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सर्वकोश
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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

८५- श्रीहरिके अनेक अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन

* श्रीहरिके अनेक अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन *३४५

तुमलोगोंका संहार-काल भी समीप ही है; इसीलिये भगवान्‌ने तुम्हारे बल, तेज, पराक्रम और माहात्म्यका पहले ही संहार कर दिया है। जो जन्म ले चुका है, उसकी मृत्यु निश्चित है। जो ऊँचे चढ़ चुका है, उसका नीचे गिरना भी अवश्यंभावी है। संयोगका अवसान वियोगमें ही होता है और संग्रह हो जानेके बाद उसका क्षय होना भी निश्चित बात है। यह समझकर विद्वान् पुरुष हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होते और इतर मनुष्य भी उन्हींके आचरणसे शिक्षा लेकर वैसे ही बनते हैं।* नरश्रेष्ठ ! यह समझकर तुम्हें भाइयोंके साथ सारा राज्य छोड़कर तपस्याके लिये वनमें जाना चाहिये। अब जाओ, धर्मराज युधिष्ठिरसे मेरी ये सारी बातें कहो। वीर ! परसोंतक अपने भाइयोंके साथ जैसे भी हो सके घरसे प्रस्थान कर दो।'

यह सुनकर अर्जुनने धर्मराजके पास जा अपनी देखी और अनुभव की हुई सारी बातें कह सुनायीं। अर्जुनके मुखसे मेरा संदेश सुनकर समस्त पाण्डव परीक्षित्‌को राज्यपर अभिषिक्त करके वनमें चले गये। मुनिवरो! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे यदुकुलमें अवतीर्ण भगवान् श्रीकृष्णकी सम्पूर्ण लीलाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया।


श्रीहरिके अनेक अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन

मुनियोंने कहा— मुनिश्रेष्ठ! आपने श्रीकृष्ण और बलरामका कैसा अद्भुत माहात्म्य बतलाया! उनकी महिमा अलौकिक है। इस पृथ्वीपर भगवान्‌के माहात्म्यकी चर्चा अत्यन्त दुर्लभ है। महाभाग! आपके मुखसे भगवत्कथा सुनते-सुनते हमें तृप्ति नहीं होती, अतः उनकी लीलाओंका पुनः वर्णन कीजिये। हमने साधु पुरुषोंके मुखसे सुना है कि पुराणोंमें अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके वाराह अवतारका वर्णन है। ब्रह्मन्! भगवान् नारायणने किस प्रकार वाराहरूप धारण किया ? और किस प्रकार अपनी दंष्ट्रासे एकार्णवमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार किया ? सबको अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीहरिकी समस्त लीलाओंका हम विस्तारपूर्वक श्रवण करना चाहते हैं।

व्यासजी बोले— मुनिवरो! तुमलोगोंने मुझपर यह बहुत बड़े प्रश्नका भार रख दिया। मैं यथाशक्ति तुम्हारें प्रश्नोंका उत्तर दूँगा। भगवान् विष्णुकी लीला-कथाका श्रवण करो। भगवान् विष्णुके प्रभावको सुननेमें जो तुम्हारा मन लगा है, यह बहुत बड़े सौभाग्यकी बात है। अतः श्रीविष्णुकी जो-जो लीलाएँ हैं, उन सबका वर्णन सुनो। वेदवेत्ता ब्राह्मण जिन्हें सहस्रमुख, सहस्रनेत्र, सहस्रचरण, सहस्रशिरा, सहस्रकर, अविनाशी देव, सहस्रजिह्व, भास्वान्, सहस्रमुकुट, प्रभु, सहस्रदाता, सहस्रादि, सहस्रबाहु, हवन, सवन, होता, हव्य, यज्ञपात्र, पवित्रक, वेदी, दीक्षा, समिधा, स्रुवा, स्रुक्, सोम, सूर्य, मूसल, प्रोक्षणी, दक्षिणायन, अध्वर्यु, सामग ब्राह्मण, सदस्य, सदन, सभा, यूप, चक्र, ध्रुवा, दर्वी, चरु, उलूखल, प्राग्वंश, यज्ञभूमि, छोटे-बड़े चराचर जीव, प्रायश्चित्त, अर्घ्य, स्थण्डिल, कुश, मन्त्र, यज्ञको वहन करनेवाले अग्निदेव, यज्ञभाग, भागवाहक, अग्राशनभोजी, सोमभोक्ता, हुतार्चि, उदायुध तथा यज्ञमें सनातन प्रभु कहते हैं, उन श्रीवत्सचिह्नविभूषित देवेश्वर


