भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
६२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु शनि पर स्थित सूर्य
के प्रभाव से जातक को अर्थ-लाभ के लिए विशेष परिश्रम
तो करना पड़ता है, परन्तु लाभ भी अत्यधिक होता है।
ग्यारहवें भाव में पापग्रह शक्तिशाली माना जाता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले पञ्चमभाव से देखने
के कारण जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान का भी
विशेष लाभ होता है। ऐसा जातक अपनी स्वार्थ पूर्ति
के लिए कटुभाषी भी होता है तथा उसी से लाभ भी
उठाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि
पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का बाहरी
स्थानों से श्रेष्ठ सम्बन्ध होता है, परन्तु व्यय की
अधिकता भी बनी रहती है। उसे अपना खर्च
चलाने के लिए बुद्धिबल का अधिक प्रयोग करना
पड़ता है। सन्तान एवं विद्या पक्ष की हानि तथा
चिन्ता के योग भी उपस्थित होते हैं।
सातवीं दृष्टि से अपने मित्र बुध की राशि
वाले षष्ठभाव को देखने के कारण जातक को शत्रुपक्ष पर विजय प्राप्त होती है,
परन्तु वह मानसिक चिंताओं का शिकार भी बना रहता है।
'मेष' लग्न में 'चन्द्रमा'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में अपने मित्र मंगल की राशि
पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक मानसिक
तथा पारिवारिक सुख-शांति प्राप्त करता है।
सातवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम
भाव को देखने के कारण स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय
के क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त होती है। ऐसे जातक
का दाम्पत्य-जीवन सुखी तथा शारीरिक स्वास्थ्य
उत्तम रहता है।
६३
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि
पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक बड़ा
धनी तथा ऐश्वर्यशाली होता है। उसे कौटुम्बिक
सुख भी यथेष्ट मिलता है, परन्तु माता के पक्ष में
स्थित त्रुटि का अनुभव भी होता है।
सातवीं नीच दृष्टि से मित्र मंगल की राशि
वाले आठवें भाव को देखने के कारण जातक की
आयु, स्वास्थ्य तथा पुरातत्त्व विषयक त्रुटियों का
सामना करना पड़ता है। उसका दैनिक जीवन भी कुछ अशान्तिपूर्ण बना रहता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम में
वृद्धि होती है तथा उसे भाई-बहिनों का सुख
मिलता है। चौथे घर का स्वामी होने के कारण
चन्द्रमा जातकको भूमि, भवन, वाहन आदि का
सुख भी देता है।
सातवीं दृष्टि से मित्र गुरु की राशि से नवें
भाव को देखने के कारण जातक धर्मात्मा, उदार,
दानी, विद्वान्, भाग्यवान् तथा यशस्वी भी होता है। कुल मिला कर इस ग्रह स्थिति
वाला जातक जीवन में अनेक प्रकार की सफलताएँ प्राप्त करता रहता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में स्वराशि पर स्थित चन्द्रमा के
प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन, सम्पत्ति
आदि का पूर्ण सुख प्राप्त होता है तथा मनोरंजन के
साधन निरंतर उपलब्ध होते रहते हैं।
सातवीं दृष्टि से शत्रु शनि की राशि वाले
दशम भाव को देखने के कारण जातक का अपने पिता
से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं सम्मान के क्षेत्र
में कमी बनी रहती है। कुल मिला कर-ऐसा जातक
सब प्रकार से सपन्न होते हुए भी यशस्वी सम्मानित नहीं हो पाता।
६४
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
पाँचवें भाव में अपने मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक
बड़ा विद्वान्, बुद्धिमान एवं सन्ततिवान होता है।
मेष लग्न : पंचमभाव : चन्द्र
सातवीं दृष्टि से अपने शत्रु शनि की राशि
वाले ग्यारहवें भाव को देखने के कारण उसे आय के
साधनों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,
परन्तु उन्हें वह अपने धैर्य एवं शांत स्वभाव से सहन
कर लेता है। कुल मिला कर ऐसी ग्रह स्थिति का
व्यक्ति धीर, गंभीर, शांत, योग्य, विद्वान्, सन्तोषी,
माता से सुखी, भू-सम्पत्ति का स्वामी, परन्तु व्यव-
साय एवं लाभ के क्षेत्र में कठिनाइयां उठाने वाला
होता है।
१३२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
छठे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक
शत्रुपक्ष में शांति का अनुभव करता है तथा विपत्तियों पर अपने धैर्य एवं विनम्रता
मेष लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र के बल पर विजय प्राप्त करता है। उसके घरेलू वाता-
वरण में भी अशांति एवं कमियां बनी रहती हैं।
सातवीं दृष्टि से अपने मित्र गुरु की राशि
वाले बारहवें भाव को देखने के कारण जातक शुभ
