संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२१- पार्वतीजीका स्वयंवर और महादेवजीके साथ उनका विवाह
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विश्वको धारण करनेवाली देवीसे कहा—‘महाव्रते! तुमने यह क्या किया? भलीभाँति सोचकर देखो तो सही। तपस्याका उपार्जन बड़े कष्टसे होता है, अतः उसका परित्याग अच्छा नहीं माना गया है। तुम अपनी तपस्या ले लो। साथ ही इस बालकको भी मैं छोड़े देता हूँ।’
देवीने कहा—ग्राह! मुझे अपना शरीर देकर भी यत्नपूर्वक ब्राह्मणकी रक्षा करनी चाहिये। तपस्या तो मैं फिर भी कर सकती हूँ; किंतु यह ब्राह्मण पुनः नहीं मिल सकता। महाग्राह! मैंने भलीभाँति सोचकर तपस्याके द्वारा बालकको छुड़ाया है। तपस्या ब्राह्मणोंसे श्रेष्ठ नहीं है। मैं ब्राह्मणोंको ही श्रेष्ठ मानती हूँ। ग्राहराज! मैं तपस्या देकर फिर नहीं लूँगी। कोई मनुष्य भी अपनी दी हुई वस्तुको वापस नहीं लेता। अतः यह तपस्या तुममें ही सुशोभित हो। इस बालकको छोड़ दो।
पार्वतीके यों कहनेपर सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले ग्राहने उनकी प्रशंसा की, उस बालकको छोड़ दिया और देवीको नमस्कार करके वहीं अन्तर्धान हो गया। अपनी तपस्याकी हानि समझकर पार्वती ने पुनः नियमपूर्वक तपका आरम्भ किया। उन्हें पुनः तपस्या करनेके लिये उत्सुक जान साक्षात् भगवान् शङ्करने प्रकट होकर कहा—‘देवि! अब तपस्या न करो। तुमने अपना तप मुझे ही समर्पित किया है। अतः वही सहस्रगुना होकर तुम्हारे लिये अक्षय हो जायगा।’
इस प्रकार तपस्याके अक्षय होनेका उत्तम वरदान पाकर उमादेवीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे स्वयंवरकी प्रतीक्षा करने लगीं।
पार्वतीजीका स्वयंवर और महादेवजीके साथ उनका विवाह
**ब्रह्माजी कहते हैं—**तदनन्तर समयानुसार हिमालयके विशाल पृष्ठभागपर पार्वतीका स्वयंवर रचाया गया। उस समय वह स्थान सैकड़ों विमानोंसे घिर रहा था। गिरिराज हिमवान् किसी बातको सोचने-विचारनेमें बड़े निपुण थे। पुत्रीने देवाधिदेव महादेवजीके साथ जो मन्त्रणा की थी, वह उन्हें ज्ञात हो गयी थी; अतः उन्होंने सोचा, यदि मेरी कन्या सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले देवता, दानव तथा सिद्धोंके समक्ष महादेवजीका वरण करे तो वही वाञ्छनीय पुण्य होगा। उसीमें मेरा अभ्युदय निहित है। यों विचारकर शैलराजने मन-ही-मन महेश्वरका स्मरण करके रत्नोंसे मण्डित प्रदेशमें स्वयंवर रचाया। गिरिराजकुमारीके स्वयंवरकी घोषणा होते ही सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले देवता आदि सुन्दर वेश-भूषा धारण करके वहाँ आने लगे। हिमवान्की सूचना पाकर मैं भी
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
देवताओंके साथ वहाँ उपस्थित हुआ। मेरे साथ सिद्ध और योगी भी थे। इन्द्र, विवस्वान्, भग, कृतान्त (यम), वायु, अग्नि, कुबेर, चन्द्रमा, दोनों अश्विनीकुमार तथा अन्यान्य देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग और किन्नर भी मनोहर वेष बनाये वहाँ आये थे। शचीपति इन्द्र उस समाजमें अधिक दर्शनीय जान पड़ते थे। वे अप्रतिहत आज्ञा, बल और ऐश्वर्यके कारण हर्षमग्न हो स्वयंवरकी शोभा बढ़ा रहे थे।