* जातस्य नियतो मृत्युः पतनं च तथोन्नतेः। विप्रयोगावसानस्तु संयोगः संचयः क्षयः ॥
विज्ञाय न बुधाः शोकं न हर्षमुपयान्ति ये। तेषामेवेतरो चेष्टां शिक्षन्तः सन्ति तादृशाः ॥
(२१२ । ८९-९०)

१३०-हिरण्यकशिपुका वध

३४६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


भगवान् विष्णुके सहस्रों अवतार हो चुके हैं और समय-समयपर होते रहते हैं। उनका जो वाराह अवतार है, वह वेदप्रधान यज्ञस्वरूप है। चारों वेद उनके चरण और यूप उनकी दाढ़ें हैं। यज्ञ दाँत और चितियाँ मुख हैं। साक्षात् अग्नि ही उनकी जिह्वा, कुश रोमावलि और ब्रह्म मस्तक है। उनका तप महान् है। दिन और रात्रि उनके नेत्र हैं। वे दिव्यस्वरूप हैं। वेद उनका अङ्ग और श्रुतियाँ आभूषण हैं। हविष्य नासिका, स्रुवा थूथुन और सामवेदका गम्भीर घोष ही उनका स्वर है। वे सत्य धर्मस्वरूप, श्रीसम्पन्न तथा क्रम (गति) और विक्रम (पराक्रम)-के द्वारा सम्मानित हैं। प्रायश्चित्त उनके नख, पशु उनके घुटने तथा यज्ञ उनका स्वरूप है। उद्गाता अन्त्र (आँत), होम लिङ्ग, ओषधि एवं महान् फल बीज हैं। वादी अन्तरात्मा, मन्त्र नितम्ब और सोमरस उनका रक्त है। वेदी कंधा, हविष्य गन्ध तथा हव्य और कव्य उनका प्रचण्ड वेग है। प्राग्वंश (यजमान-गृह) उनका शरीर है। वे परम कान्तिमान् और नाना प्रकारकी दीक्षाओंसे सम्पन्न हैं। दक्षिणा उनका हृदय है। वे महान् योगी और महायज्ञमय हैं। उपाकर्म (वेदोंका स्वाध्याय) उनका हार और प्रवर्ग (एक प्रकारकी होमाग्नि) उनका आभूषण है। नाना प्रकारके छन्द उनके चलनेके मार्ग हैं। गूढ उपनिषद् उनके बैठनेके लिये आसन हैं। पृथ्वीकी छायारूप पत्नी सदा उनके साथ रहती हैं, वे मणिमय शिखरकी भाँति पानीके ऊपर प्रकट हुए। समुद्र, पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूबी थी। सम्पूर्ण जगत्के आदि कारण और सहस्रों मस्तकोंवाले भगवान्ने वाराहरूपमें प्रकट होकर एकार्णवमें प्रवेश किया तथा सब लोकोंका हित करनेकी इच्छासे पृथ्वीको अपनी दाढ़पर उठा लिया। इस प्रकार समस्त जीवोंके हितैषी भगवान् यज्ञवाराहने समुद्र-जलको धारण करनेवाली समूची पृथ्वीका उद्धार किया।

द्विजवरो! यह वाराह-अवतारका वर्णन हुआ। उसके बाद भगवान्‌का नरसिंह अवतार हुआ। उस अवतारमें भगवान्‌ने नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था। प्राचीन कालके सत्ययुगकी बात है, दैत्योंके आदिपुरुष देवशत्रु बलाभिमानी हिरण्यकशिपुने बड़ी भारी तपस्या की। वह साढ़े ग्यारह हजार वर्षोंतक शम-दम तथा ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ मौनव्रत लेकर जप और उपवासमें संलग्न रहा। उसकी तपस्या और नियम-पालनसे स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने हंससे जुड़े हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं आकर दैत्यको वरदान दिया। उनके साथ आदित्य, वसु, मरुद्गण, देवता, रुद्रगण और विश्वेदेव भी थे। ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु ब्रह्माजीने उस दैत्यसे कहा—'सुव्रत! तुम मेरे भक्त हो। मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर

  • श्रीहरिके अनेक अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन * ३४७

माँगो और उसके द्वारा अभीष्ट वस्तु प्राप्त करो।'

