संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०- पार्वतीदेवीकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा उनके द्वारा ग्राहके मुखसे ब्राह्मण-बालकका उद्धार
| ७८ | * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण * |
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योग्य भगवान् सूर्यके एक सौ आठ सुन्दर नाम मैंने बताये हैं। जो मनुष्य देवश्रेष्ठ भगवान् सूर्यके इस स्तोत्रका शुद्ध एवं एकाग्र चित्तसे कीर्तन करता है, वह शोकरूपी दावानलके समुद्रसे मुक्त हो जाता और मनोवाञ्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है।
पार्वतीदेवीकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा उनके द्वारा ग्राहके मुखसे ब्राह्मण-बालकका उद्धार
**मुनियोंने पूछा—**प्रभो! दक्षकन्या सतीने क्रोधवश पूर्वशरीरका परित्याग करके फिर गिरिराज हिमालयके घरमें कैसे जन्म लिया? महादेवजीके साथ उनका संयोग कैसे हुआ? तथा उस दम्पतिमें वार्तालाप किस प्रकार हुआ?
**ब्रह्माजी बोले—**मुनिवरो! पार्वती और महादेवजीकी पवित्र कथा पापोंका नाश करनेवाली और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है; उसे कहता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है, महर्षि कश्यप हिमवान्के घरपर पधारे। उस समय हिमवान्ने पूछा—'मुने! किस उपायसे मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे, मेरी अधिक प्रसिद्धि होगी और सत्पुरुषोंमें मैं पूजनीय समझा जाऊँगा?'
**कश्यपने कहा—**महाबाहो! उत्तम संतान होनेसे यह सब कुछ प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मा और ऋषियोंसहित मेरी प्रसिद्धि तो केवल संतानके ही कारण है। अतः गिरिराज! तुम घोर तपस्या करके गुणवान् संतान—श्रेष्ठ कन्या उत्पन्न करो।
**ब्रह्माजी कहते हैं—**कश्यपजीके यों कहनेपर गिरिराज हिमालयने नियममें स्थित होकर ऐसी तपस्या की, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। उस तपस्यासे मुझे बड़ा संतोष हुआ। तब मैंने उनके पास जाकर कहा—'उत्तम व्रतके पालन करनेवाले गिरिराज! अब मैं तुम्हारी इस तपस्यासे संतुष्ट हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो।'
**हिमालयने कहा—**भगवन्! मैं सब गुणोंसे सुशोभित संतान चाहता हूँ। यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं तो ऐसा ही वर दीजिये।
गिरिराजकी यह बात सुनकर मैंने उन्हें मनोवाञ्छित वर देते हुए कहा—'शैलेन्द्र! इस तपस्याके प्रभावसे तुम्हारे कन्या उत्पन्न होगी, जिससे तुम सर्वत्र उत्तम कीर्ति प्राप्त करोगे। तुम्हारे यहाँ कोटि-कोटि तीर्थ वास करेंगे। तुम सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित होगे तथा अपने पुण्यसे देवताओंको भी पावन बनाओगे। तदनन्तर गिरिराजने समयानुसार अपनी पत्नी मैनाके गर्भसे अपर्णा नामकी एक कन्या उत्पन्न की। अपर्णा बहुत समयतक निराहार रही, उसे उपवाससे रोकते हुए माताने कहा—'बेटी! 'उमा' (ऐसा मत करो)।' उस समय वे मातृस्नेहसे दुःखित हो रही थीं।
कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः। वरुणः सागरोंऽशश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥
भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः। स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः॥
अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः। जयो विशालो वरदः सर्वभूतनिषेवितः॥
मनः सुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारणः। धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥
द्वादशात्मा रविर्दक्षः पिता माता पितामहः। स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥
देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः। चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः॥
(३३। ३४—४५)
३५- तपस्विनी पार्वतीको ब्रह्माजीका वरदान
* पार्वतीदेवीकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा उनके द्वारा ग्राहके मुखसे ब्राह्मण-बालकका उद्धार * ७९
माताके यों कहनेपर कठोर तपस्या करनेवाली पार्वतीदेवी उमा नामसे ही संसारमें प्रसिद्ध हुईं। पार्वतीकी तपस्यासे तीनों लोक संतप्त हो उठे। तब मैंने उससे कहा—'देवि! क्यों इस कठोर तपस्यासे तुम सम्पूर्ण लोकोंको संताप दे रही हो? कल्याणि! तुम्हींने इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है। स्वयं ही इसे रचकर अब इसका विनाश न करो। जगन्माता! तुम अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करती हो; फिर कौन ऐसी वस्तु है, जिसे तुम इस समय तपस्याद्वारा प्राप्त करना चाहती हो? वह हमें बतलाओ।'
देवीने कहा—पितामह! मैं जिसके लिये यह तपस्या करती हूँ, उसे आप भलीभाँति जानते हैं। फिर मुझसे क्यों पूछते हैं?