कार्यों में व्यय करता है तथा बाहरी स्थानों में लाभ
एवं सुख भी प्राप्त करता है। कुल मिला कर ऐसी
ग्रह स्थिति वाला जातक विनम्र, धैर्यवान, शुभकर्म
करने वाला तथा घरेलू जीवन में त्रुटियों का शिकार
बना रहने वाला होता है।
१३३
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सातवें भाव में अपने सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के
प्रभाव से जातक स्त्री-सुख एवं भोग-विलास को प्राप्त करने वाला, सुन्दर, एवं भूमि
तथा सम्पत्ति का सुख पाने वाला होता है।
मेष लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र
सातवीं दृष्टि से अपने मित्र मंगल की
राशि वाले पहले भाव को देखने के कारण जातक
शारीरिक, सौन्दर्य, सम्मान, मनोरंजन, सुख आदि
को प्राप्त करता है। कुल मिला कर ऐसी ग्रह
स्थित वाला जातक सुन्दर, विलासी, यशस्वी तथा
व्यावसायिक एवं सुख के क्षेत्र में सफलता पाने
वाला होता है।
६५
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवे भाव में अपने मित्र मंगल की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा
अचल सम्पत्ति के पक्ष में हानि उठानी पड़ती है। उसे
पुरातत्त्व तथा आयु संबंधी संकट भी उठाने पड़ते हैं तथा
घरेलू-सुखशान्ति में भी कमी रहती है।
सातवीं उच्चदृष्टि से शुक्र की राशि वाले द्वितीय
भाव को देखने के कारण जातक को धन प्राप्ति के योग
निरन्तर मिलते रहते हैं तथा वह धन एवं सुख को
अर्जित करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील भी बना
रहता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : नवमभाव : चन्द्र नवेंभाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर स्थित
चन्द्रमा के प्रभाव से जातक धर्म-कर्म, दान, पुण्य, तीर्थ-
यात्रा आदि की ओर अधिक आकर्षित रहता है। उसे
माता, भूमि तथा सम्पत्ति का सुख भी प्राप्त होता है।
सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपने मित्र बुध की
राशि वाले तृतीयभाव को देखता है। अतः जातक के
भाई-बहिनों का सुख प्राप्त होगा तथा पराक्रम में भी
वृद्धि बनी रहेगी। कुल मिलाकर इस ग्रह-स्थिति का
जातक सौभाग्यशाली, धन-सम्पत्तिवान, भाई-बहिनों से युक्त तथा धार्मिक आचार-
विचारों वाला होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
'मेष' लग्न : दशमभावः चन्द्र दसवें भाव में अपने शत्रु शनि की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक का अपने पिता से
वैमनस्य रहता है, परन्तु उसे राज्य में सम्मान की प्राप्ति
होती है और वह अपने परिश्रम एवं अध्यवसाय द्वारा
व्यवसाय में भी सफलता प्राप्त करता है।
सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपनी राशि वाले चतुर्थ
भाव की देखता है, अतः उसे माता, भूमि, भवन, सम्पत्ति
आदि का अच्छा सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति अपने
परिश्रम द्वारा अपना मकान बनवाता तथा सुख प्राप्त करता है।
१६
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : एकादशभावः चन्द्र ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु शनि की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक अपने मनोबल के
प्रभाव से अपनी आय के साधनो को बढ़ाता तथा सुखी
जीवन बिताता है। सामान्यतः उसे आय के साधनो में
कुछ कठिनाइयां आती रहती है।
सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपने मित्र की राशि
वाले पंचम भाव को देखता है, अतः जातक विद्वान्
बुद्धिमान् तथा सन्ततिवान् होता है। कुल मिलाकर ऐसी
ग्रह स्थिति वाला व्यक्ति विद्या बुद्धि के द्वारा अपनी उन्नति करता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेषलग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि में
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक शुभ कार्यों तथा
शान-शौकत मे खर्च करने वाला तथा बाहरी स्थानों से
सम्बन्ध रखने वाला होता है।
सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपने मित्र बुध की
राशि वाले षष्ठभाव को देखता है, अतः जातक शत्रु पक्ष
पर शान्ति से विजय पायेगा तथा अपनी बुद्धिमत्ता से
हर प्रकार के झगड़ों को निपटाने में सफल हुआ करेगा।
कुल मिला कर ऐसी ग्रहस्थिति का व्यक्ति सुखी तथा सन्तुष्ट जीवन बिताने वाला
एवं शत्रुपक्ष पर अपनी शालीनता से विजय पाने वाला होता है।
'मेष' लग्न में 'मंगल'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मेष लग्नः प्रथमभावः मंगल पहलेभाव में स्वराशि स्थित मंगल के प्रभाव से
जातक पुष्ट शरीर वाला आत्म-बली तथा साहसी
होता है। आठवें भाव का स्वामी होने तथा उसे पूर्ण