हिरण्यकशिपु बोला—लोकपितामह ! देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग और राक्षस मुझे मार न सकें। तपस्वी ऋषि भी क्रोधमें आकर मुझे शाप न दें। किसी अस्त्र या शस्त्रसे, वृक्ष या पर्वतसे अथवा सूखी या गीली वस्तुसे, ऊपर या नीचे—कहीं भी मेरी मृत्यु न हो। जो मेरे सेवक, सेना और वाहनोंसहित मुझे एक ही थप्पड़से मार डालनेमें समर्थ हो, उसीके हाथसे मेरी मृत्यु हो।

ब्रह्माजीने कहा—तात ! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दिये। इन सम्पूर्ण अभीष्टोंको तुम निःसन्देह प्राप्त करोगे।

यों कहकर पितामह ब्रह्माजी ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित वैराजपद—ब्रह्मधामको चले गये। तदनन्तर उस वरदानकी बात सुनकर देवता, नाग, गन्धर्व और मनुष्य ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए और बोले—'भगवन् ! इस वरदानसे तो वह असुर हम-लोगोंको सदा ही कष्ट पहुँचाता रहेगा, अतः हमारे ऊपर प्रसन्न हो उसके वधका भी उपाय सोचिये।'

ब्रह्माजीने कहा—देवताओ ! उसे अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा। उसका भोग समाप्त होनेपर वह साक्षात् भगवान् विष्णुके हाथसे मारा जायगा।

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सब देवता प्रसन्न हो अपने-अपने दिव्य स्थानोंको चले गये। वर पाते ही दैत्यराज हिरण्यकशिपु अभिमानमें आकर समस्त प्रजाको कष्ट देने लगा। आश्रममें रहनेवाले सत्यधर्मपरायण, जितेन्द्रिय एवं उत्तम व्रतधारी महाभाग मुनियोंको भी उसने सताना आरम्भ कर दिया। स्वर्गके देवताओंको हराकर तीनों लोकोंको अपने अधीन करके वह महाबली असुर स्वयं ही स्वर्गमें रहने लगा। वरदानके मदसे उन्मत्त होकर पृथ्वीपर विचरते हुए उस दानवने दैत्योंको तो यज्ञका भागी बनाया और देवताओंको उससे वञ्चित कर दिया। तब आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव और मरुद्गण शरणागतरक्षक सनातन प्रभु महाबली भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और इस प्रकार बोले—'देवेश्वर ! आप हिरण्यकशिपुके भयसे हमारी रक्षा करें। आप ही हमारे परम देवता, परम गुरु और परम विधाता हैं। सुरश्रेष्ठ ! आप ब्रह्मा आदि देवताओंके भी पालक हैं। आपके नेत्र विकसित कमलदलके समान शोभा पाते हैं। आप शत्रुपक्षका नाश करनेवाले हैं। भगवन् ! हमें शरण दीजिये और दैत्योंका संहार कीजिये।'

भगवान् वासुदेवने कहा—देवताओ ! भय छोड़ो। मैं तुम्हें अभय देता हूँ। तुम शीघ्र ही पहलेकी भाँति स्वर्गलोकको प्राप्त करोगे। मैं वरदानसे उन्मत्त दानवराज हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरोंके लिये अवध्य हो रहा है, उसके सेवकगणोंसहित मार डालूँगा।

यों कहकर भगवान् उन देवेश्वरोंको विदा करके स्वयं हिरण्यकशिपुके स्थानपर आये। उस समय उन्होंने आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका बना रखा था। इस प्रकार नृसिंहदेह धारण किये हाथ-में-हाथ मिलाये हुए आये। उनके शरीरका वर्ण मेघके समान श्याम था। शब्द भी मेघकी गर्जनाके समान ही गम्भीर था। ओज और वेगमें भी वे मेघके ही सदृश थे। मतवाले सिंहके समान उनकी चाल थी। यद्यपि हिरण्यकशिपु बलाभिमानी दैत्योंसे सुरक्षित और अत्यन्त बलशाली था तो भी भगवान्ने उसे एक ही थप्पड़से मारकर यमलोक पहुँचा दिया।

यह नृसिंह अवतारकी कथा कही गयी। अब वामन-अवतारका वर्णन सुनो। भगवान्का वामनरूप दैत्योंका विनाश करनेवाला था। उस रूपको धारणकर श्रीहरि बलवान् बलिके यज्ञमें गये और वहाँ उन्होंने अपने तीन ही पगोंसे त्रिलोकीको नापकर सम्पूर्ण दैत्योंको क्षुब्ध कर डाला। बलिके हाथसे समूची

