संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५९- लक्ष्मीतीर्थ और भानुतीर्थका माहात्म्य
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
था। वह उत्तम पुत्रोंकी जननी थी। मौद्गल्यके पिता मुद्गल ऋषि भी सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात थे। उनकी पत्नी भागीरथीके नामसे प्रसिद्ध थी। मौद्गल्य ऋषि प्रातःकाल ही गङ्गा-स्नान करते थे। यह उनका नित्यका कार्य था। गङ्गाके तटपर कुश, मिट्टी और शमीके फूलोंसे वे प्रतिदिन भगवान्का पूजन करते थे। गुरुके बताये हुए मार्गसे अपने हृदयकमलके भीतर वे प्रतिदिन भगवान् विष्णुका आवाहन करते थे। उनके आवाहन करते ही शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले लक्ष्मीपति जगन्नाथ गरुड़पर आरूढ़ हो तुरंत वहाँ आते थे। फिर मौद्गल्य ऋषिके द्वारा यत्नपूर्वक पूजित होनेपर वे कुछ कालतक उन्हें विचित्र-विचित्र कथाएँ सुनाया करते थे। कथा-वार्तामें जब तीसरे पहरका समय हो जाता, तब भगवान् विष्णु उनसे बार-बार कहते—'बेटा! अब अपने घर जाओ, तुम बहुत थक गये होगे।' इस प्रकार भगवान्के आग्रह करनेपर वे घर लौटते थे। उनके जानेपर भगवान् देवताओंके साथ अपने धामको लौटते थे। मौद्गल्य भी प्रतिदिन कुछ लेकर अपने घर आते और पत्नीको अपना उपार्जित धन देते थे। मौद्गल्यकी पत्नी जाबाला बड़ी पतिव्रता थी। उसके स्वामी शाक, फल अथवा मूल—जो कुछ भी ला देते, उसे ही लेकर वह उसका संस्कार करती और पहले अतिथियों, बालकों तथा अपने पतिको परोसती थी। इन सबको भोजन देकर वह पीछे स्वयं अन्न ग्रहण करती। जब सब लोग भोजन कर लेते तब मौद्गल्य मुनि प्रतिदिन रातमें प्रसन्नतापूर्वक श्रीविष्णुके मुखसे सुनी हुई कथाएँ सबको सुनाते थे। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत होनेके बाद मौद्गल्य मुनिने पत्नी, पुत्र, भाई, बन्धु और माता-पिताके साथ उत्तम भोग भोगे और अन्तमें मोक्ष भी प्राप्त कर लिया। तबसे वह तीर्थ मौद्गल्यतीर्थ और श्रीविष्णुतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँका स्नान और दान भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। यदि किसी तरह उस तीर्थके नामका श्रवण अथवा उसका स्मरण ही हो जाय तो भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं और वह मनुष्य पापोंसे मुक्त होकर सुखी हो जाता है। वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर ग्यारह हजार तीर्थ हैं, जो स्नान, दान और जप आदि करनेसे सब पदार्थ देनेवाले हैं।
लक्ष्मीतीर्थ और भानुतीर्थका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं— नारद! विष्णुतीर्थके बाद लक्ष्मीतीर्थ है, जो लक्ष्मीकी वृद्धि और दरिद्रताका नाश करनेवाला है। उसका पवित्र इतिहास बतलाता हूँ, सुनो। पूर्वकालकी बात है—लक्ष्मी और दरिद्रा देवीमें संवाद हुआ। वे दोनों एक-दूसरीका विरोध करती हुई संसारमें आयीं। तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जहाँ ये व्याप्त न हों। दोनों ही कहने लगीं—मैं बड़ी हूँ, मैं बड़ी हूँ। लक्ष्मीने युक्ति दी—'देहधारियोंका कुल, शील और जीवन मैं ही हूँ। मेरे बिना वे जीते हुए भी मृतकके समान हैं।' दरिद्राने भी तर्क उपस्थित किया—'मैं ही सबसे बड़ी हूँ। क्योंकि मुक्ति सदा मेरे ही अधीन है। जहाँ मैं हूँ, वहाँ काम, क्रोध, मद, लोभ और मात्सर्य—ये दोष कभी नहीं रहते। भय, उन्माद, ईर्ष्या और उद्दण्डताका भी अभाव रहता है।' दरिद्राकी बात सुनकर लक्ष्मीने प्रतिवाद किया—'मुझसे अलंकृत होनेपर सभी प्राणी सम्मानित होते हैं। निर्धन
