बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७४ ) सतसई-सटीक ।
प्रीतमने आनकर पीछेसे आँखें मींची उस समय प्यारी
हाथके लगनेका सुख पाकर जान पहँचानकर अजानकी
भांति होती है यह बात सखियोंपर तनक नहीं खुलती।
पर्यायोक्ति। छलसे इष्ट साधा ॥ २११ ॥
सरससुमिलचिततुरँगकी, करिकरिअमितउठान।
गोइ निबाहै जीति यह, प्रेमखेलचौगान ॥२१२॥
प्रेमपूर्वक भली प्रकार प्रीतमसे मिल चित्तरूपी घोड़ेके
अनगिन्त धावे अर्थात् मनोरथ करके ( गोइ ) छिपाकर अ-
थवा गेंदसे निबाहनेसे प्रेम और मैदानका खेल जीतते हैं अ-
र्थात् जैसे घुड़सवार गेंदको लकड़ीसे लुढ़काते सीमातक ले
जातेहैं और जीतते हैं इसी प्रकार तूभी बुद्धिसे छिपाकर म-
र्यादातक निबाहले तो जीतेगी। रूपक ॥ २१२ ॥
दृग मीचत मृगलोचनी, भरयो उलटि भुजबाथ ॥
जानगई तिय नाथको, हाथ परशही हाथ ॥२१३॥
पीछेसे आंख मीचतेही मृगलोचनीने हाथ उलटकर प्रीत-
मको अंकमें भरा, हाथसे छूतेही अपने प्रीतमके हाथको
जानगई। काव्यलिंग ॥ २१३ ॥
मैं मिसहा सोयो समुझि, मुँह चूम्यो ढिग जाय॥
हँस्यो खिसानी गर गह्यो, रही गरे लिपटाय २१४॥