१३१-भगवान् परशुराम

३४८
* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

पृथ्वी लेकर भगवान्ने इन्द्रको दे दी। यही महात्मा श्रीविष्णुका वामन अवतार है। वेदवेत्ता ब्राह्मण भगवान् वामनके यशका सदा गान करते हैं।

तदनन्तर भगवान् विष्णुने दत्तात्रेय नामक अवतार धारण किया। दत्तात्रेयजीमें क्षमाकी पराकाष्ठा थी। उस समय वेद, वेदोंकी प्रक्रिया और यज्ञ—सभी नष्टप्राय हो गये थे। चारों वर्णोंमें संकरता आ गयी थी। धर्म शिथिल हो चला था। अधर्म बड़े जोरोंके साथ बढ़ रहा था। सत्य मिटता जाता था और सब ओर असत्यका बोलबाला था। प्रजा क्षीण हो रही थी और धर्म पाखण्डमिश्रित हो गया था। ऐसे समयमें भगवान् दत्तात्रेयने यज्ञों तथा क्रियाओंसहित वेदोंका पुनरुद्धार किया और चारों वर्णोंको पृथक्-पृथक् करके उन्हें व्यवस्थितरूप दिया। दत्तात्रेयजी परम बुद्धिमान् और वरदायक थे; उन्होंने हैहयराज कार्तवीर्यको यह वर दिया था कि ‘राजन्! तुम्हारी ये दो भुजाएँ मेरी कृपासे एक हजार हो जायेंगी। वसुधापते! तुम सम्पूर्ण वसुधाका पालन करोगे। जिस समय तुम युद्धमें खड़े होगे, तुम्हारे शत्रु तुम्हें आँख उठाकर देख भी नहीं सकेंगे—तुम उनके लिये अजेय हो जाओगे।'

यह श्रीविष्णुके दत्तात्रेयावतारकी चर्चा की गयी। इसके बाद भगवान्ने परशुरामावतार ग्रहण किया। राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपनी सहस्र भुजाओंके कारण युद्धमें शत्रुओंके लिये दुर्जय था तो भी परशुरामजीने उसे सेनाके बीचमें मार डाला। राजा अर्जुन रथपर बैठा था, किंतु परशुरामजीने उसे धरतीपर गिरा दिया और छातीपर चढ़कर तीखे फरसेके द्वारा उसकी हजारों भुजाएँ काट डालीं। उस समय कार्तवीर्य बड़े जोर-जोरसे चीखता, चिल्लाता रहा। उन्होंने मेरुगिरिसे विभूषित समस्त पृथ्वीपर करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशें बिछा दीं, इक्कीस बार भूतलको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया और अपने समस्त पापोंका नाश करनेके लिये उन्होंने अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें भृगुनन्दन परशुरामने कश्यपजीको सारी पृथ्वी दक्षिणारूपमें दे दी। साथ ही बहुत-से हाथी, घोड़े, सुन्दर रथ और गौएँ भी दान कीं। आज भी वे विश्वका कल्याण करनेके लिये घोर तपस्या करते हुए महेन्द्र पर्वतपर निवास करते हैं।

यह सनातन परमात्मा श्रीहरिके परशुरामावतारका परिचय दिया गया। चौबीसवें त्रेतायुगमें भगवान्ने दशरथनन्दन कमलनयन श्रीरामके रूपमें अवतार लिया। भगवान् विष्णु उस समय चार रूपोंमें प्रकट हुए थे। उनका तेज सूर्यके समान था। वे लोकमें श्रीरामके नामसे विख्यात हुए और विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाके लिये उनके पीछे-पीछे गये। महायशस्वी श्रीराम सब लोगोंको प्रसन्न रखने, राक्षसोंको मारने और धर्मकी वृद्धि करनेके लिये अवतीर्ण हुए थे। कहते हैं, राजा श्रीराम सदा सब भूतोंका हित करनेके लिये तत्पर रहते थे। वे सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता थे। उन्होंने लक्ष्मणको साथ ले चौदह वर्षोंतक वनमें निवास किया था।