तब मैंने पार्वतीसे कहा—'शुभे! तुम जिनके लिये तप करती हो, वे स्वयं ही तुम्हारा वरण करेंगे। भगवान् शङ्कर ही सर्वश्रेष्ठ पति हैं। वे सम्पूर्ण लोकेश्वरोंके भी ईश्वर हैं। हम सदा ही उनके अधीन रहनेवाले किङ्कर हैं। देवि! वे देवताओंके भी देवता, परमेश्वर और स्वयम्भू हैं। उनका स्वरूप बहुत ही उदार है। उनकी समानता करनेवाला कहीं कोई भी नहीं है।'
तत्पश्चात् देवताओंने आकर परम सुन्दरी पार्वतीसे कहा—'देवि! भगवान् शङ्कर थोड़े ही दिनोंमें आपके स्वामी होंगे। अब इसके लिये तपस्या न कीजिये।' यों कहकर देवताओंने गिरिराजकुमारीकी प्रदक्षिणा की और वहाँसे अन्तर्धान हो गये। पार्वती भी तपस्यासे निवृत्त हो गयीं, किंतु अपने आश्रममें ही रहने लगीं। एक दिन जब वे अपने आश्रमपर उगे हुए अशोक-वृक्षका सहारा लेकर खड़ी थीं, देवताओंकी पीड़ा दूर करनेवाले भगवान् शङ्कर पधारे। उनके ललाटमें चन्द्राकार तिलक लगा था, वे बाँहके बराबर नाटा एवं विकृत रूप धारण करके आये थे। उनकी नाक कटी हुई थी, कूबड़ निकला हुआ था और केशोंका अन्तिम भाग पीला पड़ गया था। उनके मुखकी आकृति भी बिगड़ी हुई थी। उन्होंने पार्वतीसे कहा—'देवि! मैं तुम्हारा वरण करता हूँ।' उमा योगसिद्ध हो गयी थीं। आन्तरिक भावकी शुद्धिसे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया था। वे समझ गयीं कि साक्षात् भगवान् शङ्कर पधारे हैं। तब उनकी कृपा प्राप्त करनेकी इच्छासे पार्वतीने अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्कके द्वारा उनका पूजन करके कहा—'भगवन्! मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। घरमें मेरे पिता मालिक हैं। वे ही मुझे देनेमें समर्थ हैं। मैं तो उनकी कन्या हूँ।' यह सुनकर देवाधिदेव भगवान् शङ्करने उस विकृत रूपमें ही गिरिराज हिमालयके पास जाकर कहा—'शैलेन्द्र! मुझे अपनी कन्या दीजिये।' उस विकृत वेषमें अविनाशी रुद्रको ही आया जान गिरिराजको शापसे भय हुआ। उन्होंने उदास होकर कहा—'भगवन्! ब्राह्मण इस पृथ्वीके देवता हैं,
८० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
मैं उनका अनादर नहीं करता; किंतु मेरे मनमें पहलेसे जो कामना है, उसे सुनिये। मेरी पुत्रीका स्वयंवर होगा। उसमें वह जिसको वरण करेगी, वही उसका पति होगा।' हिमालयकी यह बात सुनकर भगवान् शङ्करने देवीके पास आकर कहा—'तुम्हारे पिताने स्वयंवर होनेकी बात कही है। उसमें तुम जिसका वरण करोगी, वही तुम्हारा पति होगा। उस समय किसी रूपवान्को छोड़कर तुम मुझ-जैसे अयोग्यका वरण कैसे करोगी?'
