बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
सप्तमशतक ७. ( २३३ )
यद्यपि मुखसे नहीं नहीं वही जक लगीजाती है तौभी
हँसीसे भरीहुई भौंहोंमें 'हाँ' सीही ठहरती है । अर्थात
मुखमें नहीं भौंहोंमें हाँ है "विरोधाभास"॥ ७१८ ॥
मुख सूखै मिस रोष मुख, कहत रूखो ह्वै वैन ।
रूखे कैसे होत यह, नेह चीकने नैन ॥ ७१९ ॥
रोषके बहानेसे मुख रूखा किया मुखसे रूखी बातें
कहती हैं परन्तु यह नेहसे चिकने नेत्र रूखे कैसे होसकते हैं
"काव्यलिंगालंकार"॥ ७१९ ॥
वाम तमासे करिरही, विवश वारुणी सेइ ।
झुकति हँसति हँसि हँसि झुकति,झुकि २ हँसि २ देइ
वारुणी पान करके वाम विवश हो तमासे कररही है
कभी झुकती हँसती फिर झुकती झुक २ कर हँस देती है
"जातिअलंकार"॥ ७२० ॥
लग्यो सुमन ह्वैहै सुफल,आतप दोष निवारि ।
वारी वारी आपनी, सींच सुहदता वारि ॥७२१॥
• सुमन ( फूल ) लगा है अच्छा फल लगेगा गर्मीके
दोषसे बचाकर अपना अच्छा मन लगाके फलभी अच्छा लगेगा
( २३४ ) सतसई-सटीक ।
क्रोधरूपी गरमीसे बचाव कर हे वारी ! अपनी प्रेमरूपी वा-
ड़ीको सुहृदतारूप जलसे सींच मान मत कर "श्लेषालं-
कार" ॥ ७२१ ॥
ललन चलन सुनि चुपरही, बोली आप न ईठ ।
राख्यो गंहि गाढे गरो, मनो गलगलीदीठ ॥७२२॥
लालनका चलना सुनकर चुपरही स्वयं प्रीतमसे न बोली
मानो आंसूभरी दृष्टि ने कसकर प्यारीका गला पकड़ रक्खा
है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ७२२ ॥
सकै सताय न तम विरह, निशदिन सरस सनेह ।
वहै रहै लागी दृगनि, दीपशिखासी देह ॥ ७२३ ॥
रात दिन सनेहके कारण विरह रूपी तम नहीं सतासकता
कारण कि, रात दिन नेत्रोंसे उसकी देह दीपकी शिखासी
लगी रहती है "विशेषोक्ति" ॥ ७२३ ॥
इति श्री पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासहित विहारी-
लालकी सतसई सम्पूर्ण ।
प्रशंसा।
दोहा।
सतसैयाके दोहरा, ज्यों नावकको तीर।
देखतके छोटे लगैं, बेधैं सकल शरीर ॥ १ ॥
सतसईके दोहे नावककेसे तीर हैं देखनेके छोटे लगते हैं
परन्तु सब शरीर वेधते हैं ॥ १ ॥
ब्रजभाषा वरणा कविन, बहुविधि बुद्धिविलास।
सबकी भूषण सतसई, करी विहारीदास ॥ २ ॥
यद्यपि कवियोंने अपनी बुद्धिके अनुसार अनेकविधि
ब्रजभाषाका वर्णन कियाहै परन्तु विहारीदासने सबकी
भूषण सतसई निर्माण की है ॥ २ ॥
करे सातसै दोहरा, सुकवि विहारीदास।
सबकोऊ तिनको पढ़ैं, गुणैं गुणेश विलास ॥ ३ ॥
सुकवि विहारीदासने सातसौ दोहे निर्माण किये उनके
पढ़नेसे गुणनकरनेसे सुख होता है ॥ ३ ॥
( २३६ ) सतसई-सटीक ।
दोहा-राधामाधव पदकमल, प्रेमसहित शिरनाय ।
भाषामें सतसईको, टीका लिखो बनाय ॥ १ ॥
अलंकार अरु अर्थ सब, भाव सहित दरशाय ।
कियो सरसटीका सरल, बुधजन लख सुखपाय॥ २ ॥
वेद बाण अरु अंक विधु, सम्वत पौष सुमास ।
तेरस तिथि बुधवारको, पूरण किय सुखरास ॥ ३ ॥
बसत रामगंगा निकट, नगर मुरादाबाद ।
भजन करत हरिको तहां, बुध ज्वालापरसाद ॥ ४ ॥
तिन हितसों टीका कियो, राधाकृष्ण मनाय ।
ब्रजविलास रचना कछू, भाषामय दरशाय ॥ ५ ॥
जगत विदित श्रीसेठजी, खेमराज सुखदान ।
तिनको सौंपी स्वत्वसह, याहि न छापे आन ॥ ६ ।
कृष्णराधिका ध्यान धर, भज श्रीराधे श्याम ।
इनहीके परसादसे, सिद्ध होत सब काम ॥ ७ ॥
इति ।
पुस्तक मिलनेका पता—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
“श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम् प्रेस खेतवाड़ी-मुंबई.
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