्रासुरका वध करनेवाले उस इन्द्रसे युद्ध करनेके लिये चलें।’ ऐसा निश्चय करके असुरोंने वहाँ आकर महर्षि आत्रेयको और उनके द्वारा निर्मित इन्द्रपुरीको भी घेर लिया। फिर तो उनपर बड़े-बड़े शस्त्रोंकी मार पड़ने लगी। इससे भयभीत होकर आत्रेयने कहा—‘मैं इन्द्र नहीं हूँ। मेरी यह भार्या भी शची नहीं है। न तो यह इन्द्रपुरी है और न यहाँ इन्द्रका नन्दनवन है। वृत्रहन्ता, वज्रधारी और सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र तो स्वर्गमें ही हैं। मैं तो वेदवेत्ता ब्राह्मण हूँ और ब्राह्मणोंके साथ ही गौतमीके तटपर निवास करता हूँ। दुर्देवकी प्रेरणासे मैंने यह कर्म कर डाला, जो न तो वर्तमान कालमें सुख देनेवाला है और न भविष्यमें ही।’
असुर बोले—मुनिश्रेष्ठ आत्रेय! यह इन्द्रका अनुकरण छोड़कर यहाँका सारा वैभव समेट लो, तभी तुम कुशलसे रह सकते हो; अन्यथा नहीं।
आत्रेयने कहा—‘मैं अग्निकी शपथ खाकर सच-सच कहता हूँ—आपलोग जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगा।’ दैत्योंसे यों कहकर वे पुनः विश्वकर्मासे बोले—‘प्रजापते! आपने मेरी प्रसन्नताके लिये जो इन्द्रपदका निर्माण किया था, इसका फिर उपसंहार कर लीजिये और ऐसा करके मुझ ब्राह्मण मुनिकी शीघ्र रक्षा कीजिये। मुझे फिर अपना वही आश्रम लौटा दीजिये, जहाँ मृग, पक्षी, वृक्ष और जल हैं। मुझे इन दिव्य भोगोंकी कोई आवश्यकता नहीं है। शास्त्रीय मर्यादाका उल्लङ्घन करके प्राप्त की हुई कोई भी वस्तु सुखद नहीं होती।’