जो तीनों लोकोंकी उत्पत्तिमें कारण, जगत्को जन्म देनेवाली तथा देवता और असुरोंकी माता हैं, जो परम बुद्धिमान् आदिपुरुष भगवान् शिवकी पत्नी मानी गयी हैं तथा पुराणोंमें परा प्रकृति बतायी गयी हैं, वे ही भगवती सती दक्षपर कुपित हो देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये हिमवान्के घरमें अवतीर्ण हुई थीं। वे जिस विमानपर बैठी थीं, उसमें सुवर्ण और रत्न जड़े हुए थे। उनके दोनों ओर चँवर डुलाये जा रहे थे। वे सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले सुगन्धित पुष्पोंकी माला हाथमें लिये स्वयंवर-सभामें जानेको प्रस्थित हुईं।
इन्द्र आदि देवताओंसे स्वयंवर-मण्डप भरा हुआ था। भगवती उमा माला हाथमें लिये देव-समाजमें खड़ी थीं। इसी समय देवीकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शङ्कर पाँच शिखावाले शिशु बनकर सहसा उनकी गोदमें आकर सो गये। देवीने उस पञ्चशिख बालकको देखा और ध्यानके द्वारा उसके स्वरूपको जानकर बड़े प्रेमके साथ उसे अङ्कमें ले लिया। पार्वतीका संकल्प शुद्ध था। वे अपना मनोवाञ्छित पति पा गयीं, अतः भगवान् शङ्करको हृदयमें रखकर स्वयंवरसे लौट पड़ीं। देवीके अङ्कमें सोये हुए उस शिशुको देखकर देवता आपसमें सलाह करने लगे कि यह कौन है। कुछ पता न लगनेसे अत्यन्त मोहमें पड़कर वे बहुत कोलाहल करने लगे और वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्रने अपनी एक बाँह ऊँचे उठाकर उस बालकपर वज्रका प्रहार करनेकी चेष्टा की; किंतु शिशुरूपधारी देवाधिदेव शङ्करने उन्हें स्तम्भित कर दिया। अब वे न तो वज्र चला सके और न हिल-डुल सके। तब भग नामवाले बलवान् आदित्यने एक तेजस्वी शस्त्र चलाना चाहा, किंतु भगवान्ने उनकी बाँहको भी जडवत् बना दिया। साथ ही उनका बल, तेज और योगशक्ति भी व्यर्थ हो गयी। उस समय मैंने परमेश्वर शिवको पहचाना और शीघ्र उठकर उनके चरणोंमें आदरपूर्वक मस्तक झुकाया। इसके बाद मैंने उनकी स्तुति करते हुए कहा—'भगवन्! आप अजन्मा और अजर देवता हैं; आप ही जगत्के स्रष्टा, सर्वव्यापक, परावरस्वरूप, प्रकृति-पुरुष तथा ध्यान करनेयोग्य अविनाशी हैं। अमृत, परमात्मा, ईश्वर, महान् कारण, मेरे भी उत्पादक, प्रकृतिके स्रष्टा, सबके रचयिता और प्रकृतिसे भी परे हैं। ये देवी पार्वती भी प्रकृतिरूपा हैं, जो सदा ही आपके सृष्टिकार्यमें सहायक होती हैं। ये प्रकृतिदेवी पत्नीरूपमें प्रकट होकर जगत्के कारणभूत आप परमेश्वरको प्राप्त हुई हैं। महादेव! देवी पार्वतीके साथ आपको नमस्कार है। देवेश्वर! आपके ही प्रसाद और आदेशसे मैंने इन देवता आदि प्रजाओंकी सृष्टि की है। ये देवगण आपकी योगमायासे मोहित हो रहे हैं। आप इनपर कृपा कीजिये, जिससे ये पहले-जैसे हो जायँ।'
तदनन्तर मैंने सम्पूर्ण देवताओंसे कहा—'अरे! तुम सब लोग कितने मूढ़ हो! इन्हें नहीं जानते? ये साक्षात् भगवान् शङ्कर हैं। अब शीघ्र इन्हींकी शरणमें जाओ।' तब वे सब जडवत् बने हुए देवता शुद्धचित्तसे मन-ही-मन महादेवजीको प्रणाम करने लगे। इससे देवाधिदेव महेश्वरने
