संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६४- सारस्वत तथा चिच्चिकतीर्थका माहात्म्य
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
हैं। उनके वृत्तान्तका स्मरण, पठन अथवा भक्तिपूर्वक श्रवण भी मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और भोग एवं मोक्षको देनेवाला है। मुने! कुशार्पणतीर्थ काशीसे भी उत्तम है। चराचर जगत्में इसके समान दूसरा कोई भी तीर्थ नहीं है। इसके स्मरणमात्रसे ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश हो जाता है। नारद! यह तीर्थ इस पृथ्वीपर स्वर्गका द्वार बताया जाता है।
सारस्वत तथा चिच्चिकतीर्थका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं— सारस्वत नामक तीर्थ समस्त अभीष्ट वस्तुओंके साथ भोग और मोक्षको भी देनेवाला है। वह मनुष्योंके सब पापोंका नाशक, समस्त रोगोंको दूर करनेवाला और सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता है। नारद! उसके माहात्म्यका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनो। पुष्योत्कटसे पूर्व और गौतमीके दक्षिणतटपर एक विश्वविख्यात पर्वत है, जिसे शुभ्रगिरि कहते हैं। शाकल्य नामसे प्रसिद्ध एक परम निष्ठावान् मुनि उस पुण्यमय शुभ्र पर्वतपर उत्तम तपस्या कर रहे थे। गौतमीके तटपर रहकर तपस्या करनेवाले उन श्रेष्ठ ब्राह्मणको सभी भूतगण प्रतिदिन प्रणाम और उनका स्तवन किया करते थे। ऋषियों, गन्धर्वों तथा देवताओंसे सेवित उस परमपवित्र पर्वतपर देवताओं और ब्राह्मणोंको भय पहुँचानेवाला परशु नामक एक राक्षस रहता था। वह यज्ञसे द्वेष रखता, ब्राह्मणोंकी हत्या करता और इच्छानुसार अनेक रूप धारण करके वनमें विचरता रहता था। जहाँ विद्वान् ब्राह्मण शाकल्यमुनि रहते थे, वहाँ भी वह महापापी राक्षस आया करता था। विप्रवर शाकल्य बड़े तेजस्वी थे। पापाचारी परशु प्रतिदिन उन्हें उठा ले जाने अथवा मार डालनेकी चेष्टामें लगा रहता था, किंतु वह अपने उद्योगमें सफल न हो सका।
एक दिन द्विजश्रेष्ठ शाकल्य देवताओंकी पूजा करके भोजन करनेकी इच्छासे आश्रमपर आये। इसी समय परशु ब्राह्मणका रूप धारण करके किसी कन्याको साथ लिये वहाँ आया। उसका शरीर शिथिल हो गया था, सिरके बाल पक गये थे और वह अत्यन्त दुर्बल दिखायी देता था। उसने शाकल्यसे कहा—'ब्रह्मन्! आप मुझे और इस कन्याको भोजनार्थी जानिये। मानद! हमलोग आतिथ्यके समयपर आये हैं। आप कृतकृत्य हो गये। इस संसारमें वे ही धन्य हैं, जिनके घरसे अतिथि अपनी अभिलाषाको पूर्ण करके निकलते हैं। जो अतिथि-सत्कार नहीं करते, वे जीते हुए भी मृतकके समान हैं। जो भोजनके लिये बैठकर भी अपने लिये बने हुए
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अन्नको अतिथिके लिये दे देता है, उसने मानो पृथ्वीका दान कर दिया।'^१