दृष्टि के कारण मंगल जातक को कभी-कभी रोगों का
शिकार भी बना देता है परन्तु आयु लम्बी देता है।
सातवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम
भवन को भी देखता है। अतः जातक को अपनी
पत्नी तथा व्यवसाय के मामले में कुछ हानि भी उठानी
पड़ती है।
६७
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
दूसरे भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि
मेष लग्न: द्वितीयभाव: मंगल में स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की धन-संचय
में कमी तथा शरीर में कष्ट का सामना करना
पड़ता है । चतुर्थ दृष्टि से पंचमभाव को देखने
के कारण जातक विद्या तथा संतान के पक्ष में कुछ
कठिनाइयों का सामना करता है । सातवीं दृष्टि से
अष्टमभाव को देखने के कारण दीर्घायु एवं पुरातत्त्व का
लाभ देता है। आठवीं दृष्टि से नवमभाव को देखने के
कारण भाग्योन्नति में भी रुकावटें डालता रहता है।
२४१
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
तीसरे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर
मेष लग्न : तृतीयभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक पराक्रमी तथा साहसी
होता है, परन्तु मंगल के षष्ठमेशी होने के कारण
भाई-बहिन के सुख में कमी आ जाती है ।
चौथी दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण
जातक शत्रुजयी होता है और हिम्मत से काम लेकर
उन पर अपना प्रभाव डालता है। सातवीं दृष्टि के
मित्र बुध की राशि वाले नवमभाव को देखने के कारण
भाग्योन्नति करता है तथा आठवीं दृष्टि से शत्रु शनि
की राशि वाले दशमभाव को देखने के कारण राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
कठिनाइयाँ भी उपस्थित करता रहता है ।
२४२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
चौथे भाव में अपने मित्र चन्द्रमा की राशि पर
मेष लग्न : चतुर्थभाव : मंगल स्थित नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को माता के
-सुख, भूमि, भवन तथा सुख के क्षेत्र में कमी रहती है ।
चौथी दृष्टि से शत्रु शुक्र की राशि वाले सप्तमभाव
को देखने के कारण स्त्री के सुख में कमी रहती
है । सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु शनि की राशि वाले
दशमभाव को देखने के कारण पिता एवं राज्य द्वारा
लाभ होता है । आठवीं दृष्टि के शत्रु शनि की राशि
वाले ग्यारहवें भाव को देखने के कारण लाभ प्राप्ति
२४३ के लिए जातक को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है ।
६८
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
पांचवें भाव में मित्र सूर्य की राशि पर
'मेष लग्न : पंचमभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को विद्या,
बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में कठिनाइयाँ आती
हैं। चौथी दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को
देखने के कारण जातक की आयु तथा पुरातत्व
का साथ देता है। सातवीं दृष्टि से सम-शनि की
राशि के ग्यारहवें भाव को देखने से कुछ कठिनाइयो
के साथ लाभ के योग उपस्थित करता है तथा
आठवीं दृष्टि से मित्र गुरु के बारहवें भाव को
देखने के कारण खर्च अधिक कराता है तथा बाहरी
स्थानों से आजीविका के सम्बन्ध बनाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
छठे भाव में मित्र बुध की राशि में
मेष लग्न : षष्ठभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक शत्रुजयी,
साहसी तथा निर्भय होता है। चौथी दृष्टि से शनि
की राशि के दसवें भाव को देखने के कारण भाग्यो-
न्नति में कठिनाइयाँ देता है। सातवीं दृष्टि से मित्र
गुरु की राशि के बारहवें भाव को देखने के कारण
खर्च अधिक तथा बाहरी स्थानों से लाभ कराता
है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि वाले प्रथमभाव को
देखने के कारण जातक को शरीर से स्वस्थ,
स्वाभिमानी तथा प्रवल प्रभाव वाला बनाये रखता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
सातवें भाव में शुक्र की राशि में स्थित
मेष लग्न : सप्तमभाव : मंगल मंगल के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय
के पक्ष में कठिनाइयाँ आती हैं। चौथी उच्च
दृष्टि से शनि की राशि के दशमभाव को देखने के
कारण पिता एवं राज्य द्वारा उन्नति के साधन
तथा यश देता है। सातवी दृष्टि से स्वराशि वाले
प्रथमभाव को देखने से जातक के शरीर को स्वस्थ
तथा प्रभावशाली बनाता है। आठवीं दृष्टि से
शुक्र की राशि वाले द्वितीयभाव को देखने के कारण
जातक को धन तथा कुटुम्ब वृद्धि के लिए अधिक
परिश्रम करने पर भी न्यून सफलता देता है।
६६