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मनुष्य शिवके ही तुल्य क्यों न हो, सबके द्वारा तिरस्कृत होता रहता है। 'मुझे कुछ दीजिये' यह वाक्य मुँहसे निकालते ही बुद्धि, श्री, लज्जा, शान्ति और कीर्ति—ये शरीरके पाँच देवता तुरंत निकलकर चल देते हैं। गुण और गौरव तभीतक टिके रहते हैं, जबतक मनुष्य दूसरोंके सामने हाथ नहीं फैलाता। जब पुरुष याचक बन गया, तब कहाँ गुण और कहाँ गौरव। जीव तभीतक सबसे उत्तम, समस्त गुणोंका भंडार और सब लोगोंका वन्दनीय रहता है, जबतक वह दूसरेसे याचना नहीं करता। प्राणियोंके लिये निर्धनता सबसे बड़ा कष्ट और पाप है। क्योंकि निर्धन मनुष्यको न तो कोई आदर देता, न उससे बात करता और न उसका स्पर्श ही करता है।* अतः दरिद्रे ! मैं ही श्रेष्ठ हूँ। तू मेरी बात कान खोलकर सुन ले।'
लक्ष्मीका यह दर्पयुक्त वचन सुनकर दरिद्रा बोली—'लक्ष्मी! मैं बड़ी हूँ—यह बारंबार कहते तुझे लज्जा नही आती ? तू श्रेष्ठ पुरुषोंको छोड़कर सदा पापियोंमें ही रमती रहती है। जो तेरा विश्वास करता है, उसके साथ तू वञ्चना करती है। फिर बड़ी-बड़ी डीगें कैसे हाँक रही है। तेरे मिलनेपर मनुष्यको जैसा भारी पश्चात्ताप सहना पड़ता है, वैसा उसे सुख नहीं मिलता। मदिरा पीनेसे भी पुरुषको वैसा भयंकर नशा नहीं होता, जैसा तेरे समीप रहनेमात्रसे विद्वानोंको भी हो जाता है। लक्ष्मी! तू सदा प्रायः पापियोंके साथ ही क्रीड़ा करती है। मैं योग्य और धर्मशील पुरुषोंमें सदा निवास करती हूँ। भगवान् शिव और श्रीविष्णुके भक्त, कृतज्ञ, महात्मा, सदाचारी, शान्त, गुरुसेवा-परायण, साधु, विद्वान्, शूरवीर तथा पवित्र बुद्धिवाले श्रेष्ठ पुरुषोंमें मेरा निवास है। अतः श्रेष्ठता तो सदा मुझमें ही है। तेजस्वी ब्राह्मण, व्रतपरायण संन्यासी तथा निर्भय मनुष्योंके साथ मैं रहा करती हूँ। किंतु तू कहाँ रहती है—यह भी सुन ले। पापपरायण राजकर्मचारी, निष्ठुर, खल, चुगलखोर, लोभी, विकृताङ्ग, शठ, अनार्य, कृतघ्न, धर्मघाती, मित्रद्रोही, अनिष्टकारी तथा हृदयहीन मनुष्योंमें ही तेरा निवास है।
इस तरह विवाद करती हुई वे दोनों मेरे पास आयीं। मैंने उनकी बातें सुनीं और इस प्रकार कहा—'पृथ्वी तथा आप (जल)—ये दोनों देवियाँ मुझसे ही प्रकट हुई हैं। स्त्री होनेके कारण वे ही स्त्रीके विवादको समझ सकती हैं और कोई नहीं। उनमें भी जो कमण्डलुसे प्रकट होनेवाली नदियाँ हैं, वे श्रेष्ठ हैं। उन सरिताओंमें भी गौतमी देवी तो सर्वश्रेष्ठ हैं। अतः वे ही तुम्हारे विवादका निर्णय करेंगी। वे ही सबकी पीड़ाओंको हरनेवाली तथा सबके संदेहका निवारण करनेवाली हैं।' मेरे कहनेसे वे दोनों पृथ्वी और जलके पास गयीं और उन सबको साथ ले गौतमीदेवीके समीप पहुँचीं। भूदेवी और आपोदेवीने गौतमीसे लक्ष्मी और दरिद्राका विवाद स्पष्टरूपसे कह सुनाया। उन दोनोंके विवादको समस्त लोकपाल, पृथ्वी और जल—ये मध्यस्थकी भाँति सुन रहे थे।