यह सुनकर शाकल्यने कहा—'मैं तुम्हें भोजन देता हूँ।' यों कहकर उन्होंने उसे आसनपर बिठाया और विधिवत् पूजा करके भोजन परोसा। परशुने हाथमें आचमनके लिये जल लेकर कहा—'दूरसे थके-माँदे आये हुए अतिथिके पीछे देवता भी आते हैं। जब अतिथि तृप्त होता है, तब वे भी तृप्त हो जाते हैं। यदि अतिथिकी तृप्ति न हुई तो वे भी अतृप्त रह जाते हैं। अतिथि और निन्दक—ये दोनों विश्वके बन्धु हैं। निन्दक तो पाप हर लेता है और अतिथि स्वर्गकी सीढ़ी बन जाता है। जो मार्गसे थककर आये हुए अतिथिको अवहेलनापूर्वक देखता है, उसके धर्म, यश और लक्ष्मीका तत्काल नाश हो जाता है।^२ इसलिये मैं थका-माँदा अभ्यागत आपसे कुछ याचना करता हूँ। आप मुझे अभीष्ट वस्तु देंगे, तभी भोजन करूँगा; अन्यथा नहीं।' शाकल्यने कहा—'उसे दिया हुआ ही समझो। तुम निश्चिन्त होकर भोजन करो।' तब राक्षसोंमें श्रेष्ठ परशुने कहा—'मुने! मैं पके बालोंवाला दुर्बल एवं बूढ़ा ब्राह्मण नहीं, तुम्हारा शत्रु हूँ। तुम्हें मारकर खा जानेका अवसर देखते-देखते मेरे कितने वर्ष व्यतीत हो गये। जैसे थोड़ा जल गर्मीमें सूख जाता है, वैसे ही मेरे सब अङ्ग भूखके मारे सूख रहे हैं। अतः मैं तुम्हारे अनुचरोंसहित तुम्हें ले चलूँगा और अपना आहार बनाऊँगा।'
परशुका यह कथन सुनकर शाकल्यने कहा—'जो उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हैं और जिन्हें सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञान है, उनकी की हुई प्रतिज्ञा कभी झूठी नहीं होती। अतः सखे! तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, करो। तथापि मेरी एक बात सुन लो; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषोंका कर्तव्य है कि जो मारनेको उद्यत हों, उनसे भी हितकी ही बात कहे। यह बात ध्यानमें रखो कि मैं ब्राह्मण हूँ। मेरा शरीर वज्रके समान कठोर है और भगवान् श्रीहरि मेरी सब ओरसे रक्षा करते हैं। भगवान् विष्णु मेरे पैरोंकी रक्षा करें। देव जनार्दन मेरे मस्तककी, भगवान् वाराह दोनों भुजाओंकी, कूर्मराज पृष्ठभागकी, कृष्ण हृदयकी, नृसिंहजी अँगुलियोंकी, वाणीके अधीश्वर मुखकी, गरुडवाहन नेत्रोंकी, धनेश दोनों कानोंकी और भगवान् भव सब ओरसे मेरे शरीरकी रक्षा करें। नाना प्रकारकी आपत्तियोंमें एकमात्र साक्षात् भगवान् नारायण ही मेरे लिये शरण हैं।'
यों कहकर शाकल्यने कहा—'राक्षसराज! अब तुम्हारी इच्छा हो तो इस समय आलस्य छोड़कर मुझे यहाँसे उठा ले चलो या यहीं सुखपूर्वक खा जाओ।' उनके यों कहनेपर भी वह राक्षस खानेको तैयार हो गया। सच है, पापीके हृदयमें करुणाका एक कण भी नहीं होता। बड़ी-बड़ी दाढ़ें और विकराल मुख बनाये जब वह ब्राह्मणके समीप पहुँचा, तब उन्हें देखकर बोला—'विप्रवर! तुमको तो शङ्ख, चक्र
१. त एव धन्या लोकेऽस्मिन् येषामतिथयो गृहात्। पूर्णाभिलाषा निर्यान्ति जीवन्तोऽपि मृताः परे॥
भोजने तूपविष्टे तु आत्मार्थं कल्पितं तु यत्। अतिथिभ्यस्तु यो दद्याद्दत्ता तेन वसुंधरा॥
(१६३।१५-१६)
२. अतिथिश्चापवादी च द्वावेतौ विश्वबान्धवौ। अपवादी हरेत्पापमतिथिः स्वर्गसंक्रमः॥
अभ्यागतं पथि श्रान्तं सावज्ञं योऽभिवीक्षते। तत्क्षणादेव नश्यन्ति तस्य धर्मयशःश्रियः॥
(१६३।२०-२१)
८८- परशु राक्षसका शाकल्यमुनिको श्रीहरिके रूपमें देखना