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मेष लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में स्वराशि स्थित मंगल
के प्रभाव से जातक दीर्घायु तथा पुरातत्त्व का
लाभ प्राप्त करता है, परन्तु लग्न का स्वामी
भी होने के कारण शारीरिक सौन्दर्य में कमी देता
है। चतुर्थ दृष्टि से शनि की राशि वाले एकादश
भाव को देखने के कारण आय के क्षेत्र में
कठिनाइयों के साथ सफलता देता है। सातवीं
दृष्टि से शत्रु शुक्र की राशि वाले द्वितीयभाव को
देखने से धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्ता बनी
रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि के तृतीयभाव के देखने के कारण जातक के पराक्रम
को बढ़ाता है, परन्तु अष्टमेश होने के कारण भाई-बहिन के सुख में कमी भी लाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
नवें भाव में मित्र राशिस्थ मंगल के
मेष लग्न : नवमभाव : मंगल प्रभाव से जातक के भाग्य की उन्नति होती
है, परन्तु मंगल के अष्टमेश होने के कारण
कुछ कठिनाइयाँ भी आती रहती हैं। चौथी मित्र-
दृष्टि से बारहवें भाव को देखने से खर्च की
अधिकता तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध रहता
है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने के
कारण जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु
मंगल के अष्टमेश भी होने के कारण भाई-बहिन के
सुख में कमी आती है। आठवीं नीच दृष्टि से चतुर्थ
भाव को देखने के कारण माता, भूमि, भवन आदि के सुख में कमी बनी रहती है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' में स्थित 'मंगल' का फलादेश
मेष लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शनि की राशि पर स्थित
उच्च मंगल के प्रभाव के जातक अपने पिता से
शत्रुता रखता है, परन्तु व्यवसाय एवं राज्य के क्षेत्र
में उन्नति करता है। चौथी दृष्टि से स्वक्षेत्री प्रथम-
भाव को देखने के कारण शारीरिक प्रभाव में
उन्नति देता है। सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव
को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के सुख
में कमी आती है। आठवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव
को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में
जातक को विशेष सफलता प्राप्त होती है।
१००
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
'मेष' लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में शनि की राशिस्थ मंगल
के प्रभाव से जातक की आय में वृद्धि होती रहती
है, परन्तु अष्टमेश दोष होने के कारण कुछ
कठिनाइयां भी आती हैं। चौथी दृष्टि से शत्रु की
राशि वाले द्वितीयभाव में देखने के कारण धन तथा
कुटुम्ब सम्बन्धी असन्तोष रहता है। सातवीं दृष्टि
से मित्रराशि के पञ्चमभाव को देखने से सन्तान
तथा विद्या के क्षेत्र में कमी बनी रहती है। आठवीं
मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर
प्रभाव बढ़ता है तथा जातक बड़ा साहसी होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मेष लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर
स्थित मंगल के प्रभाव से जातक बाहरी स्थानों में
भ्रमण करने वाला तथा अत्यधिक खर्च करने वाला
होता है। उसके शारीरिक सौंदर्य में भी कमी
रहती है।
चौथी मित्र दृष्टि से तृतीयभाव को देखने
के कारण जातक पराक्रमी होता है, परन्तु मंगल के
अष्टमेश होने के कारण भाई-बहिनों के सुख में
कमी आ जाती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से छठे भाव को देखने के कारण जातक शत्रु
पक्ष में प्रबल रहता है। आठवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम भाव को देखने
से स्त्री-सुख में कमी आती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती रहती हैं।
'मेष' लग्न में 'बुध'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र राशिस्थ बुध के प्रभाव
से जातक पुरुषार्थी होता है, परन्तु बुध के षष्ठेश
दोष के कारण रोग-पीड़ित भी रहता है। इसी
कारण भाई-बहिनों के सुख में भी कुछ कमी आ
जाती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से सातवें भाव को
देखने के कारण व्यवसाय के क्षेत्र में तो परिश्रम
द्वारा सफलता प्राप्त होती है, परन्तु स्त्री-सुख में
कुछ कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिल पाती है।
१०१
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र राशिस्थ बुध के प्रभाव से
जातक के धन एवं पुरुषार्थ में वृद्धि तो होती है, परन्तु
बुध के अष्टमेश होने के कारण धनप्राप्ति के क्षेत्र में
कठिनाइयों तथा हानि का सामना भी करना पड़ता है।
बुध के तृतीयेश होने के कारण भाई-बहिन के सुख में भी