३७- पार्वतीजीका स्वयंवरमें महादेवजीके चरणोंमें माला अर्पण करना
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प्रसन्न होकर उनका शरीर पहले-जैसा कर दिया। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवने परम अद्भुत त्रिनेत्रधारी विग्रह धारण किया। उस समय उनके तेजसे तिरस्कृत हो सम्पूर्ण देवताओंने नेत्र बंद कर लिये। तब उन्होंने देवताओंको दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे वे उनके स्वरूपको देख सकते थे। वह दृष्टि पाकर देवताओंने परम देवेश्वर भगवान् शिवका दर्शन किया। उस समय पार्वतीदेवीने अत्यन्त प्रसन्न हो समस्त देवताओंके देखते-देखते अपने हाथकी माला भगवान्के चरणोंमें चढ़ा दी।
यह देख सब देवता साधु-साधु कहने लगे। फिर उन लोगोंने पृथ्वीपर मस्तक टेककर देवीसहित महादेवजीको प्रणाम किया। इसके बाद देवताओंसहित मैंने हिमवान्से कहा—'शैलराज! तुम सबके लिये स्पृहणीय, पूजनीय, वन्दनीय तथा महान् हो; क्योंकि साक्षात् महादेवजीके साथ तुम्हारा सम्बन्ध हो रहा है। यह तुम्हारे लिये महान् अभ्युदयकी बात है। अब शीघ्र ही कन्याका विवाह करो, विलम्ब क्यों करते हो?'
मेरी बात सुनकर हिमवान्ने नमस्कारपूर्वक मुझसे कहा—'देव! मेरे सब प्रकारके अभ्युदयमें आप ही कारण हैं। पितामह! जब जिस विधिसे विवाह करना उचित हो, वह सब आप ही करायें।' तब मैंने भगवान् शिवसे कहा—'देव! अब उमाके साथ विवाह करें।' उन्होंने उत्तर दिया—'जैसी आपकी इच्छा।' फिर तो हमलोगोंने महादेवजीके विवाहके लिये तुरंत ही एक मण्डप तैयार किया, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। बहुत-से रत्न चित्र-विचित्र मणियाँ, सुवर्ण और मोती आदि द्रव्य स्वयं ही मूर्तिमान् होकर उस मण्डपको सजाने लगे। मरकतमणिका बना हुआ फर्श विचित्र दिखायी देने लगा। सोनेके खम्भोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। स्फटिकमणिकी बनी हुई दीवार चमक रही थी। द्वारपर मोतियोंकी झालरें लटक रही थीं। चन्द्रकान्त और सूर्यकान्तमणि सूर्य और चन्द्रमाके प्रकाश पाकर पिघल रहे थे। वायु मनोहर सुगन्ध लेकर भगवान् शिवके प्रति अपनी भक्तिका परिचय देती हुई मन्द गतिसे बहने लगी। उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था। चारों समुद्र, इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता, देवनदियाँ, महानदियाँ, सिद्ध, मुनि, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, यक्ष, राक्षस, जलचर, खेचर, किन्नर तथा चारणगण भी उस विवाहोत्सवमें (मूर्तिमान् होकर) सम्मिलित हुए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि सामगान करनेवाले गन्धर्व मनोहर बाजे लेकर उस विशाल मण्डपमें आये थे। ऋषि कथाएँ कहते, तपस्वी वेद पढ़ते तथा मन-ही-मन प्रसन्न होकर वे पवित्र वैवाहिक मन्त्रोंका जप करते थे। सम्पूर्ण जगन्माताएँ और देवकन्याएँ हर्षमग्न हो मङ्गलगान कर रही थीं। भगवान् शङ्करका विवाह हो रहा है, यह जानकर भाँति-भाँतिकी सुगन्ध और सुखका विस्तार