उस समय गङ्गाने दरिद्रासे कहा—'ब्रह्मश्री,
* देहीति वचनद्वारा देहस्थाः पञ्च देवताः। सद्यो निर्गत्य गच्छन्ति धीश्रीह्रीशान्तिकीतयः ॥
तावद् गुणा गुरुत्वं च यावन्नार्थयते परम्। अर्थी चेत् पुरुषो जातः क्व गुणाः क्व च गौरवम् ॥
तावत्सर्वोत्तमो जन्तुस्तावत्सर्वगुणालयः। नमस्यः सर्वलोकानां यावन्नार्थयते परम् ॥
कष्टमेतन्महत्पापं निर्धनत्वं शरीरिणाम्। न मानयति नो वक्ति न स्पृशत्यधनं जनः ॥
(१३७।१०—१३)
८०- लक्ष्मी और दरिद्राके विवादमें गोदावरीके द्वारा दरिद्राकी भर्त्सना
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तपःश्री, यज्ञश्री, कीर्ति, धनश्री, यशःश्री, विद्या, प्रज्ञा, सरस्वती, भोगश्री, मुक्ति, स्मृति, लज्जा, धृति, क्षमा, सिद्धि, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, जल, पृथ्वी, अहंशक्ति, ओषधि, श्रुति, शुद्धि, रात्रि, द्युलोक, ज्योत्स्ना, आशीः, स्वस्ति, व्याप्ति, माया, उषा, शिवा आदि जो कुछ भी संसारमें विद्यमान है, वह सब लक्ष्मीके द्वारा व्याप्त है। ब्राह्मण, धीर, क्षमावान्, साधु, विद्वान्, भोगपरायण तथा मोक्षपरायण पुरुषोंमें जो-जो रमणीय अथवा सुन्दर है, वह सब लक्ष्मीका ही विस्तार है। अधिक सुननेसे क्या लाभ—समस्त जगत् लक्ष्मीमय ही है। जिस किसी व्यक्तिमें जो कुछ भी उत्कृष्ट वस्तु दिखायी देती है, वह सब लक्ष्मीमय है। लक्ष्मीसे शून्य कोई वस्तु नहीं है। दरिद्रे! क्या तू इन सुन्दरी लक्ष्मीदेवीके साथ स्पर्द्धा करती हुई लज्जित नहीं होती? जा, चली जा यहाँसे।'
तबसे गङ्गाका जल दरिद्राका शत्रु हो गया। तभीतक दरिद्रताका कष्ट उठाना पड़ता है, जबतक गङ्गाजीका सेवन न किया जाय। तबसे लक्ष्मीतीर्थ अलक्ष्मीनाशक हो गया। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य लक्ष्मीवान् तथा पुण्यवान् होता है। महामते! वहाँ देवताओं तथा ऋषि-मुनियोंद्वारा सेवित छः हजार तीर्थ हैं, जो सब-के-सब सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।
तदनन्तर विख्यात भानुतीर्थ है, जो मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। वहाँका वृत्तान्त महापातकोंका नाश करनेवाला है। उसे बतलाता हूँ, सुनो। शर्याति नामसे विख्यात एक परम धर्मात्मा राजा थे। उनकी स्त्रीका नाम स्थविष्ठा था। रानी इस भूतलपर अप्रतिम सुन्दरी थी। संयमी पुरुषोंमें श्रेष्ठ विश्वामित्रकुमार ब्रह्मर्षि मधुच्छन्दा राजा शर्यातिके पुरोहित थे। एक समयकी बात है—वीरवर राजा शर्याति अपने पुरोहितको साथ ले दिग्विजयके लिये निकले। सम्पूर्ण दिशाओंपर विजय पाकर लौटते समय राजाने मार्गमें सेनाका पड़ाव डाला। उस समय उन्होंने अपने पुरोहितको उदास देखकर पूछा—'विप्रवर! आप खिन्न क्यों हैं? मैंने पृथ्वीको जीता और बड़े-बड़े राजाओंपर विजय पायी, यह तो महान् हर्षका अवसर है। ऐसे समयमें आप दुःखी क्यों हैं? सच-सच बताइये।' तब मधुच्छन्दाने राजाको सम्बोधित करके कहा—'राजन्! जब एक पहर दिन रहेगा, तब हमलोग यात्रा करेंगे। इसीमें रात आधी बीत जायगी। उधर इस शरीरकी स्वामिनी मेरी प्रियतमा कामके वशीभूत होकर मेरी राह देखती है। उसका स्मरण करके मेरा शरीर सूखा जाता है। कामजनित विकार उत्पन्न होनेपर वह कमलके समान मुखवाली सुन्दरी जीवित तो मिलेगी न?'