कमी आ जाती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव की देखने के
कारण जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा उसे
पुरातत्त्व सम्बन्धी लाभ भी होते हैं।
१५३
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में स्वराशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक
अत्यन्त पराक्रमी तथा हिम्मती होता है, परन्तु षष्ठेश
होने के कारण जहाँ शत्रुओं पर विजय दिलाता है, वहीं
भाई-बहिन के सुख में कमी भी ले आता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने के
कारण जातक अपने ही पराक्रम से भाग्य की वृद्धि करता
है तथा कुछ कमी के साथ धर्म-पालन की ओर भी प्रेरित
करता रहेगा। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक विवेकी,
परिश्रमी तथा पराक्रमी होता है।
१५४
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा
सुख के पक्ष में कुछ कमियां बनी रहती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव की देखने के
कारण जातक को पिता एवं राज्य पक्ष द्वारा सम्मान
तथा सफलतायें मिलती हैं। ऐसी ग्रह स्थिति का जातक
यशस्वी होता है तथा प्रत्येक क्षेत्र में कुछ परेशानियों के
बाद ही सफलता प्राप्त करता है।
१५५
१०२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्रराशिस्थ बुध के प्रभाव से
जातक अपने विशेष परिश्रम द्वारा विद्या, बुद्धि एवं
सन्तान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है, क्योंकि बुध
में स्थानाधिपति दोष है।
सातवीं मित्रदृष्टि से ग्यारहवें भाव को देखने
के कारण जातक अपने बुद्धि-विवेक द्वारा भाग्य तथा
आय की वृद्धि करता है। बुध के षष्ठेश होने के कारण
जातक को शत्रुपक्ष में भी सफलता मिलती रहती है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में स्वक्षेत्री तथा उच्च के बुध के प्रभाव
से जातक अपने शत्रुओं पर अत्यधिक प्रभाव रखने वाला
तथा अपने पुरुषार्थ द्वारा बड़े-बड़े काम कर दिखाने
वाला होता है।
बुध के पराक्रमेश के साथ षष्ठेश भी होने के
कारण भाई-बहिनों से कुछ विरोध रहता है तथा अपने
पराक्रम के बारे में भी कुछ आन्तरिक कमी का अनुभव
करता रहता है।
सातवीं नीच दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के
कारण जातक को खर्च तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ हानियाँ भी उठानी पड़ती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक अपने पुरुषार्थ द्वारा व्यवसाय में
सफलता पाता है, परन्तु षष्ठेश होने के कारण स्त्री-पक्ष
में कठिनाइयां आती रहती हैं।
सातवीं दृष्टि से मित्र मंगल की राशि वाले
प्रथमभाव को देखने के कारण जातक को सामान्य
शारीरिक कष्ट तथा रोगों का शिकार भी बनाता है।
भाई-बहिन के द्वारा जातक को सहयोग मिलता रहता है
तथा विवेक-बुद्धि भी प्रबल रहती है।
१०३
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : अष्टमभाव : बुध
आठवें भाव में मित्र मंगल की राशि में स्थित
तृतीयेश एवं षष्ठेश बुध के प्रभाव से जातक को पराक्रम,
आयु तथा पुरातत्त्व के सम्बन्ध में कठिनाइयां आती हैं
तथा शत्रुपक्ष से हानि पहुँचने की संभावना भी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से बुध द्वितीयभाव से देखता
है, अतः जातक को धन उपार्जित करने के लिए अधिक
परिश्रम करना पड़ता है। कुल मिलाकर ऐसी ग्रह
स्थिति के जातक का जीवन संघर्षपूर्ण रहता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित षष्ठेश
बुध के कारण जातक की भाग्य-पक्ष में कठिनाइयों का
अनुभव होता है, परन्तु शत्रुपक्ष के सम्बन्ध से भाग्यवृद्धि
में सफलता भी मिलती है।
सातवीं दृष्टि से बुध स्वराशि में तृतीयभाव को
देखता है, अतः जातक का पराक्रम बढ़ा रहता है और
उसे स्व-विवेक तथा भाई-बहिनों द्वारा लाभ प्राप्त होता
रहता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक कुछ परेशानियों
के साथ ही उन्नति कर पाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेषलग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक अपने पराक्रम तथा पुरुषार्थ
द्वारा अत्यधिक उन्नति करता है, परन्तु बुध के षष्ठेश
होने के कारण पिता से कुछ वैमनस्य भी रहता है।
राज्यपक्ष में सम्मान तथा शत्रुपक्ष में सफलता प्राप्त
होती है।
सातवीं शत्रु दृष्टि से बुध चन्द्रमा की राशि के
चौथे भाव को देखता है, अतः माता, भूमि तथा भवन
के सुख में कुछ कमी ला देता है।
१०४
'मेष' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र राशि पर स्थित बुध
के प्रभाव से जातक अपने परिश्रम एवं बुद्धि-विवेक
द्वारा आय के क्षेत्र में अत्यधिक सफलता प्राप्त