  • श्रीहरिके अनेक अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन * ३४९

उनके साथ उनकी पत्नी सीता भी गयी थीं, जो मूर्तिमती लक्ष्मी थीं। जनस्थानमें निवास करते हुए श्रीरामने देवताओंके अनेक कार्य सिद्ध किये। उन्होंने रावणके द्वारा अपहृत सीताका पता लगाकर उन्हें प्राप्त किया और रावणका वध किया। पुलस्त्यवंशी राक्षसराज रावण देवता, असुर, यक्ष, राक्षस और नागोंके लिये भी अवध्य था। युद्धमें उसको जीतना बहुत ही कठिन था। उसका शरीर कज्जलराशिके समान काला था। उसे कोटि-कोटि राक्षस सदा घेरे रहते थे। वह तीनों लोकोंको मार भगानेवाला, क्रूर, दुर्जय, दुर्धर, गर्वयुक्त, सिंहके समान पराक्रमी और वरदानसे उन्मत्त था। देवताओंके लिये तो उसकी ओर देखना भी कठिन था। ऐसे रावणको भगवान् श्रीरामने सेना और सचिवोंसहित संग्राममें मार डाला। इसके पहले उन्होंने और भी कई अलौकिक कर्म किये थे। अपने मित्र सुग्रीवके लिये उन्होंने महाबली वानरराज वालीको मारा और सुग्रीवको किष्किन्धाके राज्यपर अभिषिक्त किया। मधुका पुत्र लवण नामका दानव मधुवनमें रहता था। वह वीर तो था ही, वर पाकर मतवाला हो उठा था। उसे भगवान्ने शत्रुघ्नके रूपमें जाकर मारा। मारीच और सुबाहु नामक दो बलवान् राक्षस थे, जो शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंके यज्ञोंमें विघ्न डाला करते थे। उनको और उनके साथी अन्य राक्षसोंको भी युद्धकुशल महात्मा श्रीरामने मार गिराया। विराध और कबन्ध दो बड़े भयंकर राक्षस थे। वे पूर्वजन्ममें गन्धर्व थे, किन्तु शापसे मोहित होकर राक्षसभावको प्राप्त हुए थे। उन्हें भी नरश्रेष्ठ श्रीरामने मारकर शापमुक्त कर दिया। श्रीरामके बाण अग्नि, सूर्यकिरण और विद्युत्के समान तेजस्वी, तपाये हुए स्वर्णसे युक्त विचित्र पंखोंसे सुशोभित तथा महेन्द्र-वज्रके सदृश सारयुक्त थे। उन्हींके द्वारा उन्होंने युद्धमें शत्रुओंका नाश किया। परम बुद्धिमान् महर्षि विश्वामित्रने देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष दैत्योंका वध करनेके लिये श्रीरघुनाथजीको अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये थे। पूर्वकालमें, जब कि महात्मा राजा जनकके यहाँ यज्ञ हो रहा था, श्रीरामने खेलमें ही महेश्वरके धनुषको तोड़ डाला था। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीने ये सब अलौकिक कर्म करके दस अश्वमेध-यज्ञ भी किये थे, जो बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण हुए थे। श्रीरामचन्द्रजीके राज्य करते समय कभी अमङ्गलकी बात नहीं सुनी गयी। हवा तेज नहीं चलती थी। कोई किसीका धन नहीं चुराता था। न कभी विधवाओंके विलाप सुने जाते और न अनर्थकी ही प्राप्ति होती थी। उस समय सब कुछ शुभ-ही-शुभ होता था। प्राणियोंको जल, अग्नि अथवा आँधीसे कभी भय नहीं होता था। बूढ़ोंको बालकोंकी प्रेतक्रिया नहीं करनी पड़ती थी। क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी परिचर्या करते थे। वैश्य क्षत्रियोंके प्रति श्रद्धा रखते थे और शूद्र अहंकार छोड़कर ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवा करते थे। श्रीरामके राज्यमें स्त्रियाँ अपने पतिके सिवा दूसरे किसी पुरुषमें आसक्त नहीं होती थीं और पुरुष भी अपनी पत्नीको छोड़ किसी दूसरी स्त्रीपर कुदृष्टि नहीं डालते थे। उस समय सारा जगत् जितेन्द्रिय था। पृथ्वीपर डाकुओंका कहीं नाम भी नहीं था। एकमात्र श्रीराम ही सबके स्वामी और संरक्षक थे। उनके शासनकालमें मनुष्य हजारों वर्ष जीवित रहते और वे सहस्रों पुत्रोंके पिता होते थे। किसी भी प्राणीको रोग नहीं सताता था। रामराज्यमें इस भूतलपर देवता, ऋषि और मनुष्य एक साथ एकत्रित होते थे। पुराणवेत्ता पुरुष इस विषयमें एक गाथा कहा करते हैं—‘‘श्रीरघुनाथजीका वर्ण श्याम और अवस्था युवा है, उनके नेत्र कुछ-कुछ लालिमा लिये हुए हैं, मुखसे तेज बरसता रहता है, वे बहुत कम बोलते हैं। उनकी लंबी भुजाएँ