यह सुनकर राजा हँस पड़े और पुरोहितसे बोले—'ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु और मित्र हैं। फिर अपने-आपको क्यों विडम्बनामें डाल रहे हैं।
८१- पुरोहित-पत्नीको जीवित करनेके लिये राजा शर्यातिका अग्निमें प्रवेश
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संसारका सुख तो क्षणभङ्गुर है। उसमें आप-जैसे महात्माओंकी आस्था कैसी।' मधुच्छन्दा बोले— 'राजन्! जहाँ पति-पत्नी दोनों एक-दूसरेके अनुकूल रहते हैं, वहीं धर्म, अर्थ और कामकी वृद्धि होती है। अतः अपनी पत्नीके प्रति यह अनुराग दूषण नहीं, भूषण ही मानना चाहिये।'
तदनन्तर राजा विशाल सेनाके साथ अपने देशमें आये। उन्होंने पत्नीके प्रेमकी परीक्षा करनेके लिये नगरसे यह संदेश भेज दिया—'राजा शर्याति दिग्विजयके लिये गये थे। वहाँ एक राक्षस पुरोहितसहित राजाको मारकर रसातलमें चला गया।' दूतके मुखसे यह संदेश सुनकर रानी इसकी सत्यताका पता लगाने लगीं, किन्तु मधुच्छन्दाकी पत्नीने तुरंत प्राण त्याग दिये। यह एक अद्भुत बात हो गयी। दूतोंने उसकी मृत्युका हाल महाराजसे जाकर कहा। साथ ही रानियोंकी चेष्टा भी बतायी। इससे राजाको बड़ा विस्मय और दुःख हुआ; उन्होंने दूतोंसे कहा—'तुमलोग जाकर ब्राह्मणीके शरीरकी रक्षा करो और नगरमें यह बात फैला दो कि राजा अपने पुरोहितके साथ राजधानीमें आ रहे हैं।'
यों कहकर राजा चिन्तासे व्याकुल हो उठे। इसी समय आकाशवाणी हुई—'राजन्! इस पृथ्वीपर गौतमी गङ्गा सब प्रकारके संकटोंकी शान्ति करनेवाली तथा पावन हैं, वे आपका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करेंगी।' आकाशवाणी सुनकर शर्याति गौतमीके तटपर गये। उन्होंने ब्राह्मणोंको धन दिया, पितरों और द्विजोंको तृप्त किया और अपने पुरोहितको धनके साथ यह कहकर भेजा—'आप अन्य तीर्थोंमें जाकर धन-दान करें।' राजाका यह सब कार्य पुरोहित नहीं जानते थे। उनके चले जानेपर राजाने सेनाको भी भेज दिया और स्वयं अकेले ही गङ्गातटपर रह गये। उन्होंने गङ्गा, सूर्य तथा देवताओंको सुनाकर कहा—'यदि मैंने दान, होम और प्रजा-पालन किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे वह पतिव्रता ब्राह्मणी मेरी आयु लेकर जीवित हो जाय।' यों कहकर राजा अग्निमें प्रवेश कर गये। उसी समय पुरोहितकी पत्नी जीवित हो गयी।
राजगुरु मधुच्छन्दाको जब यह बात मालूम हुई कि 'राजा अग्निमें प्रवेश कर गये, मेरी पतिव्रता पत्नी मरकर फिर जी उठी और उसीके लिये महाराजने अपने जीवनका परित्याग किया है,' तब उनका ध्यान अपने कर्तव्यकी ओर गया। उन्होंने सोचा—'मैं भी अग्निमें प्रवेश करके अपने प्रिय मित्रके पास जाऊँ अथवा यहीं रहकर तपस्या करूँ?' अन्तमें वे इस निश्चयपर पहुँचे कि 'मेरा कर्तव्य तथा पुण्यकार्य यही है कि पहले राजाको जीवित करूँ, उसके बाद प्रियाके पास जाऊँ।' यह विचारकर उन्होंने सूर्यदेवका स्तवन किया, क्योंकि उनके सिवा दूसरा कोई सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला नहीं है।