करता है। उसे भाई-बहिन का लाभ भी मिलता है,
परन्तु षष्ठेश होने के कारण कुछ कठिनाइयां भी
आती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण
विद्या के क्षेत्र में सफलता देता है तथा कुछ कठि-
नाइयों के साथ सन्तान पक्ष में भी सुख दिलाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मेष लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
षष्ठेश बुध के प्रभाव से जातक को खर्च तथा बाहरी
सम्बन्धों के विषय में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता
है एवं भाई-बहिन के सुख में भी न्यूनता आती है।
सातवीं उच्चदृष्टि से बुध अपनी राशि वाले षष्ठ-
भाव को देखता है अतः जातक स्व-विवेक द्वारा शत्रुपक्ष
पर सफलता पाने में समर्थ होता है तथा गुप्त युक्तियों एवं
धैर्य से काम लेने वाला भी होता है।
'मेष' लग्न में 'गुरु'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में मित्र मंगल की राशि पर
स्थित गुरुके प्रभाव से जातक अत्यधिक यश, उन्नति
एवं बाह्य-स्थानों से प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। पांचवीं
मित्रदृष्टि से गुरु पंचमभाव को देखता है तथा
जातक महा विद्वान्, बुद्धिमान तथा सन्ततिवान
होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने
के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कठिनाइयां
आती हैं। नवीं दृष्टि से स्वराशि वाले नवमभाव
को देखने के कारण जातक के भाग्य एवं धर्म में
वृद्धि होती है।
१०५
'मेष' की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक बाह्य-स्थानों के सम्पर्क से
धन एवं भाग्य की वृद्धि करता है, परन्तु कभी-कभी
हानि भी उठानी पड़ती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से
षष्ठभाव को देखता है, अतः शत्रुपक्ष में बुद्धिमानी
से सफलता प्राप्त होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से
अष्टमभाव को देखने के कारण जातक को पुरा-
तत्त्व एवं आयु का लाभ होता है। नवीं दृष्टि से
शनि की राशि वाले दशमभाव को देखने के कारण
पिता एवं राज्य के पक्ष में कठिनाइयाँ आती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : तृतीयभाव : गुरु
तीसरे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को पराक्रम तथा
भाई-बहिनों का सुख मिलता है। पाँचवीं शत्रु दृष्टि-
से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के
क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। सातवीं दृष्टि से स्व-
राशि वाले नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म
की वृद्धि होती है। नवीं दृष्टि से शत्रु शनि की
राशि वाले ग्यारहवें भाव को देखने के कारण जातक
की आमदनी के मार्ग में कठिनाइयां उपस्थित होती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि,
भवन आदि का पर्याप्त सुख मिलता है। पाँचवीं
मित्र दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण आयु
तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं नीच
दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता एवं राज्य
सुख में कमी रहती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि वाले
द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी स्थानों से
अच्छा सम्बन्ध रहता है, परन्तु व्यय की अधिकता
रहती है। ऐसा जातक धनी, सम्पत्तिवान्, दीर्घायु तथा खर्चीला होता है।
१०६
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक विद्वान्, बुद्धिमान तथा
सन्ततिवान होता है। पांचवीं दृष्टि से स्वराशि वाले
नवें भाव को देखता है अतः जातक के भाग्य की
वृद्धि होती रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादश
भाव को देखने के कारण जातक की आमदनी के क्षेत्र
में कभी-कभी कठिनाइयां आती रहती हैं। नवीं मित्र-
दृष्टि से प्रथमभाव को 'देखने से जातक का शरीर
सुन्दर तथा स्वस्थ बना रहता है। ऐसी ग्रह स्थिति
का जातक विद्वान्, बुद्धिमान, धर्मात्मा तथा आकर्षक व्यक्तित्व वाला होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक को शत्रुपक्ष में सफलता मिलती
है तथा कुछ रुकावटों के साथ भाग्योन्नति भी होती है।
पाँचवीं नीचदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता एवं
राज्य-सम्बन्ध में कमी आती है। सातवीं दृष्टि से द्वादश-
भाव को स्वराशि में देखने के कारण व्यय की अधिकता
रहती है तथा बाहरी संबंधों से सफलता मिलती है। नवीं
शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण कुटुम्ब से
मतभेद रहता है तथा धन-प्राप्ति में कठिनाइयां आती हैं।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र