१३२-भगवान् श्रीकृष्ण

३५० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


घुटनोंतक पहुँचती हैं। उनका मुख बड़ा सुन्दर है। कंधे सिंहके सदृश हैं। महाबाहु श्रीरामने दस हजार वर्षोंतक राज्य किया। उनके राज्यमें सदा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदका घोष सुनायी देता था। धनुषकी टंकार भी सर्वदा कानोंमें आती रहती थी। 'दान करो और स्वयं भी भोगो' का उपदेश कभी बंद नहीं होता था। दशरथनन्दन श्रीराम सत्त्ववान् और गुणवान् होनेके साथ ही सदा अपने तेजसे देदीप्यमान रहते थे। उनकी सूर्य और चन्द्रमासे भी अधिक शोभा होती थी।'*

यह श्रीरामावतारका वर्णन हुआ। इसके बाद श्रीहरिका अवतार मथुरामें हुआ था। वह श्रीकृष्णके नामसे विख्यात हुआ। भगवान् श्रीकृष्ण समस्त संसारका हित करनेके लिये अवतीर्ण हुए थे। उन्होंने मानव-शरीर धारण करके शाल्व, शिशुपाल, कंस, द्विविद, अरिष्ट, वृषभ, केशी, दैत्यकन्या पूतना, कुवलयापीड़ हाथी तथा चाणूर और मुष्टिक नामके मल्लोंका वध किया। अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुरकी हजार भुजाएँ काट डालीं। युद्धमें नरकासुरका संहार किया और महाबली कालयवनको भी भस्म करा दिया। भगवान्ने अपने तेजसे दुष्ट दुराचारी राजाओंके समस्त रत्न हर लिये और उन्हें मौतके घाट उतार दिया। यह अवतार सम्पूर्ण लोकोंका हित-साधन करनेके लिये हुआ था।

इसके बाद विष्णुयशा नामसे प्रसिद्ध कल्कि-अवतार होनेवाला है। भगवान् कल्कि शम्भल नामक गाँवमें अवतीर्ण होंगे। उनके अवतारका उद्देश्य भी सब लोकोंका हित करना ही है। ये तथा और भी अनेक दिव्य अवतार हैं, जो पुराणोंमें ब्रह्मवादी पुरुषोंद्वारा वर्णित हैं। भगवान्के अवतारोंका वर्णन करनेमें देवता भी मोहित हो जाते हैं। पुराण वेदोंकी श्रुतियोंद्वारा समर्थित हैं। इस प्रकार यह अवतार-कथा संक्षेपसे कही गयी। जो सम्पूर्ण लोकोंके गुरु और सदा कीर्तन करनेयोग्य हैं, उन भगवान् विष्णुके अवतारोंका वर्णन किया गया। इसके कीर्तनसे पितरोंको प्रसन्नता होती है। जो हाथ जोड़कर अमितपराक्रमी श्रीविष्णुके अवतारकी कथा सुनता है, उसके पितर भी अत्यन्त तृप्त होते हैं। योगेश्वर भगवान् श्रीहरिकी योगमायाका वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और भगवान्की कृपासे शीघ्र ही उसे ऋद्धि, समृद्धि तथा प्रचुर भोगोंकी प्राप्ति होती है। मुनिवरो! इस प्रकार मैंने अमिततेजस्वी श्रीहरिके सर्वपापहारी पवित्र अवतारोंका वर्णन किया।


* श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्तास्यो मितभाषितः ॥
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः। दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमकारयत् ॥
ऋक्सामयजुषां घोषो ज्याघोषश्च महात्मनः। अव्युच्छिन्नोऽभवद्राष्ट्रे दीयतां भुज्यतामिति ॥
सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा। अतिचन्द्रं च सूर्यं च रामो दाशरथिर्बभौ ॥
(२१३। १५३—१५६)