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और गदा हाथमें लिये देखता हूँ। तुम्हारे सहस्रों चरण, सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों हाथ हैं। तुम सर्वव्यापी दिखायी देते हो। सम्पूर्ण भूतोंके एकमात्र निवास हो। तुम्हारा स्वरूप छन्दोमय है। तुम जगन्मय हो! इस रूपमें आज मैं तुम्हें देखता हूँ। तुम्हारा पहला शरीर इस समय नहीं है। इसलिये मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ—अब तुम्हीं मुझे शरण दो। महामते! मुझे ज्ञान प्रदान करो और ऐसा कोई तीर्थ बताओ, जो मेरा पापोंसे उद्धार करनेवाला हो। ब्रह्मन्! महापुरुषोंका दर्शन निष्फल नहीं होता, भले ही वह द्वेष अथवा अज्ञानसे ही क्यों न हुआ हो। लोहेका पारसमणिसे प्रसङ्ग या प्रमादसे भी स्पर्श हो जाय तो भी वह उसे सोना ही बनाता है।'*
राक्षसका यह वचन सुनकर शाकल्यको बड़ी दया आयी! वे बोले—'दैत्यराज! तुम्हें शीघ्र ही सरस्वतीका वरदान प्राप्त होगा। इससे तुममें भगवत्स्तवनकी शक्ति आ जायगी। फिर तुम भगवान् जनार्दनकी स्तुति करना। मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्तिके लिये श्रीनारायणकी स्तुतिके सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है।' 'बहुत अच्छा' कहकर परशु त्रिभुवनपावनी गङ्गाके तटपर गया और स्नान करके पवित्र हो गङ्गाजीकी ओर मुँह करके खड़ा हुआ। उसी समय उसने देखा, शाकल्य मुनिके कथनानुसार जगज्जननी सरस्वती सामने खड़ी हैं। उनका रूप दिव्य है। उन्होंने दिव्य चन्दनका लेप कर रखा है। संसारकी जड़ता दूर करनेवाली जगन्माता जगदम्बा भुवनेश्वरीका दर्शन करके परशुने विनीतभावसे कहा—'देवि! मेरे गुरु शाकल्यने कहा है कि तुम लक्ष्मीकान्त भगवान् गरुड़ध्वजकी स्तुति करो। आपके प्रसादसे वह शक्ति मुझे प्राप्त हो जाय—ऐसी कृपा कीजिये।' सरस्वतीने 'तथास्तु' कहा। उनकी कृपासे शक्ति पाकर परशुने भगवान् जनार्दनकी भाँति-भाँतिके वचनोंद्वारा स्तुति की। इससे भगवान् श्रीहरि बहुत संतुष्ट हुए। उन कृपासिन्धुने राक्षसको वरदान दिया—'तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण होंगे।'
इस प्रकार शाकल्य मुनि, गौतमी गङ्गा, सरस्वती देवी तथा भगवान् नरसिंहके प्रसादसे वह राक्षस महापापी होनेपर भी स्वर्गलोकमें चला गया। जिनके चरणकमलोंमें सम्पूर्ण तीर्थोंका निवास है, उन शार्ङ्गधनुषधारी भगवान् विष्णुकी कृपाका ही यह फल है। तबसे वह तीर्थ सारस्वत नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य श्रीविष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
* महतां दर्शनं ब्रह्मञ्जायते न हि निष्फलम् । द्वेषादज्ञानतो वापि प्रसङ्गाद्वा प्रमादतः ॥
अयसःस्पर्शसंस्पर्शे रुक्मत्वायैव जायते ॥
(१६३। ३८-३९)
८९- राजा पवमानका चिच्चिक पक्षीसे दो मुँह होनेका कारण पूछना