में कठिनाइयां आती हैं। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से एका-
दशभाव को देखने के कारण आमदनी के मार्ग में
रुकावटें आती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से लग्न को
देखने के कारण जातक का शरीर सुन्दर तथा व्यक्तित्व
प्रभावशाली होता है। नवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव
को देखने के कारण भाई-बहिन तथा पराक्रम का पक्ष
अच्छा बना रहता है।
१०८
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर
स्थित भाग्येश गुरु के प्रभाव से जातक के भाग्य
की उन्नति में कुछ कमी बनी रहती है। पांचवीं
मित्रदृष्टि से गुरु तृतीयभाव को देखता है, परन्तु
व्ययेश होने के कारण भाई तथा पराक्रम के क्षेत्र में
भी त्रुटिपूर्ण सफलता देता है। सातवीं मित्रदृष्टि
से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि एवं
संतान पक्ष का सहयोग मिलता है। नवमीं शत्रुदृष्टि
से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के
क्षेत्र में भी कुछ कठिनाइयों के साथ ही सफलता मिलती है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मेष लग्नः द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में स्वराशि स्थित गुरु के प्रभाव
से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों
से लाभ भी होता है। पांचवीं मित्रदृष्टि से गुरु चतुर्थ-
भाव को देखता है, अतः जातक को माता, भूमि एवं
भवन का सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से
षष्ठभाव को देखता है, अतः शत्रुपक्ष में जातक अपनी
समझदारी से सफलता प्राप्त करता है। नवीं मित्रदृष्टि
से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक के आयु तथा
पुरातत्त्व के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। ऐसी
स्थिति का जातक हरक्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ ही सफलता पाता है।
'मेष' लग्न में 'शुक्र'
'मेष'- लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक सुन्दर शरीर वाला,
सम्मानित, बलिष्ठ तथा चतुर होता है।
सातवीं दृष्टि से शुक्र स्वराशि वाले सप्तम
भाव को देखता है, अतः जातक को स्त्री तथा व्यवसाय
के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं परन्तु शुक्र के
धनेश होने के कारण व्यवसाय तथा कुटुम्ब के पक्ष
में कुछ कठिनाइयां भी आती रहती हैं।
१०६
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में स्वराशि स्थित शुक्र के प्रभाव
से जातक धनी, कुटुम्बवान तथा सौभाग्यशाली
होता है, परन्तु शुक्र के बन्धनेश के साथ सप्तमेश भी
होने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठि-
नाइयाँ भी आती हैं।
सातवीं शत्रुदृष्टि से शुक्र अष्टमभाव को
देखता है, अतः जातक को स्वयोग्यता के कारण ही
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ मिलता है। संक्षेप में,
ऐसा जातक धनी तथा ऐश्वर्यशाली होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक के पराक्रम, चातुर्य, साहस
एवं भाई-बहिनों की वृद्धि होती है, परन्तु सप्तमेश
होने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ
कठिनाइयाँ भी आती हैं।
सातवीं समदृष्टि से नवमभाव को देखने के
कारण जातक भाग्यवान तथा धर्मात्मा भी होता है।
संक्षेप में, ऐसा व्यक्ति भाग्यशाली, धार्मिक, पराक्रमी,
धनी तथा सुखी जीवन व्यतीत करने वाला होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथेभाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के
सुख में कमी रहती है, परन्तु शुक्र के द्वितीयेश तथा
केन्द्रस्थ होने के कारण धन एवं कुटुम्ब का सुख प्राप्त
होता रहता है। इसी प्रकार स्त्री तथा व्यवसाय के सुख
में भी कुछ न्यूनता बनी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव की देखने के
कारण जातक की राज्य तथा पिता के क्षेत्र में सफलता
मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी उन्नति होती है।
११०
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में शत्रु सूर्य की राशि में त्रिकोणस्थ
शुक्र के प्रभाव से जातक को सन्तान एवं विद्या के क्षेत्र
में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र दृष्टि से एकादशभाव को देखने के
कारण जातक की आमदनी अच्छी बनी रहती है।
संक्षेप में इस ग्रह स्थिति का जातक विद्वान्, सन्ततिवान्,
सुखी, धनवान तथा भाग्यशाली होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में मित्र गुरु की राशि पर नीचस्थ
शुक्र के प्रभाव से जातक शत्रु क्षेत्र में गुप्त-चातुर्य से काम
लेता है तथा कठिनाइयों का शिकार बनता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के