उनके यों कहनेपर पार्वतीने उनकी बातोंपर विचार करते हुए कहा—'महाभाग! आपको अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मैं आपका ही वरण करूँगी। इसमें कोई अनोखी बात नहीं है। अथवा यदि आपको मुझपर संदेह है तो मैं यहीं आपका वरण करती हूँ।' यों कहकर पार्वतीने अपने हाथोंसे अशोकका गुच्छा लेकर भगवान् शङ्करके कंधेपर रखा और कहा—'देव! मैंने आपका वरण कर लिया।' भगवती पार्वतीके इस प्रकार वरण करनेपर भगवान् शङ्करने उस अशोक-वृक्षको अपनी वाणीसे सजीव करते हुए-से कहा—'अशोक! तुम्हारे परम पवित्र गुच्छेसे मेरा वरण हुआ है, इसलिये तुम जरावस्थासे रहित एवं अमर रहोगे। तुम जैसा चाहोगे, वैसा रूप धारण कर सकोगे। तुममें इच्छानुसार फूल लगेंगे। तुम सब कामनाओंको देनेवाले, सब प्रकारके आभूषणरूप फूल और फलोंसे सम्पन्न एवं मेरे अत्यन्त प्रिय होगे। तुममें सब प्रकारकी सुगन्ध होगी तथा तुम देवताओंके अधिक प्रिय बने रहोगे।'
यों कहकर जगत्की सृष्टि और सम्पूर्ण भूतोंका पालन करनेवाले भगवान् शङ्कर हिमालयकुमारी उमासे विदा ले वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर पार्वतीदेवी भी उन्हींकी ओर मन लगाये एक शिलापर बैठ गयीं, इसी समय देवाधिदेव शिव स्वयं लीला करनेके लिये ब्राह्मण-बालकका रूप धारणकर निकटवर्ती सरोवरमें प्रकट हुए। उस समय उन्हें ग्राहने पकड़ रखा था। वे बोले—'हाय! ग्राहसे पकड़े जानेके कारण मैं अचेत हो रहा हूँ। कोई हो तो मुझे आकर बचाये।' पीड़ित ब्राह्मणकी वह पुकार सुनकर कल्याणमयी देवी पार्वती सहसा उठ खड़ी हुईं और उस स्थानपर गयीं, जहाँ वह ब्राह्मण-बालक खड़ा था। वहाँ पहुँचकर चन्द्रमुखी देवीने देखा, एक बहुत सुन्दर बालक ग्राहके मुखमें पड़ा थरथर काँप रहा है। ग्राहके खींचनेपर वह तेजस्वी बालक बड़ा आर्तनाद करता था। उस ग्राहग्रस्त बालकको देखकर देवी उमा दुःखसे आतुर हो उठीं और बोलीं—'ग्राहराज! यह अपने पिता-माताका एक ही बालक है, इसे शीघ्र छोड़ दो।'
**ग्राहने कहा—**देवि! छठे दिनपर जो सबसे पहले मेरे पास आ जाता है, उसीको विधाताने मेरा आहार निश्चित किया है। महाभागे! यह बालक आज छठे दिन ब्रह्माजीसे प्रेरित होकर ही मेरे पास आया है, अतः मैं इसे किसी प्रकार न छोड़ूँगा।
**देवी बोलीं—**ग्राहराज! मैंने हिमालयके शिखरपर जो उत्तम तपस्या की है, उसका पुण्य लेकर इस बालकको छोड़ दो। मैं तुम्हें नमस्कार करती हूँ।
**ग्राहने कहा—**देवि! आपने थोड़ी या उत्तम जो कुछ भी तपस्या की है, वह सब मुझे दे दें तो शीघ्र ही यह छुटकारा पा जायगा।
**देवी बोलीं—**महाग्राह! मैंने जन्मसे लेकर अबतक जो पुण्य किया है, वह सब तुम्हें समर्पित है। इस बालकको छोड़ दो।
देवीके इतना कहते ही उनकी तपस्यासे विभूषित हो वह ग्राह दोपहरके सूर्यकी भाँति तेजसे प्रज्वलित हो उठा। उस समय उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। ग्राहने संतुष्ट होकर