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चिच्चिकतीर्थ सब रोगोंका नाश, सब प्रकारकी चिन्ताओंका निवारण और मनुष्योंको सब प्रकारसे शान्तिका दान करनेवाला है। उस तीर्थके स्वरूपका वर्णन करता हूँ। पूर्वोक्त शुभ्रगिरिपर, जहाँ गौतमीके उत्तरतटपर भगवान् गदाधर विराजमान हैं, पक्षियोंका राजा चिच्चिक रहता था। उसीको भेरुण्ड भी कहते हैं। वह मांसाहारी पक्षी सदा उस पर्वतपर ही रहता था। वहाँ नाना प्रकारके फूल और फलोंसे लदे हुए तथा सभी ऋतुओंमें फूलनेवाले वृक्ष व्याप्त थे। श्रेष्ठ ब्राह्मण भी उस पर्वतके शिखरपर निवास करते थे। गौतमी गङ्गासे उस पर्वतकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। इस प्रकार वह शुभ्रगिरि विविध गुणोंसे सम्पन्न और अनेकों मुनिजनोंसे घिरा हुआ था। एक दिन पूर्वदेशके राजा पवमान, जो क्षत्रियधर्मपरायण, श्रीसम्पन्न और देवताओं तथा ब्राह्मणोंके रक्षक थे, बहुत बड़ी सेना और पुरोहितके साथ वनमें आये। वनमें घूमते-घूमते थककर किसी समय वे एक वृक्षके नीचे आये, जो गौतमीके तटपर था। बहुत-से पक्षी उस वृक्षपर निवास करते थे। वहाँ पहुँचकर राजाने चिच्चिक पक्षीको देखा, जिसके दो मुँह थे। वह स्थूलकाय और सुन्दर था। उसे चिन्तामें निमग्न देख राजाने पूछा—'तुम दो मुखवाले पक्षीके रूपमें कौन हो? चिन्तित-से दिखायी देते हो। यहाँ तो कोई भी दुःखसे पीड़ित नहीं है। फिर तुम कैसे कष्ट पा रहे हो?'
राजाके इस प्रश्नसे पक्षीका मन कुछ आश्वस्त हुआ। उसने बारंबार लम्बी साँसें लेकर धीरे-धीरे कहा—'राजन्! मुझसे न तो दूसरोंको भय है और न दूसरोंसे मुझे भयकी आशङ्का है। यह पर्वत भाँति-भाँतिके फूलों और फलोंसे भरा है। अनेकानेक मुनि यहाँ निवास करते हैं। फिर भी यह पर्वत मुझे सूना ही दिखायी देता है। अतः मैं अपने लिये शोक करता हूँ। मुझे न तो यहाँ कुछ सुख मिलता है और न मेरी कभी तृप्ति ही होती है। इतना ही नहीं, मैं निद्रा, विश्राम और शान्तिसे भी वञ्चित हूँ।' दो मुखवाले पक्षीकी यह बात सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा—'तुम कौन हो? तुमने कौन-सा पाप किया है? और क्यों तुम्हें यह पर्वत सूना दिखायी देता है? यहाँ रहनेवाले प्राणी तो एक मुखसे ही तृप्त रहते हैं। तुम्हारे तो दो मुख हैं। तुम्हें क्यों नहीं तृप्ति होती? तुमने इस जन्ममें अथवा पूर्वजन्ममें कौन-सा पाप किया है? ये सब बातें मुझसे सच-सच बताओ। मैं तुम्हें महान् भयसे बचाऊँगा।'
चिच्चिकने पुनः लंबी साँस लेकर राजासे कहा—'महाराज! मैं तुम्हें अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनो! पूर्वजन्ममें मैं वेद-वेदाङ्गोंमें पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मण था। उत्तम कुलमें मेरा जन्म हुआ था और अच्छे पण्डितके रूपमें मेरी प्रसिद्धि थी; किंतु मैं सबका कार्य बिगाड़नेवाला