कारण जातक के खर्च में अधिकता बनी रहती है, परन्तु
बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में सफलता मिलती है। ऐसी
ग्रह स्थिति से जातक को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परे-
शानियां उठानी पड़ती हैं तथा सफलता पाने के लिए
बुद्धिबल का अधिक प्रयोग करना पड़ता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में केन्द्रस्थ स्वक्षेत्री शुक्र के प्रभाव
से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में विशेष
सफलताएँ मिलती हैं।
सातवीं दृष्टि से लग्न को देखने के कारण जातक
सुन्दर, कार्यकुशल, शारीरिक दृष्टि से पुष्ट तथा
प्रतिष्ठित भी होता है। संक्षेप में, ऐसी ग्रह स्थिति वाला
जातक सुखी, प्रतिष्ठित, होशियार तथा स्त्री, धन
कुटुम्ब आदि के सुख से भरा-पूरा रहता है।
१११
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न:अष्टमभाव:शुक्र आठवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
द्वितीयेश तथा सप्तमेश शत्रु के प्रभाव से जातक को
धन, कुटुम्ब, स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यन्त
कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु आयु
एवं पुरातत्त्व की शक्ति का लाभ होता है ।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को
देखने के कारण जातक कठिन परिश्रम द्वारा धन एवं
कुटुम्ब की वृद्धि करता है तथा अपने चातुर्य द्वारा
प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है ।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : नवमभाव : शुक्र नववें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर त्रिकोणस्थ
शुक्र के प्रभाव से जातक भाग्यवान तथा चतुर होता है,
साथ ही उसे स्त्री तथा कुटुम्ब का अच्छा सुख भी मिलता
है ।
सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण
जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का
अच्छा सुख भी मिलता है ।
संक्षेप में, ऐसी ग्रह-स्थिति वाला जातक सुखी,
धनी, भाग्यवान, धर्मात्मा, पराक्रमी तथा भाई-बहिनों के सुख से युक्त होता है ।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को पिता एवं राज्य क्षेत्र से
सुख प्राप्त होता है ।
सातवीं शत्रुदृष्टि से केन्द्रस्थ शुक्र द्वारा चतुर्थ-
भाव की देखने से जातक को माता, भूमि एवं भवन
का सुख भी प्राप्त होता है ।
संक्षेप में ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक धनी,
सुखी, राज्य द्वारा सम्मानित, माता, पिता तथा स्त्री
के सुख को पाने वाला, यशस्वी तथा परम चतुर होता है ।
११२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' में स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्न: एकादशभावः शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित षष्ठमेश तथा द्वितीयेश शुक्र के प्रभाव से
जातक अपने चातुर्य द्वारा खूब लाभ कमाता है
तथा धनी होता है। उसे स्त्री एवं व्यवसाय द्वारा
भी सुख एवं लाभ की प्राप्ति होती है।
सातवीं शत्रु दृष्टि से पञ्चमभाव को देखने
के कारण जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के
क्षेत्र में बड़ी चतुराई के साथ सफलता मिलती है।
संक्षेप में, ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक धनी, सुखी, चतुर तथा स्वार्थी होता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' में स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मेष लग्नः द्वादशभावः शुक्र बारहवें भाव में अपने सामान्य शत्रु गुरु
की राशि पर स्थित उच्च के शुक्र के प्रभाव से
जातक बाहरी सम्बन्धों द्वारा बड़ी चतुराई से धन
तथा यश प्राप्त करता है तथा बहुत खर्चीला भी
होता है।
सातवीं नीच दृष्टि से मित्र राशि के षष्ठ-
भाव को देखने के कारण जातक शत्रु पक्ष में छल-
छिद्र एवं भेद युक्ति से लाभ निकालता है तथा
शत्रुओं द्वारा कुछ हानि भी उठाता है। संक्षेप में
ऐसी ग्रह स्थिति का जातक संघर्ष-पूर्ण सामान्य जीवन व्यतीत करने वाला होता है।
'मेष' लग्न में 'शनि'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य
तथा मान-प्रतिष्ठा में कमी रहती है तथा राज्य के
क्षेत्र में भी कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। तीसरी
मित्रदृष्टि तृतीयभाव पर पड़ने से पराक्रम तथा
भाई-बहिनों की वृद्धि होती है, सातवीं मित्रदृष्टि
सप्तमभाव पर पड़ने से स्त्री यथा व्यवसाय पक्ष में
सफलता देता है तथा दसवीं दृष्टि से स्वराशि
वाले दशमभाव को देखने के कारण राज्य तथा मित्र के क्षेत्र में प्रतिष्ठा की वृद्धि
भी करता है।