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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

(२३२) सतसई-सटीक ।
तजब हटावन हठ परो, शठमति आठों जाम ।
भयो वाम वा वामको, रहत कामबेकाम ॥ ७१५ ॥
यह शठमति आठों प्रहर हठ नहीं छोडता हठ ग्रहण किये
है कामदेव निष्प्रयोजन सदाही उससे प्रतिकूल रहता है
वाम-बायाँ प्रतिकूल ॥ ७१५ ॥
पायल पाँय लगीरहै, लगे अमोलक लाल ।
भोडरहूकी भासिहै, बेंदी भामिनि भाल ॥७१६॥
अमूल्य लाल लगनेसेभी पायल पांवसेही लगी रहती है
चाहे अभ्रककीभी है परन्तु बेंदी बालाके माथेपरही शोभित
होतीहै ऊँचे ऊँचेही हैं नीचे नीचेही हैं "अन्योक्ति" ॥७१६॥
भो यह ऐसोई समय, जहां सुखद दुख देत ।
चैतचाँदकी चाँदनी, डारत किये अचेत ॥७१७॥
अब यह ऐसाही समय आगया सुखदाई वस्तु दुःखदाई
होगई चैतके महीनेकी चाँदनी अचेत किये डालती है
"व्याघात अलंकार" ॥ ७१७ ॥
यदपि नाहिं नाहीं वही, वदन लगी जकजाति ।
तदपि भौंह हांसी भरिनु, हाँसीये ठहराति ७१८॥

सप्तमशतक ७. ( २३३ )
यद्यपि मुखसे नहीं नहीं वही जक लगीजाती है तौभी
हँसीसे भरीहुई भौंहोंमें 'हाँ' सीही ठहरती है । अर्थात
मुखमें नहीं भौंहोंमें हाँ है "विरोधाभास"॥ ७१८ ॥
मुख सूखै मिस रोष मुख, कहत रूखो ह्वै वैन ।
रूखे कैसे होत यह, नेह चीकने नैन ॥ ७१९ ॥
रोषके बहानेसे मुख रूखा किया मुखसे रूखी बातें
कहती हैं परन्तु यह नेहसे चिकने नेत्र रूखे कैसे होसकते हैं
"काव्यलिंगालंकार"॥ ७१९ ॥
वाम तमासे करिरही, विवश वारुणी सेइ ।
झुकति हँसति हँसि हँसि झुकति,झुकि २ हँसि २ देइ
वारुणी पान करके वाम विवश हो तमासे कररही है
कभी झुकती हँसती फिर झुकती झुक २ कर हँस देती है
"जातिअलंकार"॥ ७२० ॥
लग्यो सुमन ह्वैहै सुफल,आतप दोष निवारि ।
वारी वारी आपनी, सींच सुहदता वारि ॥७२१॥
• सुमन ( फूल ) लगा है अच्छा फल लगेगा गर्मीके
दोषसे बचाकर अपना अच्छा मन लगाके फलभी अच्छा लगेगा

( २३४ ) सतसई-सटीक ।
क्रोधरूपी गरमीसे बचाव कर हे वारी ! अपनी प्रेमरूपी वा-
ड़ीको सुहृदतारूप जलसे सींच मान मत कर "श्लेषालं-
कार" ॥ ७२१ ॥
ललन चलन सुनि चुपरही, बोली आप न ईठ ।
राख्यो गंहि गाढे गरो, मनो गलगलीदीठ ॥७२२॥
लालनका चलना सुनकर चुपरही स्वयं प्रीतमसे न बोली
मानो आंसूभरी दृष्टि ने कसकर प्यारीका गला पकड़ रक्खा
है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ७२२ ॥
सकै सताय न तम विरह, निशदिन सरस सनेह ।
वहै रहै लागी दृगनि, दीपशिखासी देह ॥ ७२३ ॥
रात दिन सनेहके कारण विरह रूपी तम नहीं सतासकता
कारण कि, रात दिन नेत्रोंसे उसकी देह दीपकी शिखासी
लगी रहती है "विशेषोक्ति" ॥ ७२३ ॥
इति श्री पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासहित विहारी-
लालकी सतसई सम्पूर्ण ।

प्रशंसा।
दोहा।
सतसैयाके दोहरा, ज्यों नावकको तीर।
देखतके छोटे लगैं, बेधैं सकल शरीर ॥ १ ॥
सतसईके दोहे नावककेसे तीर हैं देखनेके छोटे लगते हैं
परन्तु सब शरीर वेधते हैं ॥ १ ॥
ब्रजभाषा वरणा कविन, बहुविधि बुद्धिविलास।
सबकी भूषण सतसई, करी विहारीदास ॥ २ ॥
यद्यपि कवियोंने अपनी बुद्धिके अनुसार अनेकविधि
ब्रजभाषाका वर्णन कियाहै परन्तु विहारीदासने सबकी
भूषण सतसई निर्माण की है ॥ २ ॥
करे सातसै दोहरा, सुकवि विहारीदास।
सबकोऊ तिनको पढ़ैं, गुणैं गुणेश विलास ॥ ३ ॥
सुकवि विहारीदासने सातसौ दोहे निर्माण किये उनके
पढ़नेसे गुणनकरनेसे सुख होता है ॥ ३ ॥

( २३६ ) सतसई-सटीक ।
दोहा-राधामाधव पदकमल, प्रेमसहित शिरनाय ।
भाषामें सतसईको, टीका लिखो बनाय ॥ १ ॥
अलंकार अरु अर्थ सब, भाव सहित दरशाय ।
कियो सरसटीका सरल, बुधजन लख सुखपाय॥ २ ॥
वेद बाण अरु अंक विधु, सम्वत पौष सुमास ।
तेरस तिथि बुधवारको, पूरण किय सुखरास ॥ ३ ॥
बसत रामगंगा निकट, नगर मुरादाबाद ।
भजन करत हरिको तहां, बुध ज्वालापरसाद ॥ ४ ॥
तिन हितसों टीका कियो, राधाकृष्ण मनाय ।
ब्रजविलास रचना कछू, भाषामय दरशाय ॥ ५ ॥
जगत विदित श्रीसेठजी, खेमराज सुखदान ।
तिनको सौंपी स्वत्वसह, याहि न छापे आन ॥ ६ ।
कृष्णराधिका ध्यान धर, भज श्रीराधे श्याम ।
इनहीके परसादसे, सिद्ध होत सब काम ॥ ७ ॥
इति ।
पुस्तक मिलनेका पता—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
“श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम् प्रेस खेतवाड़ी-मुंबई.

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