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और कलहप्रिय था। लोगोंके मुँहपर कुछ और कहता तथा पीठ-पीछे कुछ और। दूसरोंकी उन्नति देखकर सदा दुःखी होता और माया फैलाकर संसारको ठगा करता था। मैं कृतघ्न, असत्यवादी, परनिन्दाकुशल, मित्रद्रोही, स्वामिद्रोही, गुरुद्रोही, दम्भाचारी और अत्यन्त निर्दय था। मन, वाणी और क्रियाद्वारा बहुत लोगोंको कष्ट पहुँचाता था। दूसरोंकी हिंसा करना ही मेरा सदाका मनोरञ्जन था। स्त्री-पुरुषके जोड़ेमें फूट डाल देना, समूह-के-समूहका विनाश करना, मर्यादा तोड़ना आदि दुष्कर्म मैं बिना विचारे किया करता था। विद्वान् पुरुषोंकी सेवासे दूर ही रहता था। तीनों लोकोंमें मेरे-जैसा पापी दूसरा कोई नहीं था। इसीसे मेरे दो मुँह हो गये। दूसरोंको दुःख देनेसे मैं स्वयं भी दुःखका भागी हुआ हूँ और इसीलिये यह पर्वत सूना दिखायी देता है। राजन्! और भी धर्मयुक्त वचन सुनो, जिसके पालन किये बिना ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है। क्षत्रिय युद्धमें जाकर अथवा युद्धसे अन्यत्र भी यदि भागनेवाले, हथियार रख देनेवाले, अपना विश्वास करनेवाले, युद्धमें पीठ दिखानेवाले, अपरिचित, बैठे हुए तथा 'मैं डरता हूँ' यों कहनेवाले मनुष्यको मार डालता है तो उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं। जो सामने प्रिय बोलता, परोक्षमें कटुवचन कहता, मनमें दूसरी बात सोचता, वाणीसे दूसरी बात कहता और क्रियारूपमें सदा दूसरा ही कार्य करता है, जो गुरुजनोंकी शपथ खाता, द्वेष रखता, ब्राह्मणोंकी निन्दा करता और झूठ-मूठकी विनय दिखाता, वह पापात्मा ब्रह्महत्यारा है। जो द्वेषवश देवता, वेद, अध्यात्मशास्त्र, धर्म और ब्राह्मणके सङ्गकी निन्दा करता है, वह ब्रह्मघाती है।* राजन्! मैं ऐसा ही था तो भी लज्जावश दिखानेके लिये सदाचारी-सा बना रहता था; इससे मुझे पक्षी होना पड़ा है। इस अवस्थामें रहनेपर भी मुझसे कहीं कुछ पुण्यकर्म भी बन गया था, जिससे मुझे स्वतः ही अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो आया है।'
चिच्चिककी बात सुनकर राजा पवमानको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा—'किस कर्मसे तुम्हारी मुक्ति होगी?' उसने कहा—'सुव्रत! गौतमीके उत्तरतटपर गदाधर नामक तीर्थ है। वहीं मुझे ले चलो। वह तीर्थ परम पवित्र और सब पापोंका नाश करनेवाला है। मैंने बड़े-बड़े मुनियोंसे सुना है कि वह सब अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। गौतमी गङ्गा तथा भगवान् विष्णुके सिवा दूसरा कोई क्लेशोंका नाश करनेवाला नहीं है। मैं चाहता हूँ 'सर्वतोभावेन' उस तीर्थका दर्शन करूँ। किंतु मेरे प्रयत्नसे यह कभी सम्भव नहीं है। भला, पापियोंको मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति कैसे हो सकती है। वीर! मैं यत्न करनेपर भी उस तीर्थका दर्शन नहीं कर पाता। यह कार्य मेरे लिये अत्यन्त दुष्कर है। तुम्हारी कृपा हो तो मैं भगवान् गदाधरका दर्शन कर सकता हूँ। भगवान् करुणाके सागर हैं। वे बिना बताये ही सबके दुःखोंको जानते हैं। उनका दर्शन कर लेनेपर पुनः मनुष्योंको सांसारिक क्लेशका अनुभव नहीं करना पड़ता।
* प्रत्यक्षं च प्रियं वक्ति परोक्षे परुषाणि च। अन्यद्धृदि वचस्यन्यत्करोत्यन्यत्सदैव यः॥
गुरुणां शपथं कर्ता द्वेष्टा ब्राह्मणनिन्दकः। मिथ्या विनीतः पापात्मा स तु स्याद्ब्रह्मघातकः॥
देवं वेदमथाध्यात्मं धर्मब्राह्मणसङ्गतिम्। एतान्निन्दति यो द्वेषात्स तु स्याद्ब्रह्मघातकः॥
(१६४। ३३—३५)